जलवायु परिवर्तन

Submitted by Hindi on Sat, 04/06/2013 - 09:40
Source
गोरखपुर एनवायरन्मेंटल एक्शन ग्रुप, 2011
भारत के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि यहां की कृषि अधिकांशतः मानसून आधारित है। लिहाजा मौसम में हो रहे बदलाव का सीधा प्रभाव मानसून की स्थिति पर पड़ा है और विगत दो दशकों में मानसून की अनिश्चितता ने कृषि को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्वाभाविक है कि वर्षा के क्रम व आवृत्ति में बदलाव का एक बड़ा प्रभाव सूखे के रूप में देखा जा सकता है। डिजास्टर मैनेजमेंट की रिपोर्ट के आधार पर यह स्पष्ट है कि पूरे देश में लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा सूखा क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। उ.प्र. के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो प्रदेश का दक्षिणी हिस्सा अर्थात बुंदेलखंड का पूरा क्षेत्र व विंध्य का कुछ भाग प्रमुख रूप से सूखा क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। विश्व स्तर पर चर्चा का केंद्र बिंदु जलवायु परिवर्तन स्थानीय स्तर पर भी चिंतनीय है, फिर भी हमारी प्रकृति से छेड़-छाड़ जारी है, जो हमारे अस्तित्व के लिए खतरा है।

वर्तमान परिदृश्य में मौसम में हो रहे त्वरित बदलाव को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस चल रही है। विगत दिनों इस ज्वलंत समस्या पर कोपेनहेगन में संपूर्ण विश्व समुदाय एकत्रित होकर इस समस्या पर चिंतन कर रहा था। मौसम व तापमान में हो रहे बदलाव के फलस्वरूप वैश्विक मौसम में आमूल चूल परिवर्तन के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों व पारिस्थितिकी में भी व्यापक स्तर पर बदलाव देखने को मिल रहा है। पृथ्वी की जलवायु हमेशा से परिवर्तनशील रही है इसलिए जलवायु में हो रहा परिवर्तन कोई नया नहीं है क्योंकि प्राकृतिक रूप में इसमें हो रहे बदलाव में एक लंबा समय लगता है और प्रकृति उससे सामंजस्य बनाते हुए कार्य करती है। इसलिए उसके प्रभाव को महसूस नहीं किया जाता है, परंतु विगत दो दशकों में इन बदलावों में तीव्रता व असामान्यता देखी जा रही है नतीजतन उसके प्रभाव स्पष्ट रूप से देखे जा रहे हैं। स्वाभाविक रूप से यह स्थिति मानवीय कार्यों से उत्पन्न हुई है, विकास की अंधा-धुंध दौड़ में विगत 150 वर्षों में मनुष्य ने जो हठधर्मिता अपनाई है, उसके परिणाम अब उसे खुद भुगतने पड़ रहे हैं। पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ रहा है ग्लेशियर पिघल रहे हैं और विभिन्न विसंगतियां जैसे बाढ़, सूखा आदि उत्पन्न हो रही है। यह सब अचानक नहीं बदला है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते औद्योगिकीकरण ने वातावरण में CO2 की मात्रा में बेतहाशा वृद्धि की है। नतीजतन वैश्विक तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि देखी जा रही है। वैज्ञानिकों की मानें तो पिछले एक सदी में पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 0.74 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है। यह जानते हुए भी कि हम प्रकृति का विकल्प निर्मित नहीं कर सकते, हमारी प्रकृति से छेड़छाड़ जारी है। परिणामतः विश्व की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों में दिन-प्रतिदिन परिवर्तन हो रहा है, जो एक बड़ी चिंता का विषय है।

सही मायने में 1850 की औद्योगिक क्रांति ने समूचे जलवायु को परिवर्तित करने में अपनी अहम् भूमिका निभाई है। उस दौरान जिस तरह से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिला और हमने प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करना शुरू किया, उससे प्रकृति पर दो तरफा मार पड़ी। बड़े पैमाने पर कटान हुआ और कंपनियों का धुआँ वायुमंडल में व अन्य अवशिष्ट नदियों में मिलता गया। नतीजतन वायु और जल दोनों प्रदूषित हुए, जिसका सीधा असर लगातार जलवायु में देखने को मिल रहा है। औद्योगिक क्रांति के दौरान ही विकास की दौड़ में अन्य गतिविधियों के कारण ग्रीन हाउस गैसों में बेतहाशा वृद्धि हुई। लिहाजा आज हम वैश्विक तापमान वृद्धि को लेकर चिंतित हैं जो समूचे वायुमंडल की स्थिति को परिवर्तित कर रहा है।

कोपेनहेगेन में ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इण्डेक्स 2010 द्वारा जारी सूची में भारत उन प्रथम दस देशों में है, जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक ठंड के दिनों का तापमान 3.2 डिग्री और गर्मी का 2.2. डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की संभावना है। लिहाजा मानसून की बारिश कम हो सकती है और ठंड में होने वाली वर्षा में भी 15-20 प्रतिशत की कमी हो सकती है। साथ ही साथ वर्षा के समय में भी बदलाव होने की आशंका की जा रही है। नतीजतन इसका असर हमारी कृषि और उसके फलस्वरूप हमारी राष्ट्रीय आय को भी प्रभावित करेगा। वैसे भी भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि की भागीदारी निरंतर उतार की ओर है जैसा कि निम्नांकित आंकड़ों से स्पष्ट है। ऊपर से बदलते मौसम के परिवेश के परिणामस्वरूप इसके और कम होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव


वैश्विक परदृश्य में उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों में आ रहे व्यापक तूफान, चक्रवात अप्रत्याशित वर्षा, वायु की गति में बदलाव, हिमनद का पिघलना, नित नई बीमारियों (मानव, पशु व वनस्पतियों में) का बढ़ता प्रकोप, तापमान का उतार-चढ़ाव आदि ऐसे संकेत हैं, जो जलवायु परिवर्तन को परिलक्षित करते हैं। परिणाम स्वरूप इसका प्रभाव पारिस्थितिकी व जीव समुदाय पर तथा विश्व की सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मानसून की बढ़ती अनिश्चितता, बंजर होती जमीनें, वीरान होते जंगल, बाढ़ की बढ़ती आवृत्ति व प्रवृत्ति, जल संकट, सूखा समय में वृद्धि, गर्म हवाएँ, दरकती धरती, विलुप्त होती प्रजातियाँ (पशुओं, वनस्पियों) इत्यादि ऐसी समस्याएं हैं जो स्पष्टतः जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के रूप में दिखाई पड़ रही हैं। इन प्रभावों का असर विकासशील राष्ट्रों पर ज्यादा हो रहा है और उनमें भी उस समुदाय पर, जो अतिन्यून संसाधनों के साथ अपना जीवनयापन कर रहा है।

भारत में 80 प्रतिशत खेत एक हेक्टेयर से भी छोटे हैं। ऐसी स्थिति में छोटे व सीमांत किसानों को जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप बारम्बार आने वाली बाढ़ व सूखे का सामना करना बहुत कठिन होता है। जलवायु परिवर्तन का भीषणतम असर ऐसे ही छोटे व सीमांत किसानों पर पड़ रहा है जो अपनी आधी से ज्यादा आमदनी अनाज खरीदने, पानी व स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाओं पर खर्च कर देते हैं। लिहाजा मानसून की अनिश्चितता के चलते कृषि पर निर्भर इस वर्ग की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। ऐसी हालत में वे या तो आत्महत्या करने को मजबूर हैं या फिर वे खेतीबाड़ी से पलायन कर रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर हो रहे इन बदलावों का असर क्षेत्रीय स्तर भी अलग-अलग रूप में दिखाई पड़ता है। उ.प्र. के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो यहां की भौगोलिक स्थिति काफी विविधतापूर्ण है। पूरा प्रदेश 9 कृषि जलवायुगत क्षेत्रों में विभक्त है। स्वाभाविक है कि ऐसी विविधता में जलवायु में होने वाले किसी भी तरह के परिवर्तन का प्रभाव सीधे तौर पर यहां की कृषि पर पड़ता है और आजीविका का मुख्य स्रोत होने के नाते अति न्यून संसाधनों के साथ कृषि कार्यों को करने वाली बहुसंख्य आबादी की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित होती है। एक तरफ जहां पूर्वी उ.प्र. बाढ़ की विभीषिका व जल-जमाव से ग्रसित है तो वहीं दूसरी तरफ प्रदेश का दक्षिणी हिस्सा विशेषतः बुंदेलखंड क्षेत्र विगत 10 वर्षों से सूखे की मार झेल रहा है और गंभीर जल संक्कट से जूझ रहा है। सूखे की स्थिति कमोवेश प्रदेश के मध्य व पश्चिम क्षेत्रों में भी देखने को मिल रही है मौसम की अनिश्चतता ने प्रदेश की कृषि को बुरी तरह प्रभावित किया है। लिहाजा यहां का कृषक वर्ग जो कुल जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत है, बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस बहुतायत आबादी की आजीविका का प्रमुख स्रोत आज भी कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर ही निर्भर है।

विगत दो दशकों में जिस तरह से जलवायु में परिवर्तन होता दिखाई पड़ रहा है, उससे कृषि पर पड़ रहे प्रभावों के चलते कृषक समाज की आजीविका पर विपरीत प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है। प्रदेश में बदलती जलवायुविक परिस्थितियों से कहीं पानी की अधिकता तो कहीं उसकी कमी ने कृषक समाज को संकट ला दिया है। प्रदेश का दक्षिणी हिस्सा, जिसमें मूलतः विंध्य व बुंदेलखंड का क्षेत्र आता है, में विगत एक दशक में लगातार पानी की कमी ने सूखा की स्थिति पैदा कर दी है और अब वह एक आपदा के रूप में स्पष्ट रूप से हमारे सामने विद्यमान है। सूखे का प्रभाव इन क्षेत्रों में यहां के लोगों के जीवन-यापन पर स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। खेती की बात तो दूर, यहां लोगों व पशुओं के लिए पेयजल का भी संकट पैदा हो गया है।

इन प्रभावों के चलते जो प्रमुख समस्याएं स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रही है वे मुख्यतः निम्न है-

भूगर्भ जल का निरंतर गिरता स्तर
जल जमाव
भारी संख्या में विस्थापन व पलायन (मानव, पशुओं)
स्थानीय आजीविका के साधनों में कमी
फसल विविधता में ह्रास
उर्वरता का ह्रास
प्रजातियों (जीव, वनस्पति) का विलुप्त होना या कम होना
पारंपरिक जल संचय क्षेत्रों का विलुप्त होना
सामाजिक विघटन
संसाधनों का ह्रास/नुकसान
स्वास्थ्य व शिक्षा पर प्रभाव
महिलाओं पर प्रभाव

उपरोक्त समस्याओं से पूरे प्रदेश का कृषक वर्ग जूझ रह है। विडम्बना यह है कि इस परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार होते हुए भी सबसे ज्यादा प्रभावित वहीं है। बावजूद इसके इस वर्ग ने इन परिस्थितियों से भी निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर अपने पारंपरिक ज्ञान कौशल का प्रयोग करते हुए अपने जोखिम को कम करने का भी प्रयास किया है।

जलवायु परिवर्तन और सूखा


भारत के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि यहां की कृषि अधिकांशतः मानसून आधारित है। लिहाजा मौसम में हो रहे बदलाव का सीधा प्रभाव मानसून की स्थिति पर पड़ा है और विगत दो दशकों में मानसून की अनिश्चितता ने कृषि को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्वाभाविक है कि वर्षा के क्रम व आवृत्ति में बदलाव का एक बड़ा प्रभाव सूखे के रूप में देखा जा सकता है। डिजास्टर मैनेजमेंट की रिपोर्ट के आधार पर यह स्पष्ट है कि पूरे देश में लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा सूखा क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। उ.प्र. के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो प्रदेश का दक्षिणी हिस्सा अर्थात बुंदेलखंड का पूरा क्षेत्र व विंध्य का कुछ भाग प्रमुख रूप से सूखा क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। मानसून की अनियमितता ने इस क्षेत्र में विगत एक दशक में स्थिति को और अधिक भयावह बना दिया है। वायुमंडल में ग्रीन हाऊस गैसों के तेजी से बढ़ने के कारण तापमान में जो वृद्धि हो रही है उसका प्रभाव कृषिगत क्षेत्रों पर पड़ रहा है। तापमान वृद्धि से वाष्पीकरण की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है। परिणामतः मिट्टी में आर्द्रता की कमी सूखे की स्थिति लाती है। अत्यधिक तापमान और तीव्र वाष्पीकरण ने भूगर्भ जल के दोहन को बढ़ाया है जिससे पहले से ही निम्न भूगर्भ जल स्तर वाले इन क्षेत्रों में भूगर्भीय जल का स्तर अब और तेजी से नीचे जा रहा है। गर्म जलवायु भूगर्भीय चक्र के साथ-साथ सतही चक्र अर्थात वर्षा के समय, मात्रा, वाष्पीकरण इत्यादि को अत्यधिक प्रभावित करती है। लिहाजा तीव्र वाष्पीकरण से वातावरण की आर्द्रता में वृद्धि व मिट्टी की आर्द्रता बिल्कुल न होना समूचे जलवायुगत गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। अगर मिट्टी में आर्द्रता बहुत कम हो अथवा बिल्कुल ही न हो तो ऐसी स्थिति तापमान को और अधिक बढ़ाने में सहायक होती है जो क्षेत्र में लम्बे समय तक सूखा की स्थिति बनाती है। अतः यह स्पष्ट है कि अर्धशुष्क क्षेत्रों में मौसम में हो रहे किसी भी बदलाव का असर सीधे तौर पर क्षेत्र की मिट्टी की आर्द्रता, भूगर्भ जल पुर्नभरण और भूगर्भ जलस्तर को प्रभावित करता है जिसके परिणाम स्वरूप गंभीर सूखा की स्थिति उत्पन्न होती है। भारत के संदर्भ में भूगर्भ जल की स्थिति एक गंभीर चर्चा का विषय है जहां एक तरफ भूगर्भ-जल घरेलू उपयोग के रूप में लगभग 80 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में व 50 प्रतिशत के करीब शहरी जनसंख्या के उपयोग में आता है वहीं दूसरी तरफ सिंचाई की कुल आवश्यकता का लगभग 50 प्रतिशत इसी से सिंचित होता है। एक अनुमान के अनुसार भारत के कुल सिंचित उत्पादन का लगभग 70-80 प्रतिशत भूगर्भ जल के द्वारा ही उत्पादित होता है।

उपरोक्त परिस्थितियों पर यदि हम गौर करें तो स्पष्ट है कि वर्तमान परिदृश्य में अर्धशुष्क क्षेत्रों विशेषतः हम बुंदेलखंड की स्थिति का आंकलन करें तो स्पष्ट है कि विगत एक दशक में सूखे का जो दंश वहां के लोग भुगत रहे हैं वह बहुत कुछ मौसम में हो रहे परिवर्तनों का ही परिणाम है. नतीजतन खाद्य असुरक्षा, पेयजल संकट, पलायन, शोषण, आत्महत्या जैसी स्थितियां वहां पर उत्पन्न हो चुकी है और धीरे-धीरे पहले से ही वीरान और बीहड़ ये क्षेत्र और अधिक वीरान व बीहड़ में परिवर्तित होते जा रहे हैं।



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