पूर्वी घाट का प्रलय (समुद्री तूफान)

Submitted by Hindi on Sun, 04/21/2013 - 12:54
Source
पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011

बंगाल की खाड़ी में हवा के कम दबाव की बात मई के प्रथम सप्ताह के अंत से संचार माध्यमों से लगातार की जा रही थी। इसके दुष्प्रभाव से हम भी चिंतित थे। गोदावरी की बाढ़ के बाद 1987 में जब मैंने इन इलाकों की यात्रा की थी, तो उस समय लोगों ने बताया था कि सन् 1977 के समुद्री तूफान से इस क्षेत्र में भयंकर विनाश हुआ जिसमें दस हजार के लगभग लोग मारे गए तथा अपार धन सम्पत्ति नष्ट हुई। इसलिए जब भी इस बारे में समाचार उद्घोष किया जाता तो मैं उसे ध्यान से सुनता था।

“वरदा नील्लू वस्तुन्नाई पारिपोंडी पारिपोंडी।” बाढ़ आ रही है, भागो-भागो-छाती पीटते हुए कुली सिंहाचल चिल्ला रहा था। उसे नसीपट्नम-चिचाकोंडा जाने वाली बस के ड्राइवर ने जब यह जानकारी दी कि मोटर सड़क तो बह गई है, अब जलाशय के पानी का वेग उनके गांव के ऊपर की दीवार को तोड़ रहा है तो वह छाती पीटते हुए चिल्ला रहा था। सुबह सात बजे की बात होगी। सारे गांव के लोग अपने बच्चों और पशुओं के साथ पास की पहाड़ी पर चढ़ गए। देखते ही देखते आठ बजे तक गांव के सभी मकान तथा खेत नष्ट हो गए। इसके साथ ही राम मंदिर का सभा मंडप भी नष्ट हो गया। आज से तीस वर्ष पहले बराहा नदी पर रावणपल्ली गांव के ठीक ऊपर से मिट्टी का जलाशय बनाया गया था, जो 9-10 मई 1990 की अतिवृष्टि के बाद टूट गया तथा उसकी प्रलय की चपेट में रावणपल्ली के 115 मकान पलक झपकते ही नष्ट हो गए। 11 मई को हुए महाप्रलय के चिह्न ने केवल रावणपल्ली में अपितु आंध्रप्रदेश के विशाखापटम और ईष्ट गोदावरी जिलों के पही और मैदानी भूमि में देखने को मिले।

ईष्ट गोदावरी के अंतरवर्ती गांव रंपचौड़वरम में कार्यरत ‘शक्ति’ संस्था के डॉ. शिवरामकृष्णन ने मई 1990 के तीसरे सप्ताह में तार देकर मुझे तत्काल आंध्रप्रदेश के ईस्ट गोदावरी और विशाखापटनम जिलों में बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा करने के लिए बुलाया था, किंतु अति प्राथमिकता के आधार पर वितरण होने वाला यह तार मुझे 17 दिन बाद सौंपा गया। जबकि तार के काकीनाड़ा से नैनीताल पहुंचने में एक दिन लगा, किंतु नैनीताल से गोपेश्वर 15 दिन में तार पहुंचाया गया। इस विलम्ब के कारण मैं जुलाई में इस यात्रा की यात्रा पर जा सका।

बंगाल की खाड़ी में हवा के कम दबाव की बात मई के प्रथम सप्ताह के अंत से संचार माध्यमों से लगातार की जा रही थी। इसके दुष्प्रभाव से हम भी चिंतित थे। गोदावरी की बाढ़ के बाद 1987 में जब मैंने इन इलाकों की यात्रा की थी, तो उस समय लोगों ने बताया था कि सन् 1977 के समुद्री तूफान से इस क्षेत्र में भयंकर विनाश हुआ जिसमें दस हजार के लगभग लोग मारे गए तथा अपार धन सम्पत्ति नष्ट हुई। इसलिए जब भी इस बारे में समाचार उद्घोष किया जाता तो मैं उसे ध्यान से सुनता था। आखिर में आंध्रप्रदेश के इन तटवर्ती जिलों के लोगों को सुरक्षित स्थान की ओर जाने के लिए 7-8 मई से संचार माध्यमों से घोषणाएँ हो रही थी। यह भी बताया जा रहा था कि हवा का दबाव 240 किलोमीटर की रफ्तार से है। यह भी बताया जा रहा था कि समुद्र के तटीय क्षेत्र के लोग सुरक्षित स्थानों की ओर जा रहे हैं और अंत में यह भी ज्ञात हुआ कि मरने वालों की संख्या सैकड़ों में प्रसारित हुई। इससे संतोष हुआ क्योंकि 1977 की मानव मृत्यु को देखते हुए यह पूर्व घोषणा के कारण कम हुई। इसमें उपग्रहों के द्वारा जो जानकारी मिलती रही और पूर्व सूचना के कारण विनाश का प्रभाव कम हुआ। मुख्य रूप से मानव मौत बचाई जा सकी। इस प्रकार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उन्नत जानकारियों के कारण पूर्व में सूचना मिलने से अनहोनी रुक गई।

समुद्री तूफान जिसे प्रलय भी कहा जाता है, के बाद के चित्र दिखे गए तो उससे भूस्खलन और बाढ़ की कल्पना दूर बैठे हम लोगों को नहीं थी लेकिन जब डॉ. शिवरामकृष्णन ने दंडकारण्य की पहाड़ियों में भूस्खलन की सूचना भेजी तो अंदाज़ आ गया था कि तूफान के साथ अतिवृष्टि तो होती ही है और इसी अतिवृष्टि के कारण भूस्खलन भी हुआ होगा। यह देखने और समझने के लिए मैंने आंध्रप्रदेश के लिए प्रस्थान किया।

20 जुलाई 1990 की रात को सवा दस बजे हमारी राजमुंदरी में रुक गई। मेरे साथ अरूण विनायक भी थे जो पी.टी. आई. के संवाददाता थे, वे जनान्दोलनों से जुड़े रहे हम दोनों मुंबई से साथ आए थे। धारवाड़ से श्री हीरेमठ भी साथ आए। स्टेशन पर एक-दो लोग ही खड़े थे। बाहर बूंदाबांदी हो रही थी। हम गेट की तरफ बढ़े थे कि ऊषाबाला जी मिली पूछने पर पता चला कि वे अकेले ही हमें लेने आयी हैं राजमुंदरी से चिंतुर एक सौ किलोमीटर से भी अधिक दूर था। ऊषाबाला जी इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता तथा उन दिनों परती भूमि विकास समिति से जुड़ी थी। राजमुंदरी में रहने का ठौर न मिलने के कारण रंपचौड़वरम तक रात ही जाने का निर्णय हुआ। ईस्ट गोदावरी-वेस्ट गोदावरी-खम्मम आदिलाबाद एवं विशाखापट्नम आदि जनपद न केवल समुद्री तूफान के कारण पहचाने जाने लगे हैं अपितु पीपुल्स वार ग्रुप की गतिविधियों के कारण भी खास चर्चित हैं।

गोदावरी नदी का यहां पर दो किलोमीटर से भी अधिक विस्तार है इसके आगे समुद्र की ओर गोदावरी का डेल्टा है। गोदावरी के शांत प्रवाह में बिजली का प्रकाश चिलमिला रहा था। ठीक 11:30 बजे रात हमने प्रस्थान किया। ऊषावाला जी के अलावा श्री अरुण और हम चार लोग थे। सौम्य एवं निर्विकार ऊषा जी आगे की सीट पर बैठी थी। कार तेजी के साथ अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। चिलमिलाहट पीछे छूट गई थी। अब गोदावरी का भय ही समझने को मिल सकता है। रास्ते में इस अंधेरी रात में बैल गाड़ियां चल रही थी कहीं-कहीं पर साइकिल सवार भी मिल रहे थे। दो एक कार भी तेजी से राजमुंदरी की ओर दौड़ रही थी। इतनी रात चलने के बाद भी किसी ने हमारी कार रोकी नहीं। कभी-कभार इस इलाके में अपहरण की घटना हो जाती है। ऐसी चर्चा चलने से पहले हुई थी। अंततः हम सकुशल रंपचौड़वरम पहुंच गए।

जब तक बांध निर्माण कार्य होता रहा, उसमें उन्होंने अकुशल श्रमिकों (मिट्टी खोदने और ढोने) का कार्य किया। इसमें भी मजदूरी बहुत कम दी गई जब बांध निर्माण का कार्य पूरा हुआ तो ये फिर असहाय हो गए। इनके विस्थापन की ज़िम्मेदारी न उड़ीसा सरकार ने ली और न ही आंध्रप्रदेश ने ली अंततः वे जंगल काटकर खेत बनाने लगे यह वर्णन अनेक जगह सुनने को मिला। कोरापुट में तो पहले से ही जंगल नष्ट हो गए थे। इसलिए आंध्रप्रदेश के ईस्ट गोदावरी और विशाखापट्नम जिलों के एजेंसी एरिया में कटाई करने लगे। इन लोगों के पहले से चौरस खेत थे इसलिए, इन्होंने खेत बनाने शुरू किए तो जंगलात वालों ने उन्हें रोका तथा परेशान किया, दूसरी ओर इन्हें जंगलात वालों का मुकाबला करने के लिए नक्सलवादियों ने उकसाय रंपचौड़वरम में अगली सुबह हमने प्लाइवुड का कारखाना देखा जो एकदम सुनसान पड़ा था। तीन साल पहले इस कारखाने को लेकर स्थानीय युवाओं ने प्रदर्शन किया था। उनका कहना था कि इसके लिए वन विभाग जंगली आम, कटहल, इमली आदि के पेड़ कटवा रहा है जिससे आदिवासियों को खाद्य-भोजन मिलता है। तब सवाल उठा था कि इन पेड़ों का उपयोग जीने के लिए होगा या विलासिता के लिए उस समय इस कारखाने के कारण इधर काफी चहल पहल थी। इसी प्रकार मारेडमिल्ली का टिम्बर डिपो भी देखने को मिला, जहां अब मात्र साइन बोर्ड ही शेष रह गया है। सारा डिपो खाली पड़ा है बताया गया है कि पिछले तीन वर्षों से इस क्षेत्र में पेड़ों का विनाश रोक दिया गया है। अब इधर मात्र बांस के ढेर दिखाई दिए जो राजमुंदरी कागज़ के कारखाने के लिए हैं। हम आगे बढ़ते हैं वालमूरू में नरसी अम्मा बताती है कि पुल के ऊपर से चार-पांच फुट पानी चढ़ गया था वे रात को ही निकट की पहाड़ी की ओर भाग गई थी वालमूरू के आस-पास पहाड़ियां हैं यह बस्ती पामलेरू नदी के किनारे है। लोग बताते हैं कि पहाड़ों से इतना अधिक पानी आया कि नदी जो आज 50 फुट गहरे में बह रही है उसका वेग बस्ती को छू रहा था। उन दिनों के चिह्न अभी भी साफ दिखाई दे रहे थे। इस अनर्थ के बाद उनकी झोपड़ियों में कुछ नहीं बचा। इससे आगे टाईगर हिल्स के आसपास की पहाड़ियों पर अब वन कटान बंद कर दिया गया। लेकिन दंडकारण्य के घने जंगलों के मुकाबले में यहां मीलों तक फैले यूकेलिप्ट्स और चीड़ के वृक्षों के रोपण हमारे वन विशेषज्ञों की नासमझी का प्रतीक है जो उन्होंने इन सदाबहार वर्षा जंगलों का विनाश कर इन पौधों को थोप दिया।

पहाड़ से उतरते ही खम्मम जिले के चिंतुर की ओर पहुंचे। यहां वृक्ष विहीन धरती शुरू हो जाती है चिंतुर से कुछ ही दूरी पर सिलेरू और सबरी का संगम है जो आगे चलकर गोदावरी में समाहित हो जाती है।

खम्मम जिले के चिंतुर से हमें ईस्ट गोदावरी और विशाखापट्नम जनपद की पहाड़ियों से होते हुए आग बढ़ना था। इसके बाद इन क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों के मैदानी भाग को देखने का कार्यक्रम बनाया गया। “शक्ति” के डॉ. शिवरामकृष्णन जो वर्षों से इस इलाके में आदिवासियों के हकों की लड़ाई लड़ रहे हैं उनपर रहो रहे अत्याचार की घटनाओं को प्रकाश में लाते रहे हैं। उन्हें पुलिस के लोग भी परेशान करते हैं। दूसरी ओर पीपुल्स वार ग्रुप (नक्सलाईट) उन्हें सरकार का आदमी समझ कर नजर रखते हैं, ने यात्रा का प्रबंध किया था। डॉ. शिवरामकृष्णन के अलावा यात्रा में इसी क्षेत्र में कार्यरत युवा श्री रवि आर. प्रगदा जो “समंथा” संस्था से जुड़े थे उत्साही नौजवान हैं, भी साथ थे पता चला कि उन्होंने समुद्री तूफान के बाद इस इलाके में प्रभावित लोगों की बहुत सेवा की थी। व्यापारियों ने इस विपदा का लाभ उठाते हुए आवश्यक वस्तुओं के मूल्य दुगने कर दिए थे इसके खिलाफ उन्होंने आवाज़ उठाई और उन्हें रास्ते पर लाये साथ ही मजदूरी में भी जो अनियमितता थी उसके खिलाफ भी मुहिम चलाकर सुनिश्चित मजदूरी भी दिलवायी। पहले दिन हम चिंतुर में जन विकास आंदोलन की एक बैठक में सम्मिलित हुए। इस बैठक में विनाशकारी विकास के बारे में चर्चा हुई तथा इसके विकल्प के बारे में भी विचार किया गया था।

इसके बाद सुबह डॉ. शिवरामकृष्णन, श्री रवि आर.प्रागदा श्री अरुण विनायक तथा मैंने चिंतुर से प्रस्थान किया। घाटों के बीच घने जंगलों से हम आगे बढ़ते जा रहे थे। पक्षियों के कलरव के साथ-साथ, कहीं-कहीं लंगूर दिखाई दिए, लेकिन रास्ते में न कोई वाहन, नहीं कोई आदमी दिखाई दिया, अलबत्ता एक जगह जंगल की ओर जाते हुए तीन चार आदमियों की पीठ मात्र दिखाई दी। हमारी जीप के शोर के बावजूद उन्होंने हमारी ओर झांका तक नहीं। रास्ते पर सन्नाटा ही सन्नाटा था। कई जगह जंगल इतने घने थे कि सूर्य की रोशनी ज़मीन से दिखाई ही नहीं दे रही थी।

शाम ढलने लग गई थी दूर-दूर छितरी हुई बस्ती बीच-बीच में दिखाई देती थी। टिम-टिमाती रोशनी में झोपड़ियां कभी कभार नज़दीक भी दिखाई देती थी जो अंदर का हाल दिखा रही थी। मैं टेढ़े-मेढ़े रास्ते के कारण थक गया था। हम लोग उड़ीसा के कोरापुट जिले की सीमा से लगे रास्ते से आगे बढ़ते जा रहे थे। रास्ते में बांध भी देखे इनमें साद की मात्रा तेजी से जमा हो रही थी, ऐसी जानकारी मिली लेकिन एक और दुःखद पक्ष विस्थापितों के बारे में मालूम हुआ। जिसमें इस क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने को उलट कर रख दिया तथा नए तनाव को भी जन्म दिया है। बताया गया कि लोअर सिलेरू, अपर सिलेरू एवं मचकंदा बांध जिसका निर्माण सातवें दशक के प्रारंभ में हुआ था के निर्माण के लिए वहां के गांव वालों की ज़मीन का अधिग्रहण हुआ। ज़मीन का मुआवजा बहुत कम दिया गया। कई जगह तो प्रभावितों को मुआवजा मिला ही नहीं। कई लोगों को आधा अधूरा ही दिया गया। एक तरफ से बिना समुचित विस्थापन के चीटियों की तरह उन्हें उजाड़ा गया, जिससे वे दर-दर भटकने लगे, इनमें मुख्य रूप से सामंता जाति के लोग थे। कुछ वाल्मिकी भी थे। जब तक बांध निर्माण कार्य होता रहा, उसमें उन्होंने अकुशल श्रमिकों (मिट्टी खोदने और ढोने) का कार्य किया। इसमें भी मजदूरी बहुत कम दी गई जब बांध निर्माण का कार्य पूरा हुआ तो ये फिर असहाय हो गए। इनके विस्थापन की ज़िम्मेदारी न उड़ीसा सरकार ने ली और न ही आंध्रप्रदेश ने ली अंततः वे जंगल काटकर खेत बनाने लगे यह वर्णन अनेक जगह सुनने को मिला। कोरापुट में तो पहले से ही जंगल नष्ट हो गए थे। इसलिए आंध्रप्रदेश के ईस्ट गोदावरी और विशाखापट्नम जिलों के एजेंसी एरिया में कटाई करने लगे। इन लोगों के पहले से चौरस खेत थे इसलिए, इन्होंने खेत बनाने शुरू किए तो जंगलात वालों ने उन्हें रोका तथा परेशान किया, दूसरी ओर इन्हें जंगलात वालों का मुकाबला करने के लिए नक्सलवादियों ने उकसाया। इस प्रकार से इन क्षेत्रों में एक नये प्रकार के तनाव की शुरूआत हुई।

पाडेरू डिविजन में 60 लोग भूस्खलन एवं अतिवृष्टि के कारण मारे गए तथा 2303 गाँवों के 11710 परिवार प्रभावित हुए। इनमें से 2500 परिवारों के मकान पूरी तरह से नष्ट हुए। इसके अलावा खेती, पशु, मछलियों के तालाब आदि भी नष्ट हुए। सड़क और भवन भी नष्ट हुए। यदि रुपयों में आंका जाए तो 26 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ। उन्होंने बताया कि पाडेरू डिविजन में 11 मंडल (ब्लाक) हैं। पाडेरू मंडल में 10 लोगों की मृत्यु हुई। उसके बाद अनंतगिरी मंडल में 23 और दुकुमपेटा में 19 लोग मारे गए लेकिन मकान और खेत तो हर मंडल में नष्ट हुए है। झुरमुट अंधेरा होने लग गया था। हमें जाना तो गुडेम था। पर अंधेरे में चलना ठीक नहीं समझा गया। इसलिए ऊपर सिलेरू के आस-पास ही एक सरकारी आवास में ठहरे। साथियों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ-साफ झलक रही थी रवि और शिवरामकृष्ण्णन जी ने भोजन का प्रबंध भी करवा दिया था। जिस मकान में हम ठहरे थे उसके बाहर देर रात तक वार्तालाप चल रहा था। यह किसके बीच में हो रहा था, पता नहीं और न ही मैंने जानने की कोशिश की। डॉ. शिवरामकृष्णन ने मेरा पूरा ध्यान रखा हुआ था। अत्यधिक थकान के कारण मुझे तो जल्दी ही नींद आ गई।

अगले दिन हमने वहां से 5 बजे सुबह प्रस्थान कर दिया था। अपर सिलूरू के बाद हमें रास्ते में थारम्मा (झरना) भी दिखा। धारकोंडा (पहाड़) के बाद मीलों तक जंगल फैले हैं। यह इलाक़ा सुंदर एवं भव्य लगा। सुबह के समय पक्षियों का कलरव फिर से सुनाई देने लगा। ऊपर से पहाड़ के बीच में बस्ती और खेत फिर जंगल मनोहारी दृश्य था। आगे चलकर हमें हैरानी हुई कि प्राकृतिक जंगलों को काटकर बीच-बीच में टिकवुड का प्लांटेशन किया गया है।

सर्पली आदि छोटी-बड़ी नदियों को छोड़ते हुए हम नीचे की ओर आते रहे बस्तियों के आसपास एवं खेतों में आम, कटहल, इमली तथा जिलगू के पेड़ हैं। जिलगू पेड़ के मध्य भाग में रस निकालने के लिए मिट्टी के बर्तन जगह-जगह देखने को मिले। बताया गया कि सोमरस है। इधर पुरुषों में इसको पीने का प्रचलन बहुत बढ़ गया है। इससे नशा लगता है। आगे बढ़ने पर जगह-जगह पहाड़ियां नंगी दिखाई देने लगी। उनमें जगह-जगह भूस्खलन भी दिख रहे थे। इधर रास्ते में मच्छा गड्डा, लोतू गड्डा, बड़ी गड्डा के आसपास छोटे पुल नष्ट होने के चिह्न भी हैं। खेत भी उजड़ गए हैं बताया गया कि कई नालों में 40 फीट तक पानी चढ़ गया था।

चिंतापल्ली मंडल में मकान एवं खेत तो उजड़े लेकिन मानव मृत्यु नहीं हुई।

अब हम गुडेम में थे। पिछली रात को हमें यहीं ‘चैतन्य सरपंती’ में रुकना था। लेकिन अंधेरा हो जाने के कारण यहां नहीं पहुंच पाए थे। सरवंती रास्ते से कुछ हटकर था इसलिए यहां जाना नहीं हुआ।

पाडेरू एजेंसी एरिया का मुख्यालय है। यह स्थान रमणीक है। चारों ओर से पहाड़ी बीच में तलाऊ खेत हैं लेकिन आसपास की पहाड़ी नंगी हो गई है। भूस्खलन भी हुआ है। पाडेरू उभरते हुए नगर का रूप धारण कर चुका है। यहां पर एकीकृत ट्राईबल डेवलपमेंट अथॉरिटी के परियोजना अधिकारी एवं वनाधिकारी का हेड-क्वाटर है। आई.टी.डी.ए. के अधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा के हैं, उन्होंने मुझे पहचान लिया था। मसूरी अकादमी से एक बरस पहले ही प्रशिक्षण लेकर नियुक्ति हुई थी। पहले तो उन्होंने मिलने में ना-नुकर किया। उन्हें लगा कि न जाने कौन व्यक्ति है। जब हमारे साथियों ने उन्हें मिलने के लिए मना लिया तो वे देखते ही भौचक्के रह गए। बार-बार कह रहे थे कि आप यहां इस अंतरवर्ती इलाके में कैसे? रास्ते में किसी ने परेशान तो नहीं किया। फ़ाउंडेशन कोर्स के दौरान अकादमी में मेरा व्याख्यान हुआ था इसलिए उन्होंने मुझे पहचान लिया था। मैंने उनसे उनके बैच के अन्य अधिकारियों के बारे में जानकारी ली, उन्होंने बताया कि पाडेरू में 8 से 11 मई के बीच में 716 मी.मी. बारिश हुई। बहुत तबाही हुई। पाडेरू डिविजन में 60 लोग भूस्खलन एवं अतिवृष्टि के कारण मारे गए तथा 2303 गाँवों के 11710 परिवार प्रभावित हुए। इनमें से 2500 परिवारों के मकान पूरी तरह से नष्ट हुए। इसके अलावा खेती, पशु, मछलियों के तालाब आदि भी नष्ट हुए। सड़क और भवन भी नष्ट हुए। यदि रुपयों में आंका जाए तो 26 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ। उन्होंने बताया कि पाडेरू डिविजन में 11 मंडल (ब्लाक) हैं। पाडेरू मंडल में 10 लोगों की मृत्यु हुई। उसके बाद अनंतगिरी मंडल में 23 और दुकुमपेटा में 19 लोग मारे गए लेकिन मकान और खेत तो हर मंडल में नष्ट हुए है। भेड़- बकरी एवं गाय आदि पशु भी आठ हजार से अधिक मारे गए। अनंतगिरी मंडल में सबसे अधिक जान-माल का नुकसान हुआ। इन दिनों 607 मी.मी. बारिश हुई। पाडेरू में हमें डी.एफ.ओ. भी मिले। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि अधिकारी डरे-डरे से हैं, क्यों?

हमें आगे गुमपल्ली में पता चला कि इस बस्ती में 100 परिवार की 200 एकड़ कृषि भूमि में से लगभग 160 एकड़ भूमि नष्ट हो गई। 10 मई की सबुह 11 बजे को उस दिन गुरुवार था, भयंकर भूस्खलन हुआ। गांव के बारम आपल्ल नायडू ने बताया कि भयंकर आवाज़ हुई, समझा कि पानी आ रहा है। बिजली भी चमकी। तब पता चला कि यह तो विनाश हो गया है। नायडू बताता है कि पिछले 100 सालों में पहले इस तरह नहीं हुआ। फिर गांव वालों ने जाकरम्मा (भूमिदेवता) की शुक्रवार को पूजा की, फिर जाकर मूसलाधार वर्षा बंद हुई। खंद मामाड़ी में इसी प्रकार का विनाश हुआ। वे बताते हैं कि दस साल पहले तक उनके गांव के आस-पास जंगल थे। उड़ीसा के विस्थापित सामंतों ने खेती के लिए ये जंगल काटा। ये विस्थापित सिलेरू, वलिमेला और मुचकंदा बांध के बनने से उजाड़े गए थे। इनकी पहले बहुत अच्छी खेती थी। इन्हें खेती करने के लिए दर-दर भटकना पड़ा। बाद में जंगल काटकर पोडू (झूम) भी करने लगे।

बांध से पुर्नवासित कोडू जनजाति के लगभग पांच-छः हजार लोग कोरापुट से आए हैं। उनके यहां पोडू करने के लिए भूमि नहीं रह गई है। इसलिए आए हैं। प्रारंभ में तो इन्होंने बांध में मजदूरी का काम किया। 10-15 वर्षों से उन्होंने जंगल काट कर पोडू पर कब्ज़ा या। नक्सलवादियों ने उन्हें मदद की। उनका पहले तो स्थानीय आदिवासियों ने विरोध किया, उनकी नहीं चली। स्थानीय आदिवासियों के द्वारा जंगल का विनाश नहीं हुआ। उनके पास ज़मीन का पट्टा है, सुविधा भी है।

इधर मुख्य रूप से कौंडा दौरा और कौंडा कोडू जातियां हैं। कौंडा दौरा, पोडू करते हैं। यहां पर वाल्मीकी एवं भगता भी हैं। उन्हें आरक्षण का लाभ भी मिलता है। स्थानीय आदिवासियों के पास भूमि अधिक है।

उड़ीसा से आए लोगों ने बाद में अपने रिश्तेदारों को भी बुलाया। सत्यनारायण आगे बताते हैं कि उड़ीसा में अमूमन लोग भूख से मरते रहते हैं। आज यह समस्या उड़ीसा के बजाय आंध्र की बन गई है। आगे कहते हैं कि बारिश ज्यादा हुई। नदियों में बाढ़ आयी, नदियों ने धारा परिवर्तन भी किया। बराहा नदी ने भी कोर्स बदला है। नस्सीपट्नम जो कि मैदानी इलाक़ा है, के पास आधा किलोमीटर परिवर्तन हुआ। खेती और मंदिर नष्ट हुए। रावणपल्ली पूरा गांव नष्ट हुआ। यह घटना दिन-दोपहर की है। तूफान का वेग 240 किलोमीटर का था। इस बार तूफान का प्रभाव अंदर तक पहुंचा, खम्मम में भी पहुंचा।

ताण्डवा रिजर्वायर की अधिकतम ऊंचाई 380 फुट है। इधर अतिवृष्टि से रिजर्वायर ऊपर तक भर गया था बल्कि पानी रास्ते तक पहुंच गया था। ऐसे में इसके गेट खोलने की बात आई। अन्यथा बांध टूट भी सकता था। या ऊपर से पानी उछलकर गड़बड़ी फैलाता। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सहायक अभियंता ने बताया कि उन्होंने बांध के सभी गेट खोलने का निर्णय लिया। सहायक अभियंता सिंचाई विभाग वालों ने आर.एम.ओ. को इसकी सूचना दी कि बांध के गेट खोल रहे हैं नीचे की बसासत तुनीनगर के लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए सूचित कर दें। यह बात सभी लोगों ने महसूस की कि चिंतापल्ली के आस-पास वनों का बुरी तरह से विनाश हुआ था। जिसके कारण चट्टाने टूटी। भूस्खलन एवं भूक्षरण तेजी से हुआ जिससे सड़क, पुल, पुलिया लोगों के खेत और मकान नष्ट हुए इस क्षेत्र के गांव वालों एवं अधिकारियों को इस प्रकार के तूफान से निपटने का कोई अनुभव नहीं था। इसका अनुमान लगाना कठिन है कि इससे यहां रहने वाले आदिवासियों का उनके पारिस्थितिकी पर किसी प्रकार का दुष्प्रभाव पड़ा होगा। क्योंकि इनका जीवन प्राकृतिक संसाधनों के साथ इतना उलझा हुआ है कि उसे अलग से देखना कठिन है। जंगलों का विनाश और भूस्खलन ने इन्हें झकझोर कर रख दिया था। पहाड़ों से उद्गमित नदियों जहां ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में तबाही मचाई वहीं मैदानों में उतरकर धारा परिवर्तन हुआ तथा इन पर बने जलाश्य एवं सिंचाई योजनाएं भी साद से पट गई।

नरसीपटनम के आगे से घाट शुरू होता है। यहां पर इस बीच 673 मिमी. बारिश हुई जिसने तबाही को और बल दिया। बताया गया कि बराहा नदी उत्तर वाहिनी थी वह दक्षिण वाहिणी हो गई। इसी प्रकार शारदा नदी ने भी धारा परिवर्तन कर खेतों के बीचों-बीच बहने लगी।

आगे भी ताण्डवा रिजर्वायर के आसपास में भी 527 मीमी. वर्षा हुई। ताण्डवा रिजर्वायर की अधिकतम ऊंचाई 380 फुट है। इधर अतिवृष्टि से रिजर्वायर ऊपर तक भर गया था बल्कि पानी रास्ते तक पहुंच गया था। ऐसे में इसके गेट खोलने की बात आई। अन्यथा बांध टूट भी सकता था। या ऊपर से पानी उछलकर गड़बड़ी फैलाता। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सहायक अभियंता ने बताया कि उन्होंने बांध के सभी गेट खोलने का निर्णय लिया। सहायक अभियंता सिंचाई विभाग वालों ने आर.एम.ओ. को इसकी सूचना दी कि बांध के गेट खोल रहे हैं नीचे की बसासत तुनीनगर के लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए सूचित कर दें। अभियंता बताते हैं कि 2 : 30 रात को जब उन्होने बांध के द्वार खोले तो उससे प्रति सेंकेंड 143000 सी.एम. पानी निकाला। जब कि सामान्यतः पानी 43000 सी.एम. डिस्चार्ज होता है और संकट के समय में 75000 सी.एम. डिस्चार्ज होता था लेकिन बाढ़ के पानी का इतना दबाव था कि वहां खतरे से भी दुगना पानी बाहर निकला उससे बांध के नीचे से पानी के वेग ने बहुत बड़ी खाई बना दी थी तथा तुनी शहर जिसकी आबादी 6 हजार के लगभग रही, में पानी भर गया। लोग आस-पास के टीलों में जान बचाने के लिए भागे। तुनी में रेलवे पुल की लाईन टूट गई साथ ही पामला, राउपेटा ब्लाक में भी पानी भर गया। लोगों में हाहाकार मच गया।

अनावरम में पंप रिजर्वायर भी भर गया था। इस रिजर्वायर के ठीक नीचे अनावरम शहर है इसकी आबादी 15 हजार थी अंत में नेशनल हाईवे जो बांध के एक किनारे पर था, वहां की दीवार तोड़ी गई उसमें इतना वेग था कि बड़े-बड़े पत्थर पेड़ पर चढ़ गए। एक अनहोनी टल गई। यहीं हालात शंकवरम तथा ऐलूरू में भी हुई।

यहां घाट के चारों ओर की पहाड़ियां नंगी है। बारिश के पानी को रोकने की यहां के पहाड़ों में बिल्कुल भी शक्ति नहीं थी जो बूंद पहाड़ियों पर टपकी वह भागते हुए इन जलाशयों में आ गई।

इस यात्रा के बाद यह दल डॉ. शिवरामकृष्णन के नेतृत्व में वन और पर्यावरण के सचिव श्री के.आर.मूर्ति तथा रेवेन्यू कमिश्नर आदि को मिले जिनसे तूफान पीड़ित आदिवासियों की सहायता में उदारता तथा बिगड़े पर्यावरण में सुधार लाने का अनुरोध के साथ हम सब एक दूसरे से विदा हुए।

आशा की किरण


रंपचौड़वरम में एकीकृत ट्राईबल डवलपमेंट एजेंसी के परियोजना अधिकारी श्री मनोहर प्रसाद मानते हैं कि पोण्डू (झूम-खेती) का कार्य क्षेत्र की दृष्टि से भी कठिन है। इसमें जितनी मेहनत करते हैं, उतना प्राप्त होता नहीं है, आगे चलकर मिट्टी क्षरण भी तेजी से होता हैं इसलिए पोण्डू के स्थान पर पेड़ों की खेती की आवश्यकता है जिसमें आय-वर्धन से लेकर दैनिक उपयोग के वृक्ष भी हो। इस दिशा में उन्होंने अपने क्षेत्र में अनुकरणीय प्रयास भी किया लेकिन उनके इतर जनजातीय लोगों ने भी अपने स्तर पर प्रयास किए उनका विवरण दिया जा रहा है।

चेद्दाअम्मा


रंपचौड़वरम मंडल के चिड़ीपालम गांव की श्रीमती चेद्दा अम्मा बताती हैं कि उन्होंने भी अपनी भूमि में पेड़ लगा दिए हैं। इस काम में उसने अपने परिवार के पुरुषों का साथ दिया। गड्ढे बनाए, उनमें गोबर डाला, फिर पौध रोपे। पौध अब बढ़ रहे हैं। यह कार्य जीवित रहने के लिए अच्छा है इस भूमि में फसल अच्छी नहीं होती है। देखभाल का काम मिलजुल कर पूरे परिवार के लोग जिन्हें फ़ुरसत होती है, करते हैं।

उनका मायका नौमानी गांव है। अब वहां भी यह कार्य शुरू हो गया है। उनके पिता जी ने पहले यहां कार्य शुरू किया क्योंकि वे उसके ससुराल में यह सब देख चुके थे।

अब्बा रेड्डी


इत्तपल्ली गांव का अब्बा रेड्डी कहता है कि उसने पोडू वाली भूमि में पेड़ों की खेती 1985 से शुरू कर दी है। उसने जो पौध रोपे थे उनमें से पांच मर गए हैं बाकी अच्छे हैं। उनके बीच के झाड़ को भी नहीं काटा गया है। इमली, आम, काजू, मदीचेअलू, कुरमानू, जिलगू और बूसीफल के पेड़ भी हैं, उम्मीद है कि अगले एक-दो वर्षों में आम लगने लग जाएगा। टिक का पेड़ इसलिए नहीं रोपे गए हैं कि वह उनके काम का नहीं है और जब बड़ा होगा तो जंगलात वाले ले जाएंगे।

श्री पल्लावाआदि रेड्डी


मारेड मिली के यामकोंडा रेड्डी श्री पल्लाला आदि रेड्डी को पोडू वाली ज़मीन में अब पंद्रह सौ से अधिक पेड़ हैं उनके पास पोडू वाली 15 एकड़ भूमि है। डेढ़ एकड़ में तो प्राकृतिक जंगल ज्यों के त्यों खड़े हैं। खम्मम वाली मोटर सड़क से कुछ ही कदम आगे साफ-सुथरा लाल खपरैल की छत वाला उसका मकान है। पत्नी भूम्मया उससे कुछ बड़ी लगती । पल्लाला फुर्तिला है। मकान के पास ही चीड़ीवाड़ा पतली-सी धार है इसके पानी को आदिवासी कल्याण विभाग के सहयोग से लगाई गई मशीन से सिंचाई के लिए ऊपर उठा लिया है तथा दस मुर्गियां भी हैं।

मकान के आसपास इमली, कटहल, आम, संतरा, काजू, अमरूद, मौसमी, नींबू, रामफल, सीताफल, नारियल, नीरा और चीकू के कुल मिला कर एक हजार से अधिक पेड़ हैं। साथ ही काली मिर्च, अनानास और केला भी है। तीन हजार रुपया से अधिक की आय फलों से होने लगी है। लोगों ने बीस साल से फलदार पेड़ लगाने शुरू किए हैं।

इस भूमि में पहले पोडू करते थे। अनाज केवल चार-पांच वर्ष तक ही ठीक से होता है उसके बाद इस भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण होने से उसे छोड़ देते हैं, फिर दूसरी जगह जंगल काटकर पोडू करना पड़ता है। पेट भरने के लिए कुछ न कुछ करना ही पड़ता है। पहले इधर मोटर सड़क नहीं थी, 40 किमी. दूर से चावल खरीदना पड़ता था। उसके लिए भी पैसा चाहिए। उतनी दूर परिवार को छोड़कर नहीं जा सकते थे। 15 साल पहले मोटर सड़क हमारे गांव के नज़दीक तक बनी, इस कारण एक दो बार बाहर जाना हुआ वहां फलदार पेड़ से आय होती देख कर अपने इस पोडू वाली ज़मीन को छोड़ने का जब वक्त आया तो लगा कि पैदावार नहीं कर सकते हैं छोड़ना भी अच्छा नहीं है। इसलिए फलदार पेड़ लगा दिए हैं अब तो हमें अच्छी आमदनी होती है। स्वयं भी खाते हैं अपने रिश्तेदारों को भी देते हैं। पोडू करने में जो परेशानी थी वह भी समाप्त हो गई है। अब इससे हुई आमदानी को बैंक में रखते हैं।

पल्लाला चौथी कक्षा तक पढ़ा है। विशेष घटनाओं को डायरी में लिखता है। डायरी के पहले पन्ने पर लिखा है कि 21 नवंबर 1951 को बाघ ने उसकी मां को मार दिया था। अगले पन्ने पर लिखा है कि “हमें कोंडा रेड्डी के वंशज होने का गर्व है।” लक्ष्मीमाई की कृपा हम पर रहे। यदि ऐसा हो तो हम भाग्यशाली हैं।

अपने वारिस के बारे में लिखा है कि – “मेरे मरने के बाद मेरी जायजाद मेरी पत्नी चित्र भूमय्या ही वारिस है। कोई और नहीं होना चाहिए। सब लोगों को प्रणाम।”

फिर लिखा है कि हमेशा सत्य की जीत होती है दिग्विजयरी पल्लाल आदि रेड्डी श्रीमती पी.ची. भूमय्या पति और पत्नी। हम दोनों सरकार की दी हुई भूमि पर मेहनत करके अपने हाथों से लगाए हुए सब पेड़ों का पोषण करते हैं। जुलाई ओम् श्री राम।

Disqus Comment