यांगत्से नदी का स्पर्श

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पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011
ग्रीन वाटरशेड प्रोजेक्ट के मुखिया प्रोफेसर यू झिंओंगोंग (XIAOGANG), जिन्हें वर्ष 2009 के रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, हमारे लिए पथ-प्रदर्शक का काम कर रहे थे। यह कार्यक्रम लासी लेक के आसपास है। यह क्षेत्र जेड ड्रैगन बर्फिले पहाड़ (JADE DRAGON SNOW MOUNTAIN) के दक्षिण पूर्वी ढाल में स्थित है। इस बर्फीली चोटी के अलावा लासी लेक के चारों ओर पहाड़ियां हैं। लासीहल (लाशीलेक) का जलागम डाइमंड के आकार का है। यह विविध प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है एवं वहां के लोगों का आधार है। बहुत पहले सुना था कि चीन की पीली नदी वहां का शोक है। क्योंकि वह हर वर्ष तबाही मचाती रहती थी। आगे यह भी सुनने में आया कि इस नदी को बांधने में चीनियों ने सफलता पाई है। यह मेरे लिए जिज्ञासा का विषय था और कुछ समझना भी चाहता था। नदियां तो हमारे देश में भी बहुत बौखलाती रहती हैं और अब तो हर वर्ष अधिक से अधिक बौखलाने लगी हैं। मुझे जब रेमन मैगसेसे अवार्ड फ़ाउंडेशन का निमंत्रण मिला कि चीन के यूनान प्रांत में ‘ईको-टूर’ आयोजित किया जा रहा है और इसके अंतर्गत लिजियांग के पास स्थित लासी झील तथा यांगत्से की यात्रा भी सम्मिलित है, जिसमें टाइगर ल्यिपलिन गार्ज (TIGER LEAPLI GOURGE) की यात्रा भी सम्मिलित करनी है। मैंने फ़ाउंडेशन को तत्काल अपनी सहमति दे दी थी। स्वास्थ्य गड़बड़ होने के बावजूद भी मैं मन से यात्रा हेतु तैयार था और अवसर छोड़ना नहीं चाहता था। 12 नवंबर 2009 को दिल्ली से प्रस्थान किया। जहाज़ डेढ़ घंटे देर से चला। कोलकाता साढ़े नौ बजे रात को पहुंचा। कोलकाता में उत्प्रवासन वालों ने पूछा कि चीन क्यों जा रहे हो? मैंने उन्हें बताया कि मैं भ्रमण पर जा रहा हूं। उस अधिकारी ने मुझे ऊपर से नीचे तक निहारा और फिर कहा कि किस प्रकार के भ्रमण पर? मैंने पूरी जानकारी दी। वह संतुष्ट दिखा और मेरे पासपोर्ट पर मुहर लगा दी और साथ ही उसने अपने सहयोगियों के साथ गर्मजोशी से मेरा परिचय कराया।

इसके बाद कस्टम वाले ने पूछा कि तुम्हारे पास कितने डॉलर हैं। मैंने कहा दो सौ डॉलर हैं। फिर उसका सवाल था कि कहां से लाए हो? मैंने कहा कि स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद से लाया हूं। रसीद मांगने पर मैंने कहा कि मेरे पास रसीद नहीं है। बैंक वालों ने हस्ताक्षर कराए लेकिन रसीद नहीं दी। उसने हिदायत देते हुए कहा कि अगली बार से रसीद ज़रूर लाना। इस प्रकार मैं कोलकाता से 13 नवंबर 2009 को 12.40 बजे चला और 6 बजे सुबह कुनमिंग हवाई अड्डे पर पहुंचा। यहां से मुझे 10.40 के जहाज़ से लिजियांग जाना था। बाहर ठंड थी। चार घंटे हवाई अड्डे पर रुके रहने में दिक्कत हो रही थी। शौच आदि से निवृत होना था पर अटैची को कहां रखूं यह समस्या थी। कोलकाता से इसी जहाज़ में दस-बारह और भारतीय भी थे। मैंने उनसे बात करने का प्रयास किया पर उन्होंने ज्यादा तवज्जो नहीं दी। वे सभी व्यापारी थे। आपस में सामान खरीदने की बातों में व्यस्त थे। इसी बीच एक लड़का, जो हॉफ कमीज़ पहने था और भारतीय लग रहा था, दिख गया। उसका नाम राजू था। वह चीन दूसरे शहर में एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई करने जा रहा था। उसका जहाज़ 11.40 पर था। साथ की उसे भी आवश्यकता थी। बारी-बारी से हम इधर-इधर जानकारी करते रहे। 08.40 पर सामान जमा कर मुझे बोर्डिंग पास मिल गया।

मैं लटकते-भटकते एक के बाद एक गेट की तरफ जाने लगा। यह देखने के लिए कि कहीं कुछ नाश्ता पानी मिल जाए। समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि कौन सी वस्तु निरामिष है। आखिर में एक रेस्तरां में संकोच के साथ बैठ ही गया। मेरे सामने एक लड़की ने मीनू रख दिया। मीनू में वस्तूओं के नाम चीनी तथा अंग्रेजी दोनों में लिखे थे। उसमें से मैंने लेमन टी पर अंगूठा रखा। वह लड़की समझ गई। खाने की बात आई, तो मेरी समझ में हर वस्तु में मांस होने की शंका थी। मेरी नजर मीनू के बजाय जहां उनका सामान था, उस पर गई। वहां मैंने मक्का देखा। मैंने इशारा किया तो मुझे एक मक्का लाकर दे दिया। मैं खुश था। इधर लेमन टी भी मेरे सामने रखी थी। मक्का ठीक से उबाला नहीं गया था। इसलिए यह स्वादिष्ट नहीं लग रहा था। मेरी निगाह फिर पापकार्न पर पड़ी। इशारा करने पर मुझे एक डिब्बा पापकॉर्न का मिल गया। पापकॉर्न को नीबू चाय के साथ मैंने बड़े चाव से खाया।

जहाज़ का बोर्डिंग टाईम हो गया था। मैं 24 नंबर के गेट पर पहुंचा। वहां गेट पर जहाज़ का नंबर तथा उड़ान का समय 10.40 लिखा हुआ मिला। मैं इंतजार करने के लिए एक खाली सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद गेट पर खड़ी ईस्ट चाईना एयरलाइन्स की दो महिला कर्मचारी आपस में बातें कर रही थी और मेरी तरफ इशारा कर रही थी। मैंने सोचा कि मेरी वेशभूषा को देखकर चर्चा कर रही होंगी? इसी बीच वे मेरे पास आयी। टूटी-फूटी अंग्रेजी में कहने लगी कि तुम्हारी उड़ान देर से जाएगी। इसलिए तुम्हें 11 बजे वाली उड़ान में स्थान दिलाएंगे। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था कि अब क्या करना चाहिए। मेरे साथ के अन्य यात्रियों में कोई हलचल नहीं थी। मेरे लिए ही ऐसा क्या हो गया। भाषा की दिक्कत थी। इसलिए मुझे उनके इशारों पर ही चलना पड़ा। वे मुझे बाहर काउंटर पर ले आयी और कहने लगी कि 20 नंबर के काउंटर से दूसरा बोर्डिंग पास अगली उड़ान के लिए ले लो। वे वहां से तेजी से चलीं गई। मैं एक के बाद दूसरे काउंटरों पर जाता रहा। कोई सुनने को तैयार नहीं था। भीड़ भी बहुत थी। मेरी ही तरह कुछ और लोग भी हाथ में बोर्डिंग पास लिए काउंटर 11 में खड़े थे। मैं भी वहीं खड़ा हो गया। मैं सुरक्षा जांच से बाहर आ गया था। इसलिए वापस जाना संभव नहीं था।

लाइन में खड़े-खड़े 11 बजे मेरे नंबर आया। वे विस्मय से मुझे निहारती रही कि तुम इस उड़ान से क्यों नहीं गए? मैंने उड़ान के विलंब होने की बात कहीं तो वे हंस दी। मुझे 3 बजे दोपहर बाद का बोर्डिंग पास दे दिया। अब मैं आश्वस्त हो गया था।

इधर-उधर सामान लेकर टहलते हुए मैं बहुत थक गया था। मक्के के अलावा खाया भी कुछ नहीं था। चौबीस घंटे से सोया भी नहीं था। फिर पहले वाले रेस्त्रां में गया। नींबू की चाय चालीस यूयान की थी। इस प्रकार दो चाय और मक्का पर बीस डालर के लगभग खर्च हो गए थे लेकिन उसके बाद भी मेरी भूख और थकावट मिटी नहीं।

मेरे लिए लिजियांग हवाई अड्डे पर 11.30 पर मेरे नाम की पट्टी लिखी कार के होने की सूचना मुझे दी गई थी। मैं असमंजस में था कि अब क्या होगा। मुझे सूझा कि जिस होटल में ठहरने का प्रबंध किया गया है वहां बात करनी चाहिए। मैंने एक पुलिस वाले से इशारों में कहा कि मुझे टेलीफ़ोन करना है। वह अंदर मुझे एक दुकान पर ले गया। वहां लिजियांग के होटल को मैंने अपनी व्यथा सुनाई वे बहुत मुश्किल से मेरी अंग्रेजी को समझ पाए। पर अब मैं आश्वस्त था।

समुद्र की सतह से 2500 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह लेक सबसे बड़ी मानी जाती है। बताया गया कि यहां पर 57 घुमंतू पक्षियों की प्रजातियाँ आती हैं। जो यूनान प्रांत के उत्तर पश्चिम में विविधता से भरपूर है। जाड़ों में हजारों घुमंतू पक्षियों का घर बन जाता है। इस प्रकार इस तालाब में सात विभिन्न जातियों की मछलियाँ भी पाई जाती हैं। इसके आसपास जहां मुख्य रूप से चीड़ के वृक्षों से आच्छादित जंगल हैं, वहीं वसंत में इसके आसपास की पहाड़ियां बुरास (रोडोडेंड्रौन) के फूलों से सजधज जाती हैं। इस क्षेत्र में 15 प्रजाति के ये वृक्ष पाए जाते हैं।

ठीक तीन बजे हमारा जहाज कुनमिंग के आसमान में उड़ने लगा। नीचे के दृश्य मनोहारी लग रहे थे। छोटी-छोटी पहाड़ियां हरी-भरी दिख रही थी। घाटियों के बीच में दूध की जैसी धाराएं बह रहीं थीं। कहीं-कहीं तालाब जैसे भी नजर आ रहे थे। पहाड़ियों के बीच में खेती और बस्ती भी दिखाई दे रही थी। इधर मैं खिड़की से बाहर निहार रहा था और इसी बीच घोषणा हुई कि वायुयान लिजियांग में उतरने वाला है। थोड़ी देर में हम हवाई-अड्डे पर थे। सामान लेकर मैं आशंकाओं के बीच इधर-उधर अपना नाम पट्ट देखने लगा। कहीं दिखाई नहीं दिया। कुछ दूरी पर एक आदमी एक बड़े से कागज़ को मोड़े हुए खड़ा दिखा। जैसे ही मैं उस व्यक्ति के नज़दीक पहुंचा, उसने अपने हाथ में रखा कागज़ दिखाया। उस पर सी.पी.एच.एन लिखा था। शायद होटल वालों ने मेरा नाम ठीक से सुना नहीं होगा। मैंने ड्राइवर को होटल का नाम बताया तो उसने इशारों में बैठने के लिए कह दिया। हमारी कार तेजी से आगे बढ़ रही थी। सड़क काफी चौड़ी थी। सड़क के दोनों ओर पोपुलस-विलो के पेड़ लगे थे। आसपास के खेतों में मक्का का पुआल जमा था। खेत, हरी सब्जियों से लदे थे।

लगभग एक घंटे बाद हम लिजियांग शहर के गोन्फान्ग गार्डन होटल (GUANFANG GARDEN HOTEL) में पहुंच गए। यहां पर उतरते ही रेमन मैगसेसे अवार्ड फ़ाउंडेशन की प्रेसिडेंट अबेला जी तथा कार्यक्रम अधिकारी सुश्री चैकलेट मिल गईं। मेरे आगमन से उनकी आंखों की चमक ने मेरा उत्साह भी बढ़ा दिया। मैं सारी थकावट भूल गया। जब मैंने जहाज़ के लेट होने की कहानी सुनाई तो पता चला कि मेरे साथ यह व्यवहार ओवर बुकिंग के कारण किया गया। मुझे ही क्यों दगा दिया गया? शायद मेरी भाषा और बोली ठीक से न समझ पाने के कारण हुआ हो। जबकि अतिथियों का पहले ध्यान रखा जाता है। यदि यह बात पहले ध्यान में आती तो इसका मैं अवश्य प्रतिकार करता।

शाम को सुश्री अबेला ने बताया कि एम.सी. मेहता को गलत ढंग से बीजा दिया गया था इसलिए वे नहीं आ सकेंगे। उन्हें पासपोर्ट के ऊपर वीजा देने के बजाए अलग कागज़ पर बीजा दिया गया, जो कि गलत था।

रात्रिभोज में मेरे लिए शाकाहारी सूप एवं दो-तीन सब्जी का अलग से प्रबंध किया गया था। चावल भी थे। मुझे इन दोनों से ही गुजारा करना पड़ा। चावल कम खाने की आदत थी। फिर भी रात को चावल खाना पड़ा। भोजन परोसते हुए बार-बार कहा जाता था कि पहले शाकाहार परोसें। पर पता चला कि यहां पर पहले सामिष भोजन ही परोसा जाता है। मेरे लिए यह भी अच्छी बात रही कि पहले बिना दूध की हल्की चाय दी जाती थी। जिससे मेरी गर्म पानी पीने की तमन्ना पूरी हो जाती थी।

इस बीच सभी से परिचय हो गया था। इस कार्यक्रम में दो अवार्डी फिलीपींस तथा तीन चाईना से थे। मेरे सहित कुल छह अवार्डी थे और इतने ही लोग रेमन मैगसेसे अवार्ड फ़ाउंडेशन के थे।

अगले दिन हम नौ बजे तैयार हो गए थे। हम लोग बस से ग्रीन वाटर शेड परियोजना के कार्यक्रम देखने के लिए चल पड़े। ग्रीन वाटरशेड प्रोजेक्ट के मुखिया प्रोफेसर यू झिंओंगोंग (XIAOGANG), जिन्हें वर्ष 2009 के रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, हमारे लिए पथ-प्रदर्शक का काम कर रहे थे। यह कार्यक्रम लासी लेक के आसपास है। यह क्षेत्र जेड ड्रैगन बर्फिले पहाड़ (JADE DRAGON SNOW MOUNTAIN) के दक्षिण पूर्वी ढाल में स्थित है। इस बर्फीली चोटी के अलावा लासी लेक के चारों ओर पहाड़ियां हैं। लासीहल (लाशीलेक) का जलागम डाइमंड के आकार का है। यह विविध प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है एवं वहां के लोगों का आधार है। साथ ही इसके बीच के क्षेत्र की आबादी की जल समस्या इससे जुड़ी हुई है और लिजियांग शहर के पर्यटन व्यवसाय को भी यह प्रभावित करता है।

समुद्र की सतह से 2500 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह लेक सबसे बड़ी मानी जाती है। बताया गया कि यहां पर 57 घुमंतू पक्षियों की प्रजातियाँ आती हैं। जो यूनान प्रांत के उत्तर पश्चिम में विविधता से भरपूर है। जाड़ों में हजारों घुमंतू पक्षियों का घर बन जाता है। इस प्रकार इस तालाब में सात विभिन्न जातियों की मछलियाँ भी पाई जाती हैं। इसके आसपास जहां मुख्य रूप से चीड़ के वृक्षों से आच्छादित जंगल हैं, वहीं वसंत में इसके आसपास की पहाड़ियां बुरास (रोडोडेंड्रौन) के फूलों से सजधज जाती हैं। इस क्षेत्र में 15 प्रजाति के ये वृक्ष पाए जाते हैं।

लासी लेक का इलाक़ा जैव विविधता के लिए तो जाना जाता ही है, यहां की कला और संस्कृति भी समुन्नत है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में 20 हजार के लगभग नाशी (NAXI) और यी (YI) जनजातीय गांव हैं, जिनका जीवन इस जलग्रहण क्षेत्र पर अवलंबित है। ये लोग अपनी परंपरागत जीवन शैली को बनाए हुए हैं। इस प्रकार इनकी संस्कृति तथा रीति-रिवाजों, जिनमें परंपरागत संगीत, नृत्य एवं वास्तुकला प्रमुख हैं, की अपनी विशिष्टता है। इसके बावजूद आधुनिकता को अपनाने में भी वे पीछे नहीं हैं।

यहां जगह-जगह सोलर वाटर हीटर घरों के ऊपर लगे दिखते हैं। गोबर गैस भी अमूमन हर घर में दिख जाएगी। महिलाएं खेत में हों या बाजार में अपना सामान लेकर जाती दिख जाएगी। अधिकांश परंपरागत वेशभूषा में नाशी बोली ही बोलती हैं। इनकी संस्कृति तथा रीति-रिवाज अभी सुरक्षित हैं। इनके गांव नीचे की तरफ हैं। वहीं पहाड़ी के ऊपरी भाग में यी समुदाय के लोग भी बहुत रंग-बिरंगे हैं। ये ऊंचाई वाले स्थानों पर वास करते हैं।

मुख्य रूप से ये जेड ड्रैगन स्नो माऊंटेन (JADE DRAGON SNOW MOUNTAIN) के इलाके में रहते हैं। ये लोग बाहरी संपर्क में कम हैं लेकिन मेहमानों का भरपूर स्वागत करते हैं। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से मक्का, साग सब्जी एवं अब पर्यटन का भी काफी प्रसार हो चुका है। बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में लाशी के जलागम क्षेत्र के जंगल खेती के लिए काटे गए। साथ ही जलाऊं-लकड़ी एवं लकड़ी के अन्य उपयोग के लिए भी बेतहासा ढंग से काटे गए। जिस कारण भूक्षरण, भूस्खलन बढ़ा। बाढ़ भी आने लगी और तालाब में प्रदूषण बढ़ने लगा।

गांव के ऊपर पहाड़ है, उसमें विकासमान जंगल है। मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं। बीच-बीच में इक्का-दुक्का चौड़ी पत्ती के पेड़ भी हैं। मकान पत्थरों से निर्मित हैं तथा छत खपरैलों से बने हैं। इस गांव में 72 परिवार हैं। 360 की कुल आबादी बताई गई। हर घर में बायोगैस लगा हुआ। इसके साथ पालतू सुअर भी बंधे देखे गए। हर मकान का अपना कोठा है। अलग-अलग द्वार हैं। द्वार को लताओं एवं खूबसूरत फूल के पौधों से सजाया गया है। कहीं-कहीं सौर उर्जा का प्रयोग भी किया गया है। मुख्य रूप से पानी को गर्म करने के लिए। यह मकानों के छतों पर यत्र-तत्र देखा गया सन् 2002 में इन्हीं सब बातों को देखते हुए प्रो. झिंगोंग (YU XIAOGANG) ने ग्रीन वाटरशेड संस्था का इस क्षेत्र में गठन किया। उन्होंने एकीकृत जलागम विकास का कार्य समुदाय की भागीदारी से आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने लासी झील का क्षेत्र चुना। इस लेक के चारों ओर से लगे हुए ग्यारह गांव हैं। इसके अलावा भी और दूरी पर अनेक गांव हैं। लासी लेक एक बांध के कारण भी प्रभावित था। इसका चालीस प्रतिशत पानी इस बांध को जाता है। इस प्रकार कृषि भूमि भी बाढ़ से प्रभावित हो जाती थी। ग्रीन वाटरशेड प्रोजेक्ट ने लोगों को अपने जलागम को सुधारने के लिए संगठित किया। इसके अंतर्गत सिंचाई, मछली पालन तथा विविध जलागम एवं ग्रामीण विकास कार्य में संलग्न किया। इसमें गांव-गांव से प्रतिनिधियों का मनोनयन कर फिर उन्हीं में से अध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारियों का चयन किया गया। यह संगठन काफी सक्रिय है। यह गांव में जल का समुचित बँटवारा करता है। इस समिति के अध्यक्ष अपने कार्य के बारे में बहुत उत्साहित हैं। इस प्रकार मछली से संबंधित समिति भी सक्रिय है। इससे पहले वितरण आदि में जो असमानता थी, वह काफी हद तक सुधर गई है। इन समितियों द्वारा अब जंगलों का संरक्षण, बाजार की समस्या आदि का कार्य भी हो रहा है। इसके अलावा ग्रीन वाटरशेड प्रोजेक्ट अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के माध्यम से ग्रामीण शक्ति को दिशा और गति देने का कार्य भी कर रहा है।

इधर हम लासी लेक के ऊपरी भाग की ओर गए। जहां पर वर्षों पहले एक नहर बनी हुई थी। बताया जाता है कि देख-रेख के अभाव में इसके जल का ठीक से उपयोग नहीं हो पा रहा था। इधर तीन वर्ष से ग्रीन वाटरशेड प्रोजेक्ट ने आसपास के ग्रामीणों को संगठित कर इसके वितरण का प्रबंध किया। नहर के ऊपरी भाग में घना जंगल है। इस जंगल में मुख्य रूप से चीड़, पोपुलस, मख्यूल, घिंघारू तथा जंगली गुलाब की झाड़ियां बहुतायत में थीं। इसी नहर से आसपास के खेतों की सिंचाई हो रही है। जिसमें मक्का के अलावा सब्जियों का उत्पादन भी खूब हो रहा है तथा फलों के बागों का विस्तार भी हुआ है। जल प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जल वितरण एवं उत्पादन बढ़ने की बात मुखर होकर सुनाते हैं।

हम लोग एक नाशी भोजनालय में गए। यहीं पर दिन के भोजन का प्रबंध किया गया था। इसके सभी व्यंजन स्थानीय सामग्री से परंपरागत तरीके से बनाए गए थे। मेरे लिए तीन तरह की हरी सब्ज़ियाँ तथा दो अन्य सब्जी परोसी गई थीं। चार-पांच प्रकार का मांसाहार भी था। चावल और मक्का भी भोजन में शामिल था। इसलिए आज भी मुझे मनपसंद शाकाहारी भोजन मिल गया था। आयोजक मेरा बराबर ध्यान रखते थे। मेरे लिए बनाए गए शाकाहारी व्यंजन अन्य लोग भी ले लेते थे। हरी सब्जी तो जानी पहचानी थी।

भोजन के बाद हम लोग लासी लेक की ओर गए। फिर ऊपर की ओर बढ़े। हम उत्तर पश्चिम की तरफ पहाड़ की तलहटी में बसे झिहू (XI HU) गांव में पहुंचे। महिला वाटरशेड मैनेजमेंट सेंटर के एक सार्वजनिक मकान, जिसके बाहर खेल का मैदान भी है, पर गांव की सभी औरतें हमारा इंतजार कर रहीं थीं। वे हरे रंग के कपड़े पहने थीं। आगे से आड़े-तिरछे में सफेद पट्टी लगी थी तथा पीछे से नक्काशीयुक्त सजा धजा लबादा जैसा पहना था। वे गाना गा रही थीं। बीच-बीच में अलीली...अलीली...अलीली... भी कह रही थी। ऐसा लग रहा था मानो वे स्वागत में गीत गा रही थी। बाद में पता चला कि वे गीत के माध्यम से प्रसन्नता जाहिर कर रही थी।

यहां सेंटर में गांव के लोगों द्वारा जो सामुदायिक कार्य किए गए हैं उन्हें चार्ट एवं फोटो के माध्यम से प्रदर्शित किया गया था। गांव के बारे में अलग से जानकारी दी गई थी। गांव के ऊपर पहाड़ है, उसमें विकासमान जंगल है। मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं। बीच-बीच में इक्का-दुक्का चौड़ी पत्ती के पेड़ भी हैं। मकान पत्थरों से निर्मित हैं तथा छत खपरैलों से बने हैं। इस गांव में 72 परिवार हैं। 360 की कुल आबादी बताई गई। हर घर में बायोगैस लगा हुआ। इसके साथ पालतू सुअर भी बंधे देखे गए। हर मकान का अपना कोठा है। अलग-अलग द्वार हैं। द्वार को लताओं एवं खूबसूरत फूल के पौधों से सजाया गया है। कहीं-कहीं सौर उर्जा का प्रयोग भी किया गया है। मुख्य रूप से पानी को गर्म करने के लिए। यह मकानों के छतों पर यत्र-तत्र देखा गया। बाद में प्रोफेसर यू बता रहे थे कि सौर उर्जा का बहुत विस्तार हुआ है। उन्होंने बताया कि उनके देश में जर्मनी के बाद सर्वाधिक सौर उर्जा का उपयोग हो रहा है। यह भी जानकारी मिली कि खेती-बाड़ी एवं घर गृहस्थी का अधिकतर कार्य महिलाएं ही करती हैं। पुरुष मुख्य रूप से पर्यटन उद्योग से जुड़े हैं। इस पूरे इलाके में देशी-विदेशी पर्यटक भारी संख्या में आते हैं। यहां की घुड़सवारी प्रसिद्ध है। लासी लेक के चारों ओर अश्व-शालाएं हैं। झिहू गांव के अधिकांश पुरुष इस कार्य में व्यस्त रहते हैं। गांव में भूस्खलन एवं भूक्षरण रोकने का कार्य भी गांव वालों ने किया है। इसमें ग्रीनवाटर प्रोजेक्ट का सहयोग लिया गया है।

इसी प्रकार पहाड़ी पर गांव वालो ने फलों के पौध रोपे हैं। उससे अच्छी आय होने लग गई है। कौन से फल के पौध रोपे जाए यह गांव वाले तय करते हैं। इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण के साथ उनकी आर्थिकी में बढ़ोत्तरी हुई है। गांव वालों ने मुख्य मार्ग से झिहू गांव तक अपने परिश्रम से मोटर मार्ग भी बनाया है, जो अभी कच्चा है। इस पर बड़ी बसें नहीं आ सकती हैं। अनाज, साग-सब्जी, चारा आदि ढोने का काम रिक्शे से किया जाता है। बड़ी-बूढ़ी महिलाएं हमारे यहां की तरह पीठ पर कंडी लगाकर सामान लाने ले जाने का कार्य करती हैं। मक्का की फली एवं मिर्चों को सूखाने के लिए घरों के आसपास माला में पिरों कर बड़े सुंदर ढंग से सजाने की प्रथा है। ये मालाएँ लगभग सभी मकानों के बाहर टकी हुई थीं। इनसे मकान की शोभा भी बनी रहती है तथा मिर्च और मक्का लंबे समय तक संरक्षित भी रह जाते हैं। मकान पर लकड़ी का अधिक प्रयोग किया गया है।

मैं गांव की परिक्रमा करके वापस सेंटर पर लौटा तो वहां पर सभी महिलाएं लय ताल के साथ सामूहिक नृत्य कर रही थीं। कुछ देर बाद हम भी उनके नाच में शामिल हो गए। इस नाच में गांव की हर आयु-वर्ग की महिलाएं शामिल थीं। जब हमने गांव से प्रस्थान किया तो सभी बहिनों ने हमें ‘अलिली...अलिली...अलिली’ कहते हुए विदा किया। हमारे काफ़िले के आंखों से ओझल हो जाने तक वे वहां खड़ी रहीं।

एक बड़ा चौकोर मैदान सा है, जिसके चारों ओर अलग-अलग दिशा में जाने के लिए रास्ते हैं। यहीं पर बहुत बड़ी रहट है जो नहर से पानी को ऊपर फैलाती है। इसे देखने के लिए भीड़ लगी रहती है। इसके पास ही एक छोटी पहाड़ी है। यह पहाड़ी भी परंपरागत शैली में बने मकानों से पटी है। इन मकानों में अधिकांश पर होटलों के नामपट लगे हैं। बताया गया कि पर्यटक ऐसे ही छोटे-छोटे होटलों को अधिक पसंद करते हैं। एक होटल के दरवाज़े पर नामपट था कि यहां प्रवेश कर जवानी की अनुभूति होगी। इसी प्रकार होटलों के नाम बड़े आकर्षित करने वाले थे। अगले दिन सुबह हम एक दूसरे के विचारों एवं कार्यों से अवगत हुए। चीन के प्रोफेसर यू के अलावा मा जून (MA JUN), जिन्हें 2009 का रेमन मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त हुआ था, की उम्र इकतालीस साल है। इन्होंने अंग्रेजी एवं पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद विजिंग ब्यूरो आफ साऊथ चाईना मॉर्निंग पोस्ट में कार्य किया। उन्होंने देश भर में घूम कर रिपोर्टें तैयार की थीं कि किस प्रकार आर्थिक बोझ से पर्यावरण का बिगाड़ हो रहा है। उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी-चीन का जल संकट (CHINA’s WATER CRISIS), जो यहां के पर्यावरण संकट पर पहली पुस्तक थी, जिसमें उन्होंने नदियों के प्रदूषण, बांधों के नदियों के पर्यावरण तथा पारिस्थितिकीय तंत्र पर पड़ रहे प्रभाव पर बेवाक टिप्पणी की है। बाद में मा जून ने चाईना मॉर्निंग पोस्ट को छोड़कर पर्यावरण के बारे में स्वतंत्र रूप से सलाह देने का कार्य शुरू किया। उन्होंने आगे जाकर कहा कि चीन की पर्यावरणीय समस्याओं के हल के लिए लोक भागीदारी आवश्यक है। आगे के वर्षों में उन्होंने चीन का जल प्रदूषण मानचित्र तैयार किया। इसी प्रकार वायु प्रदूषण मानचित्र तैयार किया गया। उन्होंने अपने अनुसंधान के आधार पर यहां जनजागरण का कार्य भी किया। इन दोनों कार्यों को एक तरह से ‘स्टेट ऑफ चाईनाज एनवायरमेंटल पाल्यूशन’ माना गया।

मा जून के आंकड़ों का उपयोग किया जा रहा है। मा का मानना है कि लोक ज्ञान का उपयोग सरकार और निगम, पर्यावरण संरक्षण में करें तथा इसके लिए लोगों को जोड़ा जाना आवश्यक है।

चीन के तीसरे रेमन मैगसेसे अवार्डी अस्सी वर्षीय टांग झिंझांग (TANG XIYANG) हैं, जिन्हें 2007 में शांति और अंतरराष्ट्रीय समझ के लिए पुरस्कार प्राप्त हुआ था। टांग ने भी अपना प्रारंभिक जीवन पत्रकारिता से शुरू किया था। टांग ‘ग्रेट नेचर मैगज़ीन’ के संपादक रहे। उन्होंने 21 विश्वविद्यालयों के छात्रों का यूनान में ग्रीन कैंप आयोजित किया था। उसके बाद भी वे अलग-अलग क्षेत्रों में इस प्रकार के कैंपों का आयोजन करते रहते हैं।

इसी प्रकार फिलीपींस के बेनजमीन अबादीनो (BENJAMIN ABADIANO) जिन्हें उभरते हुए नेतृत्व के लिए 2004 में रेमन मैगसेसे पुरस्कार मिला था, ने अपने कार्यों की जानकारी दी। फिलीपींस के ही दूसरे अवार्डी अनटोनियों ओपेसा (ANTONIO OPOSA JR.) को 2009 में पुरस्कार दिया गया था। उन्होंने मुख्य रूप से पर्यावरण के विभिन्न पक्षों एवं कानून में तब्दीली के बारे में अपने कार्यों की जानकारी दी।

इसी प्रकार मैंने हिमालय के पर्यावरण, विकास एवं चिपको आंदोलन की मातृ संस्था दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल द्वारा किए जा रहे प्रकृति संवर्द्धन के कार्यों की जानकारी दी। इस चर्चा एवं विचार विमर्श में हम छह रेमन मैगसेसे अवार्डियों के अलावा रेमन मैगसेसे अवार्ड फ़ाउंडेशन की प्रेसिडेंट मिस अबेला तथा अन्य न्यासियों ने भी भाग लिया था।

दिन के भोजन के बाद हम प्राचीन लिजियांग शहर को देखने गए। लिजियांग नगर वास्तुकला में अपनी प्राचीनता को बनाए हुए है। इस पुराने नगर को यूनेस्को ने वर्ष 1997 में विश्व सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया है। यहां अभी भी अपनी वेशभूषा, संस्कृति को संजोए रखा गया है। यहां के मुख्य चौक के पास से नहर बहती है। जिसके दोनों ओर परंपरागत भवनों के अंदर रेस्तरां एवं विविध वस्तुओं की दुकानें हैं। उनका अग्रभाग रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियों से सजा है। इस प्रकार नहर में भी रंग-बिरंगी मछलियाँ तैरती हुई देखी जा सकती हैं। बीच-बीच मे नहर को आर-पार करने के लिए लकड़ी के पुल बने हैं। ये पुल भी पूलों से सजे-धजे हैं रेंस्तराओं ने पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए परंपरागत नृत्य करने वाले नर्तक मंडलों को रेस्तरां के बाहर नृत्य करने के लिए रखा है। ये अपनी परंपरागत वेशभूषा में बाहर गाने के साथ नाच रहे थे। यह इलाक़ा मुख्य रूप से नाशी बाहुल्य है। नाशी (NAXI) चीन के 55 अल्पसंख्यक देशज-जातियों में एक हैं। यहां तिब्बत, यूनान एवं सिचुआन प्रांत का सांस्कृतिक एवं व्यापारिक प्रभाव भी देखा जा सकता है।

एक बड़ा चौकोर मैदान सा है, जिसके चारों ओर अलग-अलग दिशा में जाने के लिए रास्ते हैं। यहीं पर बहुत बड़ी रहट है जो नहर से पानी को ऊपर फैलाती है। इसे देखने के लिए भीड़ लगी रहती है। इसके पास ही एक छोटी पहाड़ी है। यह पहाड़ी भी परंपरागत शैली में बने मकानों से पटी है। इन मकानों में अधिकांश पर होटलों के नामपट लगे हैं। बताया गया कि पर्यटक ऐसे ही छोटे-छोटे होटलों को अधिक पसंद करते हैं। एक होटल के दरवाज़े पर नामपट था कि यहां प्रवेश कर जवानी की अनुभूति होगी। इसी प्रकार होटलों के नाम बड़े आकर्षित करने वाले थे। आगे यहां बांगचांग टेंपल का बोर्ड दिखा। इसके चारों ओर पेड़ों का झुरमुट था। इसके ठीक सामने बर्फ का पहाड़ था। बर्फ की इस पहाड़ी पर एक स्थान पर छोटा सा हिमनद था बाकी स्थान बर्फ विहीन थे। हमें जानकारी दी गई कि इस साल इस चोटी पर बहुत कम बर्फबारी हुई। इसे लोग मौसम का प्रभाव बता रहे थे। इससे कुछ ही दूरी पर वेन चौंग-प्लेस का प्रवेश द्वार था, जिसके ऊपर पत्थरों से बने शेरों के बुत रखे थे। सीढ़ियां चढ़ने के बाद विशाल दरवाज़ा था, जो बंद था। पेड़ों की झुरमुट में मकान दिखाई दे रहा था। इस पहाड़ का यह अंतिम छोर था। यहां पर सुरई का एक विशाल वृक्ष था, जिसे स्थानीय लोग आठ सौ साल पुराना बता रहे थे। इससे आगे एक रेस्तरां था, जिसमें किनारे से बैठने के लिए बांस से बने खुले कैबिन थे। इन कैबिनों से पुराने शहर का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था। दूर-दूर तक पहाड़ियां दिखाई दे रह थी।

शाम का खाना हमने पुराने शहर में ही किया। यह एक परंपरागत भोजनालय था। पुराने ढंग के बर्तनों पर परंपरागत ढंग से भोजन परोसा गया। मेरे हिस्से में तीन शाकाहारी व्यंजन थे। खाना लकड़ी की स्टिकों से ही खाया जा रहा था। इनसे खाने में मुझे कठिनाई होती थी। इसलिए मैं हर बार अपने लिए चम्मच मंगा कर उसका ही उपयोग अधिकतर करता था।अगले दिन मैं बहुत जल्दी तैयार हो गया था। यांगत्से नदी (YANGTSE RIVER) का दर्शन करना था। मैं खासा उत्साहित था। यांगत्से नदी को चीन की मदर रिवर भी कहा जाता है। मा बताते हैं कि यांगत्से नदी तिब्बत के क्विनघाई (QINGAI TIBET PLATEAU) से उद्गमित होकर छह हजार चार सौ किलोमीटर की यात्रा करने के बाद संघाई के पास प्रशांत महासागर में समाहित होती है।

दुनिया की सबसे लंबी नदियों में से यांगत्से नदी तीसरी मानी जाती है। चीन की चार प्रमुख नदियों में से यांगत्से सबसे बड़ी है। यांगत्से के बाद चीन का शोक कही जाने वाली येलो नदी का स्थान आता है। इसके बाद पर्ल (PEARL) एवं सांगुआ नदी (THE SANGHUA) का स्थान है। यांगत्से नदी इसके बाद दक्षिण पूर्व में हेंगडुउन पर्वत (HANGDUAM MOUNTAIN RANGE) श्रृंखलाओं के पास तक तेज गति से बहती है, जो लिजियांग से 44 मील की दूरी पर है।

नौ बजे हमारी बस लिजियांग के गौन्गफांग (GUANFANG) होटल से चल पड़ी। हम लिजियांग शहर से बाहर निकल गए थे। मोटर मार्ग काफी चौड़ा एवं एकदम से साफ सुथरा था। सड़क के दोनों ओर पोपुलस एवं विलो की सघन वृक्षावली थी। उससे बाहर फलों के बाग थे। बागों के बीच की ज़मीन पर सब्ज़ियाँ उगाई गई थीं। मुख्य रूप से हरी सब्ज़ियाँ थी। कुछ स्थानों पर मकई के सूखे पौधे भी खड़े थे।

फिर पहाड़ी पर बस चढ़ती गई। सड़क के आस-पास के पोपुलस के पत्तों में पीलापन आने लगा था, जो शिशिर ऋतु की शुरूआत का प्रतीक था। पहाड़ी चीड़ के पेड़ों से आच्छादित थी। यह दृश्य बसंत के आगमन की सी अनुभूति दे रहा था। पहाड़ी पर चढ़ने के बाद फिर हमारे वाहन चोटी से घुमावदार रास्ते से नीचे की ओर उतरते गए। कुछ देर बाद पर्वत-श्रृंखलाओं का मनोहारी दृश्य दिखाई दे रहा था। बूंदाबांदी हो रही थी। आसमान में बादल छा गए थे। मैं तो बाहर के अनुपम दृश्य को निहार रहा था। मुझे कभी-कभी यह अहसास हो रहा था कि हम कुमाऊं. की पहाड़ियों में हैं।

इधर हमारी बस में हलचल शुरू हो गई थी। चीनी भाई बहिनें अलीली...अलीली...अलीली.., चिल्ला रहे थे। पूछने पर पा चला कि उस मोड़ (FIRST BEND OF THE YANGTSE RIVER) पर पहुंच गए हैं, जहां से यांगत्से नदी दिखाई देती है। सभी लोग बस से उतर जाते हैं। वहां पहले से ही वाहन खड़े थे। सड़क किनारे एक खूबसूरत द्वार बना था, काफी बड़ा था। उसके दोनों ओर पहाड़ जैसे ढांचे बनाए गए थे, जो लगभग दस मीटर ऊंचे थे। इन ढांचों को सुंदर ढंग से सजाया गया था। हम लोग द्वार पर पहुंचे । उसके नीचे की ओर दूर तक सीढ़ियां बनाई गई थी। द्वार के सामने यांगत्से नदी का विहंगम दृश्य दे रहा था। पहाड़ों के बीच में आड़ी-तिरछी लकीर की तरह बढ़ती हुई आगे ऊंचे पहाड़ों की तलहटी में ओझल हो गई थी। नदी के दोनों ओर समतल खेत, हरियाली, बस्ती और उसके बाद पहाड़। जहां पहाड़ों में मिट्टी है वहां तो हरियाली है, बाकी चट्टानें तो रूखी ही थीं। इस दृश्य को हम सभी ने अपने-अपने कैमरे में कैद किया। इस दृश्य से सबके चेहरे प्रसन्न दिख रहे थे। मानो उन्हें बहुत कुछ प्राप्त हो गया हो। इस मोड़ से प्रकृति का मनमोहक नज़ारा तो दिखता ही है साथ ही भूआकृति का भी अद्भूत नज़ारा दिखाई देता है। एक ओर ढालदार पहाड़ियां, दूसरी ओर सीधी खड़ी चट्टानें।

आगे हमारी बस ढालदार पहाड़ी के बीचों-बीच मोड़ के बाद मोड़ को पार करते हुए आगे दौड़ रही थी। आसपास की पहाड़ियां हरे भरे जंगलों से आच्छादित थी। बीच में गांव दे रहे थे। वहीं परंपरागत शैली में बने मकान बहुत सुंदर दिख रहे थे। आखिर एक घंटे तक चलने के बाद हमारी बस यांगत्से नदी के किनारे पर पहुंच गई। नदी के दोनों ओर सघन हरियाली थी। तीन किलोमीटर बाद एक चौरस जगह पर बस रुकी। यहां से नदी मुश्किल से दस मीटर नीचे बह रही थी। इसी स्थान पर एक गांव के व्यक्ति ने स्थानीय उत्पादों को एक खोमचे में रखमा था, जिसमें जंगली जड़ी बूटी, फूल के पराग-जो कि भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं तथा कुछ स्थानीय छोटे-छोटे बर्तन आदि मुख्य रूप से थे।

हमारे साथी ख़रीददारी में व्यस्त हो गए। कुछ कैमरे निकाल कर नदी के इन दृश्यों को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे। मैंने भी कैमरा निकाला, चित्र खींचने लगा लेकिन वह बंद हो गया। मेरे कैमरे की बैटरी समाप्त हो चुकी थी। मुझे अफसोस हुआ कि इस भव्य दृश्य को मैं अपने कैमरे में नहीं उतार सका। पास में खड़ी रेमन मैगसेसे फ़ाउंडेशन की सुश्री चेकलेट ने मेरी उदासी भांप ली। मेरा कैमरा लिया पर वह तो खुला ही नहीं। चैकलेट ने अपने कैमरे से नदी के साथ मेरा चित्र लिया। उन्हें लगा कि इससे मुझे संतुष्टि मिलेगी। मुझे तो अपना चित्र नहीं, अपने कैमरे से इस दृश्य को लेना था। खैर...। इधर सभी एक दूसरे के साथ चित्र खींचने में व्यस्त थे। नदी तट तक जाने का रास्ता था नहीं। सीधी ढाल पर, दस-बारह मीटर की दूरी पर नदी शांत होकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

मैंने इधर-उधर देखा, नदी को स्पर्श करके, उसका अमृत लेने की तमन्ना थी। मुझे याद आया “सर्वे गंगा समुद्रगा” – जो भी नदी समुद्र में समाहित होती है वे सभी गंगा हैं। मैं इस अवसर को छोड़ना नहीं चाहता था। नदी के वेग और तीखे ढाल होने के कारण, मुझे वहां तक जाने की इजाज़त नहीं मिलने वाली थी। इसलिए मैं, सबकी निगाह बचा कर चुपके से धीरे-धीरे नदी के तट पर स्पर्श करने पहुंचा। वहां मैंने नदी का स्पर्श किया, अर्घ दिया। इससे मुझे आत्मसंतुष्टि हुई। थोड़ी देर बाद मैं अपने दल से पास पहुंच गया।

यहां पर यांगत्से नदी का पाट बहुत चौड़ा था। सामने विलो वृक्षों की सघन हरियाली थी। उसके ऊपर चौरस खेत और गांव था। लग रहा था कि भूतकाल में नदी द्वारा लाए गए मलबे में खेत और गांव की बसासत हुई। उसके ऊपर से पहाड़।

आगे यांगत्से नदी का दृश्य बहुत ही रोमांचक था। यांगत्से नदी, यहां पर मुड़ कर ‘वी’ आकार में है। वह एक सौ अस्सी डिग्री के कोण पर घूमते हुए आगे बढ़ती है। वहां पर ऐसा लगता है कि वह पहाड़ की परिक्रमा करना चाहती है। यहां पर वह उत्तर पूर्व की ओर बढ़ रही है। इतना खूबसूरत दृश्य, जो पहले कभी नहीं देखा था, दिखाई दिया। यहां पर गोलाकार में नदी का फैलाव भी बहुत ज्यादा है। सामने हरी भरी सघन वृक्षावली यहां आकर्षक छटा बिखेर रही थी। जहां से नदी मुड़ती है, वह ऐतिहासिक बस्ती शीगू है। शीगू ऊपर पहाड़ की तलहटी पर बसा है। उसके निचले भाग में नदी तट तक एक विशाल मैदान है। यह मैदान भी नदी द्वारा पूर्व में लाए गए साद से बना हुआ लगता है। शीगू और उससे लगे हुए पहाड़, ने यांगत्से नदी को अपना प्रवाह मोड़ने को मानो ज़बरदस्ती की हो। यांगत्से नदी के बारे में कहावत भी है कि यह एक खूबसूरत स्त्री है। इस पर बुरी छाया न पड़े, इसकी उसकी मां और भाइयों को चिंता थी। इसलिए वे उस पर बराबर निगाह रखते थे, आदि..आदि।

शीगू में नया पुराना सभी कुछ देखने को मिलता है। जहां दुकानों के अंदर आधुनिक वस्तुओं की भरमार है वहीं सड़क के किनारे गाँवों से लाकर, साग, भाजी, औषधीय मसालें, जड़ी-बूटी, लकड़ी के बर्तन, रिंगाल और चमड़े के वस्तुओं की भरमार थी। इनकी वहां खूब बिक्री हो रही थी। साथ ही अखरोट, सेब, संतरा आदि भी मिल रहे थे। बाजार में प्रवेश करते ही नाशियों का तिब्बत पर विजय का एक स्मारक है। इसमें पत्थर का एक बड़ा सा ढोल है। कहते हैं कि लिजियांग के नाशी जाति के लोगों ने तिब्बत की सेना पर विजय प्राप्त की थी। उसके उपलक्ष्य में यह ढोल जो पांच फिट लंबा तथा दो फिट गोलाई में है, जीत की खुशी में बजाया गया था। यहां से ऊपरी छोर की पहाड़ी पर रेड आर्मी का विजय स्मारक भी बना हुआ है।

यह स्थान काफी ऊंचाई पर है। यहां से यांगत्से नदी के मोड़ का दृश्य बहुत ही खूबसूरत दिखाई देता है। दूर तक घाटी भी दिखाई देती है। नदी नीचे की ओर मुड़ते हुए दिखाई देती है। यहां पर एक तीसरी घाटी भी दिखाई देती है जिसके चौरस खेत साग-सब्जी से लदे दिखाई दे रहे थे।

हमने नदी से मिले हुए एक स्थानीय रेस्तरां में भोजन किया, जहां उन्होंने अपने बगीचों की ताजी सब्जी से बने व्यंजन परोसे। इस प्रकार अविस्मरणीय स्थान से डेढ़ बजे प्रस्थान किया। आगे हम नदी के किनारे-किनारे पचास साठ किलोमीटर दूर तक चले। कभी नदी के दाएं किनारे तो कभी बाएं किनारे चलते रहे। नदी के दोनों ओर उपजाऊ खेत और बगीचें दिखाई दे रहे थे। बीच-बीच में बाजार और गांव थे। गांव के आसपास अखरोट, नासपाती, सेब के बाग एवं अन्य पेड़ बहुतायत में दिखाई दे रहे थे। सड़कें खूब चौड़ी थी।

पहले तो हमने पीली नदी के बारे में सुना था कि वह बहुत बौखलाती है। इस बार लोगों ने ने बताया कि यांगत्से नदी भी कम नहीं है। यह भी बहुत बौखलाती है। हमारे देश में गंगा, ब्रह्मपुत्र एवं सतलज की बाढ़ एवं बौखलाहट भी हर साल बढ़ती जा रही है। इन नदियों में ऊपर से वन विनाश, पहाड़ों की खुदाई और बड़े-बड़े बांधों के विस्तार के कारण तथाकथित महाविकास की गतिविधियाँ और तेज होती जा रही हैं। इस प्रकार नदियों का अस्तित्व का संकट जो मानव जाति के साथ सीधा जुड़ा है, कहां ले जाएगा, कहा नहीं जा सकता। नदियां तो मौन लगती हैं पर समय-समय पर वे अपनी बौखलाहट से सब कुछ बता देती है। मा ने बताया कि इसके आगे यांगत्से नदी के टाईगर लेपिंग गौर्ज पर बहुत बड़ा बांध प्रस्तावित है। यह बांध 270 मीटर ऊंचा बनेगा। इसका फैलाव दो सौ किलोमीटर दूर तक होगा। इससे एक लाख से अधिक लोग डूब के अंतर्गत आएंगे। उन्होंने बताया कि उपजाऊ कृषि भूमि, बाजार और नगर भी इसमें समाहित हो जाएंगे। इसके आसपास के कई उद्योग भी समाप्त हो जाएंगे। वे यह भी बताते हैं कि यह योजना विवादास्पद बनी है। यह जानकारी भी मिली कि यांगत्से नदी में बारह बड़े बांध बन रहे हैं, जिनमें कई निर्माणाधीन हैं तो कुछ प्रस्तावित हैं। इसके अलावा यांगत्से नदी की सहायक धाराओं में हजार से अधिक छोटे-बड़े बांध या बिजली की परियोजनाएं बनी हैं या निर्माणाधीन हैं। प्रोफेसर यू इसके दुष्प्रभावों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं।

हमें जगह-जगह मकानों के ऊपर सौर ऊर्जा लगी हुई दिखी। इस प्रकार हम यांगत्से के पास कभी दाएं, कभी बाएं से जाते हुए संगरिला राष्ट्रीय राजमार्ग से आगे बढ़े। अंत में हमने संगरिला राजमार्ग छोड़ दिया। दाई ओर टाइगर लेपिंग गौर्ज की ओर बढ़े। अंत में दस किलोमीटर दायीं ओर से चलने के बाद मोटर मार्ग वहीं पर समाप्त हो गया था। संगरिला के बारे में बता रहे थे कि यह तीन प्रांतों की सीमाओं में स्थित है। ऊपर से हिमशिखर, फिर लंबे चौड़े बुग्याल, फिर अन्य वृक्ष पंक्तियां, इसके बीच में चारागाहों में याकों के झुण्ड तथा भेड़-बकरियों का मनोहारी दृश्य दिखाई देता था। इस प्रकार वहां का वर्णन बहुत ही रोमांचक ढंग से प्रस्तुत किया गया।

यांगत्से नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जगह-जगह भूस्खलन एवं भूक्षरण भी होता रहता है। वन विनाश एवं खनन से यह अतिवृष्टि के दौरान बौखलाती रहती है, जिससे इसके तटवर्ती क्षेत्रों के लगभग एक हजार गांव प्रभावित होते रहते हैं। बताया गया है कि 1998 में यांगत्से नदी में आयी बाढ़ में लगभग दो हजार लोग मारे गए थे। यांगत्से नदी के किनारे 300 छोटे-बड़े शहर बताए जाते हैं, जिनमें से तकरीबन 105 के इससे प्रभावित होते रहने की जानकारी मिली। यांगत्से नदी के नाम से प्रसिद्ध इस नदी को पर्वतीय इलाके में जिन्गसा नदी (JINGSHA) के नाम से पहचाना जाता है। यहीं जिन्गसा नदी बाद में यांगत्से नदी (YANGTSE RIVER) कहलाती है।

आगे हम बायीं ओर की सड़क पर गए। बायीं ओर की सड़क जो नदी के कभी पास तो कभी दूर चली जाती थी। यह सड़क संगरीला हाईवे के नाम से जानी जाती है। हम दायीं ओर से आगे बढ़ रहे थे। नदी स्थिर एवं शांत भाव से आगे बढ़ रही थी। कुछ ही किलोमीटर आगे सीधे खड़े पहाड़, जो दोनों ओर से दिखाई दे रहे थे, के छोर तक सड़क गई थी। इसके ऊपरी भाग में चोटी पर नजर नहीं पड़ती थी। जहां पहाड़ी पर थोड़ी सी मिट्टी है, वहां मख्यूल-स्यारू, रिंगाल आदि पौधों ने अपना साम्राज्य फैला रखा था। यहां पर छोटे तथा बड़े वाहनों के लिए बहुत बड़ा स्टेशन भी बना हुआ है। अलग से पर्यटकों की सुविधा के लिए शौचालय आदि का भी प्रबंध है। यहां पर बहुत सारी दुकानें भी हैं। जिनमें खाने पीने के सामानों के अलावा स्थानीय उत्पाद बिक्री के लिए रखे गए हैं। यहां से आगे तीन किमी. की दूरी पर टाइगर लेपिंग गौर्ज है।

वहां तक जाने के लिए पैदल चलना पड़ता है। जो लोग पैदल नहीं चल सकते हैं उनके लिए मानव चालित रिक्शा चलाया जाता है। रिक्शे चलाने वाले वहां तक आने जाने के लिए चालीस यूआन ले रहे थे। आदमी द्वारा खीचें जाने वाले इस रिक्शा को चलाने में काफी श्रम लगता है। हमारे देश में भी पहले कोलकाता एवं मसूरी में इसी प्रकार के रिक्शे चलते थे। यहां से आगे सीधी खड़ी कहीं-कहीं पर झूलती हुई चट्टानें थी। इन्हें काट कर आठ-दस फुट चौड़ा मार्ग बना है, जिसमें हर वक्त पत्थर गिरने का भय भी बना रहता है। इसी के चलते दो स्थान पर यह पैदल रास्ता पहाड़ को काट कर सुरंग के अंदर से बनाया गया है। इधर नदी की मंथर गति से ऐसा लगता है कि वह सहमी हुई है लेकिन दो किलोमीटर चलने के बाद देखा कि सामने पहाड़ पर भूस्खलन हुआ था, जिसके बाद नदी तो कुछ देर थमी होगी, ऐसे चिह्न वहां दिखाई दे रहे थे। फिर आगे पूरे वेग एवं प्रवाह से नदी बढ़ रही थी। इसके आगे की घाटी-टाइगर लेपिंग गौर्ज के नाम से प्रसिद्ध है। इस घाटी को देखने के लिए प्रतिदिन सैकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। टाइगर लेपिंग गौर्ज में नदी एक संकरी घाटी में प्रवाहित होती है। इस स्थान पर संकरी घाटी के बीच में 30 मीटर की दूरी पर एक चट्टान है। पुराने लोगों के अनुसार टाइगर यहां पर छलांग लगा कर नदी को पार करता था। इसलिए इस जगह को टाइगर लेपिंग गार्ज कहा जाता है। इसका नाम हुटियों घाटी (HITIAO GORGE) भी है। बताते हैं कि यह दुनिया की सबसे गहरी घाटी है। इसके आसपास यूलोंग (yulong-xuehan) तथा हाबा जूएसन (HABA XUESHAN) नाम के दो बर्फिले पहाड़ हैं। यह घाटी 15 किमी. की बताई जाती है।

हमारे देश में बद्रीनाथ के पास भी एक स्थान का नाम पटमिल्ला है। पटमिल्ला का अर्थ नदी के दोनों किनारे के पहाड़ आपस में मिलने वाले हैं और यहां के बारे में कहा जाता है कि भविष्य में इस स्थान पर अलकनंदा नदी के ये दोनों किनारे के पहाड़ एक दूसरे से मिल जाएंगे। यहां पटमिल्ला से पांडुकेश्वर तक ऐसी ही संकरी घाटी में नदी बहती है। इसे देख कर मुझे यहां की याद आ गई। टाईगर लेपिंग गौर्ज की तरह अलकनंदा पर बद्रीनाथ के रास्ते पर ही रुद्रप्रयाग के पास कोटेश्वर के समीप काकड़ फाली है। काकड़ फाली का तात्पर्य है मृग का छलांग लगाने का स्थान। काकड़ फाली में अलकनंदा बहुत ही संकरी घाटी में तीव्र वेग से प्रवाहित होती है। यहां पर सन् 1977 में एडमंड हिलेरी को सागर से आकाश अभियान में अपनी नावों को निकालने में भारी कठिनाई हुई थी। वे यहां से अपनी नावों को उठा कर ले गए थे। जिसके बाद उनका अभियान नंदप्रयाग में नंदाकिनी और अलकनंदा के संगम तक ही चल पाया था।

पीपलकोटी के पास से एक हनुमानचट्टी के पास तक 30 किलोमीटर तक अलकनंदा इसी प्रकार की घाटी (GORGE) से प्रवाहित होती है। टाइगर लेपिंग गौर्ज में प्रचार का कमाल देखा जा सकता है। हर दिन, इसे देखने के लिए सैंकड़ों लोग आते हैं। रास्ता पैदल तथा बारिश होने तथा रहस्य के खुल जाने के कारण मैं उस पॉइंट तक गया ही नहीं। मेरा उस स्थान पर जाने का आकर्षण समाप्त हो गया था।

बताया जाता है कि यह घाटी तीन भागों में विभाजित है। पहले भाग में 30 मीटर चौड़ी घाटी है, जिसे टाइगर ने लांघा था। बताते हैं कि आगे का भाग तो 100 मीटर चौड़ा है। यहां नदी तेजी से बहती है। आगे का भाग बहुत गहरा एवं खतरनाक बताया जाता है।

इस घाटी से हमने पांच बजे के लगभग वापस लिजियांग के लिए प्रस्थान किया और 50 किमी. चलने के बाद यांगत्से नदी को अलीली...अलीली.. कहते हुए फिर आगे बढ़े। शाम के समय आसमान साफ हो गया था। जिस पहाड़ी से हम नीचे आए थे उसके ऊपरी भाग में छोटे – बड़े कुछ हिमनद दिखाई दे रहे थे। दोपहर की बूंदाबांदी का असर भी पहाड़ी पर दिखाई दे रहा था।कुछ स्थानों पर ताजे हिमपात के कारण सफेदी दिखाई दे रही थी। इस प्रकार, हम सभी शाम को लिजियांग नगर में पहुंचे जहां रात्रि भोजन के बाद एक दूसरे को विदाई दी।

पहले तो हमने पीली नदी (YELLOW RIVER) के बारे में सुना था कि वह बहुत बौखलाती है। इस बार लोगों ने ने बताया कि यांगत्से नदी भी कम नहीं है। यह भी बहुत बौखलाती है। हमारे देश में गंगा, ब्रह्मपुत्र एवं सतलज की बाढ़ एवं बौखलाहट भी हर साल बढ़ती जा रही है। इन नदियों में ऊपर से वन विनाश, पहाड़ों की खुदाई और बड़े-बड़े बांधों के विस्तार के कारण तथाकथित महाविकास की गतिविधियाँ और तेज होती जा रही हैं। इस प्रकार नदियों का अस्तित्व का संकट जो मानव जाति के साथ सीधा जुड़ा है, कहां ले जाएगा, कहा नहीं जा सकता। नदियां तो मौन लगती हैं पर समय-समय पर वे अपनी बौखलाहट से सब कुछ बता देती है। वे किसी भी भौगोलिक एवं व्यवस्थागत परिवेश में क्यों न हो, सबका दर्द एक सा ही है। इन स्मृतियों को संजोकर अगले दिन सुबह मैंने सात बजे के हवाई जहाज़ से लिजियांग से अपने देश के लिए प्रस्थान किया।

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चंडी प्रसाद भट्टचंडी प्रसाद भट्ट‘पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती’ चंडी प्रसाद भट्ट की बेहतरीन यात्राओं का संग्रह है जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। अद्भुत जीवट को समर्पित चंडी प्रसाद भट्ट गांधी के विचार

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