दूषित पानी पीकर चुका रहे विकास की कीमत

Submitted by Hindi on Mon, 04/29/2013 - 16:36
1. चौतरफा संकट से जूझ रहे हैं पॉवर प्लांट से विस्थापित परिवार
2. मेजा उर्जा निगम प्रा. लि. को दी गई चेतावनी


विस्थापन सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है, क्योंकि इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की यातनाएँ दी जाती है। विस्थापन का दर्द इन परिवारों की बेबसी व परेशानी को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। दरअसल सवाल सिर्फ हैंडपंपों से निकल रहे प्रदूषित पानी का ही नहीं है। बुनियादी बात है पॉवर प्लांट अधिकारियों के झूठे वायदे की, जो अब विस्थापित परिवारों के लिए भारी पड़ रहा है। ज़मीन अधिगृहीत करते समय सैकड़ों सपने दिखाए गए थे। लेकिन इस मौजा से विस्थापित दर्जनों परिवारों का हाल तो और भी बुरा है। इलाहाबाद। अपने घर व ज़मीन से विस्थापित हुए इन परिवारों को अब बिजली उत्पादन के विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। जिला प्रशासन व प्लांट मैनेजरों के कोरे आश्वासन से सैकड़ों परिवारों का भविष्य दाँव पर लग गया है। मेजा उर्जा निगम प्रा. लि. ने विस्थापन एवं पुर्नवास नीति का पालन नहीं किया। किसानों से ज़मीन लेकर उनके परिवार को जंगल में ला पटका। पुनर्वास के नाम पर एक-एक परिवार को केवल 150 वर्ग मी0 रिहायशी भूमि पट्टा के रूप में दी गई और पेयजल के लिए चार हैंडपंप लगाकर फ़ुरसत पा लिया गया। इनमें दो खराब हो गए हैं। बाकी बचे दोनों हैंडपंपों से आर्सेनिक युक्त पानी निकल रहा है, जो पीने लायक ही नहीं हैं। दूषित पानी से यहां गंभीर बीमारी का खतरा मंडरा रहा है। अपने जल, जंगल व ज़मीन से बेदखल किए गए इन किसान परिवारों का कहना है कि ज़मीन अधिग्रहण के वक्त प्लांट के मैनेजरों ने जल निगम की तर्ज पर पाइप लाइन से शुद्ध पेयजल आपूर्ति का वायदा किया था। लेकिन उन्हें पीने के पानी के लिए अब आन्दोलन करना पड़ रहा है। सुविधाएँ देने का मानदंड इसके लिये कुछ दलालों को दी जाने वाली तरह-तरह की रिश्वत है। पहाड़ी के नीचे झरने व मीठे अथाह जल के उनके स्रोतों से हटाकर भयंकर पथरीले जंगल में धकेलना भारी अन्याय है।

विस्थापन सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है, क्योंकि इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की यातनाएँ दी जाती है। विस्थापन का दर्द इन परिवारों की बेबसी व परेशानी को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। अपने पैतृक जन्मभूमि पॅवार का पूरा मौजा से बेदखल किए गए किसान परिवारों में एक उमाशंकर यादव कहते हैं- दरअसल यहां सवाल सिर्फ हैंडपंपों से निकल रहे प्रदूषित पानी का ही नहीं है। बुनियादी बात है पॉवर प्लांट अधिकारियों के झूठे वायदे की, जो अब विस्थापित परिवारों के लिए भारी पड़ रहा है। ज़मीन अधिगृहीत करते समय सैकड़ों सपने दिखाए गए थे। लेकिन इस मौजा से विस्थापित दर्जनों परिवारों का हाल तो और भी बुरा है। इन विस्थापित परिवारों को सलैया कला गांव के जंगल में बसाया गया है। पुनर्वास नीति 2003 के मानक पर प्लांट के अधिकारियों ने विस्थापित परिवारों के लिए हर तरह की बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराने की बात की थी। लेकिन विस्थापितों को अब हकीक़त पता चल रही है। पॉवर प्लांट के कारण विस्थापित अमर चंद यादव बताते हैं कि उन्हें गांव से लाकर जंगल में पटक दिया गया है। किसानों के साथ धोखा हुआ है। विस्थापितों की बस्ती को अभी तक मुख्यमार्ग से भी नहीं जोड़ा गया। कुछ दूर तक कच्ची मिट्टी डालकर आने-जाने के लिए रास्ता बना दिया गया है।

बरसात में इस पर चलना मुश्किल हो जाएगा। स्कूल, पार्क, सौन्दर्यीकरण, शुद्ध पेयजल, रोज़गार सृजन, प्रशिक्षण, तालाब, स्वास्थ्य केंद्र आदि सुविधाएँ देने से लेकर ऐसे-ऐसे सपने दिखाए गए थे गोया यहां पर माडर्न कालोनी बनेगी और उसमें रहने वाले विस्थापित शहरी जीवन व्यतीत करेंगे। अब यहां पर आलम यह है कि 40 डिग्री सेल्सियस तापमान से भी अधिक गर्म हवाएँ चल रही हैं। सुबह 10 बजे के बाद लोग घरों में दुबक जाते हैं। चारों तरफ निर्जन व पहाड़ होने के नाते शाम 6 बजे तक तेज लू चलती है। इससे जहां लोग बचते फिर रहे हैं, वहीं बस्ती में आग लगने का खतरा बढ़ रहा है। बावजूद इसके इन विस्थापितों की मुसीबत को जानने के लिए पॉवर प्लांट के अधिकार आज तक नहीं पहुंचे।

करीब 15 दिन पूर्व विस्थापित परिवारों में दो किसानों के खलिहान में आग लग गई थी, जिससे लाखों रुपये का अनाज जलकर राख हो गया। दोनों परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। आग बुझाने के लिए पानी का सहारा दो हैंडपंप हैं। जिनसे मवेशी व आदमी को ही पानी मिल पाना कठिन है। विस्थापित परिवारों में उमाशंकर यादव बस्ती के दक्षिण-पश्चिम में एक अधखुदा तालाब की तरफ इशारा करते हुए बताते हैं कि यह मेजा उर्जा निगम प्रा. लि. द्वारा तैयार कराया जा रहा है। बाकी के वायदे रोज़गार सृजन, प्रशिक्षण व स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, पार्क आदि कहां चले गए। अब प्लांट के अधिकारी कोई खोज-खबर नहीं ले रहे हैं। शुद्ध पेयजल के बारे में कम्प्लेन करने पर मेजा उर्जा निगम प्रा. लि. के सीईओ विनोद शर्मा के सेक्रेटरी ने कहा कि विस्थापित परिवारों के लिए वाटर प्यूरी फायर लगाया जायेगा। लेकिन अभी तक तो फिलहाल कोई ऐसी प्रगति नहीं दिखाई पड़ रही है।

विस्थापितों में रघुनाथ यादव, प्रभुनाथ यादव, रामरूप, विजय बहादुर, जय नारायण, रामबाबू, घनश्याम, शिवकुमार, रमेश यादव, रामअधार, जमुना, मुंशीलाल, शारदादीन, गोविन्द लाल, छविनाथ, माताबदल, रंगलाल, ननके राम, दयाशंकर, भैयालाल, गया प्रसाद, रामबली, उमाशंकर यादव, शिवशंकर यादव ने बताया कि पॉवर प्लांट में ज़मीन व घर जाने का मलाल तो उन्हें है ही, लेकिन यह उम्मीद थी कि विकास के नए रास्ते खुलेंगे, तरक्की होगी, लेकिन सब कुछ उल्टा हो रहा है। पॉवर प्लांट से विकास की संभावना धीरे-धीरे आम लोगों से कटकर कुछ विशेष लोगों व प्रतिष्ठानों तक सिमट कर रह गई। विस्थापितों को शिवाय मुसीबतों के कुछ नहीं मिला। विस्थापित परिवार मुंह बाए हुए इस विकास को दूर की कौड़ी समझने लगे हैं।

किसानों, मजदूरों व रोजी-रोटी से बेदखल किए जा रहे लोगों के लिए इस इलाके में लड़ाई लड़ रहे जन संघर्ष मोर्चा ने मेजा उर्जा निगम प्रा. लि. को चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर विस्थापितों को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध न कराई गईं तो सैकड़ों विस्थापित परिवारों के साथ कोहड़ार-इलाहाबाद मार्ग पर चक्काजाम किया जाएगा। जन संघर्ष मोर्चा के प्रभारी राजीव चन्देल ने बताया कि इस संबंध में पॉवर प्लांट के अधिकारियों को अवगत करा दिया गया है।

भूदान यज्ञ समिति की ज़मीन भी हड़प ली


एनटीपीसी द्वारा स्थापित किए जा रहे पॉवर प्लांट के लिए किसानों से हजारों एकड़ ज़मीन अधिगृहित करने के बाद जिला प्रशासन की मिली भगत से भू-दान यज्ञ समिति की भूमि भी हड़प ली गई। मेजा के सलैया गांव में करीब 48 एकड़ भूमि भू-दान यज्ञ समिति के नाम है, जिस पर इस समय पॉवर प्लांट ने कटीला तार घेर कर कब्ज़ा जमा लिया है। बताया जाता है कि भू-दान यज्ञ समिति की ज़मीन इस इलाके में और भी थी, लेकिन तहसील प्रशासन व जिला प्रशासन ने उसे रातों रात बैक डेट में काफी लोगों को पट्टा कर दिया और एनटीपीसी से उसका मुआवजा ले लिया गया। बावजूद इसके 48 एकड़ भूदान की ज़मीन अवशेष है। वरिष्ठ समाज सेवी रामधीरज जी ने कहा कि भूदान यज्ञ समिति की भूमि पर पॉवर प्लांट का कब्ज़ा अवैध है। यह सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के खिलाफ है। नियमानुसार भू-दान की भूमि केवल भूमि हीन किसानों को ही दी जा सकती है। इसके खिलाफ जल्द ही बड़े आन्दोलन की तैयारी हो रही है।

टौंस नदी के पानी पर पॉवर प्लांट की नजर


एनटीपीसी की नजर अब टौंस नदी के पानी पर है। पॉवर प्लांट के एक अधिकारी ने बताया कि पहले गंगा नदी से पानी के लिए सरकार से परमिशन मांगा गया था, लेकिन अब टौंस नदी से भी पानी लेने के लिए मांग की गई है। इधर किसानों को इस बात की भनक लगी तो हड़कंप मच गया। किसान पहले से ही डरे हुए थे कि पॉवर प्लांट के कचरे से इस नदी का पानी भयंकर प्रदूषित हो जायेगा। अब पानी लेने की खबर से उनकी चिंता और बढ़ गई है।

टौंस नदी के किनारे बसे गांव वाले बताते हैं कि इस नदी का पानी अभी भी इतना शुद्ध है कि लोग इसका इस्तेमाल पीने के लिए करते हैं। इस नदी का उद्गम स्थल म.प्र. के सतना जिले में है, जो इलाहाबाद के सिरसा कस्बे के पास गंगा में मिलती है। मध्य प्रदेश से चलकर जब यह उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती है तो यह लाखों किसान परिवारों के लिए वरदान बन जाती है। इसमें करीब आधा दर्जन सिंचाई पंप लगे हुए हैं, जिससे हजारों एकड़ ज़मीन की सिंचाई की जाती है। जबकि कोहड़ार के पास इसी नदी से पेयजल की आपूर्ति की जाती है। कभी यहां से करीब 150 ग्राम पंचायतों में पीने का पानी भेजा जाता है। इसके निर्मल जल पर पॉवर प्लांट कब्ज़ा करना चाहता है। यहां स्थानीय जन समस्याओं की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट अश्विनी जैन ने बताया कि इस पेयजल आपूर्ति पर भी पॉवर प्लांट के प्रदूषण की मार पड़ना तय है। इसके लिये एसडीएम से गुहार लगाई गई है।

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