मनरेगा से संभव है बदलाव

Submitted by Hindi on Tue, 04/30/2013 - 13:53
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सर्वोदय प्रेस सर्विस, 26 अप्रैल 2013
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के माध्यम से भारत में आर्थिक सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन की आस बंधी है। दिवा अरोरा द्वारा कुछ समय पूर्व यह साक्षात्कार लिया गया था जिसमें मनरेगा व सूचना का अधिकार कानून के संबंध में उनसे चर्चा की गई थी। यह दो आलेखों की श्रृंखला का पहला साक्षात्कार है।

अरुणा रायअरुणा रायमनरेगा की अन्य आलोचनाओं के साथ अब शरद पवार ने सरकार से कहा है कि श्रमिकों की कमी के मद्देनजर फसलों की बुआई एवं कटाई के महीनों में मनरेगा के अंतर्गत कार्य की अनुमति न दी जाए। आपका क्या विचार है?
इसे समझने हेतु किसी को भी विभिन्न राज्यों के रोजगार के आंकड़ों पर निगाह डालनी होगी, क्योंकि मनरेगा के अधिकांश कार्य उस समय हुए हैं जब खेतों में कार्य नहीं होते। इतना ही कार्य दिवसों का औसत भी 100 दिन से कम है। अतएव मनरेगा का यह दुष्प्रचार उस तबके की ओर से आ रहा है जिसके हित कृषि मजदूरों को मजदूरी (ऐतिहासिक रूप से जो नहीं दी जाती थी) देने और मोल-तोल करने से प्रभावित हो रहे हैं।

इसी तरह इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मनरेगा की वजह से उत्पादकता में कमी आई है। यदि वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध हो तो कोई भी श्रमिक इसका प्रयोग नहीं करना चाहता है। यह सच है कि मजदूर अब ज्यादा मजदूरी मांग रहे हैं और बड़े किसान तथा ठेकेदार इससे प्रभावित भी हो रहे हैं। समय आ गया है जबकि कृषि क्षेत्र को न्यूनतम समर्थन मूल्य आदि के रूप में अधिक संसाधन एवं ध्यान दिया जाए बजाए इसके कि कृषि मजदूर ही कृषि संकट का भार वहन करें।

मनरेगा को भारतीय शहरी मध्यम वर्ग की निंदा भी सहन करना पड़ रहा है, क्योंकि इस कानून का लक्ष्य ग्रामीण गरीब की सामाजिक आर्थिक स्थिति में बदलाव लाना भी है। प्रत्येक श्रम समस्या के लिए मनरेगा पर दोषारोपण किया जाता है। दुर्भाग्यवश मुख्य धारा का यह आलोचना आंकड़ों और वास्तविकता पर आधारित नहीं है, बल्कि यह स्थिति प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा हाल में कराए गए स्वतंत्र अध्ययन के जारी होने से भी निर्मित हुई है। सच कहूं तो सबसे बड़ा डर यह है कि मनरेगा गरीबों को सामाजिक-राजनीतिक नियंत्रण एवं अत्याचार के जंजाल से मुक्त कर देगा।

हो सकता है ऐसा ही हो! परंतु थोड़ा सा शक होता है, क्योंकि अनेक स्तरों पर मनरेगा भ्रष्टाचार में उलझा हुआ है?
मेरा विश्वास है कि मनरेगा में सरकार द्वारा गरीबी उन्मूलन की अन्य योजनाओं के मुकाबले कम भ्रष्टाचार है। वास्तविकता यह है कि मनरेगा को उसकी खूबियों कि भ्रष्टाचार का खुलासा और जवाबदेही मांगने के लिए दोषी ठहराया जा रहा है। लोग नियमित तौर पर भ्रष्टाचार उजागर कर रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि कई राज्यों में पंचायत प्रतिनिधियों और अफसरशाही ने इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन से स्वयं को अलग कर लिया है, क्योंकि वे इससे आसानी से धन नहीं उगाह पा रहे हैं। इस सबके बावजूद मनरेगा से भ्रष्टाचार समाप्त करना अनिवार्य है। प्रत्येक स्तर पर निगरानी तंत्र को और सशक्त बनाना होगा। आंध्रप्रदेश में सामाजिक अंकेक्षण के माध्यम से दोषी लोगों से 30 करोड़ रु. वसूले गए हैं।

आपके सरीखे कार्यकर्ताओं पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि आप लोग सरकार को इस ‘‘गैर लाभकारी‘‘ क्षेत्र में धकेल कर सार्वजनिक धन का दुरुपयोग करवा रहे हैं। सरकार के बढ़ते खर्चों से मुद्रास्फीति भी बढ़ रही है?

निजी क्षेत्रों की तरह सरकार ‘‘लाभ‘‘ के सिद्धांत पर नहीं चल सकती। यह सरकार का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करे एवं नागरिकों को भी इस बात का अधिकार है कि वे राज्य से इसकी मांग करें। यदि सरकार मूलभूत शिक्षा, स्वास्थ्य व न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती तो उसकी क्या भूमिका है? यह अन्य अधिक लागत व्ययों जैसे सुरक्षा या करों में छूट (उद्योग को दिए गए) से बहुत कम है। साथ ही मुद्रास्फीती से मनरेगा जोड़ना भी वाहियात बात है।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद व कर अनुपात विश्वभर में न्यूनतम है और इसके बावजूद हम कारपोरेट क्षेत्रों को जबर्दस्त लाभ पहुंचा रहे हैं। यह हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है। इसके विपरीत अनेक अर्थशास्त्रियों का मत है कि मनरेगा ने भारत को वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान बिगड़ती स्थिति से बचाया। ग्रामीण गरीबों के रोजगार में हुई वृद्धि ने ग्रामीण गरीबों की क्रय शक्ति में भी वृद्धि हुई है। मनरेगा एक ऐसा कानून है जिसमें गरीब को कार्य का अधिकार मिला है, यह इस तरह से दुनिया का एकमात्र कानून है। इसमें क्षमता है कि यह भारत के ग्रामीण गरीबों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में नाटकीय परिवर्तन ला सकता है और इसके माध्यम से विकास की विकेंद्रित योजनाएं वास्तविक रूप ले सकती है। इसी के साथ स्थानीय स्वशासी संस्थानों को भी मजबूती मिली है। भारत के इतिहास में पहली बार न्यूनतम मजदूरी एक वास्तविकता बनी है। निर्धनतम मजदूरों, किसानों, भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की तोल - मोल की ताकत नाटकीय रूप से बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप में संघर्ष हेतु सक्षम हुए हैं और अधिक गरिमा से काम कर पा रहे हैं और रह रहे हैं। इसकी वजह से कई लोगों को बंधुआ मजदूरी से मुक्ति मिली है और जबरिया पलायन भी कम हुआ है। सबसे निचले क्रम वालों की क्रय शक्ति इससे बढ़ी है। मनरेगा में कार्य करने वालों में महिलाओं का प्रतिशत बहुत है, जिससे कि भारतीय पारिवारिक संरचना में भी परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि मनरेगा में उन्हें पुरुषों के समतुल्य ही मजदूरी मिलती है। मनरेगा से गांव जातिगत समीकरण में भी बदलाव आया है। इसके अलावा भी अन्य कई सकारात्मक पहलू हैं।

मनरेगा अधिनियम की सीमाएं मुख्यतया इसके क्रियान्वयन को लेकर ही है। शुरुआत करें तो सबसे पहले यह कि जानकारी के अभाव में लोग इस बात को लेकर जागरूक नहीं हैं कि काम मांगना उनका अधिकार है। यही वह सूत्र है जो कि मनरेगा को कार्यशील बना सकता है, लेकिन इस सीमा ने मनरेगा के अंतर्गत काम में कमी लाई और बजट में भी कमी आई। कार्यान्वयन में देरी से भुगतान जैसी अन्य समस्याएं भी शामिल हैं। हालांकि हाल ही में मनरेगा के अंतर्गत शामिल कार्यों का विस्तार किया गया है, लेकिन स्थानीय योजना निर्माण एवं संपत्तियों पर और अधिक ध्यान एवं प्रशिक्षण दिए जाने की आवश्यकता है। इसलिए मनरेगा को बड़ी संख्या में उन गरीबों से समर्थन मिलना ही चाहिए जिन तक इसकी पहुंच है, उन्हें स्वयं इसके ढीले क्रियान्वयन के खिलाफ शिकायत करना चाहिए एवं मुख्य धारा का मीडिया जो कि प्रभावशील एवं मध्यम वर्ग की उपभोक्तावादी जनसंख्या की जरूरतों का ध्यान रखता है, से भी सहयोग अपेक्षित है।

परिचय - सुश्री अरुणा राय सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं। देश में सूचना का अधिकार कानून लागू करवाने में अहम भूमिका निभाई हैं। रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं।

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