संपर्क मार्ग को हिंडन बाढ़ क्षेत्र से बाहर करने का आदेश

Submitted by admin on Sat, 05/18/2013 - 11:11
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करहैड़ा.. उत्तर प्रदेश, जिला गाज़ियाबाद के मोहननगर चौराहे के निकट बसा हुआ एक बड़ा गांव है। अब यह गाज़ियाबाद नगर निगम क्षेत्र में शामिल कर लिया गया है। दो बरस पहले जब करहैड़ा को मेरठ बाइपास से जोड़ने के लिए पुल बनाने के लिए मिट्टी डालने की शुरुआत ही हुई थी, तभी उन्होंने समझ लिया था कि यह पुल हिंडन के प्रवाह को एक ओर से संकरा करेगा; दूसरी ओर से करहैड़ा को डुबोयेगा; साथ ही नदी की भूमि को भी संकुचित कर देगा। दरअसल आपत्ति पुल को लेकर कभी नहीं थी। पुल की लंबाई 180 मीटर है। पुलखंभों पर टिका होता है। इसे लेकर आपत्ति का तो प्रश्न ही नहीं। आपत्ति आगे एक भरवा ढलान रोड के जरिए इसे मेरठ बाइपास से जोड़ने को लेकर थी। “करहैड़ा पुल इस तरह बन रहा है कि इससे हिंडन नदी का प्राकृतिक प्रवाह संकुचित होगा; साथ ही नदी की जगह भी। वर्तमान शिकायत यही है। उत्तरदाताओं ने साफ तौर पर माना कि पुल का संपर्क मार्ग नदी के उच्चतम स्तरीय बाढ़ क्षेत्र में आता है। जाहिर है कि इससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होगा। समाधान साधारण है कि पुल के किसी ओर अतिरिक्त खंभों का निर्माण किया जाए। पुल अभी निर्मित हो ही रहा है। निर्माण पूरा नहीं हुआ है। खंभे कितने हों, इसका निर्धारण हम यह पुल बनाने वाले इंजीनियरों पर छोड़ते हैं, लेकिन वह यह सुनिश्चित करने वाला हो कि संपर्क मार्ग बाढ़ क्षेत्र में न आता हो। इन्हीं निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा करने की जरूरत है। उत्तरदाता उक्त निर्देशों का पालन करें।’’

बीती 15 मई को आया यह फैसला है करीब दो साल चले ‘विक्रांत बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले का। विक्रांत शर्मा पेशे से एडवोकेट और मन से नदी को मां तथा पानी को अपने जीवन से भी जरूरी मानने वाले युवा हैं। फैसले के लिए करहैड़ा के लोगों ने विक्रांत को बाक़ायदा 16 मई को एक बैठक कर सम्मानित किया। विक्रांत कहते हैं - “मेरे बाबा करहैड़ा में हेडमास्टर थे। हिंडन प्रदूषण मुक्ति की कई यात्राएं मैने करहैड़ा से ही शुरू की। इस तरह मुझ पर करहैड़ा के अन्न और नमक का कर्ज है। मैं तो सिर्फ कर्ज की फर्ज अदायगी कर रहा हूं; असल श्रेय तो मेरी उस छोटी सी पुरानी मारुति कार को दें,जो मुझे हर सुनवाई पर समय से पहुँचाती रही; दीपक और कौस्तुक जैसे हम उम्र वकीलों को दें, जिन्होंने सरकारी पक्ष के दिग्गज वकीलों के सामने न हथियार डाले और न बिके; रक्षक व भारतेन्दु, जिन्होंने हमेशा हौसला अफजाई की; तेवतिया, संजय, धमेन्द्र, हीरेन्द्र जैसे साथी, जो ढाल बनकर खड़े रहे; करहैड़ा के लोग,जिन्होंने कभी मेरा भरोसा नहीं तोड़ा... असल श्रेय इन्हें जाता है।’’ वह ‘हरनंदी कहिन’, वाटर पोर्टल, जलबिरादरी और कभी-कभी अपनी कलम से सहयोग करने वाले मेरे जैसे साथियों को भी धन्यवाद कहना नहीं भूलते। विक्रांत की इसी विनम्रता और बड़प्पन ने एक मामूली से दिखने वाले इस नौजवान के सिर पर जीत का बड़ा सेहरा बांध दिया है।

हिंडन नदी जहां भरवा पुल बनाया जा रहा थाहिंडन नदी जहां भरवा पुल बनाया जा रहा थाखैर! उल्लेखनीय है कि करहैड़ा.. उत्तर प्रदेश, जिला गाज़ियाबाद के मोहननगर चौराहे के निकट बसा हुआ एक बड़ा गांव है। अब यह गाज़ियाबाद नगर निगम क्षेत्र में शामिल कर लिया गया है। दो बरस पहले जब करहैड़ा को मेरठ बाइपास से जोड़ने के लिए पुल बनाने के लिए मिट्टी डालने की शुरुआत ही हुई थी, तभी उन्होंने समझ लिया था कि यह पुल हिंडन के प्रवाह को एक ओर से संकरा करेगा; दूसरी ओर से करहैड़ा को डुबोयेगा; साथ ही नदी की भूमि को भी संकुचित कर देगा। दरअसल आपत्ति पुल को लेकर कभी नहीं थी। पुल की लंबाई 180 मीटर है। पुलखंभों पर टिका होता है। इसे लेकर आपत्ति का तो प्रश्न ही नहीं। आपत्ति आगे एक भरवा ढलान रोड के जरिए इसे मेरठ बाइपास से जोड़ने को लेकर थी। करीब 200 मीटर लंबे इस संपर्क मार्ग को पुल की ही तरह खंभों पर टिका और नीचे से खाली होना चाहिए, ताकि प्रवाह बाधित न हो। इंजीनियरों ने इसे मिट्टी से भरकर प्रवाह बाधित करने का काम किया। इस 200 मीटर प्रवाह के सिकुड़ने से जो ज़मीन सूख जाएगी, उस पर लगी निगाहें उस पर अवैध कब्ज़ा करेंगी; निर्माण होगा और फिर हिंडन उनका मल भी ढोने को बाध्य होगी। आपत्ति यहां थी। करहैड़ा के लोग इस चाल को समय रहते समझ गए; चेते; धरने दिए; विरोध प्रदर्शन किया; अधिकारियों, नेताओं से मिलकर अपनी व्यथा कही। गाज़ियाबाद की कई संस्थाएं इस विरोध में साझा हुईं। ज़मीन के लालच के आगे किसी की चलती न देख विक्रांत सुप्रीम कोर्ट गए। कोर्ट ने ग्रीन ट्रिब्युनल जाने को कहा। ट्रिब्युनल ने काम रोक दिया और अब अंतिम फैसला भी सुना ही दिया है।

अखबारों में किसी ने इसे सिंचाई विभाग और जी डी ए की जीत की तरह पेश किया है और किसी ने गांव की जीत की तरह। सच यह है कि यह फैसला हिंडन नदी की जीत है। यह सुनिश्चित करता है कि बाढ़ क्षेत्र में कोई ऐसा निर्माण न हो, जिससे बाढ़ की तीव्रता बढ़े.. बाढ़ और उग्र हो जाए। यह फैसला यह भी सुनिश्चित करता है कि नदी के प्रवाह और नदी की भूमि को संकुचित करने का हक किसी को नहीं। यह फैसला उनकी आंखें भी खोलने वाला है जो ‘रिवर फ्रंट डेवलपमेंट’ के नाम नदी किनारे के सभी प्रमुख शहरों में नदियों के प्रवाह को संकुचित करने और शेष बची नदी भूमि के व्यावसायिक उपयोग की योजना बनाए बैठे हैं। अहमदाबाद यही करके अपनी पीठ ठोंक रहा हैं। गोमती नदी पर लखनऊ इसी सपने की तैयारी में है। आज देश भर में नदियों की भूमि और बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण और बसावट की बाढ़ है। निजी ही नहीं, खुद सरकारें भी कई जगह यही कर रही हैं। उन सभी के लिए यह फैसला एक सबक है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने पुल का काम आगे बढ़ने से रोकीनेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने पुल का काम आगे बढ़ने से रोकीयह फैसला अखिलेश सरकार की उस कोशिश के लिए भी सबक है, जो बाढ़ रोकने के नाम पर गंगा के बाढ़ क्षेत्र में गंगा एक्सप्रेस वे की पूर्व नियोजित परियोजना को आगे बढ़ाने में लगी है। बाढ़ क्षेत्र में इंस्टीट्युशनल एरिया और आवासीय क्षेत्र आदि निर्माण भी गंगा एक्सप्रेस वे परियोजना का हिस्सा है। क्या उत्तर प्रदेश सरकार ट्रिब्युनल का इस फैसले से सबक लेगी। कोई सबक ले न ले, अदालतों के आदेशों की पालना न होने के उदाहरणों से करहैड़ा के लोगों ने सबक ले लिया है। करहैड़ा ने हिंडन पुल पर ग्रीन ट्रिब्युनल के फैसले को लागू कराने के लिए एक पालना समिति गठन किया है। यह समिति पुल निर्माण से संबंधित सरकारी कमेटी, सिंचाई विभाग व गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण के उच्चाधिकारियों से मिलकर आदेश की पालना सुनिश्चित कराएगी। यह सुखद होगा। आइए! इनकी पीठ ठोंके।

हिंडन नदी पर पुल बनने से संकट में होता करहैड़ा गांवहिंडन नदी पर पुल बनने से संकट में होता करहैड़ा गांव

विक्रांत शर्माविक्रांत शर्मा

लोगों को संबोधित करते विक्रांत शर्मालोगों को संबोधित करते विक्रांत शर्मा

लोगों को संबोधित करते अरुण तिवारीलोगों को संबोधित करते अरुण तिवारी

एनजीटी द्वारा दिए गए फैसले पर विचार विमर्श करते अरुण तिवारी व अन्यएनजीटी द्वारा दिए गए फैसले पर विचार विमर्श करते अरुण तिवारी व अन्य

विक्रांत शर्मा पेशे से वकिल हैं विक्रांत शर्मा पेशे से वकिल हैं

वह स्थान जहां हिंडन नदी पर पुल बन रहा थावह स्थान जहां हिंडन नदी पर पुल बन रहा था

एनजीटी द्वारा दिए गए फैसले को देखने के लिए अटैचमेंट देखें।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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