किनारे की मैल से परेशान ना हों

Submitted by admin on Mon, 05/20/2013 - 13:03
Source
सोपान स्टेप, मार्च 2012
विनोबा कहते हैं कि पानी तो निकलता है, बहता है समुद्र में मिलने के लिए। पर रास्ते में एक छोटा सा गड्ढा आ जाए, मिल जाए तो वह पहले उसे भरता है। उसे भर कर आगे बढ़ सके तो ठीक नहीं तो वह उतने से ही संतोष पा लेता है। वह किसी से ऐसी शिकायत नहीं करता, कभी ऐसा नहीं सोचता कि अरे मुझे तो समुद्र तक जाने का एक महान उद्देश्य एक महान लक्ष्य, एक महान सपना पूरा करना था। और वो महान लक्ष्य तो पूरा हो ही नहीं पाया। तो हम बहना शुरू करें। जीवन की इस यात्रा में छोटे-छोटे गड्ढे आएंगे, खूब प्यार के साथ उन्हें भरते चलें। इस दुनिया से न तो हम ठीक से जुड़ पा रहे हैं न ही इससे पूरी तरह से अलग हो पाते हैं। हम त्रिशंकु की तरह अधर में लटके रह जाते हैं। गुजरात विद्यापीठ की स्थापना के समय सन् 1920 में गांधीजी ने विद्यापीठ में जो पहला भाषण दिया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इसकी स्थापना हेतु केवल विद्यादान नहीं है, विद्या देना नहीं है। विद्यार्थी के लिए गुजारे का साधन जुटाना भी एक उद्देश्य है। इस वाक्य को पूरा करते ही उन्होंने आगे के वाक्य में कहा कि इसके लिए जब मैं इस विद्यापीठ की तुलना दूसरी शिक्षण संस्थाओं से करता हूं तो मैं चकरा जाता हूं। उन्होंने इस विद्यापीठ की तुलना उस समय के बड़े माने गए, बड़े बताए गए दूसरे विद्यालयों से करते हुए एक भिन्न अर्थ में इसे अणुविद्यालय, एक लघु यानी छोटा सा विद्यालय कहा था। यहां के मुकाबले दूसरे संथाओं में ईट-पत्थर, चूना कहीं ज्यादा लगा था – ऐसा भी तब गांधीजी ने कहा था। लेकिन इस मौके पर हम यह दुहरा लें कि अणु दिखता छोटा सा ही है पर उसके भीतर ताकत तो अपार होती है।

पिछले दो-पांच वर्षों में आप सबने देखा ही है कि समृद्धि की सबसे आकर्षक चमक दिखाने वाले अमेरिका जैसे देश भी भयानक मंदी के शिकार हुए हैं और वहां भी इस अर्थव्यवस्था ने ग़जब की तबाही मचाई है। उधारी की अर्थव्यवस्था में डूबे सभी देशों को तारने के लिए किफायत को लाईफ जैकेट नहीं फेंकी गई है। उन्हें तो विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे बड़े महाजनों ने और उधार देकर बचाना चाहा है। हिंदी में और गुजराती में भी दो शबद् हैं – एक नौकरी दूसरा शब्द है चाकरी। नौकरी कीजिए आप जीविका के लिए पर जो काम करें उसमें अपना मन ऐसा उंडेल दें कि वह काम आपका खुद का काम बन जाए-किसी दूसरे के लिए किया जाने वाला काम नहीं बने। नौकरी में चाकरी का भाव जितना सध सकेगा आपसे, उतना आनंद आने लगेगा और तब आप उसे केवल पैसे के तराजू पर तोलने के बदले संतोष के तराजू पर तोलने लगेंगे।

देश में दो और पुरानी विद्यापीठों की उम्र देखेंगे तो यह विद्यापीठ एकदम ताजी, आज की लगेंगी। हमारे सुनहरे बताए गए इतिहास में एक विद्यापीठ थी नालंदा और दूसरी थी तक्षशिला। दूसरी विद्यापीठ का अर्थ है तक्ष यानी तराशना, शिला यानी पत्थर, या चट्टान। अनगढ़ पत्थर में से यानी साधारण से दिखने वाले पत्थर में थे, शिक्षक, अध्यापक अपने सधे हाथों से, औजारों से एक सुंदर मूर्ति तराश कर निकालें। मामूली से छात्र को एक उपयोगी, संवेदनशील नागरिक के रूप में तराश कर उसके परिवार और समाज को वापस करें। इन नामों का यह सुंदर खेल कुछ हजार बरस पहले चला था और हमें आज भी नहीं भूलना चाहिए कि नालंदा और तक्षशिला जैसी इतनी बड़ी-बड़ी विद्यापीठ आज तो खंडहर बन गई हैं और बहुत हुआ तो पर्यटकों के काम आती है। उनकी ईंट से ईंट बज चुकी है। तो इससे हमें यह समझ में आना चाहिए कि संस्थाएं, खासकर शिक्षण संस्थाएं केवल ईंट-पत्थर, गारे, चुने से नहीं बनती। वे गुरु और छात्रों के सबसे संयोग से बनती है। यह बारीक संयोग जब तक वहां बना रहा, ये प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान भी चलते हैं। आप सब जानते ही हैं कि इनमें से कैसे-कैसे बड़े नाम उस काल में निकले। कैसे-कैसे बड़े-बड़े प्राध्यापक वहां पढ़ाते थे, चाणक्य जैसी विभूतियां वहां थीं, जिनका लिखा लोग वे सारे अक्षर आज भी पढ़ते थे और उनके लिखे वे सारे अक्षर आज भी क्षर नहीं हुए हैं, आज भी मिटे नहीं हैं। नालंदा और तक्षशिला को राज्याश्रय भी खूब था पर वह राज ही नहीं बचा तो आश्रय क्या बचता।

आज हमारे अखबार, टेलीविजन के सात दिन-चौबीस घंटे चलने वाले एक-दो नहीं सौ चैनल अमंगलकारी समाचारों से भरे पड़े हैं। तो क्या हम सचमुच ऐसे अनिष्टकारी युग से गुजर रहे हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता है। गाँधीजी ने हिंद स्वराज में जैसा कहा था यह ठीक वैसा ही है – यह तो किनारे की मैल है। बीच बड़ी धारा तो साफ है। समाज के उस बड़े हिस्से के बारे में गांधीजी ने सौ बरस पहले बड़े विश्वास से कहा था कि उस पर न तो अंग्रेज राज करते हैं और न आप राज कर सकेंगे। हां आज वह लगातार उपेक्षित रखे जाने पर शायद थोड़ा टूट गया है, पर अभी अपनी धुरी पर कायम है।

विनोबा कहते हैं कि पानी तो निकलता है, बहता है समुद्र में मिलने के लिए। पर रास्ते में एक छोटा सा गड्ढा आ जाए, मिल जाए तो वह पहले उसे भरता है। उसे भर कर आगे बढ़ सके तो ठीक नहीं तो वह उतने से ही संतोष पा लेता है। वह किसी से ऐसी शिकायत नहीं करता, कभी ऐसा नहीं सोचता कि अरे मुझे तो समुद्र तक जाने का एक महान उद्देश्य एक महान लक्ष्य, एक महान सपना पूरा करना था। और वो महान लक्ष्य तो पूरा हो ही नहीं पाया। तो हम बहना शुरू करें। जीवन की इस यात्रा में छोटे-छोटे गड्ढे आएंगे, खूब प्यार के साथ उन्हें भरते चलें।

(लेखक प्रख्यात गांधीवादी हैं, वर्तमान में गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली से संबद्ध हैं। यह आलेख उनसे बातचीत पर आधारित है)

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अनुपम मिश्रबहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है. इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठायी थी.

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