जब पर्वत ही बह जाएं तो...

Submitted by Hindi on Tue, 06/18/2013 - 12:55
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दैनिक भास्कर (ईपेपर), 18 जून 2013
आश्चर्य होता है कि जिन सदानीरा नदियों में कुछ दिन पहले तक मीलों तक पानी ही नहीं था और नदियां सूखे नालों में बदल गई थीं, जो केवल गैर कानूनी रेत खनन के लिए ही उपयोगी मानी जाती थीं, उनमें अचानक इतना पानी कहां से आया कि नदियां उफनने लगीं और किनारों को भी बहा ले गईं। त्रासदी को और त्रासद बनाने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग को न तो इस बात का अनुमान था कि ऐसी आपदा आ सकती है और न वह इसके लिए किसी रूप में तैयार था। उत्तराखंड की त्रासदी पहली बड़ी चेतावनी है। इसे अनसुना करके हम अपने लिए और बड़े संकट को ही आमंत्रित करेंगे। हर कोई बरसात की प्रतीक्षा में होता है और मौसम विभाग की भविष्यवाणियों को तौलता रहता है। अक्सर लोग कहते मिलते हैं कि हमारा मौसम विभाग भी हमारे राजनीतिक दलों की तरह कहता कुछ है और होता कुछ और है। लेकिन अब के मौसम ने समय से पहले आकर ऐसे दस्तक दी, जैसे मेघदूत के बदले यमदूत की भूमिका में आ गया हो। उत्तराखंड को इसका कोपभाजन बनना पड़ा, जहां पुल उड़ गए, मकान धराशायी हुए, गाड़ियाँ बह गईं और बाढ़ ने दर्जनों लोगों की बलि ले ली। पता नहीं कितने अब भी लापता हैं। बरसों पहले एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने कहा था कि हिमालय अभी बच्चा है, यह थोड़ी छेड़छाड़ से रुआंसा हो जाता है, अधिक सताओगे तो चीख-चीख कर फफक कर रो पड़ेगा। शायद वही हो रहा है क्योंकि उत्तराखंड में इतनी छेड़छाड़ हुई है प्रकृति के साथ, उसकी नदियों के साथ, उसकी घाटियों और पहाड़ियों, ढलानों के साथ, लगता है कि हर कोई पहाड़ को नोच कर खाना चाहता है।

आश्चर्य होता है कि जिन सदानीरा नदियों में कुछ दिन पहले तक मीलों तक पानी ही नहीं था और नदियां सूखे नालों में बदल गई थीं, जो केवल गैर कानूनी रेत खनन के लिए ही उपयोगी मानी जाती थीं, उनमें अचानक इतना पानी कहां से आया कि नदियां उफनने लगीं और किनारों को भी बहा ले गईं। जब दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में बरसात के पानी से सड़कें नालों में बदल जाती हैं और नालियां कहीं गायब हो जाती हैं तो कहा जाता है कि नगर में जल निकलने के आपात रास्ते अवरुद्ध हो गए थे। पानी को सहज रूप में बहने का मौका नहीं मिला तो उसे सड़कों पर आना ही था, घरों में घुसना ही था। लेकिन कोई नहीं सोचता कि जब हम उन जल मार्गों को नष्ट कर देते हैं जिन्हें प्रकृति ने बहुआयामी कर्तव्य निभाने के लिए हजारों सालों की मेहनत के बाद रचा था तो पानी अस्वाभाविक रास्ते तो खोजेगा ही। पर्वत सचमुच रोने लगा है और उसके रुदन में उसके किनारे बसे हजारों लोग भी शामिल हो गए हैं।

उत्तराखंड में गंगा और उसकी सभी सहायक नदियों में असाधारण पानी भर गया है। अलकनंदा और मंदाकिनी के कारण चारधाम की सभी यात्राएं रोक दी गई हैं। इस समय पानी रुद्रप्रयाग के पुल के ऊपर से बह रहा है। यह पुल नीचे से बद्रीनाथ केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को जाने वाले मार्ग को जोड़ता है। इसी मार्ग से प्रसिद्ध हेमकुंट साहब जाया जा सकता है। साफ है कि हजारों यात्री, जो विभिन्न यात्राओं पर निकल चुके थे, वे मार्ग में ही फंस गए हैं। जो यात्री वापसी पर कहीं सुनसान स्थानों पर फंसे हैं, उनके रहने के लिए स्थान भी उपलब्ध नहीं हैं और खाने-पीने की वस्तुएँ भी समाप्त हो चुकी हैं। जो व्यवस्था है उसके लिए व्यापारी चार गुना दाम वसूल करने की कोशिश करते हैं। अनुमान है कि लगभग तीन लाख लोग बीच में ही फंसे हुए हैं। दो सौ से अधिक लोग लापता हैं और पचास से अधिक लोगों की मौतें हो चुकी हैं। बाढ़ के पानी की विकरालता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अस्सी गंगा के प्रकोप के कारण किनारे पर बसा पूरा गांव ही बह गया है। छोटे-छोटे घरों की बात तो क्या, चार मंजिल का एक भवन भी पानी के कारण ढह गया। यह बाढ़ केवल गंगा घाटी में ही नहीं आई है यमुना का भी यही हाल है और दूसरी पहाड़ी नदियों का भी। यमुना के कारण हरियाणा के कई जिलों में भी भारी नुकसान हो रहा है और हिमाचल भी बाढ़ की चपेट में है। इस राज्य में भी एक दर्जन से अधिक मौतें हो चुकी हैं।

आपदा नियंत्रण विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि पहाड़ियां कमजोर हो रही हैं, जिससे भूस्खलन होता रहता है लेकिन अगर बरसात में कमी नहीं आई तो पहाड़ियों का पूरी तरह ढह जाने का खतरा पैदा हो जाएगा। लेकिन पहाड़ कमजोर क्यों हो रहे हैं? हिमालय विशाल पर्वतमालाओं में सबसे कम उम्र की श्रृंखला है और इतनी कम उम्र भी नहीं कि अपने आप ही ढह जाए। इसके कुछ भाग अब भी निर्माणाधीन हैं इसलिए यह बहुत संवेदनशील श्रृंखला है। हजारों सालों में प्रकृति ने इसकी सुरक्षा का अपना ही नियम बना लिया था। इसने पानी के बहाव को नियंत्रित करने के कई रास्ते खोजे थे। जंगल पानी के बहाव को नियंत्रित करने का उपाय है।

उत्तराखंड में बरसी आफतऊंचाई से नीचे बहने वाले पानी के लिए निश्चित मार्ग तय हो गए थे। चारों ओर से आने वाली नदियों के मिलन स्थलों का चुनाव प्रकृति ने ही किया था। इन संगमों या प्रयागों के कारण हिमालय में विभिन्न स्थानों और दिशाओं से निकलने वाला पानी विशाल जल धाराओं में बदल जाता है, जो अंत में देव प्रयाग में गंगा का रूप लेता है। इसलिए गंगा दरअसल एक जलसंचय का विराट प्राकृतिक प्रबंधन है। लेकिन हमने बांधों के लालच में उसे बिगाड़ दिया।

महाभारत का प्रसंग है कि युद्ध से पहले कृष्ण के बड़े भाई बलराम सरस्वती जी की तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। लेकिन उन्हें नदी कहीं दिखाई दी, कहीं दिखाई नहीं दी। नदी की हालत यहां तक हो गई थी कि बलराम को नहाने के लिए भी पानी नहीं मिला। उत्तरकाशी से गंगोत्री तक गंगा भी दूर-दूर तक ग़ायब हो चुकी है। यह भी लगभग सरस्वती की स्थिति को पहुंच गई है। लेकिन सरस्वती प्राकृतिक कारणों से इस हालत तक पहुंची थी, गंगा मानवीय कारणों से पहुंच रही है। हिमालय में गंगा की सौ से अधिक सहायक नदियां, जिन्हें गंगा के ही नाम से जाना जाता है, अब बरसात के पानी को ही वहन करने के लिए रह गई हैं। इस बार वे वहन नहीं कर पाईं।

त्रासदी को और त्रासद बनाने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग को न तो इस बात का अनुमान था कि ऐसी आपदा आ सकती है और न वह इसके लिए किसी रूप में तैयार था। कई इलाकों में स्थानीय लोगों ने पहले ही अधिकारियों को बताया था कि वे खतरे में हैं और उन्हें मदद की आवश्यकता है। लेकिन कई दिन की पूर्व सूचना के बावजूद लोगों को बचाया नहीं जा सका। दरअसल, आपदा प्रबंधन न तो किसी वैज्ञानिक आकलन पर टिका है और न ही उसे सरकारी तौर पर कोई प्राथमिकता का काम माना जाता है। इसलिए जानकारी के बावजूद उसके पास संकट के समय न तो कोई योजना होती है और न ही साधन। उत्तराखंड की त्रासदी पहली बड़ी चेतावनी है। इसे अनसुना करके हम अपने लिए और बड़े संकट को ही आमंत्रित करेंगे।

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