बड़े बांध और समझदारी का सूखा

Submitted by Hindi on Fri, 06/28/2013 - 11:53
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सामयिक वार्ता, जुलाई 2013
राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े बांधों की उपयोगिता पर कई सवाल उठते हैं। भारत सरकार ने 1991 से 2007 के बीच बड़े व मध्यम बांधों पर करीब 1,30,000 करोड़ रु. खर्च किए हैं। लेकिन बांधों से सिंचित क्षेत्र कम होता गया है। नब्बे के दशक की शुरुआत में देश में नहरों से 177.9 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित हो रही थी। वर्ष 2004 में यह घटकर 146 लाख हेक्टेयर रह गई।देश के सबसे ज्यादा बांध महाराष्ट्र में ही हैं। 2009 तक महाराष्ट्र में 1845 बांध बन चुके थे। लेकिन इन बांधों का कोई नतीजा नहीं दिख रहा है। राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2011-12 में महाराष्ट्र के कुल बोए गए रकबे का केवल 17.9 फीसदी सिंचित था, जबकि राष्ट्रीय औसत 45 फीसदी है। महाराष्ट्र के बांधों में 90 फीसदी सिंचाई के मकसद से ही बने हैं, फिर भी यह हालत है। इतने बांध बनने के बावजूद महाराष्ट्र की 65 फीसदी सिंचाई कुओं से होती है, नहरों से नहीं। इस वर्ष जब पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है, ये बांध खाली पड़े हैं।

ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए मराठवाड़ा क्षेत्र में सिंचाई के लिए बने सबसे बड़े बांध को लें। औरंगाबाद जिले में पैठन के पास जायकवाड़ी नामक स्थान पर गोदावरी नदी पर यह बांध 1965 में शुरू हुआ और 1976 में पूरा हुआ। इसकी योजना में यह माना गया था कि बांध में 215 अरब घनफुट पानी बह कर आएगा। इसमें 115 अरब घनफुट पानी ऊपर के क्षेत्र के उपयोग के लिए सुरक्षित रहेगा और 100 अरब घनफुट पानी इस योजना के कमांड क्षेत्र में संचाई के लिए उपलब्ध रहेगा। योजना का कमांड क्षेत्र औरंगाबाद, जालना, बीड़, नांदेड़ और परभणी जिलों में है। लेकिन ऊपर के क्षेत्र में नासिक व अहमदनगर जिलों में 190 अरब घनफुट पानी संग्रहित करने वाले बांध बन गए। इस तरह जायकवाड़ी बांध खाली रहने लगा। मूल प्रोजेक्ट में माना गया था कि हर चार में से तीन सालों में जायकवाड़ी बांध पूरा भरेगा, लेकिन वह मुश्किल से पांच में से एक साल भरता है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े बांधों की उपयोगिता पर कई सवाल उठते हैं। भारत सरकार ने 1991 से 2007 के बीच बड़े व मध्यम बांधों पर करीब 1,30,000 करोड़ रु. खर्च किए हैं। लेकिन बांधों से सिंचित क्षेत्र कम होता गया है। नब्बे के दशक की शुरुआत में देश में नहरों से 177.9 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित हो रही थी। वर्ष 2004 में यह घटकर 146 लाख हेक्टेयर रह गई।

विडंबना यह हे कि वाटरशेड आंदोलन में महाराष्ट्र अग्रणी रहा है, जिसमें विकेंद्रित रूप से गांव के स्तर पर पानी को रोका जाता है और यह काफी कम खर्च पर होता है। इसके बावजूद बड़े बांधों के प्रति यह मोह और पागलपन क्या दिखता है? समझदारी और विवेक का अभाव या बड़े बांधों में बड़े कमीशन और बड़े घोटालों का आकर्षण, या दोनों?

(इकॉनॉमि एंड पॉलिटिकल वीकली, 4 मई 2013, में प्रकाशित आलेख पर आधारित)

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