देनवा का अनुपम सौंदर्य

Submitted by admin on Sat, 07/20/2013 - 09:14
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कुल मिलाकर, देनवा जैसी छोटी नदियों का बहुत महत्व है। सतपुड़ा से निकलने वाली ज्यादातर नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। दुधी, पलकमती, मछवासा, शक्कर आदि कई नदियां अब बरसाती नाला बन कर रह गई हैं, जो पहले सदानीरा थीं। देनवा में अभी पानी है, अपूर्व सौंदर्य भी है, जंगल भी है। लेकिन यह कब तक बचा रहेगा, यह कहा नहीं जा सकता। इसका पानी भी धीरे-धीरे कम होने लगा है। ऐसी छोटी नदियों को बचाने की जरूरत है। जंगल बचाने की जरूरत है। छोटे स्टापडेम बनाकर बारिश की बूंद-बूंद सहेजने की जरूरत है। शायद हम कुछ कर पाएं। सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला की प्रसिद्ध महादेव की पहाड़ियों से उद्गमित देनवा से मेरा कई बार साक्षात्कार हो चुका है। कभी मटकुली के पुल पर, कभी देनवा दर्शन में और कभी थोड़ा नीचे जंगल के रास्तों पर। लेकिन सतधारा में देनवा का सौंदर्य देखते ही बनता है। हल्के काले रंग की एक छोर से दूसरे छोर तक चट्टानों पर अलग-अलग सात धाराओं में उछलती-कूदती, गेंद की तरह टप्पा खाती और नाचती-गाती देनवा को घंटों निहारते रहो, तब भी मन नहीं भरता। यहां देनवा के किनारे दोंनों ओर हरा-भरा जंगल है। सरसराती हवा और चिड़ियों के सुंदर गान से माहौल मजेदार बन जाता है। सतधारा में जब हम पहुंचे तब हमें ज्यादा अंदाजा नहीं था कि यहां देनवा दर्शन और प्राकृतिक सानिध्य पाने के लिए इतने लोग आते हैं। कुछ ही घंटों में दर्जन भर गाड़ियां आ गईं और उसमें बैठे लोग ऊंचाई से उतर कर नदी में स्नान करने चले गए। कुछ लोग अपने साथ भोजन वगैरह लाए थे, वे भोजन करने लगे। बच्चे नदी की रेत में खेलने-कूदने लगे।

भौगोलिक रूप से होशंगाबाद जिला दो भागों में बंटा है। एक मैदानी क्षेत्र और जंगल पट्टी। मैदानी भाग में नर्मदा कछार है और यहां मिश्रित आबादी है। यहां तवा की नहर से सिंचित खेती भी है। जबकि जंगल पट्टी में गोंड-कोरकू आदिवासी ही निवास करते हैं। और अधिकांशतः ‘खेती-बाड़ी बारिश पर निर्भर है। इसके किनारे ही ज्यादातर आदिवासी गांव हैं। सतपुडा की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ पचमढ़ी में ही है और उसके नजदीक से ही देनवा उद्गमित हुई है। और वहीं से एक बड़ी नदी सोनभद्रा का उद्गम स्थल है। लेकिन देनवा दक्षिण से देनवा कुंड से निकलती है। फिर बांद्राभान में तवा में मिलती है, जो नर्मदा की सहायक नदी है। इटारसी से जबलपुर रेल लाइन पर तवा पुल है, जिसमें बारिश में बहुत पानी रहता है।

नर्मदा की तरह देनवा का भी धार्मिक महत्व है जो हमें भी देखने को मिला। जून माह में जिस दिन हम वहां पर गए थे, कुछ ग्रामीण स्त्री पुरूष देनवा की पूजा करने आए थे। भूराभगत पर तो मेला भी लगता है। पचमढ़ी आते-जाते समय मटकुली पुल पर रुककर लोग इसकी पूजा करते हैं। पचमढ़ी के रास्ते में देनवा दर्शन एक पर्यटन स्थल बन गया है। जहां खड़े होकर देनवा का अनोखा रूप लोग देखते रहते हैं।

नदियों से जीवन है यह किताबी परिभाषा नहीं, हकीकत है। देनवा के किनारे फैली रेत में बरौआ समुदाय के लोग तरबूज खरबूज की खेती करते है। गर्मियों में यहां की ककड़ी और खरबूजों की मांग बढ़ जाती है। और स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिलता है। गर्मियों के मौसम में मटकुली में यहां की ककड़ी बिकती हैं। महिलाओं छोटी टोकनियों में लेकर ककड़ियां बेचती हैं। लेकिन इस बार बारिश तरबूज-खरबूज बहाकर ले गई। बरौआ बिना खेती के रह गए।

देनवा नदीबारिश में मछुआरे जाल लेकर देनवा में डेरा डाले रहते हैं क्योंकि जैसे ही देनवा में थोड़ा ज्यादा पानी हुआ, तवा बांध की मछलियां हवाई जहाज की तरह ऊपर चढ़ आती हैं और मछुआरों को मछली मिलती हैं। लेकिन पिछले सालों से मछलियां कम मिलती हैं। देनवा का पानी स्वच्छ, निर्मल और जड़ी-बूटी व खनिजों से युक्त है। यानी सही मायने में मिनरल वॉटर है। जो पानी बोतलों में मिनरल के नाम से बिकता है, उनमें मिलावट के किस्से आते रहे हैं। लेकिन देनवा का पानी निर्मल है, मीठा है और पीने योग्य है। जब गर्मियों में मटकुली जैसे कस्बों में पानी की कमी होती है, तब इससे ही पूर्ति होती है।

बारिश में मटकुली के पुल पर बाढ़ आ जाती है और अक्सर पिपरिया-पचमढ़ी का रास्ता बंद हो जाता है जब तक बाढ़ नहीं उतर जाती है। हाल ही में भारी बारिश के कारण पुल पर पानी बना रहा जिससे यातायात बाधित रहा। इस पुल को बनाने की मांग लंबे अरसे से की जा रही है। पचमढ़ी जाने वाले सैलानियों को बहुत परेशानी होती है जब यातायात बंद रहता है। मटकुली में ही भभूतसिंह कुंड है, जो आदिवासियों की अंग्रेजों से लड़ाई की याद दिलाता है। यह नदी उस लड़ाई की गवाह है जो हर्राकोट के कोरकू राजा भभूतसिंह ने अपने अधिकार व इज्जत के लिए अंग्रेजों से लड़ी थी। इसी देनवा नदी के किनारे जबरदस्त लड़ाई हुई थी।

कुल मिलाकर, देनवा जैसी छोटी नदियों का बहुत महत्व है। सतपुड़ा से निकलने वाली ज्यादातर नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। दुधी, पलकमती, मछवासा, शक्कर आदि कई नदियां अब बरसाती नाला बन कर रह गई हैं, जो पहले सदानीरा थीं। देनवा में अभी पानी है, अपूर्व सौंदर्य भी है, जंगल भी है। लेकिन यह कब तक बचा रहेगा, यह कहा नहीं जा सकता। इसका पानी भी धीरे-धीरे कम होने लगा है। ऐसी छोटी नदियों को बचाने की जरूरत है। जंगल बचाने की जरूरत है। छोटे स्टापडेम बनाकर बारिश की बूंद-बूंद सहेजने की जरूरत है। शायद हम कुछ कर पाएं। फिलहाल, सतधारा का अनुपम सौंदर्य देखकर हम अभिभूत हैं।

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बाबा मायारामबाबा मायारामबाबा मायाराम लोकनीति नेटवर्क के सदस्य हैं। वे स्वतंत्र पत्रकार व शोधकर्ता हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से 1989 में बी.ए. स्नातक और वर्ष 2000 में एल.एल.बी.

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