पूरी दुनिया आपकी क्लाइंट हो सकती है

Submitted by admin on Mon, 07/22/2013 - 11:37
Source
दैनिक भास्कर (ईपेपर), 22 जुलाई 2013
फंडा यह है कि... अगर आप कुछ नया कर रहे हैं तो दुनिया आपकी तरफ उम्मीद से देखने लगती है। वह आपसे मदद हासिल करने के लिए तैयार रहती है। जरूरत बस एक मुहिम और उसके प्रति समर्पण की ही होती है।

जलवायु परिवर्तन मौसम की चाल में बहुत से बदलाव ला रहा है। लिहाजा, ऐसी कोई ऑनलाइन व्यवस्था बेहद जरूरी है जिस पर स्थान विशेष से संबंधित मौसम और जलवायु आदि की जानकारियां उपलब्ध हों। जिनके जरिए लोग मौसम में लंबी अवधि में आने वाले बदलावों के बारे में जान सकें, समझ सकें। भारत में किसान तो पूरी तरह मौसम पर ही आश्रित रहते हैं। उनके लिए तो इस तरह की व्यवस्था और जानकारियां वरदान साबित हो सकती हैं। अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को में क्लाइमेट्स कंपनी के मालिक हैं क्वाबेना असांटे। वे जल संसाधन, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल इन्फॉर्मेशन सिस्टम और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के विशेषज्ञ हैं। उनका सपना है कि दुनिया भर के किसान एक रोज अपने कंप्यूटर पर बैठकर खुद ही मौसम और जलवायु की जानकारी हासिल करें। इसके हिसाब से अपनी खेती-बाड़ी के संबंध में फैसले करें। इस तरह की सूचनाओं के लिए किसी पर उनकी निर्भरता न रहे और सिर्फ सपना ही नहीं बल्कि उन्हें यकीन है कि यह क्रांति एक न एक दिन होकर रहेगी। फिलहाल, क्वाबेना खुद किसानों के लिए विभिन्न सूचनाओं का जरिया बने हुए हैं। वे उनके मतलब की लगभग हर जानकारी उन्हें मुहैया करा रहे हैं। मसलन-बुवाई का सबसे बढ़िया समय कौन सा है। किस फसल के लिए कितने पानी (सिंचाई) की जरूरत है। किस वक्त कौन सी फसल को उगाने में कितना जोखिम है? आदि, आदि। क्वाबेना की वेबसाइट भी है। इसका नाम है- www.climatus.com। साइट पर इस तरह की सूचनाएं लगातार अपडेट होती रहती हैं। जनसंख्या बढ़ने के प्रभाव, अनियमित जलवायु परिवर्तन और जल संसाधनों के अभाव से पैदा होने वाली समस्याओं से जुड़ी जानकारियां भी वेबसाइट पर मुहैया रहती हैं।

क्वाबेना के साथ उनकी भारतीय पत्नी शालिनी वेंकटरमन भी सक्रिय हैं। शालिनी चेन्नई की हैं। क्वाबेना यूएस जियोलॉजिकल सर्वे के साथ काम कर रहे थे। वहां शालिनी विजिटिंग प्रोफेसर थीं। यहीं दोनों की मुलाकात हुई। वे करीब आए और जीवनसाथी बन गए। क्लाइमेट रिस्क मैनेजमेंट में सलाहकार के तौर पर क्वाबेना क्लाइमेट डाटाबेस विकसित करने की अगुवाई कर चुके हैं। उन्हीं के नेतृत्व में ऑनलाइन पोर्टल बनाया गया है जिसमें दुनिया भर के 30 लाख से ज्यादा स्थानों से संबंधित जरूरी डाटा उपलब्ध है। इस पर जलवायु परिवर्तन से जुड़े पिछले 10 साल तक के आंकड़े उपलब्ध हैं। उनका यकीन कि आज के समय में हमारे इको सिस्टम से संबंधित छोटी-मोटी जानकारियों से काम नहीं चलेगा। इससे ज्यादा करना होगा। क्वाबेना और उनकी पत्नी शालिनी लगातार लगे हुए हैं कि वे नई-नई तकनीक के जरिए जलवायु परिवर्तनों के बारे में लोगों की समझ विकसित कर सकें।

उनका आधार वाक्य है कि सिर्फ जानकारी से संपन्न लोग ही प्राकृतिक और निर्मित वातावरण के बीच सुखद संतुलन बनाए रख सकते हैं। इनकी कंपनी-क्लाइमेट्स को पर्यावरण, सामाजिक और कंप्यूटेशन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों की मदद भी मिल रही है। कंपनी का ऑनलाइन पोर्टल ज्यादातर जानकारियां मुफ्त में मुहैया कराता है। उसकी कमाई का जरिया वे लोग होते हैं जो कोई खास किस्म की जानकारी चाहते हैं। और ये कमाई भी कंपनी और पोर्टल को बेहतर करने में ही फिर निवेश कर दी जाती है। क्वाबेना और शालिनी का दावा है कि जिन किसानों के पास जलवायु व मौसम में आ रहे परिवर्तन आदि की जानकारी होती है वे ज्यादा बेहतर तरीके से अपनी फसलों का प्रबंधन कर पाते हैं। जरूरत के हिसाब से वे बुवाई के समय में परिवर्तन कर लेते हैं। बीज की किस्मों का चुनाव भी उपलब्ध जानकारियों के हिसाब से करते हैं। इसके उलट जो किसान गरीब हैं, जिनके पास इस तरह की जानकारियां नहीं हैं, वे परेशान होते रहते हैं। मौसम के साल-दर-साल बदलाव उन्हें चौंकाते रहते हैं। वे सिर्फ उम्मीद ही बांधे रहते हैं कि अगले साल मौसम अच्छा हो।

अब यहां भारत के किसानों से जुड़े कुछ आंकड़ों का जिक्र किया जा सकता है। देश में हर आधे घंटे में कोई न कोई किसान अपनी जीवनलीला खत्म कर लेता है। कारण सबके पास एक ही होता है कि उन पर कर्ज का भारी बोझ है और फसलें साल-दर-साल बदलते मौसम के कारण बर्बाद हो रही हैं। पहले किसान अपनी पारंपरिक जानकारियों के आधार पर ही खेती-किसानी करते थे। लेकिन आज इनसे उनका काम नहीं चल रहा है। आज कोई भी यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि अगले साल मौसम कैसा रहेगा। पानी कम गिरेगा या ज्यादा। कब गिरेगा, कब नहीं। इसकी वजह साफ है कि जलवायु परिवर्तन मौसम की चाल में बहुत से बदलाव ला रहा है। लिहाजा, ऐसी कोई ऑनलाइन व्यवस्था बेहद जरूरी है जिस पर स्थान विशेष से संबंधित मौसम और जलवायु आदि की जानकारियां उपलब्ध हों। जिनके जरिए लोग मौसम में लंबी अवधि में आने वाले बदलावों के बारे में जान सकें, समझ सकें। भारत में किसान तो पूरी तरह मौसम पर ही आश्रित रहते हैं। उनके लिए तो इस तरह की व्यवस्था और जानकारियां वरदान साबित हो सकती हैं। इन सूचनाओं का एक बड़ा ग्राहक बीमा क्षेत्र हो सकता है। उसे इनसे रिस्क फैक्टर के आकलन व बदलाव के बारे में फैसले लेने में मदद मिल सकती है।

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