चाल से खुशहाल

Submitted by admin on Thu, 08/29/2013 - 15:13
Source
तहलका, अगस्त 2013

उत्तराखंड के उफरैंखाल में कुछ लोगों ने किसी सरकारी या बाहरी मदद के बिना जो किया है उसमें कई हिमालयी राज्यों के सुधार का हल छिपा है।

सबसे पहले लोगों ने अखरोट के पौधों की एक नर्सरी बनाई। इन पौधों की बिक्री प्रारंभ हुई। वहीं के गाँवों से वहीं की संस्था को पौधों की बिक्री से कुछ आमदनी होने लगी। यह राशि फिर वहीं लगने जा रही थी। एक के बाद एक शिविर लगते गए और धीरे-धीरे उजड़े वन क्षेत्रों में वनीकरण होने लगा। इन्हीं शिविरों में हुई बातचीत से यह निर्णय भी सामने आया कि हर गांव में अपना वन बने। वह सघन भी बने ताकि ईंधन, चारे आदि के लिए महिलाओं को सुविधा मिल सके। इस तरह हर शिविर के बाद उन गाँवों में महिलाओं के अपने नए संगठन उभरकर आए, ये ‘महिला मंगल दल’ कहलाए ये महिला दल कागजी नहीं थे।ढौंड गांव के पंचायत भवन में छोटी-छोटी लड़कियां नाच रही थीं। उनके गीत के बोल थे : ठंडो पाणी मेरा पहाड़ मा, ना जा स्वामी परदेसा। ये बोल सामने बैठे पूरे गांव को बरसात की झड़ी में भी बांधे हुए थे। भीगती दर्शकों में ऐसी कई युवा और अधेड़ महिलाएं थीं जिनके पति और बेटे अपने जीवन के कई बसंत ‘परदेस’ में ही बिता रहे हैं। ऐसे वृद्ध भी इस कार्यक्रम को देख रहे थे जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा भाग ‘परदेस’ की सेवा में लगाया है और भीगी दरी पर वे छोटे बच्चे-बच्चियां भी थे, जिन्हें शायद कल परदेस चले जाना है। एक गीत पहाड़ों के इन गाँवों से लोगों का पलायन भला कैसे रोक पाएगा? लेकिन गीत गाने वाली टुकड़ी गीत गाती जाती है। आज ढौंड गांव में है तो कल डुलमोट गांव में, फिर जंद्रिया में, भरनों में, उफरैंखाल में। यह केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं है। इसमें कुछ गायक हैं, नर्तक हैं, एक हारमोनियम, ढोलक है तो सैकड़ों कुदाल-फावड़े भी हैं जो हर गांव में कुछ ऐसा काम कर रहे हैं कि वहां बरसकर तेजी से बह जाने वाला पानी वहां कुछ थम सके, तेजी से बह जाने वाली मिट्टी वहीं रुक सके और इन गाँवों में उजड़ गए वन, उजड़ गई खेती फिर से संवर सके।आधुनिक विकास की नीतियों ने यहां के जीवन की जिस लय को, संगीत को बेसुरा किया है, उसे फिर से सुरीला बनाने वालों की टोली है यह दूधातोली की। पौड़ी गढ़वाल के दूधातोली क्षेत्र के उफरैंखाल में आज से कोई 21 बरस पहले अस्तित्व में आई छोटी सी यह टोली आज यहां के 136 गाँवों में फैल गई है और इस क्षेत्र में अपने काम को खुद करने का वातावरण बना रही है। अपने काम में हैं- अपने वन, अपना पानी, अपना चारा, अपना ईंधन और अपना स्वाभिमान।

इस टोली के विनम्र नायक हैं शिक्षक सच्चिदानंद भारती। वे उफरैंखाल के इंटर कॉलेज में पढ़ाते हैं। 1979 में कॉलेज की अपनी पढ़ाई पूरी करके वे पौड़ी जिले के अपने गांव गाडखर्क, उफरैंखाल लौटे थे। उन्हीं दिनों उन्हें पता चला कि उत्तराखंड के मध्य में स्थित दूधातोली क्षेत्र में वन निगम फर-रागा के पेड़ों का कटान कर रहा है। हिमालय में रागा प्रजापति भोजवृक्ष की तरह ही धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। मशहूर चिपको आंदोलन से प्रेरित भारती को लगा कि इस कटान को तो हर कीमत पर रोकना चाहिए, वे अपने कुछ साथियों के साथ दूधातोली वन क्षेत्र से जुड़े गाँवों की ओर चल पड़े, पदयात्रा के माध्यम से जगह-जगह लोगों को यह समझाने की कोशिश की गई कि यह वन सरकार का जरूर है पर इसके विनाश का पहला बुरा झटका इन्हीं गाँवों को भोगना पड़ेगा। सब लोग साथ दें तो इस विनाश को रोका जा सकता है। इन्हीं बैठकों में से यह बात भी सामने आई कि वन सरकार का है पर इस पर पहला हक तो उसके पास बसे गाँवों का ही होना चाहिए, दूधातोली में जगह-जगह सघन पदयात्राओं, बैठकों आदि का प्रभाव पड़ा, एक वन अधिकारी ने इस समस्या को समझने के लिए लोगों के साथ विवादित वन क्षेत्र का दौरा किया, फिर दैड़ा गांव में सब गांवों के साथ हुई बैठक में इस कटान को पूरी तरह रोक देने की घोषणा कर दी गई। सत्य के आग्रह को सरकार ने स्वीकार किया।

ऐसी घटना उस क्षेत्र के लिए नई ही थी। इससे दो बातें निकलीं- एक तो यह कि लोग एक हो जाएं तो सरकार के गलत कामों, निर्णयों को भी रोका जा सकता है, बदला जा सकता है और दूसरी यह कि अब जबू एक बड़े विनाश को रोक ही लिया गया है तो फिर इसी स्थान से वनों के संवर्धन का काम क्यों न शुरू किया जाए, इस काम को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए मार्च, 1982 में ‘दूधातोली लोक विकास संस्थान’ बना। इसकी स्थापना के समय ही कुछ बातें बिल्कुल साफ ढंग से तय की गई थीं। अपने क्षेत्र में पर्यावरण संवर्धन का काम तो करना ही है पर इसमें संस्था का आधार वहीं के लोग तथा देशी साधन हों, इसका पूरा ध्यान रखा जाएगा। यह भी योजना बनी कि हर वर्ष चार शिविरों के माध्यम से यह सब काम किया जाएगा। जल्द ही समझ में आ गया कि वनीकरण करना है तो अपनी जरूरत के पौधे भी खुद ही तैयार करने पड़ेंगे। संस्था बनाने में शिक्षकों की भूमिका प्रमुख थी, इसलिए आगे की योजनाओं में उनका ध्यान सबसे पहले अपने छात्रों की तरफ गया। छात्रों ने अपने शिक्षकों की प्रेरणा से तरह-तरह के बीजों का संग्रह प्रारंभ किया।

सबसे पहले इन लोगों ने अखरोट के पौधों की एक नर्सरी बनाई। इन पौधों की बिक्री प्रारंभ हुई। वहीं के गाँवों से वहीं की संस्था को पौधों की बिक्री से कुछ आमदनी होने लगी। यह राशि फिर वहीं लगने जा रही थी। एक के बाद एक शिविर लगते गए और धीरे-धीरे उजड़े वन क्षेत्रों में वनीकरण होने लगा। इन्हीं शिविरों में हुई बातचीत से यह निर्णय भी सामने आया कि हर गांव में अपना वन बने। वह सघन भी बने ताकि ईंधन, चारे आदि के लिए महिलाओं को सुविधा मिल सके। इस तरह हर शिविर के बाद उन गाँवों में महिलाओं के अपने नए संगठन उभरकर आए, ये ‘महिला मंगल दल’ कहलाए ये महिला दल कागजी नहीं थे। कागज़ पर बने ही नहीं थे। कोई लेखा-जोखा, रजिस्टर, दस्तावेज़ नहीं। पूरे सच्चे मन से बने संगठन थे। संस्था दूधातोली के कार्यालय में भी इनकी गिनती या ब्योरा देखने को नहीं मिलता। ऐसे महिला मंगल दलों की वास्तविकता तो उन गाँवों में धीरे-धीरे ऊंचे उठ रहे, सघन हो चले तो वनों से ही पता चल सकती थी। अब पर्यावरण शिविर वर्ष में चार बार लगते हैं पर उनसे जन्मे महिला मंगल दल पूरे वर्ष भर काम करते हैं। गांव के वन की रक्षा व उसका संवर्धन उनकी मुख्य ज़िम्मेदारी होती है।

1993 के प्रारंभ में सच्चिदानंद भारती ने अपने क्षेत्र में वनों के साथ पानी की परंपरा को भी समझना प्रारंभ किया। पहाड़ों में ताल तो आज भी हैं, पर इनकी संख्या तेज ढलानों के कारण कम हो रही है। खाल और चाल नामक दो और रूप भी यहां रहे हैं जो पिछली सदी में लगभग मिट गए थे। उफरैंखाल नाम स्वयं इस बात का प्रतीक था कि कभी यहां पानी का अच्छा प्रबंध रहा होगा। खाल ताल से छोटा रूप है तो चाल खाल से भी छोटा है। ये ऊंचे पहाड़ों की तीखी ढलानों पर भी बनती रही हैं। भारती ने पानी की कमी और उससे जुड़ी अनेक समस्याओं को समझा और वनों के संवर्धन के साथ पहाड़ों में जल संरक्षण के काम को जोड़ा। दूधातोली के क्षेत्र में चाल बनाने का काम गाडखर्क गांव, उफरैंखाल से प्रारंभ हुआ आज इस क्षेत्र में कोई 35 गाँवों में खाली पड़ी बंजर धरती पर पानी की कमी से उजड़ गए खेतों और अच्छे घने वनों तक में कोई 7000 चालें वर्ष भर चांदी की तरह चमकती हैं।

चालों की वापसी ने यहां अनेक परिवर्तन किए हैं। उजड़े खेतों में फिर से फसल लगने की तैयारी हो रही है। बंजर वन भूमि में साल भर पानी रहने के कारण प्रकृति स्वयं अनेक अदृश्य हाथों से उसमें घास और पौधे लगा रही है। ठीक पनप चुके वनों में और सघनता आ रही है। घास, ईंधन और पानी-इनके बिना पर्वतीय व्यवस्था चरमरा गई थी। आज यहां फिर से जीवन का संगीत वापस लौट रहा है। चाल ने जंगलों की आग को भी समेटने में अद्भुत भूमिका निभाई है जो उत्तराखंड सहित देश के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में हर साल सैकड़ों करोड़ रुपए का नुकसान करती है। चालों ने सूख चुके नालों और छोटी नदियों को भी सरस कर दिया है।

इतना बड़ा लाभ बांटने वाली चाल स्वयं बहुत ही छोटी होती है। इस छोटेपन में ही इसका बड़प्पन छिपा है। जहां भी ठीक जगह मिली वहां पांच से दस घनमीटर के आकार की जल तलाई बनाई जाती है। जब ऊपर से नीचे तक पूरे ढलाने को अनेक जल तलैयाएं अपने छोटे-छोटे आकार से ढक देती हैं, तब पानी का अक्षय भंडार बन जाता है। पानी पहाड़ी ढलानों में यहां-वहां से बहता है, इसलिए जल तलाई भी यहां-वहां ही बनाई जाती हैं और इस तरह हर जगह पानी एकत्र होता जाता है। इन सबमें संग्रहित पानी धीरे-धीरे रिसकर नीचे घाटी तक आता है। यहां घाटी में चालों से बड़े ढांचे, यानी खाल या ताल बनाए गए हैं। इनमें भी अब पूरे वर्ष पानी का भंडार बना रहता है। कोई 50-100-200 रुपए में एकचाल बन जाती है। बनाने वाले इसे अपना काम मानकर बनाते हैं। इसलिए 50-100 की मदद भी कम नहीं मानते। वे इसे बनाते समय अपने को किसी का मज़दूर नहीं मानते। वे इसके मालिक हैं और उनके स्वामित्व से सामाजिक समृद्धि साकार होती है। ऐसी सुदृढ़ समृद्धि पूरे समाज का आत्मविश्वास बढ़ाती है। उसका माथा ऊंचा करती है।

तब यदि अचानक कोई बड़ी लेकिन अव्यावहारिक योजना वहां आ जाए तो उस समाज के पैर नहीं डगमगाते। एक ऐसी ही योजना सन 1998 में इस क्षेत्र की पूर्वी नयार घाटी में आई थी। जलागम विकास का काम था। समर्थन या विश्व बैंक जैसी संपन्न संस्था का, पर इन गाँवों ने उसका समर्थन नहीं किया। काम तो वहीं था, जिसे ये गांव कर ही रहे थे- वनों का विकास, जलागम का विकास। पैसे की कोई कमी नहीं थी। परियोजना की लागत 90 करोड़ रुपए थी। गांव-गांव में जब इस योजना का बखान करने वाले बड़े-बड़े बोर्ड लग गए, तब भारती ने वन विभाग को एक छोटा-सा पत्र भर लिखा था। उन्होंने बहुत विनम्रता से बताया था कि इस क्षेत्र में वनों का, पानी का अच्छा काम गांव खुद ही कर चुके हैं- बिना बाहरी, विदेशी या सरकारी मदद के। तब यहां इन 90 करोड़ रुपए से और क्या काम करने जा रहे हैं आप? भरोसा न हो तो कुछ अच्छे अधिकारियों का एक दल यहां भेजें, जांच करवा लें और यदि हमारी बात सही लगे तो कृपया इस योजना को वापस ले लें।

शायद देश में पहली बार ही ऐसा हुआ होगा कि सचमुच वन विभाग का एक दल यहां आया और इस क्षेत्र में पहले से ही लगे, पनपे और पाले गए सुंदर घने वनों को देख न सिर्फ चुपचाप लौट गया बल्कि अपने साथ 90 करोड़ की योजना भी समेट ले गया।

उफरैंखाल बताता है कि हिमालय के कुछ थोड़े से गांव तय कर लें तो वे विदेशी पैसे या सरकारी अनुदान के बिना एक शताब्दी की गलतियों को 20 वर्षों में सुधार कर कितना बड़ा काम खड़ा करके दिखा सकते हैं। इसमें केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि सभी पर्वतीय क्षेत्रों के सुधार के बीच छिपे हैं।

 

गौना ताल : प्रलय का शिलालेख  

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भाषा और पर्यावरण

2

सुनहरे अतीत से सुनहरे भविष्य तक

3

शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन

4

साध्य, साधन और साधना

5

जड़ें

6

पुरखों से संवाद

7

तकनीक कोई अलग विषय नहीं है

8

राज, समाज और पानी : एक

राज, समाज और पानी : दो

राज, समाज और पानी : तीन

राज, समाज और पानी : चार

राज, समाज और पानी : पाँच

राज, समाज और पानी : छः

9

अकेले नहीं आता अकाल

10

चाल से खुशहाल

11

तैरने वाला समाज डूब रहा है

12

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

13

गौना ताल : प्रलय का शिलालेख

14

रावण सुनाए रामायण

15

दुनिया का खेला

16

आने वाला पल जाने वाला है

17

तीर्थाटन और पर्यटन

18

जीवन का अर्थ : अर्थमय जीवन

 

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

अनुपम मिश्रबहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है. इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठायी थी.

नया ताजा