असहमति व अभिव्यक्ति के अहिंसात्मक तरीके पर प्रहार के खिलाफ गंगा अपील

Submitted by admin on Tue, 09/10/2013 - 11:02

मुद्दा यह है कि यदि हमारी सरकारें असहमति व विरोध जताने के अहिंसात्मक स्वरों को सुनना और मान्यता देना बंद कर देंगी तो क्या समाज हिंसात्मक विकल्पों की ओर रुख करने को विवश नहीं हो जाएगा? क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला नहीं है? क्या इसका विरोध नहीं होना चाहिए? यदि हमने अभी ही कुछ नहीं किया, तो क्या स्वामी सानंद और संत गोपालदास की मौत के बाद स्यापा करना दिखावा मात्र नहीं होगा?

अनशन - असहमति तथा विरोध जताने का एक ऐसा लोकतांत्रिक व अहिंसात्मक तरीका है, जिसे भारत ही नहीं, दुनिया की शायद ही कोई संस्कृति या संविधान हो, जो मान्यता न देते हों। सत्याग्रह और अनशन के जिन औजारों के बूते भारत की आज़ादी में योगदान के कारण देश ने महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा दिया, यदि अनशन को आत्महत्या का प्रयास करार देकर कोई आपको जेल की अंधेरी कोठरी में ठूंस दे, तो इसे आप क्या कहेंगे? गंगा अनशनरत् स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (पूर्व नाम प्रो जी डी अग्रवाल) के साथ यही हुआ है। हरियाणा के 6764 गाँवों की ढाई लाख एकड़ गोचर की भूमि बचाने को लेकर संत गोपालदास का अनशन की उपेक्षा भी हम देख ही रहे हैं।

ग़ौरतलब है कि स्वामी सानंद का अनशन उस गंगा की कष्ट की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए है, जिसे वर्तमान केन्द्रीय सरकार और इसके इन्हीं प्रधानमंत्री जी ने ‘राष्ट्रीय नदी’ का दर्जा देकर संरक्षित करने का संकल्प लिया था। इसी सरकार के पर्यावरण एवम् वन मंत्रालय ने अभी-अभी गंगा को दुनिया की सबसे पवित्र नदी बताते हुए हलफ़नामा दायर किया है। बावजूद इसके अनशन के इन 90 दिनों में न तो सरकार ने कोई संवेदनशीलता दिखाई और न समाज ने; उन्होंने भी नहीं, जिन्होंने गंगा और हिंदुत्व को अपना चुनावी मुद्दा घोषित किया है। अदालतों ने अवश्य इस बीच कई सकरात्मक निर्देश जारी किए।

मित्रों, इस प्रकरण पर चुप्पी देखकर लगता है कि या तो हमारा पूरा समाज ही संवेदनाशून्य हो गया है या फिर इस मसले पर व्यापक चुप्पी की एक बड़ी वजह यह रही कि मीडिया ने इस अनशन को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। याद कीजिए! अनशन को आत्महत्या करार देने का अलोकतांत्रिक व्यवहार इससे पूर्व उत्तर-पूर्व की एक बहन के साथ भी हुआ था। हिंदी भाषा को लेकर जनपथ पर हुए श्यामरूद्र पाठक के अनशन को शांति भंग करने का अपराध घोषित करने का प्रकरण आपको याद ही होगा।

मुद्दा यह है कि यदि हमारी सरकारें असहमति व विरोध जताने के अहिंसात्मक स्वरों को सुनना और मान्यता देना बंद कर देंगी तो क्या समाज हिंसात्मक विकल्पों की ओर रुख करने को विवश नहीं हो जाएगा? क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला नहीं है? क्या इसका विरोध नहीं होना चाहिए? यदि हमने अभी ही कुछ नहीं किया, तो क्या स्वामी सानंद और संत गोपालदास की मौत के बाद स्यापा करना दिखावा मात्र नहीं होगा? याद कीजिए! गंगा में खनन के खिलाफ इसी मातृसदन के स्वामीश्री शिवानंद जी के शिष्य संत निगमानंद के साथ भी यही हुआ था। जीते जी उनके अनशन को न समाज ने बहुत तवज्जो दी और न मीडिया में। मौत के बाद समाज ने भी स्यापा किया और मीडिया में भी संपादकीय लिखे गए।

इस बार ऐसा न हो, इसके लिए हम मीडिया के माध्यम से हम समस्त समाज से अपील करते हैं कि वह जागे। इससे पहले कि अनशनकारी के प्राण साथ छोड़ दें, अनशन को आत्महत्या करार देने के लिए हरिद्वार प्रशासन की भर्त्सना करे; प्रधानमंत्री को विवश करे कि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के अध्यक्ष होने के नाते वह इसकी आपात बैठक बुलाकर उत्तराखंड के पुनर्वास, गंगा और अनशन के मसले पर बरती जा रही संवेदनहीनता के खिलाफ लेकर ठोस, सकरात्मक व नीतिगत निर्णय लें; स्वामी सानंद के जीवन के लिए न सही, भारत की देवनदी, राष्ट्रीय नदी, अस्मिता, आस्था और आजीविका के लिए सही; गोचर भूमि की रक्षा के लिए सही; लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के अहिंसात्मक तरीके पर कुठाराघात के खिलाफ सही; उस भरोसे के लिए सही, जो लोक ने खुद अपनी शक्ति के प्रति खोया है।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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