उत्तराखंड बांध त्रासदी, भाग -1

Submitted by admin on Tue, 09/10/2013 - 12:02
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माटू जनसंगठन
विष्णुप्रयाग बांध आपदा संघ द्वारा एक पत्र सरकार के संबंधित विभागों और जेपी कंपनी को 21 जुलाई को भेजा गया था जिसमें सारी घटना का विवरण लिखकर मांग की गई थी कि आपदा की ज़िम्मेदारी लेते हुए जेपी कंपनी को मुआवजा देना चाहिए। जिसका कोई जवाब किसी ने भी नहीं दिया। 8 सितंबर को जोशीमठ में कोतवाल ने प्रभावितों द्वारा जेपी के खिलाफ प्रथम जांच रिर्पोट दर्ज करने से ही इंकार कर दिया। उसका कहना है कि मामला बड़ा है। यानि कंपनी अब इतनी बड़ी हो गई है कि उसके खिलाफ आप बात भी नहीं कर सकते हैं।बद्रीनाथ जी से कुछ ही किलोमीटर 16 जून 2013 की शाम को 5 बजे अलकनन्दा नदी का जलस्तर अत्यधिक बढ़ने लगा जो कि रोज के जलस्तर से काफी अधिक था जिसके कारण गोविंदघाट में भय का माहौल पैदा हो गया था। पुनः रात को लगभग 11:30 बजे गोविंद घाट के गुरुद्वारे का जेनरेटर कक्ष और नदी के दूसरी तरफ लगा विद्युत ट्रान्सफार्मर बाढ़ की चपेट में आने से गुरूद्वारा एवं गोविंदघाट में पूरी तरह अंधेरा छा गया, जिससे लोगों में और भी डर हो गया। पास के पुलस्तर तक नदी का पानी पहुँच चुका था, इस कारण गोविंदघाट में जो पार्किंग थी उसमें नदी का पानी पूरी तरह फैलने लगा और धीरे-धीरे भूमि का कटाव होने लगा जिससे पार्किंगों में खड़े वाहन भी बहने लगे। 17 जून की सुबह 4:30 बजे गोविंदघाट में अलकनन्दा नदी पर स्थित, पुलना गांव जाने हेतु लो.नि.वि. द्वारा बनाया गया पक्का पुल भी बह कर बीच नदी में अटक गया जिस कारण पानी का बहाव गोविंदघाट बाजार की तरफ जाने लगा। धीरे-धीरे भूमि का कटाव होने लगा और देखते ही देखते एक के बाद एक होटल, दुकानें, मकान, पार्किंग स्थल, गुरूद्वारा की इमारतें भी ढहने लगी। 17 जून की सायं 5 बजे तक गोविंदघाट में इमारतों, होटलों, खेतों, पार्किंग स्थलों व दुकानों के स्थान पर नदी द्वारा बहा कर लाए गए मलबे के अलावा कुछ भी शेष नहीं रह गया था साथ ही नदी के दूसरी तरफ पुल के बह जाने से हजारों तीर्थयात्री व स्थानीय निवासियों के साथ-साथ लगभग 1500 घोड़े/खच्चर, एवं मवेशी भी फंस चुके थे जो कि अपनी जीवन व मृत्यु से जूझ रहे थे।

गोविंदघाट के ऊपर की तरफ के गांव पाण्डुकेश्वर में भी 17 जून 2013 की सुबह लगभग 6 बजे नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण भूमि का कटाव तीव्र गति से होने लगा था जिससे वहां पर स्थित होटल, मकान व खेती योग्य भूमि भी बह गए।

बाद में मालूम पड़ा की इस आपदा का कारण विष्णुप्रयाग बांध था। स्थानीय लोग इस घटनाक्रम पर बात कर रहे थे कि ऐसा कैसे हुआ कि पानी आया फिर रुका और फिर तेजी से आया। चूंकि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। 19 जून को कुछ ग्रामीण लामबगड़ व विनायक चट्टी आदि गाँवों से आए, उन्होंने गोविंदघाट में लोगों को बताया कि जे.पी. कम्पनी के बांध फटने से यह तबाही हुई है। इसकी सत्यता जानने के लिए लोग लामबगड़ बैराज की ओर गए तब सब कुछ साफ हो गया कि क्यों 16 जून 2013 को रात्रि में एकदम से पानी बहुत ज्यादा आया और फिर कुछ समय बाद कम हो गया था। लेकिन पुनः 17 जून 2013 को सुबह 2:30 से लेकर 4:30 तक बहुत ज्यादा पानी आया और सब कुछ बहाकर खत्म कर दिया।

कारण यह था कि पहले जे.पी. कम्पनी वालों ने गेट खोलकर सारा बांध खाली कर दिया था, पुनः गेट बंद कर दिया लेकिन जब बांध में फिर से बड़ी झील बननी शुरू हुई तो कम्पनी वालों ने गेट खोलने की कोशिश की होगी, लेकिन उनकी मेहनत बेकार हो गई थी क्योंकि गाद एवं बड़े-बड़े बोल्डरों ने तब तक गेट सिस्टम खराब कर दिया था। गेट बंद होने के कारण बांध के पीछे 1.5 किमी. झील बनी जिसके कारण बांध पानी का दवाब नही संभाल पाया और टूट गया। जिससे नीचे नदी ने अत्यधिक विकराल रूप धरकर सब कुछ तोड़फोड़ कर तबाही मचाई। जाहिर है कि क्षेत्र के इस तबाही के जिम्मेदार जेपी कंपनी की बदनीयतपूर्ण लापरवाही है। इसलिए नुकसानों की भरपाई से जेपी कंपनी मुंह नही मोड़ सकती।

विष्णुप्रयाग बांध के ऊपर से बहती अलकनंदा नदीइस तबाही में विष्णुप्रयाग बांध के नीचे के 25 परिवारों का सब कुछ समाप्त हो गया है। लगभग 50 परिवारों की 75 प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति का नुकसान हुआ है। बागवानी, खेत-खलिहान, दुग्ध व्यवसाय, पशु भारवाहकों के पशुओं की हानि, अन्य छोटे व्यवसायियों के नुकसान सहित पूरी पांडुकेश्वर न्याय पंचायत में सभी परिवार प्रभावित हुए हैं। बांध कंपनी ने कभी लोगों के पास आकर नहीं पूछा कि हुआ क्या?

अब महीनों बाद बांध मरम्मत की चिंता के कारण ज़रूर लोगों से जेपी कंपनी के अधिकारी मिले। गाँवों में बांध विरोध को देखते हुए यह प्रचार किया गया कि यदि बांध ही बंद हो जाएगा तो मुआवजा कैसे देगी बांध कंपनी? अभी सर्वे किया जाएगा तब तय करेंगे की बांध से कितना नुकसान हुआ। अगस्त को जोशीमठ में विष्णुप्रयाग बांध से प्रभावित गाँवों से आए लोगों की बड़ी रैली हुई। अब गांववालों को लिखकर दिया है कि हमारी कोई गलती नहीं है। 40 दिनों से ज्यादा गांव पांडुकेश्वर में धरना चालू है इन ग्रामीणों की साधारण सी मांग है कि सुरक्षा दीवार और क्षति का मुआवजा दिया जाए।

विष्णुप्रयाग बांध आपदा संघ द्वारा एक पत्र सरकार के संबंधित विभागों और जेपी कंपनी को 21 जुलाई को भेजा गया था जिसमें सारी घटना का विवरण लिखकर मांग की गई थी कि आपदा की ज़िम्मेदारी लेते हुए जेपी कंपनी को मुआवजा देना चाहिए। जिसका कोई जवाब किसी ने भी नहीं दिया। 8 सितंबर को जोशीमठ में कोतवाल ने प्रभावितों द्वारा जेपी के खिलाफ प्रथम जांच रिर्पोट दर्ज करने से ही इंकार कर दिया। उसका कहना है कि मामला बड़ा है। यानि कंपनी अब इतनी बड़ी हो गई है कि उसके खिलाफ आप बात भी नहीं कर सकते हैं। यह लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। आपदाग्रस्त उत्तराखंड में इस आपदा की राहत क्या होगी? प्रभावितों ने रजिस्ट्री से रिर्पोट दर्ज कराई है।

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