वैश्विक तापवृद्धि का स्वास्थ्य पर प्रभाव

Submitted by admin on Sat, 09/14/2013 - 11:48
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विज्ञान प्रसार
जलवायु परिवर्तन से संभावित प्रभावों पर आईपीसीसी की समीक्षा के अनुसार गर्म होती जलवायु कुछ स्थानिक लाभ प्रदान कर सकती है। इसमें शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में ठंड से होने वाली मृत्युदर में कमी और कुछ क्षेत्रों, विशेषकर उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों, में भोजन उत्पादन में वृद्धि सम्मिलित है। जन स्वास्थ्य सुविधाएँ और जीवन के उच्च मानदंड जैसे गुण कुछ लोगों को विशिष्ट प्रभावों से बचा सकते हैं। इस बात की संभावना नगण्य है कि जलवायु परिवर्तन से उत्तरी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में मलेरिया पुनः अपने पांव पसार सकता है। जलवायु परिवर्तन से तात्पर्य संपूर्ण पृथ्वी की जलवायु या क्षेत्रीय स्तर पर समय के साथ जलवायु में पाया जाने वाला अंतर है। यह वायुमंडल की परिवर्तनशीलता या इसी औसत स्थिति में परिवर्तन का दशकों से लाखों वर्षों के समय के पैमाने के आधार पर व्याख्या करता है। मानव स्वास्थ्य के लिए स्थानीय जलवायु एवं कुछ रोगों के पाए जाने या इनकी जैसे कुछ अन्य ख़तरों के मध्य गहरा संबंध होता है। यह भविष्यवाणी की गई है कि स्वास्थ्य पर धनात्मक और ऋणात्मक प्रभावों के मध्य संतुलन में एक स्थान से दूसरे स्थान पर अंतर पाया जाएगा और जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा यह समय के साथ परिवर्तित होता रहेगा।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर्शासकीय पैनल


गंभीर वैश्विक जलवायु परिवर्तन की समस्या को पहचानते हुए विश्व मौसम विज्ञान संबंधी संगठन (डबल्यू.एम.ओ.) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरणीय कार्यक्रम (यूनेप) द्वारा सन् 1988 में जलवायु परिवर्तन पर अंतर्शासकीय पैनल (आईपीसीसी) का गठन किया गया। इसका उद्देश्य ऐसी वैज्ञानिक, तकनीकी एवं सामाजिक-आर्थिक सूचनाओं को एकत्र करना है जो मानवीय गतिविधियों से होने वाले जलवायु परिवर्तनों को समझने, इसके संभावित प्रभाव और इन प्रभावों को अनुकूल बनाने व घटाने के विकल्पों के हिसाब से प्रासंगिक हों। आईपीसीसी की प्रमुख गतिविधियों में से एक जलवायु परिवर्तन पर जानकारी की स्थिति का आंकलन करना है।

आईपीसीसी ने स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के सम्बंध में अपनी तीसरी आंकलन रपट में कहा है कि “व्यापक रूप से ग्लोबल वार्मिंग द्वारा मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालने में वृद्धि होने की संभावना है, विशेषकर अल्प आय जनसंख्या के स्वास्थ्य पर, जो प्रमुखता से उष्णकटिबंधीय/उपोष्ण देशों में बसती है।” इसलिए इन खतरों के ‘कैसे’ और ‘क्यों’ को समझना अत्यंत आवश्यक है।

विस्तृत रूप से देखा जाए तो ग्लोबल वार्मिंग की स्थितियाँ अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष हैं जो आमतौर से मौसम की चरम स्थितियों के कारण पैदा होती हैं। ये स्थितियाँ स्वास्थ्य पर निम्नांकित प्रभाव डाल सकती हैं:

जलवायु परिवर्तन की विभिन्न क्रियाओं और परिस्थितिकीय विच्छेद के फलस्वरूप होने वाला स्वास्थ्य पर प्रभाव, जो जलवायु परिवर्तन के कारण होता है।
स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विविध प्रभाव – अभिघातज, संक्रामक, पोषक, मनोवैज्ञानिक एवं अन्य – जो जलवायु के कारण होने वाली आर्थिक अव्यवस्था के बाद निराश और विस्थापित जनसंख्या में पाए जाते हैं।

आईपीसीसी की तीसरी मूल्यांकन रपट (2001) के अनुसार :


पिछली एक सदी में विश्व के औसत सतही तापमान में 0.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है।
वैश्विक स्तर पर, 1998 सबसे गर्म वर्ष था और अभिलेखों के अनुसार 1990 का दशक सबसे गर्म दशक था।
बहुत से क्षेत्रों, विशेषकर मध्य से उच्च अक्षांशीय देशों में, वर्षा में वृद्धि दर्ज की गई है।
हाल के दशकों में, एशिया और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सूखे की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि दर्ज की गई है।

बढ़ती तपिश और जीवन की गुणवत्ता


जन स्वास्थ्य सुरक्षित पीने के पानी, समुचित भोजन, सुरक्षित आवास और अच्छी सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करता है। बदलती हुई जलवायु इन सभी मानदंडों को बेहतरी या बदतरी की दिशा में प्रभावित कर सकती है।

जलवायु परिवर्तन से संभावित प्रभावों पर आईपीसीसी की समीक्षा के अनुसार गर्म होती जलवायु कुछ स्थानिक लाभ प्रदान कर सकती है। इसमें शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में ठंड से होने वाली मृत्युदर में कमी और कुछ क्षेत्रों, विशेषकर उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों, में भोजन उत्पादन में वृद्धि सम्मिलित है। जन स्वास्थ्य सुविधाएँ और जीवन के उच्च मानदंड जैसे गुण कुछ लोगों को विशिष्ट प्रभावों से बचा सकते हैं। इस बात की संभावना नगण्य है कि जलवायु परिवर्तन से उत्तरी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में मलेरिया पुनः अपने पांव पसार सकता है।

हालांकि, वैश्विक स्तर पर यदि देखा जाए तो तेजी से बदलती जलवायु का जनस्वास्थ्य पर अत्यधिक विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका है और विशेषकर निर्धनतम तबका, जिनका योगदान ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन से सबसे कम है, पर सर्वाधिक प्रभावित होगा। स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुछ प्रभाव निम्नानुसार हैं:

लू के थपेड़ों की आवृत्ति में वृद्धि होगी। हाल ही में किए गए आंकलन दर्शाते हैं कि मानवीय दखलंदाज़ी से होने वाला जलवायु परिवर्तन सन् 2003 में यूरोप में ग्रीष्म ऋतु में गर्म थपेड़ों के लिए एक प्रमुख कारक था।
अधिक परिवर्तनीय अवक्षेपण पद्धतियां शुद्ध जलापूर्ति के लिए खतरा पैदा करेंगी जिससे जल जनित रोगों के खतरे में वृद्धि होगी।
बढ़ते तापमान और परिवर्तनीय अवक्षेपण के प्रभाव से कई अत्यधिक निर्धन क्षेत्रों में बुनियादी खाद्य पदार्थों के उत्पादन में कमी आ सकती है जिससे कुपोषण का खतरा बढ़ जाएगा।
बढ़ते समुद्री स्तर के कारण तटीय क्षेत्रों में जलप्लावन का खतरा बढ़ेगा जिससे जनसमूहों का विस्थापन हो सकता है। दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी अभी समुद्र तट से 60 किलोमीटर की दूरी के अंदर निवास करती है। इस दृष्टि से कुछ सर्वाधिक असुरक्षित क्षेत्रों में मिश्र में नील नदी के समीप की भूमि या डेल्टा, बांग्लादेश में गंगा-ब्रह्मपुत्र का तटीय क्षेत्र या मुहाना और मालदीव, मार्शल द्वीप समूह और तुवालू जैसे कई छोटे द्वीप सम्मिलित हैं।
जलवायु में परिवर्तन होने से महत्वपूर्ण रोगवाहक जनित रोगों के संचरण काल में वृद्धि होने के आसार होंगे और साथ ही इनके भौगोलिक क्षेत्रों में भी परिवर्तन हो सकता है। इससे यह रोग ऐसे क्षेत्रों में भी पहुंच सकते हैं जहां या तो लोगों में इन रोगों के विरूद्ध प्रतिरोधकता नहीं पाई जाती या फिर जहां जनस्वास्थ्य संबंधी अच्छी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।

हालांकि जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का आंकलन मात्र एक मोटा अनुमान है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक संख्यात्मक निर्धारण से ज्ञात होता है कि 1970 के दशक के मध्य से हुए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के फलस्वरूप सन् 2000 तक 1,50,000 मौतें हुई हैं। इस निर्धारण में यह भी कहा गया है कि भविष्य में इन प्रभावों में वृद्धि होनी संभावित है।

बढ़ता तापमान और ओजोन


ओजोन दरअसल ऑक्सीजन का एक अपरूप है जो ऑक्सीजन के तीन अणुओं से मिलकर बनता है और इसका संकेत O3 होता है। वायुमंडल में ओजोन क्षोभमंडल में सर्वाधिकता से पाई जाती है और यह क्षेत्र पृथ्वी की सतह से 10 से 50 किलोमीटर ऊपर होता है। यहां ओजोन की परतें धरती पर जीवन की रक्षा करने में सहयोग करती है। ओजोन यहां धरती पर जीवन के विभिन्न रूपों के लिए सूर्य की लघु तरंगदैर्घ्य पराबैंगनी किरणों के लिए छलनी का कार्य करती है। परंतु समतापमंडल में ओजोन पूर्णतया भिन्न रूप में कार्य करती है। यह एक ग्रीनहाउस गैस है, जो स्वास्थ्य के लिए घातक है और वनस्पतियों एवं वस्तुओं के लिए हानिकारक है। समस्या यह है कि हवा का उच्च तापमान जमीनी सतह पर ओजोन की मात्रा में भी वृद्धि करता है।

समतापमंडल में पाई जाने वाली ओजोन सूर्य के प्रकाश, मुख्य रूप से पराबैंगनी प्रकाश, हाइड्रो कार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड जो मोटरगाड़ियों, गैसोलिन वाष्प, जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत संयंत्रों, शोधक कारख़ानों और कुछ अन्य उद्योगों से उत्सर्जित होते हैं, से अन्नयक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होती है। बढ़ती जनसंख्या के साथ मोटर-गाड़ियों और उद्योगों में भी वृद्धि हो रही है जिससे निचले वायुमंडल में ओजोन की मात्रा भी बढ़ रही है।

सन् 1900 से पृथ्वी की सतह के नजदीक ओजोन की मात्रा दुगुनी से अधिक हो गई है। उत्तरी गोलार्द्ध के शहरी क्षेत्रों में मई से सितंबर के गर्म दिनों में आमतौर से ओजोन का उच्च स्तर पाया जाता है। अपरान्ह के मध्य से अंत तक ओजोन का स्तर अपनी सर्वोच्चता पर होता है क्योंकि सुबह के भागम-भाग वाले समय में गाड़ियों का उत्सर्जन सूर्य की किरणों से क्रिया कर इस समय तक ओजोन निर्मित कर देता है। तापमान बढ़ने के साथ ही रासायनिक क्रियाओं की दर भी बढ़ती है और समतापमंडल में ओजोन के स्तर में वृद्धि हो जाती है। इसलिए अत्यधिक गर्म मौसम वायु प्रदूषकों की मात्रा में वृद्धि करने में सहायक होता है।

क्षोभ मंडल पर ओजोन के उच्च स्तर के प्रभाव से श्वसन तंत्र में जलन, खांसी, गले में खराश एवं/ अथवा छाती में कष्टप्रद अनुभूति होती है। इसके कारण कार्य क्षमता में कमी होना भी पाया गया है। जिससे व्यक्ति की तंदुरूस्ती पर फर्क पड़ता है और वह अधिक ताकत वाले कार्य नहीं कर पाता यह अस्थमा को भी बढ़ाता है और श्वसन तंत्र संबंधी संक्रमणों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। ओजोन फेफड़ों के ऊत्तकों को क्षति पहुंचाती है जिससे सूजन के साथ फेफड़ों की दीवार को भी क्षति होती है। दमें और फेफड़ों संबंधी अन्य रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए समस्या अधिक गंभीर होती है। लंबे समय तक इस प्रकार बार-बार सूजन आने से फेफड़े के ऊत्तकों पर पपड़ी जम सकती है। जिसके फलस्वरूप फेफड़े की कार्यक्षमता स्थाई रूप से प्रभावित हो जाती है और जीवन की गुणवत्ता कट जाती है। यहां तक कि ओजोन की साधारण मात्रा के प्रभाव से ही एक स्वस्थ मनुष्य में सीने में दर्द, जी मचलाना और सीने का भारीपन जैसे लक्षण हो सकते हैं।

पृथ्वी पर तापवृद्धि और धूम-कोहरा


धूम कोहरा या स्मॉग (धुंआ + कोहरा) एक तरह का वायु प्रदूषण है। धूम-कोहरे की बढ़ती स्थितियाँ गर्म जलवायु से जुड़ी हुई हैं। आदर्श स्मॉग कोयले की बड़ी मात्रा के फलस्वरूप बनता है और यह धुएं और सल्फर डाइऑक्साइड का मिश्रण होता है। स्मॉग किसी भी जलवायु में पाया जा सकता है जहां उद्योग या शहर बड़ी मात्रा में वायु प्रदूषकों को उत्सर्जित करते हैं। हालांकि, यह गर्म, धूप वाले मौसम के समय सर्वाधिक बूरी स्थिति में होता है क्योंकि इस समय ऊपरी वायु इतनी गर्म होती है कि यह हवा के ऊर्ध्वाधर संचरण को रोक देती है। यह खासतौर से पहाड़ों से घिरे स्थानों पर अधिक पाया जाता है। बहुधा यह धनी आबादी वाले स्थानों या शहरी क्षेत्रों के पर लम्बे समय तक टिका रहता है। जीवाश्म ईंदन के दहन से उत्पन्न धूम कोहरा संवेदनशील लोगों में श्वसन तंत्र संबंधी परेशानी पैदा कर सकता है।

समय की मांग है कि ऐसी योजनाओं, नीतियों और उपायों को लागू किया जाए जिससे जलवायु परिवर्तनशीलता एवं भविष्य में जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य असुरक्षा की स्थिति को घटाया जा सके, चाहे यह स्थिति किसी भी देश में हो।

मानव दैहिकी और वैश्विक तापवृद्धि


मनुष्य एक सीमित तापमान के दायरे के अंदर आराम से रह सकता है। हालांकि मनुष्य काफी कम या बहुत अधिक तापमान पर भी जीवित रह सकता है क्योंकि शरीर क्रिया तंत्र इसके साथ सामंजस्य बिठाने में समर्थ है। समय के साथ लोग अत्यंत उच्च या निम्न तापमान पर जिंदा रहने के लिए खुद को अनुकूल बना लेते हैं। परंतु तापमान में अधिक गर्मी होने से शरीर की प्राकृतिक शीतलन क्रिया पर अधिक दबाव पड़ता है। खासतौर पर तब, जब आर्द्रता अधिक हो और बयार हल्की हो। अल्पावधि वाले उतार-चढ़ाव, जैसे अत्यधिक गर्म दिन (जिनमें बढ़ोतरी अनुमानित है), को झेलना विशेषकर कठिन होता है क्योंकि ये शारीरिक एवं शरीर क्रिया से संबंधित सामंजस्य बिठाने के लिए बहुत कम समय प्रदान करते हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, शरीर भीतरी तापमान को एक ही स्तर पर बनाए रखने की जद्दोजहद में लग जाता है। हालांकि एक बिंदु पर आकर इसकी प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया पर्याप्त नहीं रहती। हृदयवाहिका तंत्र सही ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाता जिससे मूर्च्छा, हृदयस्पंदन में तेजी, रक्तदाब में गिरावट, त्वचा में चिपचिपापन और ठंडापन तथा जी मिचलाने जैसे लक्षणों के साथ आतप श्रांति (हीट एक्जॉशन) हो सकता है। अन्यथा, शरीर का भीतरी तापमान बढ़ने लगता है जिससे ऊष्माघात या हीट स्ट्रोक पैदा होता है और चरम स्थिति में मृत्यु भी हो सकती है।

समय के साथ मानव ने मौसम की तुनकमिजाजी के सामने टिक पाने के लिए सामाजिक, व्यवहारिक और तकनीकी विधियां विकसित कर ली हैं। किसी क्षेत्र का पहनावा बहुधा वहां के मौसम के मिजाज को प्रदर्शित करता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हुए विकास ने ऐसे वातानुकूलित घर और कार्यस्थल उपलब्ध करा दिए हैं जिससे एक सुविधाजनक तापमाप स्तर बरकरार रखा जा सके।

सूर्य का प्रकाश एवं मानव स्वास्थ्य


सूर्य का प्रकाश जीवन के लिए परमावश्यक है परंतु इसकी अधिकता हानिकारक हो सकती है। सूर्य का प्रकाश विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा है जो विद्युत चुम्बकीय तरंगों के द्वारा फैलती है।

स्वास्थ्य के नज़रिये से धूप के विद्युत चुम्बकीय वर्णक्रम के सबसे महत्वपूर्ण भाग निम्नांकित है।

पराबैंगनी विकिरण, यह आंखों के लिए अदृश्य होता है।
दृश्य प्रकाश, जिसके कारण हम देख पाते हैं।
अवरक्त विकिरण, अदृश्य परंतु ताप का प्रमुख स्रोत है।

तालिका 2 : सौर पराबैंगनी विकिरण का मानव स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव


त्वचा पर प्रभाव

आंखों पर प्रभाव

रोग प्रतिरोधकता एवं संक्रमण पर प्रभाव

अन्य प्रभाव

परोक्ष प्रभाव

त्वचा कैसंर

तीव्र नेत्रश्लेष्मा शोथ

रोग प्रतिरोधकता में कमी

विटामिन डी का उत्पादन

जलवायु, खाद्यान्न आपूर्ति, संक्रमामक रोगवाहक, वायु-प्रदूषण आदि पर प्रभाव

आतपदाह या सनबर्न

आंख का कैंसर

संक्रमणों के प्रति अधिक सुग्राह्यता

रिकेट्स और अस्थिसुषिरता से बचाव

 

 

मोतियाबिंद

प्रतिरक्षा को क्षति

अतिरक्तदाब या उक्त रक्तचाप, हृदय रोगों तथा तपेदिक में संभावित लाभ

 

 

आंख को गंभीर क्षति

अप्रकट विषाणुजनित संक्रमणों का प्रकट होना

 

 

 

 

 

 

स्तन कैंसर तथा प्रोस्टेट कैंसर की संभावना

 

 

 

 

टाईप-1 डायबिटीज से संभावित बचाव

 

 

 

 

सामान्य स्वास्थ्य एवं सोने/जागने के चक्र में बदलाव

 



अत्यधिक धूप के सम्पर्क में रहने से त्वचा के विभिन्न कैंसर तथा मोतियाबिंद एवं आंखों के अन्य रोगों का खतरा बढ़ने के साथ ही त्वचा में झुर्रियां या बुढ़ापे के लक्षण भी जल्दी आने लगते हैं। यह व्यक्तियों की संक्रमण के प्रति लड़ने की ताकत पर भी विपरीत प्रभाव डालता है और टीकाकरण कार्यक्रमों की सफलता में भी बाधक बनता है।

धरातल तक पहुंचने वाली पराबैंगनी किरणों की तीव्रता दिन भर में परिवर्तित होती रहती है। दिन के मध्य भाग में, जब आसमान एकदम साफ हो धरती को यह सर्वाधिक प्राप्त होती है। वैश्विक सौर पराबैंगनी निर्देशिका ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन-इंटरसन’ परियोजना के कार्यों द्वारा विकसित किया गया एक महत्वपूर्ण साधन है जो यह बताता है कि किसी दिन विशेष को सुरक्षा आवरण का क्या स्तर प्रयोग किया जाना उचित होगा। यह धरती की सतह पर अधिकतम सौर पराबैंगनी विकिरण का आंकलन प्रस्तुत करता है। यह आमतौर पर धूप भरी दुपहरी में धरती की सतह पर पहुंचने वाली त्वचा को क्षति पहुंचाने वाले पराबैंगनी विकिरण की सर्वोच्च मात्रा की भविष्यवाणी करने के लिए प्रयोग किया जाता है। निर्देशिका में मानक शून्य से आरम्भ होकर ऊपर को बढ़ते हैं और सूचकांक जितना अधिक होगा पराबैंगनी विकिरण के प्रभाव से त्वचा और आंखों को क्षति पहुंचने की सम्भावना उतनी ही अधिक होगी तथा इस नुकसान में समय भी उतना ही कम लगेगा।

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