‘पानी को चलना सिखा दो...’

Submitted by admin on Sun, 09/15/2013 - 12:38
Source
नवनीत हिंदी डाइजेस्ट, जून 2013
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष डॉ.राजेंद्र सिंह से अशोक अंजुम की उनके जल विषयक आंदोलन के विषय में हुई बातचीत के कुछ अंश-

पहले तो आप अपने जन्म, परिवार आदि के बारे में बताएं और फिर जल को लेकर जो आपने इतना बड़ा आंदोलन छेड़ा उसके बारे में जानना चाहूंगा।
मेरा जन्म गंगा और यमुना के बीच दिल्ली के पास स्थित डोला नामक गांव में 6 अगस्त 1959 को हुआ। पढ़ाई भी सब यहीं रहकर की। गांव में माता-पिता हैं। हम पांच भाई, दो बहनें हैं। मेरा एक बेटा और एक बेटी है। बेटे ने डी.सी.एम. के मैनेजर पद से अभी दो दिन पहले त्यागपत्र दिया है। मैंने उससे कहा है कि कम-से-कम एक साल मेरे साथ आकर पानी का काम करो,वह मन बना रहा है। बेटी असम से समाज-कार्य में कोर्स कर रही है। (कुछ सोचते हुए) मैं 1980 में भारत सरकार की सेवा में जयपुर चला गया। जहां चार साल तक नौकरी करने के बाद एक दिन मन में यह विचार आया कि हम सरकार की बहुत बड़ी मशीन में मामूली-से पुर्जे हैं। क्या यूं ही जीवन कट जाएगा? तब 1984 में अलवर के पास थाना गाजी तहसील के गोपालपुरा गांव में दवाई और पढ़ाई का काम शुरू किया। एक दिन वहां के एक बूढ़े किसान मांगू काका (नाम याद आते ही जैसे आंखों में श्रद्धा भाव उभर आता है) ने कहा- रजेंदर, दवाई और पढ़ाई बाजार की चीज है, तुम ऐसा काम करो जो पैसे से न होता हो और वह है पानी का काम। तब मैंने मांगू काका से कहा- पर मैंने तो पानी की पढ़ाई नहीं की। वे बोले- यही तो अच्छी बात है कि तुमने पढ़ी नहीं, मैं सिखा दूंगा। मैंने तपाक से प्रश्न किया- तुम मुझे सिखा दोगे तो फिर तुम क्यों नहीं करते? काका यह सुनकर कुछ उदासी भरे स्वर में बोले जिस दिन से वोट पड़ने लगे गांव बट गया। अब तो यह काम कोई बाहर से आकर ही कर सकता है।

तब क्या उम्र रही होगी आपकी?
यही कोई 25-26 साल... हां तो मांगू काका की बात पर यकीन करके हमने पानी का काम शुरू कर दिया। तब पानी का बाजार नहीं था। हमने बादलों से निकली पानी की बूंदों को पकड़ना सीखा, उन्हें धरती की कोख में डालना सीखा और फिर जरूरत पड़ने पर उस पानी को निकालना सीखा।

आपने पानी पर जो काम किया है, इसको लेकर अड़चने भी खूब आई होंगी? सरकारी रवैया आपके प्रति कैसा रहा है?
जब हम पानी का काम कर रहे थे, तब 1986 में सिंचाई और बाढ़ अधिनियम-1954 के तहत राजस्थान सरकार ने हम पर पहला मुकदमा इस तर्क के साथ कर दिया कि हम उसका पानी रोक रहे हैं। हम उसके खिलाफ लड़े। हमारा कहना था कि हमारी ज़मीन पर जो पानी बरसा है, वह हमारा है। हमने केवल अपना पानी रोका है, राजस्थान सरकार का नहीं। बड़ी तगड़ी बहस छिड़ गई कि यह पानी किसका है? भूजल किसका है? सतही जल किसका है? और पाताल जल किसका है? यह मुकदमा जीत गए और यह निर्णय हुआ कि सतही जल उसका है, जिसकी ज़मीन पर बरसा है। अधोजल, अगर संकट न हो तो निजी है। भूजल और पाताल जल सबका साझा है- इसके साथ ज्यादा छेड़छाड़ नहीं कर सकते।

अच्छा ये बताइए कि आपने पानी का काम शुरू कैसे किया? मांगू काका की उसमें क्या भूमिका रही? स्थानीय लोगों का रवैया कैसा था? शुरू में क्या-क्या अड़चनें आईं?
सरसा नदी के गोपालपुरा गांव से हमने पानी का काम शुरू किया। दरअसल, 1980 में यह गांव बेपानी होकर उजड़ गया था। यहां पर बस कुछ बूढ़े लोग बचे थे,उनके चेहरी पर लाचारी थी, हाथों को बेकारी थी और शरीर को बीमारी थी। पहला काम 1985 में संपन्न हुआ। स्थानीय लोगों के सहयोग से ऊंचाई पर चौतरे और मेवलो वाला बांध बनाया। इसके बनते ही बरसात का पानी जो रुका तो नीचे की तरह के कुओं में पानी आ गया। वे युवक जो पानी के कारण गांव से पलायन कर गए थे उनको बूढ़ों ने वापस बुला लिया। जवानों ने पानी के आते ही खेती शुरू कर दी। पहली फसल पर जवानों ने सोचा कि दावत करते है। तब तक गांव में दूध नहीं था, गाय-भैंस नहीं थीं। मैंने मांगू काका से कहा कि जवान छोरे नहीं मानते, दावत करना चाहते हैं। जवानों का उल्लास, जोश। गांव के लोगों के रिश्तेदारों की लिस्ट बनाई गई। सभी को बुलाया। 45 गांवों से कुल 60 लोग आए। ये मेरे जीवन की पहली मीटिंग थी।

बड़ा रोमांच होगा मन में, एक बड़ा काम जो आपके माध्यम से हुआ था?
अरे सुनो तो, 60 लोग उस तालाब के पास बैठ गए। उनमें से कुछ लोग बोले -राजेंदर ने बड़ा खराब करा है। अरे ये तो कलेक्टर के काम सै-पाणी पिलाणा। और लोगों ने भी समर्थन किया कि यौ काम तो उणका सै, जिन्हें हमने वोट दियो है। यै काम तो हमें नहीं उन्हें करणौ है। वहीं के एक युवक हनुमान ने धीरे-से मेरे कान में हंसते हुए कहा-राजेंदर भाई, अब थारा बेड़ा गर्क। अब यह काम नहीं होने वाला लड़ाई होगी। अब कोई फैसला नहीं होने का। हां, अगर आज की मीटिंग सही हो गई तो ये पानी का काम आगे बढ़ सकता है। तभी मांगू काका पांच-छः बुड्ढों के बीच में से बोले- ‘अरे राजेंदर, तैने का दुनिया का ठेका उठाया है, ये बेकार की बातें करने वाले लोग सैं।’ मैं बोला- ‘मांगू काका, तू स्वार्थी है, तेरे गांव का अच्छा काम सारे में फैलना चाहिए।’ करीब पांच-छः मिनट चुप रहने के बाद मांगू काका उठकर बोले- ‘सुणों भई! मैं तो रिश्तेदारी की खातिन तने बुलाया था। तने हमारा काम चोखा लागे तो करो, नहीं तो दलिया खायो और जाओ। यहां पर बेकार की बातें न करो।’ एक गरीब गांव का पटेल ऐसे बोल दे, ये बहुत बड़ी बात थी। आपस में तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। ये लड़ाई रात के दो बजे तक चली, किसी ने न दलिया खाया, न वहां से उठा। तब दो बजे के बाद फैसला हुआ। फैसला सुनाने वाले ने कहा- ‘देखों भाई, गोपालपुरा गरीब गांव था, म्हारे से छोटा। गांव कै छोरा वापस आ गया,। हम इनसे अच्छा करेंगे।’ फैसले के बाद सभी ने ताली बजाई, दलिया खाया। धीरे-धीरे बात करने लगे- ‘रे राजेंदर, म्हारे गांव में कब आवेगा?’ और इस प्रकार अगले साल 36 गाँवों में पानी का काम शुरू हो गया।

राजस्थान की सात नदियों को भी पुनर्जीवित करने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कौन-कौन-सी नदियां हैं वे, जरा उनके बारे में भी बताइए।
सबसे पहले तो हमें यह जानना होगा कि नदी सूखती क्यों है? एक तो भूजल खाली होने पर नदी सूखती है, दूसरे नाड़ी रूपी स्रोत यानी सड़ खाली होने पर भी नदी का प्रवाह रुक जाता है। 1996 में थाना गाजी, राजस्थान की अरवनी नदी ने सबसे पहले बहना शुरू किया, वो सदानीरा हुई. 1997 में अजबगढ़ क्षेत्र की सरसा नदी, 1997 में ही सरिस्का क्षेत्र की जहाजवाली नदी, 1996 में भगानी नदी, अब ये सभी नदियां सदानीरा हैं, 2008 में सावी में पानी आय़ा, ये जयपुर जिले से निकलती है और दिल्ली के पास यमुना में मिलती है। 2008 में ही सवाई माधोपुर, चंबल क्षेत्र की महेश्वरा पुनर्जीवित हुई, जो करौली से शुरू होती है। एक खास बात- ‘नदियां बहती तब हैं जब पुनर्भरण की स्थिति बनी रहे। पेड़, छोटे बांध, चेकडैम आदि नदी के जीवन के लिए उपयोगी है। हमने विभिन्न नदियों पर लगभग दस हजार छोटे बांध बनाए, जहां की धरती का पेट खुला हुआ था। पानी जहां दौड़ता हो उसे चलना सिखा दो, चलने लगे तो रेंगना सिखा दो, रेंगने लगे तो धरती का खुला पेट दिखा दो और जब बुरा वक्त आये तो अपना काम चला लो- यही पानी का विज्ञान है।

आज ग्लोबल वार्मिंग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। धरती तेजी से गर्म हो रही है। यह गंभीर समस्या है, इस पर गहरे विचार-विमर्श के साथ जुटने की आवश्यकता है। आप क्या कहते हैं?
प्रदूषण का मुख्य कारण ग्लोबलाइजेशन है, जिसके फलस्वरूप डिफॉरस्टेशन हो रहा है। जिससे मिट्टी बह जाती है और नमी समाप्त हो जाती है, फलतः हरियाली भी समाप्त हो जाती है। धरती की हरियाली और नदियों की पवित्रता दोनों ही बहुत जरूरी है। ये धधकते मौसम को ठीक करती हैं। आज मिट्टी की नमी, धरती की हरियाली, भूमि का कटाव और नदियों के पेट का जमाव-इन चारों पर काम करने की आवश्यकता है। मिट्टी की नमी मरती जा रही है। आज मुख्य मुद्दा भारत को बाढ़ और सुखाड़ से बचाना है।

कुछ और महत्वपूर्ण बात जो आप पानी के विषय में बताना चाहते हों,
हमने पानी को तैयार करने के लिए 130 तरह के डिज़ाइन तैयार किए हैं, हमारे साथ गांव के लोग जुड़े हैं, इन्हें बड़ा ज्ञान है, तगड़ी समझ है। ये जानते हैं कि जियो कल्चरल डायवर्सिटी कैसी है, राजस्थान का किसान एक-एक बूंद का हिसाब रखता है, जबकि बागपत, मेरठ, अलीगढ़ का किसान ट्यूबवैल चलाकर सो जाता है।

आप जो ये पानी का काम कर रहे हैं इसके लिए फंड कहां से आता है?
इस काम में लोगों का अपना पसीने का पैसा लगा है। ग़रीबों के लिए चंदा करते हैं, पूरा नहीं, 70 प्रतिशत। 30 प्रतिशत वे लोग अपनी मेहनत की कमाई खर्च करते हैं। सरकार से कभी एक पैसा नहीं लिया।

सरवरी नदी से जुड़ा मछली के ठेकेदारों वाला प्रसंग क्या है।?
(मुस्कराते हुए) जब सरवरी नदी सूखी थी तो सरकार का फिशरी डिपार्टमेंट भी सोया हुआ था। जब नदी में पानी आ गया तो 1996 में फिशरी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर ने मछली मारने के ठेके देने शुरू कर दिए। सरवरी नदी पर। तब जिनके खून-पसीने से नदी जीवित हुई थी, उन्होंने विरोध किया कि ये नदी जीवित हुई थी, उन्होंने विरोध किया कि ये नदी हमारी है, ये पानी हमारा है और मछली भी हमारी है। तब गुलाब सी। गुप्त (मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस), टी.के. निभान ( राजस्थान यूनिवर्सिटी के वी.सी.) तथा कुछ और महत्वपूर्ण लोगों की उपस्थित में महापंचायत हुई, जिसमें 7 हजार से अधिक लोग एकत्र हुए। वहां नदी के संबंध में महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। नदी का प्रबंधन राज्य का दायित्व है किंतु नदी को 72 गांव के लोगों ने जीवित किया है अतः इसके इस्तेमाल का पूरा अधिकार 72 गांव के लोगों का है। निर्णय हुआ कि प्रत्येक गांव से दो-दो प्रतिनिधि चुने जाएं, जो पानी के संरक्षण का काम करें। डेढ़ घंटे में 162 लोगों का लिस्ट जज के हाथों में थमा दी गई। तब से लगभग 13 साल हो गए, सब काम सुचारू रूप से चल रहे हैं। पानी के खर्च वाली फसलें वहां बैन हैं। (कुछ देर शांत रहकर वे बताते हैं) जहां तक मेरे अपने पानी के खर्चे की बात है, मैंने 5 साल तक प्रतिदिन 52 तौले पानी में स्नान किया है। एक कटोरे में पानी लेकर उसमें अंगोछे को भिगोता था और उससे सारा बदन रगड़कर दूसरे कटोरे में निचोड़ता था। खूब ताजगी आ जाती थी। अब भी मैं एक बाल्टी से अधिक खर्च नहीं करता। यह भी मैंने पत्नी के आग्रह पर शुरू किया है।

बड़ी प्रसन्नता की बात है कि सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया है। ऐसा करने से गंगा कि स्थिति में क्या परिवर्तन होने वाला है? क्या इससे कोई फायदा होगा?
सरकार ने गंगा एक्शन प्लान पर 7100 करोड़ खर्च किए लेकिन उसका लाभ कुछ नहीं हुआ। अतः इन्हें कोई पूछने वाला नहीं था। अब राष्ट्रीय नदी घोषित होने पर जिस प्रकार राष्ट्रीय ध्वज को अपमानित करने वालों को सजा मिलती है, उसे प्रकार गंगा को प्रदूषित करने वालों की सजा का प्रावधान होगा।

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