अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य

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विज्ञान प्रसार

वैश्विक तापवृद्धि के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का अध्ययन करने वाले लोग अल नीनो अथवा दक्षिणी दोलन के प्रभावों का आकलन कर रहे हैं। अल नीनो दरअसल एक महासागरीय घटना है जो उष्णकटिबंधी प्रशांत क्षेत्र में अमूमन हर पांच साल में उत्पन्न होती है। पेरू से लगा हुआ महासागर असामान्य रूप से गर्म हो जाता है और महीनों इस तापमान पर रहने के बाद ही सामान्य की ओर लौटता है या फिर अत्यधिक ठंडे तापमान में चला जाता है (ला नीनो)। ‘दक्षिणी दोलन’ से तात्पर्य वातावरण में होने वाले उस बदलाव से हो जो कि प्रशांत महासगर के गर्म या ठंडे स्थितियों में जाने से उत्पन्न होता है।

यह लगभग निश्चित है कि विश्व में बढ़ते तामान की स्थिति बदतर होने पर दुनिया भर में लाखों लोग ताप और रोगों की चपेट में आकर मौत के मुंह में समा जाएंगे। आई.पी.सी.सी. की भविष्यवाणी है कि ग्लोबल वार्मिंग के आरंभिक प्रभाव के रूप में अधिकाधिक और अधिक प्रचंड गर्म हवा के थपेड़े देखे जाएंगे। गर्म दिनों का घातक रूप से लंबा खिंचाव, जिससे 1995 की ग्रीष्म में मिडवेस्ट में 669 लोगों और जुलाई 1999 में संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी भाग में 250 लोगों की जान ली थी, जैसी घटनाएँ अधिक आम हो जाएंगी।

तापवृद्धि से मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दूसरा प्रमुख खतरा संक्रामक रोगों का है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर अप्रैल 2007 की रिपोर्ट में आई.पी.सी.सी. ने चेताया है कि बढ़ते तापमान के परिणामस्वरूप “कुछ संक्रामक रोगवाहकों के स्थानिक विस्तार में परिवर्तन” हो सकता है और “इनका प्रभाव मिश्रित होगा, जैसे कि अफ्रीका में मलेरिया के क्षेत्र और संचरण क्षमता में कमी या वृद्धि”। आई.पी.सी.सी. वैज्ञानिक जो तथ्य प्रस्तुत करना चाहते थे, उसका विश्लेषण है कि जैसे-जैसे गर्म तापमान उष्मकटिबंध से उत्तर और दक्षिण की तरफ विस्तारित होगा और अधिक ऊंचाईयों की ओर बढ़ेगा,, रोगवाहक मच्छर उसके साथ-साथ फैलेंगे। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग की बदौलत दुनिया भर में लाखों और लोग मलेरिया से संक्रमित हो जाएंगे। मस्तिष्कशोथ की महामारियों में वृद्धि होने की आशंका है क्योंकि यह भी एक मच्छर जनित रोग है और गर्म तापमान से सीधे संबंधित है। कीटों और चिचड़ी आदि रोगवाहक परजीवियों द्वारा फैलाए जाने वाले रोगों के पर्यावरणीय परिवर्तनों से प्रभावित होने की संभावना है क्योंकि ये जीव-स्वयं ही वनस्पति के प्रकार, तापमान, आर्द्रता आदि के लिए अतिसंवेदनशील हैं।

अगस्त 2003 में यूरोप न हाल की घटनाओं में सबसे कतरनाक गर्म हवाओं के थपेड़े झेले। फ्रांस में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा। इस तरह की तपिश को झेलने के आदि नहीं होने और पहले से तैयार नहीं होने के कारण कई लोग (अधिकांश बीमार और वृद्ध) मौत के मुंह में चले गए। कुल मिलकार फ्रांस में उन गर्मियों में उच्च तापमान के कारण लगभग 15,000 मौतें हुईं और पूरे यूरोप में इस घातक मौसम में 35,000 लोगों को काल के गाल में पहुंचाने में योगदान दिया होगा।

आस्ट्रेलिया में जलवायु में प्रमुख रूप से गर्माहट आने की आशंका व्यक्त की गई है: 2070 तक पूरे ऑस्ट्रेलिया में औसत तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस से 6 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि होने की संभावना जताई गई है। अत्यंत प्रचंड वर्षा की घटनाओं, जिनसे बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है, में भी वृद्धि होने की आशंका है पर इसके बावजूद पूरी 21वीं सदी में पूरे देश के आमतौर से शुष्क रहने की संभावना है।

वैश्विक तापवृद्धि के संभावित परिणाम


ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से होने वाले बदलावों पर बहुत सी संभावनाएं व्यक्त की गई हैं। नीचे इनमें से महत्वपूर्ण बिंदुओं को संक्षिप्त पर सूचीबद्ध किया गया है जो पेंटागन की रिपोर्ट पर आधारित है (स्रोत:दी ऑब्जर्वर)

भविष्य के युद्ध धर्म, विचार या राष्ट्रीय गौरव के स्थान पर जीवित रहने के मुद्दे पर लड़े जाएंगे।
सन् 2008 तक उग्र तूफान तटीय रुकावटों को तहस-नहस कर देंगे जिससे हॉलैंड का बड़ा भूभाग निवास करने योग्य नहीं रहेगा।
अमेरिका के कैलिफोर्निया में सेक्रामेंटो नदी क्षेत्र में डेल्टा द्वीप का तटबंध टूट सकता है जिससे उत्तर से दक्षिण को पानी पहुंचाने वाली कृत्रिम जल प्रणाली भंग हो जाएगी।
2010 से 2020 के मध्य यूरोप में वार्षिक औसत तापमान में 15.6 डिग्री सेल्सियस की गिरावट दर्ज की जा सकती है। ब्रिटेन में मौसमी परिस्थितियां साइबेरिया जैसी बननी शुरू हो जाएंगी।
अगले 20 वर्षों में धरती द्वारा अपनी वर्तमान जनसंख्या को कायम रखने की क्षमता में ‘महत्वपूर्ण कमी’ साफ नजर आने लगेगी।
बढ़ते समुद्री स्तर के कारण बांग्लादेश लगभग पूरी तरह से वीरान हो जाएगा क्योंकि समुद्री पानी आंतरिक जलापूर्ति को दूषित कर देगा।

तालिका -7 21वीं सदी में ग्लोबल वार्मिंग के प्रक्षेपित प्रभाव (आई. पी.सी.सी. 2001 से, तालिका एसपीएम-1 से संग्रहित)।

संभावित प्रभाव

संभाव्य प्रभावों का आकलन

कुछ स्थानों पर घटित होने के उच्च विश्वास (67-95 प्रतिशत संभावना) के साथ उदाहरण

उच्चतम तापमान में वृद्धि, लगभग समस्त भूस्थल पर अधिक गर्म दिन और गर्म हवाएं।

अत्यंत संभावित (90-99 प्रतिशत)

वृद्धों और शहरी गरीबों में मृत्यु दर और गंभीर रोगों में वृद्धि। पशुधन और वन्य जीवों में अधिक तापघात, कई फसलों के नष्ट होने के खतरे में वृद्धि, विद्युत वातानुकूलन की मांग में वृद्धि और ऊर्जा वितरण की विश्वसनीयता में कमी।

निम्न तापमान में वृद्धि, सर्द दिनों की संख्या में कमी, टिठुरन भरे दिन और सर्द हवाएं लगभग सभी स्थानों पर।

अत्यंत संभावित (90-99 प्रतिशत)

सर्दी जनित रोग प्रकोप और मृत्यु दर में कमी, कई फसलों के नष्ट होने के खतरे में कमी और कई अन्य के लिए खतरे में वृद्धि। कुछ कीटों और रोगवाहकों के क्षेत्र और क्रियाशीलता में वृद्धि। गर्माहट के लिए ऊर्जा की मांग में कमी।

अधिक प्रचंड वर्षा कई क्षेत्रों में अत्य़ंत संभावित (90-99 प्रतिशत)

अत्यंत संभावित (90-99 प्रतिशत)

बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और कीचड़ बहने से क्षतियों में वृद्धि। भू क्षरण में वृद्धि। बाढ़ के बहाव में वृद्धि। बाढ़ग्रस्त सपाट क्षेत्रों के कुछ जल स्रोतों के पुनर्भरण में वृद्धि। राजकीय और निजी बाढ़ बीमा तंत्रों और आपदा सहायता उपक्रमों पर अधिक दबाव

अधिकांश मध्य अक्षांशीय महाद्वीरों आंतरिक क्षेत्रों में ग्रीष्मकालीन शुष्कता में वृद्धि और अकाल का खतरा

संभावित (67-90 प्रतिशत)

फसलों के उत्पादन में कमी। भूमि के सिकुड़न के कारण इमारतों की नींव को क्षति पहुंचने के खतरे में वृद्धि। जलस्रोतों की संख्या और गुणवत्ता में कमी। जंगल में आग के खतरों में वृद्धि।

उष्णकटिबंधीय चक्रवातोंकी अधिकतम वायु तीव्रता में वृद्धि, औसत और उच्चतम वृष्टितपात में वृद्धि।

संभावित (67-90 प्रतिशत)

मानव जीवन के लिए खतरे में वृद्धि, संक्रामक रोगों, महामारियों सहित कई अन्य खतरे। तटीय भूक्षरण और तटीय भवनों और मूलभूत संरचनाओं के नुकसान में वृद्धि। तटीय जलवायु के नष्ट होने के अधिक खतरा, जैसे मूंगे की चट्टानें और मैंग्रोव।

कई भिन्न क्षेत्रों में सूखे और बाढ़ की तीव्रता का संबंध अल नीनों से।

संभावित (67-90 प्रतिशत)

सूखे और बाढ़ संभावित क्षेत्रों में कृषि और क्षेत्रीय भूमि की उत्पादकता में कमी। सूखा संभावित क्षेत्रों में जल विद्युत शक्ति क्षमता में कमी।

एशिया में ग्रीष्म मानसून वृष्टिपात में उतार-चढ़ाव में वृद्धि।

संभावित (67-90 प्रतिशत)

शीतोष्ण और उष्णकटिबंदीय एशिया में बाढ़ और सूखे के विस्तार और इससे नुकासन में वृद्धि।

मध्य अक्षांशीय तूफानों की तीव्रता में वृद्धि

अनिश्चित

मानव जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरे में वृद्धि। सम्पत्ति और आधारभूत संरचनाओं के नष्ट होने में वृद्धि। तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का ह्रास।

 



वैश्विक तापवृद्धि के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का अध्ययन करने वाले लोग अल नीनो अथवा दक्षिणी दोलन के प्रभावों का आकलन कर रहे हैं। अल नीनो दरअसल एक महासागरीय घटना है जो उष्णकटिबंधी प्रशांत क्षेत्र में अमूमन हर पांच साल में उत्पन्न होती है। पेरू से लगा हुआ महासागर असामान्य रूप से गर्म हो जाता है और महीनों इस तापमान पर रहने के बाद ही सामान्य की ओर लौटता है या फिर अत्यधिक ठंडे तापमान में चला जाता है (ला नीनो)। ‘दक्षिणी दोलन’ से तात्पर्य वातावरण में होने वाले उस बदलाव से हो जो कि प्रशांत महासगर के गर्म या ठंडे स्थितियों में जाने से उत्पन्न होता है। एक अल नीनो के दौरान, गर्माए हुए पूर्वी प्रशांत से होने वाला वाष्पीकरण दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका के कुछ भागों में असामान्य रूप से भारी वर्षा का कारण बनता है जबकि दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के अन्य हिस्से और दक्षिण पूर्वी एशिया और आस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ता। उष्णकटिबंधी प्रशांत पर वायुमंडलीय दबाव में बदलाव भी पूरे गोलार्द्ध पर लहरदार प्रभाव डालता है। इसके कारण सामान्यतया संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के उत्तरी हिस्सों और पश्चिमी कनाडा में शीत की तीव्रता में कमी आती है। ला नीनो के दौरान प्रभावित क्षेत्रों में मौसम की स्थितियाँ पूर्व के विपरीत प्रचंड स्थितियों में जा सकता है।

रोग की महामारियों को फैलाने में सहायक स्थितियों का पता लगाने के लिए उपग्रह द्वारा सर्वेक्षण किया जाता है जिससे बचाव के पूर्व उपाय किए जा सकें। उपग्रह से प्राप्त चित्र दर्शाता है कि पश्चिमी भूमध्यीय हिंदमहासागर और पूर्वी प्रशांत महासागर का सतही तापमान गर्माहट लिए हुए था (चित्र में बॉक्स से प्रदर्शित) और अफ्रीका महाद्वीप का निचला हिस्सा भारी वर्षा के कारण वनस्पतियों से हरा भरा था (चित्र में हरे रंग से प्रदर्शित)। इस पैटर्न से प्रदर्शित हुआ कि अफ्रीकी हिस्सा पशुओं और मनुष्य में रिफ्ट वैली फीवर का महामारी की चपेट में आने के खतरे में था। 1999 में प्रस्तुत शोध उपग्रहीय पर्यवेक्षण के लाभों को वर्णित करता है। यह प्रदर्शित करता है क उपग्रहीय चित्रों के माध्यम से प्राप्त चित्रों द्वारा पहचाने गए दो भिन्न महासागरों के गर्म क्षेत्र और अफ्रीकी महाद्वीप के निचले हिस्से (हार्न) की सरस हरियाली के कारण अफ्रीकी हार्न में रिफ्ट वैली फीवर की महामारी का पूर्वानुमान पांच माह पूर्व ही लगाया जा सकता है। यदि इस प्रकार के आकलनों के साथ पशुओं में आवश्यक टीकाकरण वक्त रहते कराया जाए तो यह मनुष्य एवं पशुधन में महामारी की रोकथाम करने में बेहद कारगर साबित हो सकता है।

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