गंगा-जल

Submitted by admin on Thu, 09/26/2013 - 13:44
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काव्य संचय- (कविता नदी)
फूटकर समृद्धि की स्रोत स्वर्णधारा से
छलकी
गंगा बही धर्मशील,
सूर्य स्थान था
जहां से मानव-स्वरूप
कोई धर्मावतार
रत्नजटित, आभूषित, स्वयं घटित,
हिम के धवल श्रृंगों पर
आदिम आश्चर्य बना :

जनता का शक्ति धन
साधन धनवानों का...
उसी चकाचौंध में सज्जनता छली गई,
धर्म धाक,
भोला गजरात चतुर अंकुश से आतंकित
अहंहीन दास बना,
शक्ति के ज्ञान की क्षमता भी चली गई:

ऐ मुक्त वन विहारी।
गर्दन ऊँची करो,
गंगा का दानी जल
लोक हित बहता है,
वंशज भगीरथ के,
उसका कल-कल निनाद
जन वाणी कहता है;
आओ, शक्ति बाँध
कमल बनके इसी क्रीड़ा जल में...
अछूती गहराइयों में उतरें...
अवगुंठित बल से इस धारा प्रवाह में
भयविहीन
विहरें,
देखें तो जीवन की दुर्दम दुःख कारा में
सचमुच ही कौन दैत्य
सदियों से रहता है।

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