कृत्रिम वर्षा के उपाय तथा संभावनाएँ

Submitted by admin on Tue, 10/15/2013 - 15:34
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राधाकांत भारती की किताब 'मानसून पवन : भारतीय जलवायु का आधार'
मौसम वैज्ञानिक, वर्षा करने के लिए इस विधि की क्षमता का अभी वैज्ञानिक दृष्टि से अनुसंधान ही नहीं कर पाए थे कि उससे बहुत पहले ही सरल होने के कारण इसका व्यापारिक दृष्टि से प्रयोग होने लगा। इस विधि द्वारा वर्षण करने के लिए कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सर्वप्रथम यह निश्चित नहीं है कि सिल्वर आयोडाइड के कण हमेशा ही बादल के अतिशीतित स्तरों में पहुंच जाते हैं, क्योंकि ये अतिशीतित स्तर ज़मीन से प्रायः कई सौ किलोमीटर ऊपर होते हैं। तलीय हवा की विक्षुब्धता के कारण वायुमंडल में कुछ किलोमीटर की ऊंचाई तक धुआं ऊपर की तरफ काफी तेजी से विसरित होता है। उपलब्ध परिस्थितियों में कृत्रिम वर्षा का प्रयास तभी सफल हो सकता है यदि दो शर्तें पूरी हों। एक तो बादल में अतिशीतित बूंदों की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए और दूसरे उनमें कुछ हिम-क्रिस्टल भी जरूर होने चाहिए। ये हिम क्रिस्टल श्रृंखला अभिक्रिया को शुरू करते हैं। आरंभ में कृत्रिम वर्षा के जो प्रयोग किए गए थे, उनमें वायुयानों द्वारा ठोस कार्बन डाइऑक्साइड (शुष्क हिम ‘ड्राइ-आइस’) जैसे अत्यंत ठंडे पदार्थ की गोलियां अतिशीतित बादलों में बिखेर देते थे। ये गोलियां ‘बीज’ की तरह कार्य करती थी। इसके पहले 1946 में अमेरिका के वैज्ञानिक वी.जी. शेफर ने दिखाया था कि अतिशीतित कुहरे से भरे पात्र में ठोस कार्बन-आक्साइड का एक छोटा-सा कण डालने पर करोड़ों की संख्या में छोटे-छोटे हिम-क्रिस्टल बनने लगते हैं। शेफर के इस प्रयोग की अमरीका और आस्ट्रेलिया के मैदानों में जांच की गई। ऐसा करने के लिए वायुयान द्वारा कई पौंड शुष्क हिम की गोलियों के ‘बीज’ उपयुक्त बादलों पर गिराए गए। इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि इस प्रकार की विधि प्रायः प्रभावी होती है। इसके अतिरिक्त ऐसा प्रतीत होता है कि इस विधि द्वारा अतिशीतित स्तरी और कपासी मेघों को पर्याप्त मात्रा में हिम-मेघों में बदल जा सकता है। इस बात का भी प्रमाण है कि कुछ प्रयोगों में पानी या बर्फ का वर्षण ज़मीन तक पहुंचा था।

फसलों के लिए पानी का संग्रह करने के लिए वायुयान द्वारा शुष्क हिम गिराकर वर्षा करना कुछ हद तक ही उपयोगी हो सकता है। यह विधि बहुत खर्चीली है और छोटे क्षेत्रों पर प्रयुक्त की जा सकती है। 1946 में अमरीका के भौतिक विज्ञानी वानेगट ने एक महत्वपूर्ण खोज की। इसके खोज के अनुसार -50 डिग्री सेल्सियस से कम ताप पर सिल्वर आयोडाइड के सूक्ष्म कणों का उपयोग हिम बनाने वाले केंद्रकों के रूप में हो सकता है। इसका कारण यह है कि सिल्वर आयोडाइड के क्रिस्टलों की संरचना हिम-क्रिस्टलों की संरचना के बहुत समान होती है। वानेगट की खोज के बाद यह मालूम हुआ कि 40 डिग्री से अधिक ताप पर (इस ताप पर पानी बिना किसी उद्दीपन के ही जम जाता है) अन्य पदार्थ विशेषतः मृत्तिका (क्ले) हिम बनाने वाले नाभिकों की भांति कार्य करती है। परंतु इनमें से कोई भी पदार्थ सिल्वर आयोडाइड-जैसा प्रभावशाली नहीं होता।

वर्षा कराने की वानेगट विधि में प्रयुक्त सिल्वर आयोडाइड के कण ऊर्ध्वपातन से सरलतापूर्वक पैदा किए जा सकते हैं, उदाहरणार्थ, इस रसायन के एसीटोन विलयन को तप्त ज्वाला में डालकर अथवा सिल्वर आयोडाइड से संसेचित कोक की अंगीठी में जलाकर असंख्य कण उत्पन्न किए जा सकते हैं। दूसरी विधि अपेक्षाकृत अधिक सरल है। अनुकूल परिस्थितियों में सिल्वर आयोडाइड का धुआं विस्तृत होकर ज़मीन से ऊपर की तरफ, बादल के अतिशीतित भागों तक पहुंचकर बरजेरॉन प्रकरण को शुरू कर सकता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार के अनुत्सुक बादलों को वर्षा में बदलने की यह एक आदर्श विधि है। सिल्वर आयोडाइड वैसे महंगा नहीं होता और सिद्धांतः इसकी अपेक्षाकृत थोड़ी मात्रा ही आवश्यक होती है। ज़मीन से बादलों का ‘बीजन’ करने की क्रिया भी बहुत सरल है। ब्लो-लैंप या अंगीठी की तरह के जनित्रों को लक्षित क्षेत्र के ऊर्ध्वगामी पवन में कई किलोमीटर तक एक पंक्ति के रूप में रखते हैं। इनमें सिल्वर आयोडाइड को कई घंटों तक निकलने देते हैं। इस काम में बहुत कुशलता की आवश्यकता नहीं होती और खर्च भी अधिक नहीं होता। इस प्रकार वायुयान द्वारा बीजन करने की आर्थिक कठिनाई समाप्त हो जाती है।

मौसम वैज्ञानिक, वर्षा करने के लिए इस विधि की क्षमता का अभी वैज्ञानिक दृष्टि से अनुसंधान ही नहीं कर पाए थे कि उससे बहुत पहले ही सरल होने के कारण इसका व्यापारिक दृष्टि से प्रयोग होने लगा। इस विधि द्वारा वर्षण करने के लिए कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सर्वप्रथम यह निश्चित नहीं है कि सिल्वर आयोडाइड के कण हमेशा ही बादल के अतिशीतित स्तरों में पहुंच जाते हैं, क्योंकि ये अतिशीतित स्तर ज़मीन से प्रायः कई सौ किलोमीटर ऊपर होते हैं। तलीय हवा की विक्षुब्धता के कारण वायुमंडल में कुछ किलोमीटर की ऊंचाई तक धुआं ऊपर की तरफ काफी तेजी से विसरित होता है। परंतु अधिक ऊंचाई पर यह क्रिया काफी धीरे-धीरे हो जाती है और ताप वितरण अनुकूल होने पर यह रुक भी सकती है। दूसरी कठिनाई यह है कि सूर्य का प्रकाश पड़ने पर सिल्वर आयोडाइड खराब हो जाता है। लगभग एक घंटे तक खुला रहने पर और अपेक्षाकृत उच्च ताप पर इसकी केंद्रक बनाने की क्षमता समाप्त हो जाती है।

अब वर्षा उत्पन्न करने या उसे बढ़ाने के प्रयास करते समय तक मुख्य कठिनाई यह आती है कि परीक्षणों के परिणामों का मूल्यांकन कैसे किया जाए? मौसम विज्ञान में जितनी भी राशियां मापी जाती है उनमें ऐसा भी होता है कि किसी स्थान पर एक साल तक वर्षा होती है परंतु दूसरा साल सूखा रहता है और यह क्रम लगातार कई वर्षों तक चलता रहता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक स्थान पर तो भारी वर्षा होती है जबकि उससे कुछ ही दूर दूसरे स्थान पर वर्षा या तो बहुत कम होती है, अथवा होती ही नहीं। बीजन करने के बाद यदि वर्षा हुई तो हम समझते हैं कि प्रयोग सफल रहा है। लेकिन क्या प्रमाण है कि इसके बिना, केवल प्राकृतिक रूप से, अर्थात् मानवीय हस्तक्षेप के बिना वर्षा हुई, यह समस्या हमेशा ही उठ खड़ी होती है।

प्रारंभ में कुछ व्यापारी आपरेटरों ने वर्षा में कई सौ प्रतिशत तक की वृद्धि का दावा किया। आजकल ऐसे कथनों पर सामान्यतः विश्वास नहीं किया जाता, और ऐसा समझा जाता है कि यह वृद्धि 10 या 20 प्रतिशत से अधिक नहीं थी, यद्यपि इसमें भी बहुत संदेह है। अत्यधिक परिवर्तनशील घटक में ऐसी मामूली घट-बढ़ का पता लगाने के लिए आवश्यक है कि अनेक सुनियंत्रित प्रयोग कर उनका ठीक-ठीक सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाए। अधिकतर मौसम वैज्ञानिकों की यह राय है कि कृत्रिम रूप से वर्षा कराने के लिए बहुत धन खर्च करने पर भी इस बात का कोई संतोषजनक प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है कि ज़मीन से छोड़े गए सिल्वर आयोडाइड का प्रयोग करके विस्तृत क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा निश्चित रूप से बढ़ाई जा सकती है।

लेकिन आशा की एक किरण दिखाई देती है। इस बात का प्रमाण है कि अगर सिल्वर आयोडाइड के पैदा करने वाले साधनों को ऊंचे पहाड़ों पर उस तरफ रखा जाए जिधर हवा चल रही हो तो वर्षा की मात्रा कुछ हद तक बढ़ जाती है। इन परिस्थितियों में बने पार्वतिक बादल पार्यः अतिशीतित होते हैं और पहाड़ों पर ऊपर की तरफ उठने वाली हवा सिल्वर आयोडाइड के कणों की पर्याप्त मात्रा को तेजी से बादलों में मिला देती है। ज़मीन पर रखे जनित्रों द्वारा सफलतापूर्वक बीजन होने के लिए यह सबसे अधिक अनुकूल परिस्थिति है। भारत में हिमालयी क्षेत्र तथा पश्चिमी घाट के इलाके इस प्रयास के लिए उपयुक्त कहे जा सकते हैं। फिर भी, यह नहीं कहा जा सकता कि लंबे समय तक लगातार होने वाली अनावृष्टि को समाप्त करने की कोई विधि नहीं है। किंतु बीजन सफलतापूर्वक तभी संभव होता है जबकि परिस्थितियां निश्चित रूप से प्राकृतिक वर्षा के अनुकूल हों तथा आकाश में बादल तैरते रहें।

केंद्रकों की उत्पत्ति के बारे में काफी अनुसंधान हो रहा है और लंदन विश्वविद्यालय के इंपीरियल-कॉलेज में तो यह कार्य विशेष रूप से हो रहा है। इसके फलस्वरूप कुछ अप्रत्याशित और आकर्षक परिणाम भी प्राप्त हो चुके हैं। उदाहरणार्थ, जिन धूलि कणों के चारों ओर एक बार बर्फ बन चुकी हो, उनमें बाद में परीक्षणों में हिमायन (फ्रीजिंग) शुरू करने की अधिक क्षमता होती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि वे उच्च ताप पर भी नाभिकीय कार्य कर सकते हैं। इस संबंध में एक सुझाव यह दिया गया है कि इस प्रकार का प्रभाव संभवतः बर्फ के उन सूक्ष्म टुकड़ों द्वारा होता है जो दरारों में फंसे रहते हैं। पहली बार बर्फ के ये सूक्ष्म टुकड़े गलने से बच जाते हैं और फिर दूसरे परीक्षण में हिमायन बढ़ाने के लिए समर्थ हो जाते हैं। संघनन या हिमायन के लिए वायुमंडल के केंद्रकों की उत्पत्ति संबंधी कोई वास्तविक भौतिक सिद्धांत मौसम विज्ञान के साथ क्रिस्टल-विज्ञान और भौतिक-रसायन जैसे दूसरे विज्ञानों पर आधारित होगा।

भारत में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से कुछ जल-विज्ञान विशेषज्ञों ने कृत्रिम वर्षा के सफल प्रयोग किए हैं। ऐसे प्रयास उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय रूप से काफी सफल रहे थे। किंतु अधिक व्यय के कारण सरकारी विभाग इस ओर वांछित रूप में उन्मुख नहीं हो सके हैं।

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