पुनर्वास की परिभाषा साफ नहीं

Submitted by admin on Fri, 10/18/2013 - 11:33
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जनसत्ता (रविवारी), 13 अक्टूबर 2013
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन से राज वाल्मीकि की बातचीत

अमानवीय प्रथाहाल ही में मानव मल ढोने वाले रोज़गार का निषेध एवं उनके पुनर्वास विधेयक 2012 को संसद ने पारित किया है। इस पर आपकी क्या राय है?
इसे विधेयक को पास कराने के लिए सफाई कर्मचारी आंदोलन और हमारी ही तरह सोच रखने वाले अन्य सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने कई सालों तक संघर्ष किया। सरकार पर दबाव बना। वह मजबूर हुई। इसी का परिणाम है कि पिछले अधिनियम 1993 के बीस साल बाद यह विधेयक पारित हुआ। पर हम इस कानून से खुश नहीं हैं। दरअसल ये सभी मैला ढोने वालों की मांग थी कि हमें नया कानून चाहिए। उन्हें इज्जतदार पेशे में पुनर्वास चाहिए।

इस कानून में क्या खामियां हैं?
इस कानून से मैला प्रथा का उन्मूलन नहीं होगा, इसके कई रूप हैं जैसे शुष्क शौचालयों की सफाई, ओपेन ड्रेन, सेप्टिक टैंक, रेलवे ट्रैक, सीवर इन सबके उन्मूलन के बारे में कोई तरीका नहीं दिया है। उनके उन्मूलन के बारे में इस कानून में कुछ नहीं है।

सरकार की पुनर्वास नीति पर आपकी क्या राय है?
इसमें मैला ढोने वालों के पुनर्वास की परिभाषा साफ नहीं है। पुनर्वास किसका, जो आज काम कर रहे हैं या पांच साल पहले कर रहे थे या बीस साल पहले काम कर रहे थे? अभी सरकार जो सर्वे कर रही है वह सिर्फ शहरों तक सीमित है। गांव के बारे में कुछ नहीं हो रहा। गांव में मैला ढोने वालों का क्या होगा? रेलवे पटरी पर मैला साफ करने वालों का क्या होगा? कैंटोनमेंट में जो लोग मैला ढो रहे हैं उनका क्या होगा। सरकार की पुनर्वास की कोई रूपरेखा नहीं है। रेलवे की तकनीक कब बदलेगी? क्या इसके लिए सरकार बजट आबंटन करेगी?

मैला ढोने वाले कह रहे हैं कि हमने इज़्ज़त से जीने के लिए मैला ढोना छोड़ा दिया। पर उनके पुनर्वास का कोई भरोसा नहीं है क्या वे ऐसे ही जीते रहेंगे। जो मैला ढोना छोड़ चुके हैं पुनर्वास में उन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सरकार पुनर्वास के लिए दोबारा सर्वे करने को कहती है। सरकार की बात का कोई भरोसा नहीं है।

बीस साल पहले एक अधिनियम बना था- ‘मैला ढोने वालों का रोज़गार और शुष्क शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम 1993’ और ‘मैला ढोने वालों के नियोजन के प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013’ में आप क्या अंतर देखते हैं?
देखिए, पहले के यानी अधिनियम 1993 में मैला प्रथा की परिभाषा बहुत सीमित थी। सिर्फ शुष्क शौचालयों से हाथों से टीन और झाड़ू की मदद से मानव मल साफ करने और उसे डंपिंग स्थान पर डालने की प्रथा को ही मैला प्रथा कहा गया था। जबकि इसमें इसकी परिभाषा को विस्तृत किया गया है। इस अधिनियम में मैला ढुलाने वाले दोषियों की सजा बढ़ा दी गई है। पर क्या किसी को सजा मिलेगी? पहले ही किसी को सजा नहीं मिली तो अब क्या मिलेगी। दरअसल सरकार की राजनीतिक इच्छा बहुत कमजोर है। इस देश में दलित, महिला, आदिवासी, अल्पसंख्यकों के लिए काम करने की सरकार की राजनीतिक इच्छा नहीं है या बहुत कमजोर हैं। अगर सरकार अगर सरकार दृढ़ संकल्प कर ले तो यह समस्या इतनी बड़ी नहीं है कि देश से मैला प्रथा का अंत न हो सके।

सफाई कर्मचारी आंदोलन भारत से मैला प्रथा उन्मूलन के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन है और पिछले तीस साल से संघर्षरत है। इसके क्या परिणाम हुए हैं? और इसकी भावी रणनीति क्या है?
जब मैंने काम करना शुरू किया था तब लोग इसे ‘हमारा काम’ कहते थे यानी उनकी मानसिकता पूरी तरह यह बनी हुई थी कि इस समुदाय विशेष लोगों का का काम सिर्फ मैला ढोना है। जब मैं उनसे इसे छोड़ने की बात करता था तब लोग मेरा ही विरोध करते थे। मुझे पागल समझते थे। मैला ढोने को ही अपनी किस्मत समझते थे।

तीस सला पहले मैला प्रथा की आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं था। आज स्थिति ऐसी नहीं है मैला प्रथा के खिलाफ लोग जागरूक हुए हैं। अब लोग मैला प्रथा छोड़ने की बात करने लगे हैं तो एक रास्ता नजर आने लगा है। आज मैला ढोने वाली महिलाएं कहती हैं कि हमने तो यह काम किया पर हमारे बच्चे यह नहीं करेंगे। यह एक रास्ता बन गया है - मैला से मुक्ति का। इसके लिए कार्ययोजना चाहिए, विभिन्न सामाजिक संगठनों और सरकार के पास। अब मैला ढोने वाले समुदाय में भी मैला प्रथा के बारे में थोड़ी जानकारी बढ़ी है। धीरे-धीरे लोग जागरूक हो रहे हैं। अब आज मैला ढोने वाले स्वयं नहीं चाहते कि उनके बच्चे मैला ढोएं। हमारा विश्वास तो इस समुदाय के उन बच्चों पर है जो यह कहते हैं कि हम यह काम नहीं करेंगे। उन्हीं से हमें उम्मीदें हैं।

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