शिमला में कंक्रीट

Submitted by admin on Sat, 10/26/2013 - 16:31
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जनसत्ता (रविवारी), 20 सितंबर 2013
अपनी कुदरती खूबसूरती के लिए मशहूर शिमला दिनोंदिन बदहाल होता जा रहा है। जहां-जहां बेतरतीब बन रहे मकानों की वजह से शहर पर दबाव बहुत बढ़ गया है। इस बारे में बता रहे हैं एसआर हरनोट।

अंग्रेजों ने शिमला का विकास सावधानी और सूझबूझ से इस तरह किया ताकि न तो प्राकृतिक संसाधनों को कोई क्षति पहुंचे और न ही पर्यावरण को कोई खतरा हो। जब हमारा देश आज़ाद हुआ तो वे स्थल तो पूरी तरह सुंदर बने रहे जहां-जहां अंग्रेजों ने छावनियां बनाईं लेकिन दूसरी जगहों पर देवदार, बुरांश और बान के जंगलों की जगह कंक्रीट के जंगल उगने शुरू हो गए। 1941 में शिमला की जनसंख्या 18,3,48 थी जो 1951 में 46,1,50 हो गई।शिमला का नाम लेते ही प्रकृति का एक अद्भुत सुंदर पहाड़ी शहर आंखों के आ सामने जाता है। देवदार, बुरांश, चीड़ और बान के घने जंगलों से आच्छादित शिमला की सात पहाड़ियां-जाखू हिल, इलिजियम हिल, बेटोनी हिल, इनवेरम हिल, ऑब्जरवेटरी हिल, प्रोस्पैक्ट हिल और समर हिल। उनकी चोटियों पर निर्मित प्राचीन मंदिर और ढलानों में लाला और हरी टीन की छतों वाली ब्रिटिशकालीन भव्य इमारतें। लेकिन यह अतीत की बातें हैं।

अंग्रेजों को शिमला की पहाड़ियां इतनी भाईं कि उन्होंने दो सौ साल पहले इस छोटे से पहाड़ी गांव श्यामला को शिमला शहर में तब्दील कर दिया। 1815 में गोरखा युद्ध के दौरान उनकी एक टुकड़ी श्यामला गांव के रास्ते जाखू पहाड़ी से होती हुई कोटगढ़ पहुंची थी। वे इस पहाड़ी क्षेत्र की जलवायु और प्राकृतिक सौंदर्य देख कर दंग रह गए। 1817 में जिराल्ड बंधु इसी मार्ग से सतलुज घाटी के भू-गर्भ संबंधी सर्वेक्षण के लिए किन्नौर गए थे, जिन्होंने अपनी डायरी में इस खूबसूरत क्षेत्र का सुंदर वर्णन किया है। 1815 में स्पाटू में सहायक राजनीतिक अधिकारी रौस का कार्यालय स्थापित हुआ और बाद में छावनी बनी। 1819 में रौस ने ही सबसे पहले शिमला में एक लकड़ी की कुटीर निर्मित की और उसमें रहने लगा। 1922 में मेजर कनेडी इस पहाड़ी क्षेत्र का राजनीतिक अधिकारी नियुक्त हुआ और उसने कनेडी हाउस नाम से लकड़ी और पत्थर का पहला मकान बनाया जहां आज हिमाचल विधान सभा परिसर है। बहुत साल पहले वह प्रचीन मकान आग में जल कर राख हो गया। बाद में अंग्रेजों की आवाजाही बढ़ने लगी और कई भव्य और आलीशान इमारतें बनीं। 1826 में लॉर्ड एहमर्स्ट ने बंगाल से आकर कुछ समय कनेडी हाउस में गुजारा और इसी समय शिमला को ग्रीष्म राजधानी बनने का श्री गणेश हुआ जो 1864 में सर जे लॉरेंस के कार्यकाल में औपचारिक रूप से पूरा हो गया।

अंग्रेज स्वास्थ्य लाभ और अपने विश्राम के लिए इस पहाड़ी इलाके को विकसित करना चाहते थे और इसी नजर से ब्रिटिश सरकार ने मेजर कनेडी को राजा पटियाला और राणा क्योंथल से शिमला के साथ लगते इलाकों और गाँवों को हासिल करने का आदेश दिया। मेजर कनेडी ने क्योंथल के राणा से 12 गांव प्राप्त किए जिनमें फागली, बेमलोई, कनलोग और खलीनी मुख्य थे। इसके अलावा चार अन्य गांव पटियाला से लिए गए जिनमें कैंथू और अनाडेल शामिल थे। आज ये पुराने गांव ही शिमला के उप नगर हैं। इसके बाद शिमला के विकास ने गति पकड़ ली। 1830 में शिमला की पहाड़ियों पर केवल तीस मकान बने थे जो 1860 तक पहुंचते दो सौ तक हो गए। इसी के साथ जनसंख्या में भी बढ़ोतरी हुई। 1881 में शिमला में कुल 1141 मकान थे और जनसंख्या बारह हजार थी।

शिमला के समिट्री क्षेत्र में कंक्रीट का जंगलअंग्रेजों ने शिमला का विकास सावधानी और सूझबूझ से इस तरह किया ताकि न तो प्राकृतिक संसाधनों को कोई क्षति पहुंचे और न ही पर्यावरण को कोई खतरा हो। जब हमारा देश आज़ाद हुआ तो वे स्थल तो पूरी तरह सुंदर बने रहे जहां-जहां अंग्रेजों ने छावनियां बनाईं लेकिन दूसरी जगहों पर देवदार, बुरांश और बान के जंगलों की जगह कंक्रीट के जंगल उगने शुरू हो गए। 1941 में शिमला की जनसंख्या 18,3,48 थी जो 1951 में 46,1,50 हो गई। इसका एक कारण पंजाब के कई क्षेत्रों का शिमला में शामिल होना भी था। 2011 की जनगणना के मुताबिक इसकी आबादी 1.69 लाख है।

जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ जनसाधारण की सुविधाएँ की मांग भी बढ़ेगी। आज शिमला शहर पर जनसंख्या के साथ बाहर से आने वाले लाखों पर्यटकों का बोझ भी शामिल है। उपनगरों में जिस तरह 10-15 सालों में बेतरतीब मकान बने हैं और अंधाधुंध पेड़ों का कटान हुआ है वह खतरे की घंटी है।

कुछ क्षेत्र शिमला नगर निगम की परिधि में पहले नहीं आते थे और इसी बात का लाभ आम लोगों ने उठाया। यहां के जमींदारों ने न केवल पैसे के लालच में अपनी जमीन बेचीं बल्कि जंगलों को भी नहीं बख्शा। ढलानों पर इस तरह कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए कि लोगों ने रास्ते तक नहीं छोड़े। जो प्रतिबंधित हरी पट्टी थी वहां भी रसूख वालों ने आलीशान भवन बना लिए। पुराने देवदार गुम होते गए और शिमला की पहाड़ियां कंक्रीटों से लद गईं।

संजोली से तलहटी के गांव का विहंगम दृश्यहर तरह बेतरतीब कई-कई मंजिला मकान इस तरह पहाड़ी ढलानों पर निर्मित हैं कि उन्हें देखते डर लगता है। संजौली, समिट्री, ढली, मैहली, जाखू, कसुंपटी, कच्चीघाटी और टूटू की ढलानों पर जंगल कम और कंक्रीट ज्यादा हैं। शिमला को ऊपरी हिमाचल से जोड़ने वाली बड़ी सुरंग संजौली से ढली के मध्य एक विशालकाय पहाड़ के नीचे से बनाई गई है। यह सुरंग 1850 में बनी थी। इस सुरंग के ऊपर और आसपास कई-कई मंजिला मकान हैं जो इसकी सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

सौ साल पहले जब हिमाचल में भूकंप आया था तो हिमाचल के कई क्षेत्रों में भारी तबाही हुई थी, लेकिन उस समय न इतने मकान थे और न इतनी जनसंख्या। आज अगर उसी तीव्रता का भूकंप आ जाता है तो शिमला शहर का क्या हश्र होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। शिमला शहर को सुनियोजित तरीके से एक पहाड़ी शहर की तरह बसाने में प्रशासन ने पहले से कोई सख्त मापदंड या कानून बनाए होते तो आज यह स्थिति न होती।

प्राकृतिक आपदाएं बिना कारण कभी नहीं आतीं। जब बड़ी दुर्घटनाएँ होती हैं तो आमतौर पर देखा गया है कि सभी असहाय हो जाते हैं। इसलिए आज जो स्थिति शिमला शहर की है वह निरंतर डराती है। शिमला की पहाड़ियों पर देवदार के जो घने जंगल हैं उन्हें बचाने की बहुत जरूरत है। जिस अनुपात में बरसों पुराने देवदार उगते थे। अब देवदारों का उगना बंद हो गया है। भारी बरसात और हिमपात के कारण भी हर वर्ष दर्जनों देवदार के पेड़ गिर रहे हैं।

संजोली में भूस्खलनशिमला की सड़कें जो पहले सुंदर और स्वच्छ हुआ करती थीं उनके आर-पार कतारों में वाहन खड़े दिखाई देते हैं। पार्किंग की जगह नहीं है। कई जगह पार्किंग के लिए दर्जनों पेड़ों की बलि दी जा रही है। ये सभी चीजें शहर के भविष्य को और ज्यादा संकट में डाल रही है।

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