उत्तराखंड त्रासदी : मानव द्वारा उत्पन्न आपदा

Submitted by admin on Sun, 10/27/2013 - 13:51
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रोजगार समाचार, 13-19 जून 2013
उत्तराखंड में पिछले एक दशक से सड़कों का निर्माण और विस्तार किया जा रहा है। इसके लिए भूवैज्ञानिक फॉल्ट लाइन, भूस्खलन के जोखिम को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है और विस्फोट के इस्तेमाल, वनों की कटाई, भूस्खलन के जोखिम पर कोई ध्यान दिए बगैर, उपयुक्त जलनिकासी संरचना के अभाव सहित विभिन्न सुरक्षा नियमों की अनदेखी की जा रही है। पिछले दशक में पर्यटन के तीव्र विस्तार में आपदा प्रबंधन के आधारभूत नियमों पर ध्यान नहीं दिया गया। 38,000 वर्ग कि.मी. से भी अधिक के दायरे में फैले हिमालयी क्षेत्र की पर्वतधाराओं, नदियों, वनों, हिमनदों और लोगों को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदा का जटिल होना लाज़िमी है। प्राकृतिक आपदाएं और इसके प्रभाव अक्सर एक साथ कई चीजों के घटने का परिणाम होती हैं। हाल में उत्तराखंड में आई आपदा उन मानव जनित कारणों को उजागर करती है जिसकी वजह से इस घटना का प्रभाव कई गुना बढ़ गया। उत्तराखंड कच्चे और नए पहाड़ों वाला राज्य है। यह क्षेत्र भारी वर्षा, बादल फटने, भूस्खलन, आकस्मिक बाढ़ और भूस्खलन से अक्सर प्रभावित होता रहता है। यहां के भूतत्व में काफी समस्याएं हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से बादल फटने और आकस्मिक बाढ़, हिमनद के फटने से बाढ़ (हाल में हुई आपदा में एक से अधिक जगहों पर इनकी आशंका लगा रही है जिसमें केदारनाथ, हेमकुंड साहिब और पिथौरागढ़ के ऊपर बहने वाली धाराएं शामिल हैं) सहित काफी तेज वर्षा के प्रभाव में वृद्धि हो रही है और इन सबके साथ भूस्खलन की घटनाएँ हो रही हैं। ऐसी स्थिति में सभी विकासात्मक परियोजनाओं को इस वास्तविकता को समझते हुए जोखिम कम करने का प्रयास करना चाहिए।

वर्षा का होना प्राकृतिक है किंतु नदियों के मुहानों पर अनियमित, असुरक्षित और अनियोजित बुनियादी ढांचे का विकास और उपयुक्त जांच तथा संतुलन, पारदर्शी अध्ययनों और लोकतांत्रिक निर्णायात्मक प्रक्रिया के अभाव में यहां काफी संख्या में पनबिजली परियोजनाओं का विकास इस मानवीय त्रासदी को बढ़ाने के पीछे के मुख्य कारकों में एक है। उत्तराखंड में नियमों का काफी उल्लंघन किया गया पर इस त्रासदी ने यह दिखा दिया कि प्रकृति प्रलोभनों को स्वीकार नहीं करती।

आपदा प्रबंधन का पहला सिद्धांत है पूर्व चेतावनी, जहां हम असफल हुए। जब आप इस आपदा का विश्लेषण करते हैं तो जो पहली चीज दिमाग में कौंधती है वह यह कि वहां डॉप्लर रडार प्रणाली मौजूद नहीं है जो कि बादल फटने की घटना की जानकारी भी कम से कम 3-6 घंटे पूर्व दे सकती हैं। उत्तराखंड के लिए 2008 में ही इस प्रणाली के वास्ते राशि मंजूर कर दी गई थी लेकिन उत्तराखंड सरकार और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के बीच समन्वय में कमी की वजह से यह प्रणाली उपलब्ध नहीं थी।

उत्तराखंड मौसम विभाग ने 15, 16 और 17 जून को भारी से काफी भारी बारिश की चेतावनी दी थी और यहां तक कि तीर्थयात्रियों को चार धाम (गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ) की यात्रा को चार दिनों के लिए रोकने को भी कहा था, हालांकि, उत्तराखंड प्रशासन ने इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया और इसे अनसुना कर दिया। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि कार्रवाई योग्य पूर्वानुमान जारी नहीं किया गया था। प्रशासन में कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि उन्होंने कार्रवाई की लेकिन ऐसा कोई सबूत दिख नहीं रहा है।

यहां तक कि बारिश शुरू होने के बाद भी विशिष्ट स्थानों पर भारी वर्षा की तत्काल निगरानी और इस सूचना को नीचे प्रशासन और लोगों तक तेजी से प्रसारित करने के कोई इंतजाम नहीं थे। यहां तक कि ऐसा लग रहा है कि इस आपदा के केंद्र केदारनाथ में वर्षा मापने का कोई पैमाना नहीं था। केंद्रीय जल आयोग बाढ़ पूर्वानुमान के लिए भारत का प्रमुख तकनीकी निकाय है। हालांकि इस समूचे बाढ़ से प्रभावित उत्तराखंड क्षेत्र के लिए पूर्वानुमान जारी करने में केंद्रीय जल आयोग पूरी तरह से नाकाम रहा। श्रीनगर में 17 जून की सुबह सैकड़ों घर बाढ़ से प्रभावित हुए और यहां पर बाढ़ चेतावनी प्रणाली मौजूद होने के बावजूद केंद्रीय जल आयोग ने कोई पूर्वानुमान जारी नहीं किया।

जैसा की मार्च 2013 की कैग की रिपोर्ट में कहा है कि उत्तराखंड में राज्य के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता के तहत 2007 में गठित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) की कोई बैठक नहीं हुई। राज्य ने आपदा प्रबंधन के लिए कोई नियम, विनियम, नीति अथवा दिशानिर्देश तैयार नहीं किया। उत्तराखंड में क्रियाशील एसडीएमए मौजूद नहीं है। यह दर्शाता है कि आईएमडी, सीडब्ल्यूसी, एनडीएमए और एसडीएमए जैसी एजेंसियाँ चेतावनी, पूर्वानुमान, निगरानी और सूचना के प्रसार की आधारभूत प्रणाली को भी कायम नहीं रख पाईं जिससे इस क्षेत्र में आपदा के स्तर को काफी कम किया जा सकता था। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से राज्य खनन, सड़क निर्माण, बड़ी मात्रा में पनबिजली परियोजनाओं, इमारतों और पर्यटन आदि सहित विभिन्न परियोजनाओं के संदर्भ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इसके प्रभाव की वास्तविकताओं को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया। नदी तल पर अवैध खनन इतना तीव्र और विध्वंसक था कि इसे रोकने के लिए आंदोलन करते हुए स्वामी निगमानंद ने अपनी जान दे दी। अदालत द्वारा इस बारे में स्पष्ट निर्देश हैं कि नदी के दोनों तरफ कम से कम सौ मीटर के दायरे में कोई निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता लेकिन उत्तराखंड में इसे लागू करने के लिए कोई नहीं है। यहां तक कि नदी के मुहाने पर सैकड़ों भवन बनाए गए इसके अलावा कई जगहों पर 100 मीटर की दूरी तक की जगह पर कब्जा किया गया है। यहां तक कि इस क्षेत्र में सरकारी भवन भी तैयार किए गए। श्रीनगर में अर्धसैनिक बल। सशस्त्र सीमा बल की बड़ी इमारत (पिछले वर्ष उद्धाटित) और सरकार के पर्यटन निगमों के विभिन्न होटल इस बात के सबूत हैं। उत्तरकाशी में 3-4 अगस्त 2012 को आई आपदा में इमारतें भागीरथी नदी में इस प्रकार ध्वस्त हुईं जैसे कि वे ताश के पत्तों से बनी हों, जैसा कि जून में टीवी चैनलों पर दिखाया गया। इसके बाद और सितंबर 2012 में रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ में आई आपदा के बाद इससे निपटने के लिए अनेक संस्तुतियां की गई पर किसी ने इसे क्रियान्वित करने की परवाह नहीं की।

उत्तराखंड में पिछले एक दशक से सड़कों का निर्माण और विस्तार किया जा रहा है। इसके लिए भूवैज्ञानिक फॉल्ट लाइन, भूस्खलन के जोखिम को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है और विस्फोट के इस्तेमाल, वनों की कटाई, भूस्खलन के जोखिम पर कोई ध्यान दिए बगैर, उपयुक्त जलनिकासी संरचना के अभाव सहित विभिन्न सुरक्षा नियमों की अनदेखी की जा रही है। पिछले दशक में पर्यटन के तीव्र विस्तार में आपदा प्रबंधन के आधारभूत नियमों पर ध्यान नहीं दिया गया।

दो सौ से भी ज्यादा विभिन्न आकार की पनबिजली परियोजनाएं कार्यान्वयन के विभिन्न स्तरों पर हैं। इसमें से कुछ संचालन कर रही हैं, कुछ निर्माणाधीन हैं। कुछ अन्य मंजूरी की प्रतीक्षा कर रही हैं और कुछ की योजना तैयार की जा रही हैं। इन सभी का पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव काफी महत्वपूर्ण है और साथ ही इस क्षेत्र में होने वाली आपदा पर भी इसका काफी प्रभाव है। 25 मेगावाट से कम की परियोजनाओं के प्रभाव का कोई आंकलन अथवा निगरानी नहीं की गई। यहां तक कि 25 मेगावाट से ऊपर की परियोजनाओं के लिए भी हमारे पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने यह कहा था कि अधिकांश इआईए सही नहीं हैं और इसमें केवल नकल का काम हुआ है। पर्यावरण और वन मंत्रालय की विशेषज्ञ समीक्षा समिति आईआईए की उपयुक्तता के संबंध में आधारभूत नियमों, संचयी प्रभाव आंकलन, जन परामर्श प्रक्रिया की उपयुक्तता अथवा पर्यावरणीय अनुपालन में ठीक काम नहीं कर रही हैं। यहां तक कि जब उल्लंघन के सबूत सरकारों के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं तो वे इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठा पातीं। इन परियोजनाओं में बड़े बांध, सुरंगें, सड़कें, शहर, वन कटाव, जलप्लवन सभी कुछ सम्मिलित होता है। इनकी वजह से राज्य में आपदा का जोखिम बढ़ जाता है। अलकनंदा नदी पर 330 मेगावाट के निर्माणधीन पनबिजली परियोजना की वजह से अलकनंदा में अवैध रूप से आधे मिलियन क्यूबिक मीटर से भी अधिक मलबा डाला गया। 17 जून की रात बाढ़ के साथ ही नदी में डाला गया सारा मलबा श्रीनगर शहर में घुस गया जिससे हजारों घर डूब गए और कई मकानों के तीन तलों तक मलबा भर गया। नदी में अवैध रूप से मलबा डालने की बात राज्य और केंद्र सरकार के ध्यान में कई बार लाई गई लेकिन कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। रुद्रप्रयाग जिले में मंदाकिनी नदी पर बनाए जाने वाले फाटा व्योंग और सिंगोली भटवारी पनबिजली परियोजनाओं में भी यही काम हुआ।

टिहरी बांध की वजह से हरिद्वार और ऋषिकेश शहर बच गए। ऐसी आधारहीन बातें कहकर राज्य सरकार और सीडब्ल्यूसी तथा टीएचडीसी जैसी केंद्र सरकार की एजेंसियाँ पनबिजली परियोजनाओं की आलोचनाओं पर से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही हैं। हमारा विश्लेषण दर्शाता है कि अगर टिहरी बांध नहीं होता तो भी इन शहरों में बांध के स्तर में कोई वृद्धि नहीं होती क्योंकि भागीरथी और अलकनंदा में बाढ़ अलग-अलग समय पर आई।

हमें यह समझना होगा कि हमने चीजों को मिटाने और प्रलोभनों की गंभीर गलती की है। पुनर्निर्माण और पुनर्वास के साथ उत्तराखंड को इन गलतियों को स्वीकार करना होगा और तत्काल सुधार, शुरुआती संचयी प्रभाव आंकलन और सभी नदी थालों की क्षमता का अध्ययन करना होगा और इस बीच निर्माणाधीन और नियोजित परियोजनाओं को रोकना होगा। सभी विकासात्मक कार्यों के संबंध में निर्णय लेने में अहम भूमिका वाले सक्रिय आपदा प्रबंधन विभाग को सुनिश्चित करना होगा इसके साथ ही विश्वसनीय पर्यावरणीय शासन और अनुपालन प्रणाली स्थापित करनी होगी। विभिन्न अवसंरचनाओं के प्रभाव का आकलन करना होगा। ठोस चेतावनी, पूर्वानुमान, निगरानी और सूचना प्रसार प्रणाली स्थापित करनी होगी। अगर हम इन न्यूनतम कदमों को नहीं उठाएंगे तो अगली आपदा मौजूदा आपदा की पूर्व कड़ी लगेगी।

लेखक साउथ एसिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के समन्यवक हैं।

ईमेल : Ht.sandrp@gmail.com

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