भूजल प्रबंधन : बूंदों पर टिकी बुनियाद

Submitted by admin on Fri, 11/29/2013 - 15:28
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पानी की बूंदों को सहेजने के ये उदाहरण नए जमाने के लिए भले ही नए हों, लेकिन दुनिया में इनका इतिहास बहुत पुराना है। ताल, पाल, झाल, चाल, खाल, बंधा, बावड़ी, जोहड़, कुंड, पोखर, पाइन, तालाब, झील, आपतानी आदि अनेक नामों से जलसंचयन की अनेक प्रणालियां भारत में समय-समय पर विकसित हुई। जिनके पास नकद धेला भी नहीं था, उन्होंने भी बारिश के पहले अक्षया तृतीया से अपने पुराने पोखरों की पालें ठीक करने का काम किया। बारिश के बाद देवउठनी एकादशी से जागकर इस देश ने लाखों-लाख तालाब बनाए। यह बात अक्सर कही जाती है कि भारत में पानी की कमी नहीं, पानी के प्रबंधन में कमी है। एक ही इलाके में बाढ़ और सुखाड़ के विरोधाभासी चित्र इस बात के स्वयंसिद्ध प्रमाण हैं। प्रमाण इस बात के भी हैं कि पानी का प्रबंधन न सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है, न रोने से और न किसी के चीखने-चिल्लाने से। हम इस मुगालते में भी न रहें कि नोट या वोट हमें पानी पिला सकते हैं। हकीक़त यह है कि हमें हमारी जरूरत का कुल पानी न समुद्र पिला सकता है, न ग्लेशियर, न नदियां, न झीलें और न हवा व मिट्टी में मौजूद नमी। पृथ्वी में मौजूद कुल पानी में सीधे इनसे प्राप्त मीठे पानी की हिस्सेदारी मात्र 0.325 प्रतिशत ही है। आज भी पीने योग्य सबसे ज्यादा पानी (1.68 प्रतिशत) धरती के नीचे भूजल के रूप में ही मौजूद है। हमारी धरती के भूजल की तिजोरी इतनी बड़ी है कि इसमें 213 अरब घन लीटर पानी समा जाए और हमारी जरूरत है मात्र 160 अरब घन लीटर।

भारत सरकार खुद मानती है कि मानसून के दौरान बहकर चले जाने वाली 36 अरब घन लीटर जलराशि को हम भूजल बैंक में सुरक्षित कर सकते हैं। केन्द्रीय जलसंसाधन मंत्री श्री हरीश रावत जी ने एक बैठक में माना कि सरकार के पास इस बात का कोई आंकड़ा नहीं है कि हम कुल वर्षाजल का कितना प्रतिशत संचित कर पा रहे हैं। लेकिन सच यही है कि निकासी ज्यादा है और संचयन कम। ऐसे में पानी के खातेदार कंगाल हो जाए, तो ताज्जुब क्यों?

सच यह भी है कि अभी तक देश में जलसंरचनाओं के चिन्हीकरण और सीमांकन का काम ठीक से शुरू भी नहीं किया जा सका है। भारत के पास कहने को राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर अलग-अलग जलनीति जरूर है, लेकिन हमारे पानी प्रबंधन की चुनौतियों को जिस नदी नीति, बांध नीति, पानी प्रबंधन की जवाबदेही तथा उपयोग व मालिकाना सुनिश्चित करने वाली नीति, जलस्रोत से जितना लेना, उसे उतना और वैसा पानी वापस लौटाने की नीति की दरकार है, वह आज भी देश के पास नहीं है। बावजूद इसके सभी के सच तो यही है कि यदि आज भी हमें हमारी जरूरत का पूरा पानी यदि कोई पिला सकता है, तो वे हैं सिर्फ और सिर्फ बारिश की बूंदें। जाहिर है कि भूजल प्रबंधन ही पानी प्रबंधन की सबसे पहली और जरूरी बुनियाद है।

बारिश की बूंदों को सहेजने की हमारी संस्कृति पिछले दो दशक से सरकारी योजनाओं, दस्तावेज़ों और बयानों में उतर जरूर आई है; स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी ’रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ की बहुप्रचारित शब्दावली सीख ली है; लेकिन देश के एक बहुत ब़ड़े समुदाय को अभी भी यह समझने की जरूरत है कि छोटी और परंपरागत इकाइयां ही हमें वह जलसुरक्षा वापस लौटा सकती हैं, जो खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिशों में हमने पिछले 66 वर्षों खोई है।

इस दावे को यहां कागज़ पर समझाना जरा मुश्किल है, लेकिन लद्दाख, करगिल, लाहुल और स्पीति जैसे शुष्क पहाड़ी और ठंडे रेगिस्तानों के जिंग और कूलों को देखकर समझा जा सकता है कि यदि जलसंचयन का स्थानीय कौशल न हो, तो वहां आज भी आबादी का रहना मुश्किल हो जाए। सूरत में हीरों का व्यापार करने वाले मथुर भाई सवानी आपको बता सकते हैं कि सौराष्ट्र के अपने गांव खोपला में जलसंचयन इकाइयां बनाने का काम क्यों किया। सच यह है कि जलसंचयन में सिर्फ विदर्भ के गोंड परिवारों का पलायन रोकने की ही क्षमता ही नहीं है, जूनागढ़ और पोरबंदर की 15 तहसीलों में पानी का खारापन भी नियंत्रित हुआ है।अपनी बनाई कई हजार चालों के बूते ही उफरैखाल, दूधातोली (जिला-पौड़ी गढ़वाल) के 38 गाँवों का ग्रामीण समुदाय अपनी सूखीगौला नदी का नाम बदलकर गाड़गंगा रखने का गौरव हासिल कर सका है। जलसंचयन के ऐसे संकल्प व उपयोग के अनुशासन के कारण ही जिला-अलवर (राजस्थान)की नदी ’अरवरी’ के पुनर्जीवन का प्रयास वर्ष-2003 के अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव (ब्रिसबेन, आस्ट्रेलिया)की अंतिम सूची में सम्मान से नवाजा गया। कहना न होगा कि अब यदि मारवाड़ के 38वें राठौर प्रधान महाराजा गजसिंह उर्फ बापजी, उद्योगपति रुइया वडालमिया परिवार से लेकर पीएचडी चैंबर्स ऑफ कॉमर्स या सी.आई.आई जैसे प्रतिष्ठित व्यापारिक संगठन भी जलसंचयन का काम कर खुद को धन्य मानते हैं, तो आखिर कोई तो चमत्कार होगा, मेघों की बरसाई नन्ही बूंदों को सहेजने में।

पानी की बूंदों को सहेजने के ये उदाहरण नए जमाने के लिए भले ही नए हों, लेकिन दुनिया में इनका इतिहास बहुत पुराना है। ताल, पाल, झाल, चाल, खाल, बंधा, बावड़ी, जोहड़, कुंड, पोखर, पाइन, तालाब, झील, आपतानी आदि अनेक नामों से जलसंचयन की अनेक प्रणालियां भारत में समय-समय पर विकसित हुई। जिनके पास नकद धेला भी नहीं था, उन्होंने भी बारिश के पहले अक्षया तृतीया से अपने पुराने पोखरों की पालें ठीक करने का काम किया। बारिश के बाद देवउठनी एकादशी से जागकर इस देश ने लाखों-लाख तालाब बनाए। तालाबों की तलहटी से गाद निकासी का काम कभी रुकने नहीं दिया। अपनी आय के दो टके का 10 फीसदी कुंआ-बावड़ी-जोहड़ आदि धर्मार्थ में लगाने के कारण ही सेठ-साहूकार एक समय तक महाजन यानी ‘महान जन’ कहलाए। समयानुसार नहरों के माध्यम से नदी जल का सीमित उपयोग भी समाज अपनी पानी जरूरत की पूर्ति के लिए किया। सतही व भूजल के अपने इस सुंदर प्रबंधन व अनुशासित उपयोग के कारण ही सदियों तक भारत पानीदार बना रह सका।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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