झारखंड की अखंड लूट

Submitted by admin on Sat, 11/30/2013 - 10:02
Source
जनसत्ता, 15 नवंबर 2013
उम्मीद थी कि अलग राज्य बनाने के बाद झारखंड में आदिवासी समाज के इस वैशिष्ट्य को अक्षुण्ण रखने की कोशिश होगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अलग राज्य के नाम पर सत्ता का एक और केंद्र विकसित हो गया जहां राजनेताओं अधिकारियों और ठेकेदारों के लिए लूट का तो अपार अवसर है, लेकिन झारखंडी जनता की स्थिति पहले से बदतर होती जा रही है। हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से झारखंड सबसे निचले पायदान पर है। तेरह साल पहले झारखंड राज्य का गठन हुआ था। झारखंड आंदोलन की काट में वनांचल आन्दोलन खड़ा करने वाली भाजपा ने झारखंड राज्य का गठन क्यों किया, इसको लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अविभाजित बिहार की सत्ता पर काबिज होने की कोशिशों में विफल होने के बाद भाजपा ने अपने प्रभाव वाले इलाके की सत्ता पर काबिज होने की मंशा से बिहार का विभाजन किया। वहीं कुछ की समझ है कि मल्टीनेशनल कंपनियों के हित-साधन और खनिज संपदा की लूट का मार्ग प्रशस्त करने के लिए उन्होंने यह काम किया। लेकिन झारखंड आंदोलन से जुड़े प्रबुद्ध नेताओं और झारखंडी जनता के दिमाग में अलग राज्य को लेकर लक्ष्य स्पष्ट था - झारखंडी अस्मिता और संस्कृति की रक्षा, जिसके लिए वह सदियों से संघर्ष करती रही है, कुर्बानी देती रही है। क्या है यह झारखंडी अस्मिता और संस्कृति? सामाजिक क्षेत्र में यह आकांक्षा वर्गविहीन, जातिविहीन, छुआछूत-मुक्त, औरत-मर्द की बराबरी वाले समाज के रूप में प्रकट होती है, तो आर्थिक क्षेत्र में जीवन के संसाधनों-जल, जंगल, जमीन-के सामूहिक उपयोग के रूप में।

यह सही है कि खुटखट्टीदारी व्यवस्था अब आदिवासी समाज में भी नहीं रही, लेकिन ज़मीन अब भी नितांत व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, गांव की संपत्ति ही है। उसकी खरीद-फरोख्त के पहले गांव की सहमति अनिवार्य है। राजनीतिक क्षेत्र में बहुमत और अल्पमत पर आधारित ‘लोकतंत्र’ की जगह सर्वानुमति के ‘स्वाशासन’ के रूप में हम इस विशिष्ट पहचान को देख सकते हैं, तो कला और संस्कृति के क्षेत्र में आभिजात्य संस्कृति के मंच और दर्शक-दीर्घा की जगह एक खुले रंगमंच को देख सकते हैं, जहां दर्शक और कलाकार में कोई फर्क नहीं रहता। क्योंकि यहां ‘चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत’। चलना और बोलना तो हर कोई जानता है। आदिवासी और गैर-आदिवासी समाज के फर्क को ज़मीन के साथ मनुष्य के संबंधों के आईने में भी देख सकते हैं। गैर-आदिवासी समाज आदिम साम्यवादी व्यवस्था, सामंतवाद, राजशाही और लोकतांत्रिक व्यवस्था के दौर से गुजरा है और वहां ज़मीन किसान की नहीं होती। सामंतवादी व्यवस्था में ज़मीन सामंत की, तो राजशाही के दौर में राजा की। लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी ज़मीन रखने वाले भी हर व्यक्ति को लगान देना पड़ता है। लेकिन आदिवासी समाज में ज़मीन उसकी होती है, तो खेती के लिए ज़मीन को तैयार करता है इसलिए आदिवासी समाज ज़मीन के लिए किसी तरह का टैक्स देने को तैयार नहीं। अपने इस हक के लिए उसने निरंतर संघर्ष किया तिलका ‘मांझी, सिद्धो, कान्हू और बिरसा मुंडा का संघर्ष अपने इसी नैसर्गिक अधिकार के लिए था और उन संघर्षों की ही परिणति जनजातीय क्षेत्र के लिए विशेष भू- कानूनों के रूप में हम आज देख रहे हैं। ‘पेसा’ कानून के द्वारा उनके स्वशासन के अधिकार को और मजबूत बनाने की पेशकश हुई। लेकिन आदिवासीयत की मूल भावना सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करने के बावजूद उसे ज़मीन पर उतारने की कोशिश नहीं हुई, उसी तरह जिस तरह सरकार ने वन कानून बनाया तो जरूर, लेकिन उसे राज्य में लागू नहीं किया जा सका है।

उम्मीद थी कि अलग राज्य बनाने के बाद झारखंड में आदिवासी समाज के इस वैशिष्ट्य को अक्षुण्ण रखने की कोशिश होगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अलग राज्य के नाम पर सत्ता का एक और केंद्र विकसित हो गया जहां राजनेताओं अधिकारियों और ठेकेदारों के लिए लूट का तो अपार अवसर है, लेकिन झारखंडी जनता की स्थिति पहले से बदतर होती जा रही है। हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से झारखंड सबसे निचले पायदान पर है। सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो राज्य के पैंतालीस फीसद से अधिक गरीब रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं।

एक बड़ी आबादी मलेरिया और तपेदिक जैसी बीमारियों से आक्रांत है। आदिम जनजातियों में से कई मिटने के कगार पर हैं। आज़ादी के आसपास राजमहल की पहाड़ियों में बसे पहाड़िया आदिवासियों की संख्या ढाई लाख के करीब थी, जो घटकर पैसठ-सत्तर हजार के करीब पहुंच गई है। यह सब तब हो रहा है जब राज्य का वार्षिक वार्षिक बजट लगातार बढ़ते-बढ़ते 28 हजार करोड़ को पार कर चुका है। अविभाजित बिहार में कुल बजट में महज हजार-बारह सौ करोड़ का हिस्सा दक्षिण बिहार को मिलता था। लेकिन बजट में इस विशाल बढ़ोतरी का फायदा राज्य की जनता को नहीं मिलता। इसकी एक प्रमुख वजह तो यह कि बजट की कुल राशि का पचास फीसद से भी अधिक गैर योजना मद, यानि मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों और राज्य के सरकारी कर्मचारियों के वेतन-सुविधाओं पर खर्च होता है। और शेष बची राशि योजना-मद यानी विकास योजनाओं पर खर्च होती है। यह भी होता है कि गैर योजना मद की राशि तो शत-प्रतिशत खर्च हो जाती है लेकिन योजना मद की राशि खर्च नहीं हो पाती और जितनी खर्च होती है उसका बड़ा हिस्सा लूट-खसोट की भेंट चढ़ जाता है। इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं पिछले दस वर्षों में राज्य के विकास के नाम पर क्या कुछ हुआ, इसकी पड़ताल हम नंगी आंखों से कर सकते हैं। जन-हित का कोई एक काम सरकार ने ऐसा किया हो, जिस पर गर्व किया जा सके, नहीं दिखता। हां बढ़ती हुई वेतन सुविधाओं और विकास -मद की राशि की लूट-खसोट से अर्जित संपत्ति के बदौलत गिने-चुने शहरों में रिहायशी कॉलोनियां बन रही हैं, राज्य की खस्ताहाल सड़कों पर बेशुमार कीमती गाड़ियाँ दौड़ती नजर आने लगी हैं। लेकिन उससे परे विपन्नता का वही महासागर, कुपोषित बच्चे, एनीमियां पीड़ित औरतें। आदिवासी अपने शारीरिक सौष्ठव के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब गाँवों में ऐसे औरत-मर्द नहीं दिखते। राजनीतिकों का पेट इतने से नहीं भरा।

आदिवासियों-मूलवासियों के विकास के लिए बने बजट का बड़ा हिस्सा चट कर जाने के बाद भी उनकी हवस खत्म नहीं हुई। अब वे राज्य की खनिज संपदा और जल, जंगल, ज़मीन बेचने में जुट गए हैं। बाबूलाल मरांडी से लेकर अब तक के तमाम मुख्यमंत्रियों में कई भिन्नताएं हैं। लेकिन विकास को लेकर उनकी दृष्टि एक जैसी है। सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ करार-एमओयू कर राज्य में कल-कारखानों का जाल बिछाना चाहते हैं। अब तक घोषित रूप से सैकड़ों एमओयू हो चुके हैं। अघोषित रूप से भी चोरी-छिपे लौह अयस्क और कोयले का पट्टा बेचा जा रहा है। जनता के प्रबल विरोध की वजह से इक्का-दुक्का एमओयू को छोड़ कर कोई ज़मीन पर नहीं उतरा है। हालांकि झारखंड सरकार और उसकी पुलिस कंपनियों का लठैत बन कर झारखंडी जनता का दमन करने के लिए मैदान में उतर चुकी है। तपकारा में बाबूलाल मरांडी की सरकार ने गोली चलवाई तो काठीकुंड में शिबू सोरेन की सरकार ने। लेकिन दमन के बावजूद जनता झुकने को तैयार नहीं। इसलिए सीएनटी एक्ट जैसे विशेष कानूनों के संशोधन को लेकर ही बहस शुरू हो गई है। बाबूलाल मरांडी ने अपने मुख्यमंत्रित्व-काल में छोटा नागपुर संथाल परगना किराएदारी अधिनियम में संशोधन की बात की थी उनका कहना था कि आदिवासी जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी ज़मीन बेच सके। उस पैसे से धंधा करके बेहतर जीवन जी सके। शिबू सोरेन और फिर हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इस तरह की बातें हो रही हैं। बात सुनने में अच्छी लगती हैं। खेती को अलाभकारी बताया जा रहा । हैवैसे में आदिवासी अपनी भूमि बेंच सके तो वह भी पैसा बना सकता है और उस पैसे से बेहतर जीवन बसर कर सकता है। मगर हम यह भूल जाते हैं कि जमीन की बेहतर कीमत शहर के आसपास होती है।

सुदूर ग्रामीण इलाकों में ज़मीन की वह कीमत नहीं मिलने वाली और एक बार आदिवासी ज़मीन खरीद-फरोख्त के लिए उपलब्ध हो गई, तो सबसे पहले गाँवों में बैठे महाजनों के हत्थे चढ़ेगी। ऐसा इतिहास में कई बार हो चुका है। सिद्धो कान्हू का ‘हूल’ महाजनों के कब्जे से अपनी ज़मीन की मुक्ति का ही संघर्ष था, बिरसा का ‘उलगुलान’ उसी की अगली कड़ी। सत्तर के दशक में खुद शिबू सोरेन महाजनों से आदिवासियों की ज़मीन मुक्ति का आंदोलन चला चुके हैं। आदिवासी नैसर्गिक रूप से अपनी ज़मीन से बंधा हुआ है। जंगल उससे छिन चुका उसके क्षेत्र से गुजरने वाली नदियां उद्योगीकरण से होने वाले प्रदूषण और बड़ी-बड़ी सिंचाई-विद्युत परियोजनाओं की भेंट चढ़ चुकी है। एक बार ज़मीन उसके हाथ से निकली नहीं कि वह दर-दर का भिखारी हो जाएगा, उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। कोई शक हो तो हमें एचइसी, बोकारो स्टील जैसे कारखानों से होने वाली विस्थापितों की स्थिति पर गौर करना चाहिए।

जरूरत इस बात की थी कि सरकार खेती को उन्नत करने के लिए उपाय करती। सिंचित क्षेत्र का विस्तार करती जंगल को कटने बचाती है और नदियों को प्रदूषण से मुक्त करती। भूमिगत जल स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसे रोकने की योजनाएं बनाती। झारखंड की धरती वैध-अवैध खुले खनन से विरूपति होती जा रही है। परती ज़मीन का निरंतर विस्तार हो रहा है। इन सबका मारक प्रभाव जल, जंगल, जमीन पर निर्भर आदिवासी समाज पर पड़ रहा है। झारखंड के नेताओं इन सबकी चिंता नहीं। झारखंड बनने के बाद से ही वे इसे लूटखंड बनाने की कोशिशों में लग गए थे और आज झारखंड की पहचान देश के भ्रष्टतम राज्य के रूप में है। इन्हीं सबका परिणाम यह भी है कि राज्य में उग्रवाद अपने पैर पसारता जा रहा है। झारखंड बनने के पहले उग्रवादियों की सक्रीयता इसके कुछ ही जिलों तक सीमित थीं, आज लगभग सभी जिले उग्रवाद से आक्रांत हैं। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि उग्रवाद से निपटने के लिए झारखंड को एक तरह से सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया गया है। क्या ग्रीन हंट अभियान वास्तव में उग्रवादियों से निपटने के लिए है? क्या माओवादी उनके गिरफ्त में आने के लिए यहां के जंगलों में बैठे रहेंगे? नेपाल की तराई से बिहार, झारखंड, ओडिशा होते हुए आंध्र प्रदेश तक की हरी पट्टी उनकी शरणस्थली है। यहां अभियान तेज हुआ तो वे वहां चले जाते हैं। मारी जाती है झारखंडी जनता। मारे जाते हैं शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लोग। कुछ लोगों का मानना है कि यह अभियान मल्टीनेशनल कंपनियों की मदद के लिए चलाया जा रहा है, ताकि ज़मीन अधिग्रहण के विरोध में चलने वाले शांतिपूर्ण आन्दोलनों को भी उग्रवाद से निबटने के नाम पर कुचला जा सके। लेकिन जब तक जनता में असंतोष है, उग्रवाद को खाद मिलती रहेगी।

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा