असमानता के धरातल पर बसा शहरी गरीब लोक

Submitted by admin on Sat, 12/14/2013 - 11:08
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आज गाँवों के बिगड़ते हालात और त्रासदी भरे जीवन से तंग आकर लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिसमें भारी संख्या में गांव के गरीब मेहनतकश मजदूर शामिल हैं जो शहरों में जाकर मेहनत मजदूरी करने को मजबूर हैं। इधर शहरों के हालात ऐसे हैं कि यहां रहने वाले लगभग आधी आबादी को उपयुक्त आवास या घर उपलब्ध नहीं है। शहरों में मकानों की भारी कमी है, मकानों की 95 फीसदी समस्या शहरी समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों से जुड़ी है। एक तरफ पंच सितारा संस्कृति में पलते बच्चे हैं तो दूसरी तरफ 10/10 के झुग्गियों में सिसकता बचपन। अमीर और गरीबों के बीच आवासीय स्थितियों और सामाजिक नजरिए को देखें तो एक बड़ा निर्मम विभाजन दिखाई देता है। जबकि दोनों ही वर्गों के लोग एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों की आजीविका उनके आपसी संबंधों पर टिकी हुई है। बिना शहरी गरीब मज़दूरों के हमारा शहरी जन जीवन एक दिन भी नहीं चल सकता है? आज हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शहरीकरण बहुत तेजी से हो रहा है। आँकड़े बताते हैं कि 2030 तक दुनिया कि आबादी का 50 प्रतिशत हिस्सा शहरों में होगा। विश्व में सबसे ज्यादा आबादी भारत में बढ़ रही है और सबसे ज्यादा शहरीकरण भी भारत में ही हो रहा है। 2011 की जनगणना को देखें तो पता चलता है कि 31 प्रतिशत हमारे देश कि जनसंख्या शहरों में निवास कर रही है। इतिहास में पहली बार शहरों कि जनसख्या में गाँवों कि अपेक्षा ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

आज गाँवों के बिगड़ते हालात और त्रासदी भरे जीवन से तंग आकर लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिसमें भारी संख्या में गांव के गरीब मेहनतकश मजदूर शामिल हैं जो शहरों में जाकर मेहनत मजदूरी करने को मजबूर हैं। इधर शहरों के हालात ऐसे हैं कि यहां रहने वाले लगभग आधी आबादी को उपयुक्त आवास या घर उपलब्ध नहीं है। शहरों में मकानों की भारी कमी है, मकानों की 95 फीसदी समस्या शहरी समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों से जुड़ी है। जिसके पास मकान खरीदने की कोई व्यवस्था नहीं है, किराए पर कमरा लेने या मकान के लिए लोन लेने कि क्षमता और वैधता को लेकर भी दिक्कतें हैं। शहरी गरीबों के लिए ज़मीन आसानी से उपलब्ध नहीं है। बाजारवादी और नवउदारवादी नीतियों के कारण ज़मीन निजी मुनाफ़े की विषय वस्तु बन चुकी है।

शहर के नागरिकों की आवास ज़रूरतों को दो भागों में बांट कर देखा जा रहा है। वैभव- विलास से परिपूर्ण मकानों और उच्च जीवन शैली की पृष्ठभूमि में सम्पन्न लोगों के लिए शहर के मध्य नज़दीकी क्षेत्रों में सर्व सुविधा आयुक्त कालोनियों का निर्माण हो रहा है। जबकि गरीबों को शहर से दूर सीमा के बाहर धकेला जा रहा है जहां न तो बुनियादी सुविधाएँ हैं और न ही रोज़गार के मौके। सुविधाओं और सेवाओं का ऐसा बँटवारा कि किसी के बगीचे और गार्डन के लिए फव्वारे का भरपूर पानी और किसी को प्यास बुझाने के लिए पानी मिलना मुश्किल है। अमीर और ग़रीबों के बीच आवासीय स्थितियों और सामाजिक नजरिए को देखें तो एक बड़ा निर्मम विभाजन दिखाई देता है। जबकि दोनों ही वर्गों के लोग एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों की आजीविका उनके आपसी संबंधों पर टिकी हुई है। बिना शहरी गरीब मज़दूरों के हमारा शहरी जन जीवन एक दिन भी चल सकता है?

हमारे सिटी मेकर्स जो कि वैभवशाली इमारतें, लंबी चौड़ी सड़कें, बड़ी-बड़ी कालोनियां, आधुनिक बाजार, भारी भरकम मॉल बनाने के काम में लगे हो या सीवेज के अंदर उतरकर जान जोखिम में डालकर साफ सफाई करने का कार्य करते हों। आटो टेम्पो, बस - रिक्शा चलाने वाले, मैकेनिक, कारीगर, मजदूर, घरों में काम करने वाली बाई, जमादार, सड़क साफ करने वाले, कचरा उठाने वाले, झाड़ू लगाने वाले, दूध सब्जी वाले, खोमचे वाले, होटल या रेस्टोरेंट में काम करने वाले सब लोग इन्हीं मलीन बस्तियों, के घुटन भरे माहौल में गुजर- बसर करते हैं।

दूसरी तरफ शहरी सभ्य समाज व शासन में ऐसे लोगों कि भी कमी नहीं है जो इन्हें शहरी सुंदरता और व्यवस्था के विरोधी, गंदगी और अव्यवस्था के जिम्मेदार, अपराधी और शातिर मानते हैं। शहरी विकास में ये बस्तियां और यहां के लोग एक अतिक्रमणकारी और अवरोधक के रूप बदनाम किए जाते रहे हैं। ये नजरिया शहरी सहिष्णुता, समरसता और सौहार्द के लिए खतरनाक है जिसके दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

आज शहरों के विकास में सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि शहरों के नियोजन में शहरी गरीबों को कब तक हाशिये पर रखा जाता रहेगा। कब तक शहरी संसाधनों के आवंटन में अन्याय जारी रहेगा। ये इंसानी बस्तियां हैं, यहां भी इंसान रहते हैं, उन्हें कब तक उजाड़ कर या जबरन बेदखली करके ऐसी जगहों पर फेंका या खदेड़ा जाता रहेगा जहां न तो उनके रोजी रोटी कमाने कि कोई व्यवस्था है और न ही न्यूनतम बुनियादी सुविधाओं कि पहुंच। अनुपयुक्त वातावरण व आवासों में रहने को मजबूर ये हमारे देश के ही लोग हैं जिन्हें दोयम दर्जे के नागरिकों कि सुविधाएँ भी मुअस्सर नहीं है। क्या हमारे शहरों कि सूरत बिना इनके भागीदारी व विकास के सवर पाएगी। हमारा शहरी समाज सभ्य और सुंदर कहलाने का हक़दार है ये बड़ा सवाल बिना हल किए हम सामाजिक न्याय और प्रजातंत्र में समान अवसर, समान नागरिकता और सबको सम्मान से जीने का हक प्रदान नहीं कर सकते हैं।

.ऐसा नहीं है कि इनकी व्यथा और अन्याय को आवाज़ देने वाले समूह या संगठन नहीं हैं, राजनैतिक पार्टियाँ वोट बैंक के रूप में ही सही उन्हें आवासीय जन सुविधाओं सड़क, बिजली, पानी उपलब्ध कराने का आश्वासन समय-समय पर देती रहती है। जेएनएनयूआरएम, राजीव आवास योजना जैसे योजनाओं के माध्यम से भी कुछ लोगों को राहत का मरहम लगा दिया जाता है। लेकिन इस योजनाओं की पहुँच और गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। बिना किसी स्पष्ट नीति और राजनैतिक इच्छाशक्ति के इतनी गंभीर समस्या के समाधान के बारे में सोचा नहीं जा सकता। इस मुश्किल लक्ष्य को पाने के लिए भागीरथ प्रयासों की शुरूआत शीघ्रता पूर्ण रणनीतिक प्रयासों के साथ की जानी चाहिए। तब जाकर घर से वंचित करोड़ों लोगों के अपने घर के सपने साकार होंगे।

नोटः- लेखक शहरी गरीबों के आवास अधिकार अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

संजय कुमार सिंह
‘‘बचपन’’ भोपाल (म.प्र.)
226, रोहित नगर, बाबड़िया कलां,
भोपाल (मघ्य प्रदेश)
मो. 9406924298


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