‘अपना तालाब’ विस्तार कार्यशाला का आयोजन

Submitted by admin on Tue, 01/07/2014 - 23:30
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22 दिसम्बर 2013; महोबा जिले के बरबई गाँव में ‘अपना तालाब अभियान’ विस्तार कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला की चर्चा का केंद्र था कि प्रतिभागी किसान आपस में अपने-अपने तालाबों के अनभुव का विनिमय तथा खेतों की जरूरत के अनुरूप आवश्यक विस्तार कार्य योजना।

बुंदेलखंड के सर्वाधिक जल संकटग्रस्त जनपद महोबा में वर्षाजल आधरित खेती करने वाले क्षेत्र के किसानों द्वारा निर्मित तालाबो में वर्षा जल भंडार की क्षमताओं उनकी फसल सिंचाई में उपयोगिताओं, तालाबों के आकार-प्रकार सहित खेती के बीजों और फसलों के साथ उत्पादन की गुणवत्ता पर विमर्श, आयोजित कार्यशाला की प्राथमिकतायें थीं।

जिला मुख्यालय से 28 किमी दूर किसान वृजपाल सिंह के खेत, बरबई में आयोजित कार्यशाला का प्रमुख आकर्षण बना; उनका एक हेक्टेयर का 4 मीटर गहरा अपना तालाब, जिससे वे 11 हेक्यटेयर क्षेत्र में खेती करते हैं। उनका अपने खेत के पेड़-पौधों को पर्याप्त सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता, सदियों से अनुपजाऊ जमीन को उपजाऊ बनाकर 8 गुना तक उत्पादन बढ़ाना, अन्ना प्रथा का उनकी कृषि भूमि में कोई प्रभाव न पड़ना आदि मेहमान किसानों के लिए चर्चा-परिचर्चा का विषय रहा।

कार्यशाला में आने वाले किसानों का समूह पहले वृजपाल सिंह के तालाब के भीटों पर पहुंचकर तालाब निर्माण लागत, लम्बाई, चौड़ाई, गहराई व पानी के भंडारण की क्षमता और सिंचाई की लागत आदि विविध सवाल करते दिखे। वृजपाल सिंह तालाब के हर गुर को सिखाते रहे, और अपने जवाब से संतुष्ट करते रहे। तालाब तक आने-जाने वाले पानी के प्रबंधन, पानी के रास्तों का भी किसानों ने गहराई से अवलोकन किया।

वृजपाल सिंह के खेत में ही किसानों की बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में आए किसानों ने अपने नाम, गांव, मुख्य फसल, कृषि भूमि की गुणवत्ता, रकबा, सिंचाई के साधन, वर्तमान में बोई गयी फसल सहित कृषि में विशेष उपलब्धियों के साथ अपने परिचय दिये। उपस्थित किसानों में से 26 किसानों ने इस वर्ष अपना तालाब बनाने और 35 किसानों ने पहले बना चुके अपने तालाबों को विस्तारित कर जल भंडारण की क्षमताएं बढ़ाने के प्रति उत्सुकता जाहिर की। कुछ ऐसे किसान, जिनके यहां तालाब बन रहे हैं, ने अपने तालाब बनाने के अनुभव सुनाए।

सालारपुर की महिला किसान शीला देवी ने अपने पिछली फसल का अनुभव सुनाया। बताया कि मेरे पास 6 बीघा खेती है, जिसमें से एक बीघे में प्राकृतिक और ‘जीवामृत’ पद्धतियों का इस्तेमाल किया। मात्र एक बीघे में ही 2 क्विंटल गेहूं, 2 क्विंटल चना तथा 1 क्विंटल लाही का उत्पादन मिला। इसके लिए ‘जीवामृत’ खाद का प्रयोग किया। खाद बनाने के लिए हमें गोबर एक अन्ना गाय से मिला। शिला ने बताया कि इस वर्ष वे तालाब बनाने का जतन कर रही हैं। उनको विश्वास है कि पानी आने के बाद उनके फसल में दो गुने की वृद्धि होगी।

गाँव सालारपुर के किसान सुखलाल अपनी छोटी कृषिभूमि में साग-भाजी और पपीता की खेती से मिली उपलब्धि को सुनाते हुए कहा कि खेत की मेड़ पर मैंने पपीता की खेती की है। ‘जीवामृत’ पद्धति और गोबर का इस्तेमाल भी किया है।

बरबई के किसान भूपत सिंह ने अपने दो एकड़ में बने तालाब के फायदे को बताया कि ‘हम सामान्य रूप से पांच हजार रुपये का प्रति एकड़ प्रतिवर्ष फायदा लेते हैं। इसी के साथ तालाब की मेड़ों पर लगे पेड़ों से लाख रुपये सालाना कमा लेते हैं।‘ तालाब बनाने से पहले के अनुभव बयां करते उन्होंने कहा कि ‘लागत भी प्रायः नहीं निकल पाती थी। पर खेत में फसल लगाना मजबूरी थी क्योंकि गाँव-समाज यह नहीं समझे की अब हममें फसल लगाने की हिम्मत भी नहीं रही.’ खेत उनके ऊँची और अच्छी मेड़ों के अन्दर सुरक्षित हैं। अन्ना यानि छुट्टा गायों से भी सुरक्षित हैं।

बरबई के किसान शिवराज सिंह का तालाब सबकी उत्सुकता का केंद्र है। उन्होंने तालाब बनाने के लिए असीम हिम्मत जुटाई थी। जमीन बेचकर बहन की शादी के लिए पैसा जुटाया था, शादी रोककर तालाब बनाया था। सब किसान जानना चाहते थे कि इतनी हिम्मत आखिर कहाँ से?

शिवराज सिंह ने बताया कि मैंने अपने पड़ोस में बने तालाब से यह तो समझा लिया था कि मेरे सूखे खेत को तालाब ही पानी दे सकता है। अपना तालाब अभियान से प्रभावित हुआ। तब मैंने निर्णय लिया। मुझे विश्वास था कि मैं सफलता के करीब हूँ।

बरबई के ही किसान लालभाई ने बताया कि मेरा भी संकल्प है तालाब बनाने का। पिछले साल ही बना लेता पर समय से साधन नहीं मिल पाया। जिससे मेरा तालाब नहीं बन पाया। पर इस वर्ष मैं अपने तालाब जरूर बना लूँगा।

बैठक में मातृ भूमि विकास संस्था के पंकज बागवान ने तालाब के फायदों की लम्बी-चौड़ी फेहरिस्त गिनाई। ग्रामोन्नति के श्री रूद्र प्रताप मिश्रा ने समझाया कि पानी के बिना किसानी नहीं संभव है.

अपना तालाब अभियान के संयोजक पुष्पेन्द्र भाई ने बताया कि कर्ज, सूखा से मुक्ति के लिए ‘अपना तालाब’ ही चाहिए। अपना तालाब अभियान के बारे में बताया कि यह अभियान राज और समाज का साझा अभियान है। जिलाधिकारी अनुज कुमार झा इस अभियान के कुशल नायक हैं। जमीन और जल संरक्षण से जुड़े सभी विभाग अब इस अभियान के मुख्य रथी हो गए हैं।

कार्यशाला के संयोजक अपना तालाब अभियान समिति के सदस्य अरविंद खरे ने कहा कि किसानों को खेती की जरूरत के लिए कितना पानी चाहिए; हिसाब लगाना चाहिए। पानी की जरूरत के हिसाब से तालाब बनाना चाहिए। कार्यशाला का संयोजन ग्रामोन्नति के राजेंद्र कुमार निगम ने किया।

कार्यशाला में 147 किसानों की उपस्थिति रही। भोजन में बेर्रा की रोटी, बैगन-आलू का भर्ता, अरहर की दाल, कैंथा की चटनी, सलाद था। व्यवस्था का काम रामदास प्रजापति, श्रीमती सूरजमुखी, श्रीमती राजबाई कुहार ने की। बरबई गाँव के वरदानी कुशवाहा ने टेंट का सामान सब अपनी तरफ से उपलब्ध कराया। भोजन निर्माण में भेदीलाल, रमाशंकर, झुर्री, बैजनाथ, बचोली, रामकिशुन, राजमुन्ना, मथुरा, तेजराम, रामप्रकाश, छिद्दी कुशवाहा, रत्तू, बदलू कुशवाहा, रामबाबू, कल्लू यादव, पथरौड़ी वाले रैकवार जी, दीनदयाल नाई, भगवान दास शिवहरे, भगवान दास कहार, श्याम सोनी ने उत्साहपूर्वक सहयोग दिया।

भोजन निर्माण में इंधन और आंटे की वृजपाल सिंह की ओर से की गयी शेष व्यवस्था में कुल 3500 का नकद खर्च कर 147 लोगों के खाने की व्यवस्था की गयी।

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