जिला प्रशासन व एनटीपीसी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई में साथ दें

Submitted by admin on Sun, 01/12/2014 - 15:58

बहादुर साथियों,


एनटीपीसी से बिजली बनाने के लिए सबसे जरूरी ईंधन कोयला ढोने के लिए रेलवे लाइन के नाम पर अब फिर हमारे किसानों के साथ अन्याय किया जा रहा है। रेलवे लाइन की जद में आ रही जमीन कौड़ियों के भाव लेने की कोशिश की जा रही है। गंगा नदी से पानी लेने के लिए पाइप बिछाने के लिए भी किसानों की जमीन ज़बरदस्ती लेने की साजिश चल रही है। प्रतिबंधित होने के बावजूद एनटीपीसी द्वारा बड़े-बड़े बोरवेलों के माध्यम से जमीन के भीतर से भारी मात्रा में पानी निकालकर निर्माण कार्य किया जा रहा है और इलाके का जल स्तर गिराया जा जा रहा है। हमारे इलाके के किसानों, मज़दूरों, भूमिहीनों, दलितों व हर उन वर्ग के लोगों को, जो अपनी धरती, अपने पेड़-पौधे, अपने पानी, अपने मवेशियों, अपने हरे-भरे चारागाह, नदी, नाले, तालाब, पोखरे, कुएं व ईश्वर द्वारा वरदान के रूप में मिले पहाड़ी-पहाड़ पर परिश्रम करके अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी, रहने के लिए आशियाने व बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए पैसे का इंतज़ाम करके सुखी थे और धीरे-धीरे अच्छी प्रगति कर रहे थे, उनके साथ जिला प्रशासन व एनटीपीसी द्वारा बिजली बनाने का कारखाना लगाने के नाम पर बहुत बड़ा धोखा किया गया। हालांकि देर से सही, लेकिन कंपनी लगाने के लिए भूमि अधिग्रहण के नाम पर पटवारी यानि लेखपाल से लेकर जिलाधिकारी तक ने जो धोखा, अन्याय व जालसाजी किसानों-मजदूरों के साथ की है, अब उसका पर्दाफाश हो चुका है। पांच वर्ष पहले जिला प्रशासन व कंपनी प्रबंधन द्वारा की जा रही धोखेबाजी, चालबाजी व पैतरेबाजी की तस्वीर स्पष्ट नहीं थी, लेकिन आज इलाके का बच्चा-बच्चा जान गया है कि पॉवर प्लांट स्थापित करने के बहाने कैसे उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया है।

मित्रों, जब कहीं भी कोई फ़ैक्टरी, कोई कंपनी, कोई कारखाना लगाया जाता है तो उस इलाके के लोग, वहां के बेरोजगार नौजवान, मजदूर, भूमिहीन बेसहारा लोग यही उम्मीद करते हैं कि कंपनी-फ़ैक्टरी लगने से उन्हें नौकरी मिलेगी, काम मिलेगा, मजदूरी मिलेगी, उनके लिए स्थाई रूप से रोजी-रोटी का इंतज़ाम होगा। अगर यह सच नहीं है तो किसानों, मजदूरों की जमीन पर उनके जंगल पर उनके चारागाह पर कोई फ़ैक्टरी, कारखाना लगाना वहां के लोगों के साथ अन्याय है, बहुत बड़ा धोखा है और यदि यह सच है कि कंपनी लगने से इलाके के लोगों का विकास होता है, उन्हें रोजगार मिलता है, उन्हें स्थाई नौकरी मिलती है, तो यह सवाल खड़ा होता है कि एनटीपीसी ने आज तक कितने भू-प्रभावित परिवारों के बच्चों को स्थाई नौकरी दी है। इलाके के कितने बेरोजगारों को रोजगार दिया है। जमीन लेते समय किसानों-मजदूरों से कहा गया था कि उन्हें सरकारी नौकरी दी जाएगी। रोजगार मिलेगा। एक-एक प्रभावितों के साथ न्याय होगा। आज एनटीपीसी बन रही है। हम पूंछते हैं कि कहां गई एनटीपीसी की नौकरी? अब क्यों नहीं दिया जा रहा बेरोजगारों को रोजगार? कहां गए ये एनटीपीसी के दलाल? क्यों नहीं बताते कि एनटीपीसी ने कहां बहा दी है विकास की गंगा?

मेजा में किसानों का एनटीपीसी के गेट के सामने धरनाएनटीपीसी को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी कहने वाले लोग क्यों इस सवाल का जवाब नहीं देते? हो सकता है कि यह एनटीपीसी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी उनके लिए साबित हो रही हो लेकिन, कोई जाकर पवांर का पूरा से भगाए गए उन परिवारों से पूछे कि एनटीपीसी लगने से क्या हाल हो रहा है उनका। कोई जाकर हमारे निषाद भाइयों, मुसहर भाइयों और आदिवासी भाइयों से पूछे कि क्या हाल है एनटीपीसी के आने से। पवांर के पूरा से विस्थापित की गई उस 80 साल की बुढ़िया माई से कोई पूछे कि एनटीपीसी ने क्या दिया है उसे और उसके परिवार को। एनटीपीसी का जिक्र करने मात्र से उसके आंख से झर-झर कर आंसू बहने लगते हैं। वह एक हाथ से इशारा करके बताती है कि बस्ती के कितने दुधारू पशु मर चुके हैं। बस्ती के हैंडपंपों का जो पानी पी रहे हैं लोग उनके चेहरे की ओर देंखे तो लगता है कि किसी बीमारी ने घेर रखा है उन्हें। हमारे पवांर के पूरा के उमाशंकर यादव भाई जब से गांव छोड़कर आए हैं, परिवार पालने की चिंता से उन्हें हार्टअटैक का डर बना रहता है।

जवान लड़के पूछते हैं कि एनटीपीसी को जमीन क्यों दे दिया? कहां जाएं कमाने के लिए वह? खेती नहीं होगी तो खरीदकर कब तक खाएंगे। जो मुआवजा मिला है, उससे कितनी जमीन खरीदी जा सकती है? इसी बस्ती के जवान लड़के 25-30 की उम्र में बूढ़ों जैसे दिखने लगने लगे हैं। मूलचंद्र यादव भाई के चेहरे पर जो चिंता की लकीरें नजर आ रही हैं, वह इस बात का संकेत है कि जमीन जाने का दुख उन्हें भीतर ही भीतर परेशान कर रहा है। अमहवा से झड़ियाही गांव में नाले के किनारे बसाए गए परिवारों के दो लोग नाले में गिरकर मर चुके हैं। यहां एनटीपीसी के विकास का क्या हाल है, वह भी जान लें- अमहवा से कोहड़ार बाजार जाने वाला रास्ता एनटीपीसी ने बंद कर दिया है, वहां बोर्ड टंगवा दिया गया है कि यह आम रास्ता नहीं है। भाइयों, अब इस बस्ती के लोग सीधे रास्ते से कोहड़ार बाजार नहीं जा सकते हैं। यदि कोई रात-विरात बीमार हो जाए तो उसे कैसे अस्पताल तक पहुंचाया जाए। आगे और सुनिये विकास का हाल, -इस बस्ती के आस-पास शौच जाने के लिए जगह नहीं है। बरसात में यह बस्ती चारों तरफ पानी से घिर जाती है। बस्ती से तब किसी का पेट दर्द करने लगे तो उसे नाव से नाला पार कर शौच करने जाना पड़ता है।

किसानों का विस्थापन विरोधी मार्च रैलीबड़े अफसोस की बात है कि किसानों, मजदूरों, भूमिहीनों व गरीबों के साथ धोखा करने में एनटीपीसी से पहले जिला प्रशासन, जिसमें पटवारी (लेखपाल) से लेकर जिलाधिकारी, (डीएम) नेता (जनता के प्रतिनिधि) ठेकेदार, सरकारी दलाल शामिल रहे, वह भी किसान, मजदूर के घर ही जन्म लिए रहे होंगे। लेकिन कहते हैं कि जब ओहदा बढ़ता है और जेब भरने लगती है तो इंसान का चरित्र बदल जाता है। भावनाएं बदल जाती हैं। संवेदनाएं मर जाती हैं। संबंध समाप्त हो जाते हैं। एक लेखपाल भी दरवाजे पर आ जाता है तो हमारा किसान उसके सम्मान में आवभगत करता है, एक पैर पर खड़ा रहता है। कभी एसडीएम, या डीएम जैसे माई-बाप आ जाते हैं, वैसे तो कभी आते नहीं, लेकिन आ जाएं तो किसानों को लगता है, भगवान आ गए, अब उनकी सारी समस्या हल हो जाएगी। लेकिन इसी लेखपाल, एसडीएम व डीएम की तिकड़ी ने जिस तरह से किसानों के साथ छल किया है, उसकी एक बानगी देखिए। हमारे बहुत कम किसानों को यह मालूम है कि उनकी ज़मीन, जिसे वह 90 हजार रुपये प्रति की दर से जाने की बात कहते हैं, वह महज 60 से 64 हजार के बीघे में ले ली गई है। जमीन का प्रति बीघे रेट 90 नहीं 60 हजार रुपए दिया जा रहा है। इसमें 30 प्रतिशत सोल्शियम व 12 प्रतिशत अतिरिक्त प्रतिकर जुड़ा हुआ है। इस प्रकार से यह 60,000 में 30 प्रतिशत का गुणा करने पर 18 हजार सोल्शियम तथा करीब 12 हजार रुपए अतिरिक्त प्रतिकर मिलाकर कुल 90 हजार रुपए होता है। इस गुणा-गणित के हिसाब से जमीन की वास्तविक कीमत मात्र 60 हजार रुपए प्रति बीघे दिया जा रहा है। क्योंकि 30% सोल्शियम व 12% अतिरिक्त प्रतिकर तो देना ही देना है वह चाहे 3 लाख रुपए प्रति बीघे जमीन ली जाए या 9 लाख के बीघे। तो जमीन किस रेट पर ली गई है मात्र 60-64 हजार रुपए प्रति बीघे। गजब की बात तो यह है कि जिला प्रशासन के किसी अभिलेख में मुआवजे का रेट दर्शाया ही नहीं गया है।

इस बात को एसडीएम मेजा भी स्वीकार करते हैं कि किसानों के साथ न्याय नहीं हुआ। एसडीएम मेजा ने भी माना कि करीब 33 प्रतिशत जमीन काफी उपजाऊ है, जिसका रेट अलग से तय करना चाहिए था। इसके अलावा वह यह भी मानते हैं कि मुआवजा देने में भी देरी की गई है। सभी गृह विस्थापितों का नाम दर्ज नहीं किया गया। मुआवजा की धनराशि समय से न मिलने के कारण आज उसकी ब्याज जोड़ा जाए तो समझ में आता है कि इसकी भरपाई कैसे हो।

एनटीपीसी से बिजली बनाने के लिए सबसे जरूरी ईंधन कोयला ढोने के लिए रेलवे लाइन के नाम पर अब फिर हमारे किसानों के साथ अन्याय किया जा रहा है। रेलवे लाइन की जद में आ रही जमीन कौड़ियों के भाव लेने की कोशिश की जा रही है। गंगा नदी से पानी लेने के लिए पाइप बिछाने के लिए भी किसानों की जमीन ज़बरदस्ती लेने की साजिश चल रही है। प्रतिबंधित होने के बावजूद एनटीपीसी द्वारा बड़े-बड़े बोरवेलों के माध्यम से जमीन के भीतर से भारी मात्रा में पानी निकालकर निर्माण कार्य किया जा रहा है और इलाके का जल स्तर गिराया जा जा रहा है। सलैया गांव में राख डालने के लिए तालाब बनाने व कोयले रखने के लिए रैक रखने की तैयारी हो रही है। इससे इलाके में जो प्रदूषण फैलेगा उससे लोगों का जीना मुहाल हो जाएगा। एनटीपीसी की जो राख उड़ेगी उससे तो 18 से 20 किलोमीटर तक पेड़-पौधे, फसलें व खेती बर्बाद हो जाएगी। इन सारी बातों को जानने के बाद यह भी सोचने की जरूरत है कि आखिर इलाके को एनटीपीसी से क्या मिलेगा? बिजली, लेकिन क्या खेती बर्बाद कर, अपना पानी नष्ट कर, पर्यावरण को जहरीला बनाकर तथा अपने हरे-भरे मैदान, मवेशियों को खोकर हमें ऐसे विकास की जरूरत है। हम किसान बिजली के विरोधी नहीं हैं, लेकिन कोयला और पानी सुखाकर पैदा होने वाली बिजली हमारे लिए फायदेमंद नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह सौर उर्जा तकनीक को विकसित करे। घरों में, नदियों के ऊपर, खेतों के ऊपर, नहरों के ऊपर सौर उर्जा प्लेटें लगाएं और पांच-पांच गाँवों को बिजली दे। सौर उर्जा से चलने वाले पंप को अनुदान पर बांटें। इससे पर्यावरण को नुकसान नहीं होगा। किसानों की ज़मीन नहीं जाएगी। सस्ते दर पर बिजली मिलेगी।

किसानों का विस्थापन विरोधी मार्च रैलीइसलिए किसानों-मजदूरों व सभी परियोजना प्रभावित लोगों का कहना है कि एनटीपीसी स्थापित करते समय जिला प्रशासन व कंपनी प्रबंधन ने जो वायदे किए थे, उसे पूरा नहीं किया गया। बंजर, पहाड़ी, उपजाऊ सभी तरह की जमीन का एक रेट लगाया गया, जो कि अन्याय है, धोखा है। इस अन्याय और धोखे के खिलाफ अब पूरे दम-खम से लड़ेंगे। सलैया व अमहवा गांव के किसानों-मजदूरों ने करीब 300 हेक्टेयर जमीन पर एनटीपीसी द्वारा कोई भी काम करने से मना कर दिया है। लेकिन प्रशासन व ठेकेदार यहां पर पुलिस बल का प्रयोग कर कार्य प्रारंभ करने की साजिश कर रहे हैं। अतः सभी परियोजना प्रभावित परिवारों, इलाके के किसानों-मजदूरों व न्याय का साथ देने वाले बहादुर साथियों से यह अपील की जा रही है कि वह निरंकुश जिला प्रशासन, संवेदनहीन एनटीपीसी प्रबंधन व माफिया टाइप ठेकेदारों के खिलाफ लामबंद होकर इस लड़ाई को मुकाम तक ले जाने में मदद करें। अब यह लड़ाई काफी आसान हो गई है। भारी संख्या में किसान-मजदूर विस्थापन विरोधी मंच के बैनर तले एनटीपीसी गेट पर धरने पर बैठ गए हैं, जिन्हें आपके समर्थन व साथ की बहुत जरूरत है। उम्मीद है इस लड़ाई में आप सभी हमारे साथ आएंगे।

किसान-मजदूर नेता
बीके निषाद ,
दुर्गा निषाद,
मंसूर अली,
रमाकांत बिन्द,
रामनारायन आदिवासी,
मौजीलाल कोल,

राजकुमार यादव
अध्यक्ष विस्थापन विरोधी मंच

राजीव चन्देल
संयोजक विस्थापन विरोधी मंच।

मोबाइल- 09454125412, 0775381777

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