पानी का स्वाद

Submitted by pankajbagwan on Wed, 01/15/2014 - 18:02
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अकड़ कर कहता है नमक –

मै तो हूँ नमक

मै कभी नहीं बदलता अपनी राय,

और पानी मे घुल जाता :

इतरा कर कहती शकर -

मै तो हूँ मीठी

मीठी ही रहूंगी हमेशा,

और पानी मे घुल जाती :

इसी तरह खट्टा,कडुवा,तीता,बकठा...

हर स्वाद अपनी –अपनी

अकड़ और ऐंठ लिए

घुल जाता पानी में ।

पानी कहता –मै हूँ जीवन,

हर स्वाद के लिए जगह है मुझमे,

माध्यमिक हैं मेरी क्षमताएं,

समास हूँ विभिन्नताओं के बीच,

रूप मॆं अरूप में अपरूप में

बहती हैं मेरी समावेशी संस्कृति की धाराएँ…

संकलन/प्रस्तुति-
नीलम श्रीवास्तवा,महोबा उत्तरप्रदेश

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About the author

(19 सितंबर, 1927)


जन्म-स्थान :


फैजाबाद।

शिक्षा :


एम.ए. (अंग्रेजी), लखनऊ विश्वविद्यालय।
‘नयी कविता’ के प्रमुख कवि, समीक्षक और कहानीकार। ‘तीसरा सप्तक’ में सम्मिलित।

प्रमुख कृतियां :


‘चक्रव्युह’, ‘परिवेश : हम-तुम’, ‘आत्मजयी’, ‘अपने सामने कोई दूसरा नहीं’ (कविता-संग्रह); ‘आकारों के आसपास’ (कहानियां); ‘आज और आज से पहले’ (आलोचना व समीक्षा)।

वृत्ति :


मूलतः साहित्य साधना और पैतृक व्यवसाय। अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में कविताओं के अनुवाद प्रकाशित/संकलित।

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