फाइलों के नीचे दम तोड़ती व्यवस्था

Submitted by admin on Tue, 01/28/2014 - 17:12
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दैनिक भास्कर (ईपेपर), 23 जनवरी 2014
खबरों के मुताबिक वीरप्पा मोइली ने जब पर्यावरण मंत्रालय का प्रभार संभाला तो उन्हें 350 फाइलें मिलीं जिन्हें नटराजन ने रोक रखा था। इनमें से 180 फाइल उनके घर से 22, 23 व 24 दिसंबर को बिना हस्ताक्षर लौटी थीं। किंतु 119 फाइलों पर तो उनके हस्ताक्षर होने के बाद भी किसी वजह से उन्हें रोका गया था। उनके हस्ताक्षरों वाली 50 अन्य फाइलें उनके स्टाफ ने रोक रखी थीं। नटराजन ने हरियाणा की महत्वपूर्ण 2800 मेगावाट की परमाणु बिजली परियोजना भी बिना कारण दिए साल भर से रोक रखी थी। एक महत्वपूर्ण राज्य में मुझे उद्योगपतियों के समूह ने बोलने के लिए आमंत्रित किया। मैंने उन्हें देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने का आह्वान किया। तब मुझे बताया गया कि हर माह उनके कारखानों में विभिन्न विभागों के 65 इंस्पेक्टर मुआयने के लिए आते हैं। इसमें से प्रत्येक के पास कारखाना बंद करने के अधिकार हैं, हालांकि वे सारे नियमों व निर्देशों का पालन करते हैं।

मैंने उनसे पूछा कि जब सब कुछ नियम-कायदों से हो रहा है तो वे रिश्वत देते क्यों हैं। जवाब था चेकिंग इंस्पेक्टर के शब्द ही कानून है, क्योंकि कोई अधिकारी उनके खिलाफ शिकायत नहीं सुनता। रिश्वत में उनका भी हिस्सा जो होता है। मैंने पूछा कि क्या इस वसूली में ऊपर वालों का भी हाथ रहता है तो सवाल किया गया कि क्या मेरा मतलब मंत्री से है। मेरे हां कहने पर उनका कहना था कि मंत्री के अपने बिचौलिए होते हैं, क्योंकि वे आमतौर पर रिश्वत के मामले में सीधे दखल नहीं देते।

तब मुझे एक किस्सा याद आया जो मेरी जानकारी के मुताबिक सच ही है। एक बिजनेसमैन को नया उद्योग लगाने के लिए कोई मंजूरी चाहिए थी। रकम तय हुई और मंत्री महोदय ने मंजूरी देते हुए फाइल पर अंग्रेजी में 'अप्रूव्ड' लिख दिया। जब निर्धारित समय में पैसा नहीं पहुंचा तो मंत्री ने फाइल बुलवाई और अप्रूव्ड के आगे अंग्रेजी शब्द 'नॉट' लगा दिया यानी मंजूरी नहीं। बेचारा बिजनेसमैन मुसीबत में फंस गया। उसने दूसरा बिचौलिया खोजा। उसने कहा कि अब दुगना पैसा देना होगा, क्योंकि मंत्रीजी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। सौदा हो गया तो मंत्री ने फाइल बुलवाई नॉट के अंग्रेजी अक्षर 'ई' लगाकर उसे नोट कर दिया। नोट, अप्रूव्ड यानी ध्यान दें, मंजूरी दे दी गई है!

प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार ने पर्यावरण मंत्रालय से जयंती नटराजन को हटाने का परोक्ष उल्लेख किया। पणजी की रैली में मोदी ने कहा, 'मैंने दिल्ली में जयंती टैक्स के बारे में पहली बार सुना, जिसे चुकाए बिना पर्यावरण मंत्रालय में कोई फाइल नहीं हिलती थी। यह किस तरह की व्यवस्था वे विकसित कर रहे हैं।' जयंती नटराजन ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा, 'गुजरात में पर्यावरण कानूनों का घोर उल्लंघन हो रहा था। वे पर्यावरण को नष्ट कर रहे थे। मैंने इसका विरोध किया।' हालांकि नटराजन ने किसी परियोजना या प्रस्ताव का नाम नहीं लिया। खबरों के मुताबिक वीरप्पा मोइली ने जब पर्यावरण मंत्रालय का प्रभार संभाला तो उन्हें 350 फाइलें मिलीं जिन्हें नटराजन ने रोक रखा था। इनमें से 180 फाइल उनके घर से 22, 23 व 24 दिसंबर को बिना हस्ताक्षर लौटी थीं। किंतु 119 फाइलों पर तो उनके हस्ताक्षर होने के बाद भी किसी वजह से उन्हें रोका गया था। उनके हस्ताक्षरों वाली 50 अन्य फाइलें उनके स्टाफ ने रोक रखी थीं। नटराजन ने हरियाणा की महत्वपूर्ण 2800 मेगावाट की परमाणु बिजली परियोजना भी बिना कारण दिए साल भर से रोक रखी थी। इसे मोइली ने 27 दिसंबर को हरी झंडी दी है और 6 जनवरी 2014 को प्रधानमंत्री ने इसकी आधारशिला रखी।

जब कर्नाटक में मैं एक जिले का एसपी था तो मैंने जान जोखिम में डालकर एक अपराधी को पकड़ने में घायल हुई मुस्लिम युवती को कांस्टेबल से पदोन्नत कर हेड कांस्टेबल बना दिया। चूंकि मेरा जिला छोटा था तो एक माह में मैं सारे थानों के दौरे कर लिया करता था। अगले दौरे में मैंने पाया कि वह युवती अब भी कांस्टेबल ही है। मेरे हस्ताक्षरों वाला पत्र एक माह बाद भी जारी नहीं हुआ था। मैंने एक सीआईडी अधिकारी को जांच के लिए कहा। दो दिन बाद मुझे रिपोर्ट मिली कि मेरे ऑफिस का डिस्पेच क्लर्क लेटर जारी करने के लिए 100 रुपए मांग रहा था। मैंने उसे बुलाया तो काम के बोझ का बहाना बनाने लगा। रिकॉर्ड देखा तो उसके यहां से रोज 10 पत्र जारी हो रहे थे। फिर यही क्यों रोका गया। मैंने उसे निलंबित किया। बाद में उसे बर्खास्त ही करना पड़ा।

हमारी व्यवस्था में एक हायरार्की यानी पदानुक्रम होता है। सैद्धांतिक रूप से यह राजनीतिक व मंत्री स्तर पर भी मौजूद है। हालांकि, वास्तविक जीवन में स्थिति अलग ही है। मुझे मालूम है कि कैबिनेट में शामिल होने के दो साल बाद भी कई मंत्री कभी मौजूदा प्रधानमंत्री से मिलने नहीं गए। एक मंत्री ने यह टिप्पणी की कि प्रधानमंत्री उनसे कैसे सीनियर हुए। वे निर्वाचित होकर आए हैं जबकि प्रधानमंत्री तो राज्यसभा से आए हैं। मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी ने मुझे बताया था कि कुछ मंत्री तो प्रधानमंत्री के पत्र का जवाब देने की जहमत तक नहीं उठाते। बहुत बार तो वे सिर्फ 'फाइल' लिख देते हैं। यह मामला तो खबरों में भी आया है कि एक मंत्री या उसके परिवार के एनजीओ पर अनुदान के कुछ लाख रुपए खर्च न करने का आरोप लगा तो उनके अन्य सहयोगी मंत्री ने टिप्पणी की, 'मुझे नहीं लगता कि उन्होंने ऐसा किया होगा, क्योंकि यह तो बहुत छोटी राशि है।'

मूल अधिकारों के नाम पर हमने सारे अधिकार अभियुक्त को दे दिए हैं और अपराध का शिकार हुए व्यक्ति को कुछ नहीं दिया है। वे बेचारे मामले निलंबित रहने से दशकों तक परेशानी भुगतते रहते हैं। अदालतों में कुल 332 करोड़ मामले लंबित पड़े हैं। कारण सीधा सा है- सरकार न्याय संबंधी आधारभूत ढांचे पर खर्च ही नहीं करना चाहती। फिर 1863 के प्राचीन कानूनों से आप 2013 के भ्रष्टाचार व अन्य अपराधों से नहीं निपट सकते। कुख्यात 'निर्भया' मामले से संबंधित जज के मुताबिक जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं किया गया है। मंत्री और ऊंचे पद पर बैठे लोगों के अलावा देश की जनता भी इस मामले में दोषी है, क्योंकि वह जाति, धर्म, क्षेत्र आदि के आधार पर वोट देती है। आखिर में नेता तो जनता में से ही चुने जाते हैं। गठबंधन के युग में किसी भी सरकार की प्राथमिकता प्रशासन में ईमानदारी या सच्चाई लाना अथवा उसे जनता के प्रति जवाबदेह बनाना नहीं, खुद को बचाए रखना है। राजनेताओं या राजनीतिक दलों का एक ही सिद्धांत है, सत्ता में बने रहना। जनता जाए भाड़ में। हमारे यहां ढेरों प्रकार के रेग्यूलेटर व इंस्पेक्टर हैं, जिनका मूल काम जनता को न्याय देना नहीं, जितना हो सके उतना पैसा वसूल करना है। फिर नेता लोग चाहे जितने बड़े-बड़े दावे करते फिरें। 1988 में राजीव गांधी ने कहा था कि रुपए में सिर्फ 15 पैसे जनता तक पहुंचते हैं और 2009 में राहुल गांधी ने बताया कि अब 10 रुपए में सिर्फ 10 पैसे अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं। आप चाहें तो इसे शासन कह सकते हैं।

अरस्तू ने कहा था, 'जो चीज लोगों की बड़ी संख्या में आम हो जाती है, उसकी सबसे कम परवाह की जाती है। हर आदमी मुख्यत: अपने बारे में सोचता है। सबके हित के बारे में वह शायद ही कभी सोचता है। इस बारे में वह तभी सोचता है जब वह एक व्यक्ति के रूप में खुद चिंतित होता है। वजह यह है कि हम दूसरों से तो फर्ज पूरा करने की अपेक्षा करते हैं जबकि खुद उसकी अनदेखी करते हैं। यह भारत पर बिल्कुल ठीक बैठता है।