भूजल

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इंटर कोऑपरेशन
भूजल एक गतिशील स्रोत है। लेकिन यह असीमित नहीं है इसकी मात्रा तथा गुणवत्ता एक स्थान से दूसरे स्थान तथा जलवायु के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। जल पटल का उतार-चढ़ाव भूजल भंडारों में परिवर्तन को दर्शाता है। भूजल भंडारों में वर्षा उपरांत पुनर्भरण से तथा तालाबों, नहरों तथा सिंचाई से रिसाव द्वारा वृद्धि होने पर जल पटल ऊपर आ जाता है। इसी प्रकार भूजल भंडारों से पम्पों द्वारा पानी निकालने से तथा भूजल के बाह्य प्रवाह के कारण जल पटल में गिरावट हो जाती है। धरती की सतह के नीचे भूजल लगभग हरेक जगह पर कम या अधिक मात्रा में उपलब्ध है। एक अनुमान के अनुसार पृथ्वी पर लगभग 20 लाख घन मील आयतन में भूजल समाया हुआ है और इसका लगभग आधा भाग पृथ्वी की सतह से केवल एक मील की गहराई में ही व्याप्त है। वर्षा के मौसम के बाद जल का एक भाग जमीनी सतह के नीचे विभिन्न प्रकार की कठोर और नरम चट्टानों में दरारों, तरेड़ों तथा चट्टानों के कणों के मध्य रिक्त स्थानों में एकत्र हो जाता है। यह जल ही भूजल कहलाता है।

भूजल का विश्लेषण


पृथ्वी की सतह के नीचे चट्टानों में उपलब्ध समस्त रिक्त स्थान जब जल से पूर्ण रूप से भर जाते हैं तो वह क्षेत्र संतृप्त क्षेत्र कहलाता है। इस संतृप्त क्षेत्र की ऊपरी सतह ‘जल पटल’ (वाटर टेबल) कहलाती है।

इस जल पटल की पृथ्वी सतह से गहराई विभिन्न परिस्थितियों में मात्र केवल कुछ ही मीटर अथवा कई मीटर तक हो सकती है। अत्यधिक वर्षा अथवा ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में हिम के पिघलने के कारण जब जल रिसाव बढ़ जाता है तो जल पटल बढ़कर जमीन की सतह के अधिक समीप आ जाता है। इसी प्रकार लंबे समय तक सूखे की स्थिति बनी रहे तो जल पटल जमीनी सतह से अधिक गहराई तक उतर जाता है।

भूजल पृथ्वी सतह के नीचे चट्टानों में संग्रहित रहता है तथा परतों, दरारों अथवा कणों के रिक्त स्थानों के बीच सीमित गति से प्रवाहित होता रहता है। ऐसी चट्टानें जिनमें भूजल समुचित मात्रा में संग्रहित रहता है एवं प्रवाहित होता रहता है वह जल भर रचिता कहलाता है।

भूजल प्रवाह की गति, विभिन्न प्रकार की चट्टान में उपलब्ध रिक्त स्थानों और चट्टान कणों के आकार तथा उनके आपस में जुड़े होने पर पर निर्भर करती है। बालू तथा रेतीली मिट्टी से बनी चट्टानें अधिक उपयोगी जलभर रचिता होती हैं। इस प्रकार की चट्टानों के कणों के मध्य रिक्त स्थानों की तथा दरारों की निरंतरता के कारण इनमें अतिवेध्यता (परमीएबिलीटी) उत्पन्न हो जाती है। फलस्वरूप यहां भूजल सुगमता से प्रवाहित होता है। किन्हीं विशेष भू-आकृतिक परिस्थितियों में जब भूजल सतह पर प्राकृतिक अवस्था में निकल कर बहने लगता है, तब वह झरने (स्प्रिंग) का निर्माण करता है। अन्यथा भूजल प्रवाह जमीनी सतह के ढलान के अनुरूप होता है अंत्तोगत्वा झीलों एवं नदियों के तलभाग की ओर प्रवाहित होता है। यही भूजल कुओं बावड़ियों अथवा नलकूपों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

भूजल का पुनःपूरण वर्षा जल द्वारा अथवा हिमखंडों के पिघलने के उपरांत जमीन की सतह द्वारा रिसाव होने से संभव होता है। पृथ्वी के अनेक भागों में भूजल पुनःपूरण की तुलना में भूजल के अधिक दोहन के कारण जल संकट उत्पन्न होता जा रहा है। इसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर भूजल प्रदूषण की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। इसका प्रमुख कारण है आबादी एवं औद्योगिक स्रोतों से दूषित पदार्थों का निस्तारण ऐसे स्थानों पर कर दिया जाता है, जहां से विषैले एवं हानिकारक यौगिक सीधे ही रिसाव द्वारा भूजल भंडारों में शनैःशनैः घुलते रहते हैं। इस प्रकार निरंतर दूषित यौगीकों के भूजल में मिलते रहने के कारण जल गुणवत्ता में परिवर्तन हो जाता है तथा भूजल प्रदूषित होकर पीने योग्य नहीं रह जाता है।

भूजल की अवस्थिति


भूजल की समुचित मात्रा जमीन की सतह के नीचे दानेदार चट्टानों अथवा दरारों या भग्न तल एवं तरेड़ युक्त चट्टानों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। किसी भी क्षेत्र में भूजल की उपलब्धता उस क्षेत्र की वर्षा, भू-आकृति, चट्टानों की जलभराव क्षमता एवं सतही जल भंडारों की स्थिति, जैसे तालाब, नदी, पोखर आदि पर निर्भर करती है। ऐसी रचिताएं जो कि मोटे व लगभग गोल कणों से निर्मित हों तथा जिनके कण आपस में बिना किसी सीमेंट (लेप वर्जण) या कमजोर सीमेंट द्रव्यों द्वारा जुड़े हों, भूजल उपलब्धता के लिए श्रेष्ठ होती है। उदाहरणार्थ बालू, रेत, ग्रेवल, पेबल्स आदि का मिश्रण, सम्पीडित शैल इत्यादि है। ठोस एवं कठोर चट्टानें भी भूजल के अच्छे स्रोतों का निर्माण करती हैं। इनमें मुख्यतया सैंडस्टोन एवं ग्रिट इत्यादि हैं। दरारों एवं भग्न तलों युक्त चट्टानें भी भूजल स्रोतों का निर्माण करती हैं। इसी प्रकार छिद्रों वाले चूने का पत्थर (केवरनस लाइम स्टोन) एवं छिद्रों वाली आग्नेय चट्टानें भी उपयोगी जलभर रचिताओं का निर्माण कर सकती हैं।

भू-आकृतिक रूप से पहाड़ों के तल, घाटियां एवं प्राकृतिक रूप से उथले स्थल भूजल उपलब्धता की दृष्टि से उपयुक्त हो सकते हैं। इसी प्रकार ऐसे स्थल जहां सतही जल के स्रोत जैसे बांध, बड़े तालाब, नहरें आदि स्थित हों, वहां भी भूजल उपलब्धता की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं।

भूजल की गहराई


किसी भी स्थान पर सतह से जल पटल की गहराई मुख्यतया उस स्थल की भू-आकृतिक स्थिति पर निर्भर करती है। साधारणतया लगभग सपाट तथा रेतीले क्षेत्रों में जल पटल की गहराई अधिक होती है। लेकिन घाटियों एवं नदियों के रेतीले तथा सम्पीड़ित भराव वाले स्थलों पर भूजल स्तर कम गहराई में स्थित होता है। कठोर और सघन चट्टानों में अधिकतर दरारों एवं तरेरों वाली संरचना पच्चीस से तीस मीटर तक की गहराई में व्याप्त होती है। अतः इस प्रकार की चट्टानों में जल पटल अधिक गहरी नहीं होती है। ऐसे स्थल जहां सतही जल के साधन जैसे बांध, तालाब नदी, नाले, नहरें हों, वहां भी जल पटल की गहराई कम ही होती है। नदी क्षेत्रों में सतही जल की अधिकता जलानुवेधन (वॉटर लॉगिंग) की परिस्थितियां पैदा कर देती हैं। जिसके फलस्वरूप जल पटल जमीनी सतह की स्पर्श करने लगता है अथवा जमीनी सतह के ऊपर भी आ जाता है। जिन स्थानों पर जलोढ़ निक्षेप (एल्युवियल डिपोजिट) का जमाव बहुत अधिक गहराई तक हो तथा औसत वर्षा भी कम हो वहां जल पटल की गहराई भी बढ़ जाती है।

राजस्थान में भूजल स्तर की गहराई का विभिन्न स्थानों पर बहुत अधिक अंतर है। कम गहराई वाले जल पटल के क्षेत्र इंदिरा गांधी नहर परियोजना द्वारा सिंचित क्षेत्रों गंगानगर, हनुमानगढ़ तथा बीकानेर जिलों में तथा माही कमांड क्षेत्र में बांसवाड़ा व डूंगरपुर जिले के कुछ क्षेत्रों में तथा चंबल कमांड के कोटा, बूंदी व बारां जिलों के कुछ क्षेत्रों में व्याप्त है। अरावली पर्वत श्रृंखला के पूर्वी भाग में जल पटल की गहराई 10 मीटर से 25 मीटर तक होती है। पाली, जालौर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, चुरू, सीकर तथा झुंझुनू जिले में जल पटल की गहराई 20 से 40 मीटर तक होती है। पश्चिमोत्तर क्षेत्रों के अधिकांश भाग में भूजल स्तर बहुत गहरा होता है। बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर जिले के कुछ भाग तथा नागौर, जोधपुर, चुरू व सीकर जिले में कुछ सीमित स्थानों पर जल पटल 40 से 80 मीटर तक की गहराई में व्याप्त होता है। जैसलमेर व बीकानेर के कुछ स्थान ऐसे भीहैं जहां जल पटल की गहराई 100 मीटर से भी अधिक है।

भूजल प्राप्त करना


किसी भी क्षेत्र में भूजल स्रोतों के विकास के लिए समुचित योजनाबद्ध रूप से जल भर शैलों को अंकित करना तथा उसका मात्रात्मक व गुणात्मक मूल्यांकन करना अतिआवश्यक होता है। इसके अंतर्गत जल भूविज्ञान, रासायनिक तथा भू-भौतिकी अन्वेषण और उसके उपरांत परीक्षण नलकूप वेधन करने की आवश्यकता होती है। जल भू-वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए निम्न तथ्यों के सविस्तार अध्ययन करने की आवश्यक होती है:

1. क्षेत्र के भू-आकृतिक बनावट का विस्तृत अध्ययन;
2. क्षेत्र में निर्मित सभी प्रकार की भूजल संरचनाओं (कुएं, नलकूप आदि) तथा अन्य जल संरचनाओं की विस्तृत तालिका तैयार करना,
3. क्षेत्र, की सभी भू-संरचनाओं का तथा उनकी संरचनाओं का अध्ययन,
4. क्षेत्र के वर्षा संबंधी नदी नालों में प्रवाहित होने वाली जल राशि का मापन तथा सतही जल के सिंचित क्षेत्र संबंधित सभी आंकड़ों का संकलन तथा
5. कुओं एवं नलकूपों द्वारा भूजल नमूनों का संकलन तथा उनका रासायनिक परीक्षण।

प्रायः हवाई छायाचित्र तथा उपग्रह छायाचित्रों के माध्यम से भू-आकृतिक एवं जमीनी उपयोग के विस्तार का अध्ययन किया जाता है। भू-भौतिकी सर्वेक्षण प्रमुखतया सतही रोधिता सर्वेक्षण द्वारा किया जाता है। इस विधि के अंतर्गत विद्युतवाह को जमीनी सतह के माध्यम द्वारा गहराई में व्याप्त शैलों में प्रवाहित किया जाता है। विभिन्न प्रकार की शैलों की संरचना तथा उनमें उपलब्ध जल राशि व उसके रासायनिक गुणों के अनुरूप विद्युतवाह से उत्पन्न रोधित का मापन कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया से विभिन्न शैलों की मोटाई तथा उनमें संग्रहित जल की रासायनिक गुणवत्ता का अनुमान किया जाता है। कभी-कभी भूकम्पीय (सिसमिक) तथा प्रभावित (इनड्यपस्ड) विद्युतवाह सर्वेक्षण भी रोधिता सर्वेक्षण के परिणामों को सम्पुष्ट करने के लिए किया जाता है। इन सर्वेण से प्राप्त आंकड़ों का निर्वचन जलभर शैलों के प्रसार उनकी मोटाई, जल पटल की गहराई, जल उपलब्धता तथा भूजल की रासायनिक गुणवत्ता आदि तथ्यों की जानकारी के लिए किया जाता है। उपरोक्त तथ्यों के पुष्टिकरण हेतु चयनित स्थानों पर परीक्षण या समन्वेषण नलकूप वेधन किया जाता है। इसके द्वारा प्रत्येक तल के जलभर शैलों की मोटाई, जल पटल की गहराई तथा भूजल उपलब्धता की मात्रा आदि संबंधित तथ्यों को निर्धारित किया जाता है। अधिक विस्तृत जानकारी हेतु नलकूप वेधन के उपरांत विद्युत लॉगिंग भी प्रायः की जाती है। भूजल उपलब्धता के सही आकलन, जल पटल उतार एवं कूप क्षमता का निर्धारण परीक्षण अथवा समन्वेषण नलकूप में पम्पिंग परीक्षण द्वारा किया जाता है।

अनाच्छादित कुएं (ओपन वेल्स)


कुआं एक ऐसी संरचना है जो कि जमीन में खुदाई से निर्मित होती है तथा जिसके द्वारा भूजल जमीनी सतह तक लाया जाता है। अनाच्छादित कुएं बड़े आकार के एवं परिधि के होते हैं तथा इनका निर्माण साधारण हाथ के औजारों जैसे कि फावड़ा, गैती आदि की सहायता से किया जाता है। मुख्यतया 4 प्रकार के कुएं उपयोग में आते हैं।

1. कच्चे कुएं (अनलाइंड वेल्स) - इस प्रकार के कुओं की दीवारों में किसी प्रकार की निर्माण सामग्री का उपयोग नहीं होता है। ये ठोस मिट्टी में बिना ढहे रह सकते हैं। जल पटल की गहराई तक यह अपेक्षाकृत चौड़े खोदे जाते हैं तथा उसके बाद ये संकरे रखे जाते हैं। यदि आवश्यक हो तो रंध्रों में रेती सामग्री से लाइनिंग की जाती है, जिसके द्वारा भूजल रिसकर कुएं में एकत्रित होता है। इस प्रकार के कुओं में सीमित मात्रा में भूजल होता है। इसे साधारण रूप से बाल्टी तथा रस्सी द्वारा निकाला जाता है।

2. पक्के कुएं (लाइंड वेल्स) - ऐसे कुएं सामान्यतः रेतीली तथा कमजोर शैल रचिताओं में बनाए जाते हैं। कुएं की दीवारों को ढहने से रोकने के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्रियों से लाइनिंग की जाती है। इनमें सामान्यतया सीमेंट, ईंटें, कंक्रीट आदि का प्रयोग होता है। कुओं की दीवारों में लाइनिंग के समय कुछ छिद्र दिए जाते हैं, जिसके द्वारा भूजल कुएं के भीतर एकत्रित होता है। कुएं का तल साधारणतया कच्चा ही छोड़ दिया जाता है। लेकिन विशेष परिस्थितियों में तल को भी पक्का किया जाता है।

3. सांचेदार कुएं (क्रेस्ड वेल्स) - ऐसे स्थलों में जहां जमीनी सतह के नीचे बहुत शिथिल एवं छिदनी संरचना हो तो वहां पर कुओं को धंसने से रोके बिना खोदना असंभव हो जाता है। पूर्वनिर्मित गोलाकार सीमेंट कंक्रीट तथा चिनाई कोठियों व जालियों को प्रायः ऐसे स्थलों में भारी वजन (रेतीले बोरे) आदि से दबा कर बिठाया जाता है। उनके अंदर से शिथिल व छिदनी मिट्टी लगातार निकालते रहने से ये कोठियां नीचे बैठती जाती है, इस प्रकार सांचेदार कुओं का निर्माण किया जाता है।

4. तल छिद्र कुएं (केविटी वेल्स) - इस प्रकार के कुओं का निर्माण ऐसे स्थलों पर होता है, जहां ऊपरी सतह में कठोर संरचनाएं, जोकि क्ले एवं कंकर आदि से निर्मित होती हैं, तथा अभेद्य होती हैं। इस कठोर सतह में बोरिंग की जाती है जिसके नीचे व्याप्त जल भर रचिताओं से भूजल प्राप्त होता है। निरंतर पम्पिंग के कारण इनमें केविटी का निर्माण हो जाता है। कठोर चट्टानों वाले क्षेत्रों में ऊपरी सतह काफी ऋतु क्षरित एवं दरार युक्त होती है। ऐसे स्थलों पर कुओं की साधारण औजारों से खुदाई की जाती है तथा कुएं की दीवारों में यदि कमजोर रचिताएं हों तो लाइनिंग की जाती है अथवा ऐसे ही छोड़ दी जाती है।

ऐसे स्थलों में जहां जल पटल अधिक गहरा नहीं होता एवं मिट्टी तथा जल भर रचिताओं के ढहने अथवा धंसने की समस्या नहीं होती, कुओं का निर्माण उपयुक्त होता है। इस प्रकार के कुओं द्वारा भूजल प्राप्ति सीमित ही होती है तथा इसकी गहराई जल पटल से अधिक नीचे करने पर महंगी तथा कठिन होती है। कम परिधि वाले एवं लगभग 30 मीटर गहरे कुएं राजस्थान प्रदेश के अधिकांश स्थानों पर पाए जाते हैं। इस प्रकार के कुओं का उपयोग पीने के पानी के लिए किया जाता है तथा इनका स्वामित्व सामुदायिक अथवा कृषकों के समूह द्वारा होता है। कम गहरे कुएं व्यक्तिगत स्तर पर निर्माण किए जाते हैं तथा पीने के पानी के साथ कभी-कभी कृषि के लिए उपयोग में लाए जाते हैं।

नलकूप


नलकूप निर्माण की विभिन्न प्रकार की विधियां प्रचलित हैं। किसी एक विधि का चयन मुख्यतया इन बातों पर निर्भर करता है - नलकूप निर्माण का उद्देश्य, अपेक्षित जल प्राप्ति, जल पटल की गहराई, जल भर रचिताओं की प्रकृति तथा जल मात्रा की उपलब्धियां। शिथिल एवं छिदरी रचिताओं वाले स्थानों पर कम गहराई तथा छोटे व्यास के नलकूप हाथों से अथवा हल्की मशीनों के द्वारा निर्मित किए जाते हैं। अपेक्षाकृत थोड़ी अधिक गहराई के नलकूप को बनाने के लिए केसिंग पाईप के अग्रभाग को शिथिल एवं छिदरी रचिताओं में दबाव द्वारा लम्बवत ढकेला जाता है।

जेटेड नलकूप :


जेटेड नलकूपों का निर्माण पानी की अत्यधिक उच्च दबाव वाली धार के द्वारा किया जाता है। दबाव वाली टाप ड्रिलिंग को केबल टूल परकशन भी कहा जाता है। इस विधि के अंतर्गत एक भारी नोकदार लोहे के उपकरण को बार-बार जोर से उठाया व गिराया जाता है। इस प्रहार के कारण रचिताओं को ढीला कर दिया जाता है तथा शैलों को तोड़ दिया जाता है। ये टूटी हुई और चूर-चूर हुई चट्टानों के अव्यय पानी में मिलकर कीचड़ सा बना देते हैं, जिसे बेलर द्वारा बाहर निकाल लिया जाता है। शिथिल तथा छिदरी रचिताओं में केसिंग पाइप भी साथ ही डाला जाता है। निश्चित गहराई तक छिद्रण करने के बाद इसमें जाली वाले तथा बिना जाली वाले पाईप असेंबली को उतार दिया जाता है तथा केसिंग को बाहर निकाल लिया जाता है, ताकि जल भर रचिताओं में भरा हुआ भूजल जाली वाले पाइपों के माध्यम से कूप में प्रवाहित होने लगता है।

आम्मस परिभ्रामी विधि (हाइड्रोलिक रोटेरी विधि) :


इस विधि में छिद्रण को मशीनों की सहायता से घुमाया जाता है ताकि वह जमीन में छेद कर सके। छिद्रण द्वारा निकली मिट्टी को बाहर निकालने के लिए जल अथवा छिद्रण द्रव्य प्रवाहित किया जाता है जो कि बरमे में से होकर प्रवेश करता है तथा कटे हुए शैलीय टुकड़ों को लेकर बाहर निकलता है तथा छिद्रण उपकरणों को ठंडा भी रखता है। छिद्रण द्रव्य चिकनी मिट्टी अथवा मुल्तानी मिट्टी का सम्मिश्रण होता है तथा इसका नलकूप की दीवारों में लेप हो जाता है। इस कारण नलकूप निर्माण विधि तक छिद्र पूर्णतया बिना ढहे अथवा धंसे यथास्थिति में रह पाता है। वाछिंत गहराई तक छिद्रण करने के बाद जाली वाले तथा बिना जाली वाले पाइपों को आपस में जोड़कर बनी असेंबली को नलकूप में उतारा जाता है। पाइपों और नलकूप छिद्र के बीच रिक्त स्थान में ग्रेवल भर दिया जाता है।

वायु परिभ्रामी विधि (एअर रोटेरी विधि) :


इस विधि द्वारा नलकूप वेधन आम्मस परिभ्रामी विधि जैसा ही होता है, लेकिन इसमें छिद्रण द्रव्य का प्रयोग नहीं होता है। कटे हुए शैल टुकड़ों को बाहर निकालने में तथा छिद्रण उपकरणों को ठंडा करने के लिए तेज हवा के दबाव का उपयोग किया जाता है। यह विधि कठोर और दरारों युक्त रचिताओं में नलकूप निर्माण के लिए बहुत उपयुक्त है। कभी-कभी ढहने वाली रचिताओं में सुगमतापूर्वक छिद्रण के लिए छिद्रण फोम का भी उपयोग किया जाता है।

नलकूप निर्माण के उपरांत नलकूप विकास की प्रक्रिया आरंभ की जाती है। यह आवश्यक है कि नलकूप निर्माण के तुरंत बाद छिद्रण द्रव्य, चिकनी मिट्टी सिल्ट तथा बहुत महीन कण आदि जाली वाली पाइपों के समीप से पूर्णतया निकल जाएं ताकि नलकूप से साफ पानी बिना मिट्टी कण लिए प्राप्त किया जा सके।

उद्धहन युक्तियां (लिफ्टिंग डिवाइसेस)


कुएं से पानी खींचने के परंपरागत तथा हाथों द्वारा काम लिए जाने वाली युक्तियों का पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है। आधुनिक समय में जल प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के पंप उपलब्ध हैं। उपयुक्त पम्प का चुनाव कुएं की क्षमता, अपेक्षित जल प्राप्ति, पावर की उपलब्धता उद्धहन शीर्ष (लिफ्टहेड) तथा लागत पर निर्भर करता है।

1. परिवर्ती विस्थापन पम्प (वेरीएबल डिस्प्लेसमेंट पम्प) : इन पम्पों का उन्मोधन, चूषण (सकशन) अनुभाग के प्रतिपानुपाती होता है। केन्द्रापग (सेंट्रीफ्यूगल) पम्पस, धार (जेट) पम्पस तथा वायु उद्धहन (एयर लिफ्ट) पम्पस इसी श्रेणी में आते हैं।

2. धनात्मक विस्थापन पम्पस (पोजीटिव डिस्प्लेसमेंट्स पम्प्स) : इन पंपों का उन्मोचन (डिस्चार्ज) गति पर निर्भर करता है। इस प्रकार के पम्पस कुओं से पानी खींचने में कम ही उपयोग में आते हैं, क्योंकि इनकी क्षमता बहुत कम होती है।

3. केंद्रापग (सेंद्रीप्यूगल) पम्पस : कुओं से पानी निकालने के लिए अधिकतर इसी प्रकार के पम्पों का उपयोग किया जाता है। यह दो प्रकार के होते हैं:

1. उथले कुओं के पम्प : क्षैतिज केंद्रापग प्रकार के पम्प उथले कुओं से पानी निकालने के लिए बहुतायत में प्रयोग में लाए जाते हैं। यह पंप के अंतरग्रहण भाग में निर्वायु परिस्थिति बना देते हैं जिसके कारण जलसतह पर वायुमंडल का दबाव पंप के अंदर पानी बढ़ा देता है। वायुमंडलीय दबाव पर आधारित होने के कारण इन पम्पों का लिफ्ट 7.5 मीटर से अधिक नहीं होता है।

2. गहरे कुओं के पंप : गहरे कुओं के वरीवर्त (टरबाइन) पंप में केंद्रापग इंपेलर्स की एक श्रेणी होती है जो कि पानी के अंदर रहती है। यह एक सीधी शॉफ्ट द्वारा शीर्ष जुड़ी रहती है। इस प्रकार के पम्पों के उपयोग के लिए यह आवश्यक होता है कि नलकूपों का व्यास अधिक हो तथा वे एकदम सीधे हों ताकि इम्पेलर्स शॉफ्ट आदि एकदम लम्बवत जुड़े रहें। इन पम्पों की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है।

3. सबमरसीबल पम्प : इस प्रकार के पम्पों में संपूर्ण असेम्बली बिजली की मोटर तथा पम्प जल पटल के नीचे स्थापित किए जाते हैं। यह कम व्यास वाले नलकूपों में भी लगाए जा सकते हैं तथा उन नलकूपों में काम आ सकते हैं जो कि एकदम सीधे न हों।

4. जेट पम्प : यह केंद्रापग पम्प ही हैं जिसमें इम्पेलर के मध्य जेट होती है इन पम्पों में पानी का परिचलन एक वेचुरी द्वारा होने से डिलीवरी दबाव काफी बढ़ जाता है।

5. एअरलिफ्ट पम्प : इस प्रकार के पम्पों में संपीडित वायु को डिस्चार्ज पाईप द्वारा कुएं में डाला जाता है। यह वायु पानी में मिलकर बुलबुले बना देती है तथा विशिष्ट गुरुत्वाकर्षण को कम कर देती है जिसके कारण पानी बाहर निकल आता है। इस प्रकार के पम्पों की क्षमता कम होती है तथा इनका उपयोग मुख्यतया नलकूप विकास के लिए किया जाता है।

मॉनीटरिंग


भूजल एक गतिशील स्रोत है। लेकिन यह असीमित नहीं है इसकी मात्रा तथा गुणवत्ता एक स्थान से दूसरे स्थान तथा जलवायु के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। जल पटल का उतार-चढ़ाव भूजल भंडारों में परिवर्तन को दर्शाता है। भूजल भंडारों में वर्षा उपरांत पुनर्भरण से तथा तालाबों, नहरों तथा सिंचाई से रिसाव द्वारा वृद्धि होने पर जल पटल ऊपर आ जाता है। इसी प्रकार भूजल भंडारों से पम्पों द्वारा पानी निकालने से तथा भूजल के बाह्य प्रवाह के कारण जल पटल में गिरावट हो जाती है। भूजल की रासायनिक गुणवत्ता में परिवर्तन भी भूजल भंडारों में होने वाले बढ़ोतरी अथवा कमी से प्रभावित होते हैं। भूजल पुनर्भरण के कारण लवणों की संक्रेद्रिता कम हो जाती है, जबकि अधिक पंपिंग से लवणों की सघनता में बढ़ोतरी हो जाती है। कई बार अधिक सिंचाई से जल रिसाव के कारण कई प्रकार के लवण भूजल स्रोतों तक पहुंच कर उनकी संकेद्रिता बढ़ा देते हैं तथा प्रदूषित जल के रिसाव के कारण भी भूजल भंडारों में लवणों की अधिकता हो जाती है।

किसी भी क्षेत्र में भूजल उपलब्धता में होने वाले परिवर्तनों पर दृष्टि रखने के लिए वहां प्रतिरूपित (रिप्रजेन्टेटिव) कुओं के व्यापक जाल का चयन किया जाता है। प्रतिरूपित या आधारभूत कुओं का चयन मुख्यतया इन बातों पर निर्भर करता है : 1. भूजल संभाव्य क्षेत्रों का विस्तारण। 2. जल भू-वैज्ञानिक एवं रसायनिक गुणवत्ता और 3. भूजल विकास की स्थिति। इन आधारभूत एवं प्रतिरूपित कुओं की समयानुसार मॉनीटरिंग होती है। इसके अंतर्गत जल पटल का मापन तथा भूजल नमूनों का संग्रहण सम्मिलित है। सामान्यतया ऐसे कुओं में वर्षा पूर्व, वर्षा उपरांत तथा सिंचाई के उपरांत काल में जल पटल मापन तथा भूजल नमूनों का संग्रहण किया जाता है। इन आंकड़ों के संकलन और विश्लेषण के आधार पर ही उस क्षेत्र में भूजल प्रबंधन किया जाता है।

भूजल स्तर मापन


भूजल स्तर का माप कुओं के ऊपर एक निश्चित स्थान से किया जाता है। भूजल स्तर मापने के लिए सामान्य फीता, विद्युत जल स्तर मापक यंत्र अथवा वायु लाइन का उपयोग होता है। फीते द्वारा भूजल स्तर मापन विधि सबसे अधिक प्रचलित है तथा यह एक परिशुद्ध विधि है। इस विधि में इस्पात अथवा मेटेलिक फीते के अग्र भाग में एक हल्के ठोस भार को बांध दिया जाता है। फीते को कुएं में लटकाया जाता है तथा अग्र भाग को जल स्तर के कुछ नीचे तक डाला जाता है। फिर ऊपर खींच लिया जाता है। फीते का चाक लगा अग्र भाग जल स्तर के नीचे तक गीला हो जाता है और यह स्पष्ट चिन्ह बना देता है। फीते को ऊपर से पकड़ने वाले माप से यह गीला चिन्हित माप घटाने पर परिशुद्ध जल स्तर का माप ज्ञात हो जाता है।

विद्युत जल स्तर मापक, नलकूपों एवं पीजो मीटर में उपयोग में लिया जाता है। इस यंत्र में एक एमीटर तथा बैटरी तारों के निम्न भाग में एक छोटा विद्युत द्वार (इलेक्ट्रोड) जुड़ा होता है। इलेक्ट्रोड का आंतरिक भाग खुला होता है तथा दोनों तारों के सिरे यहां वायु रिक्त में खुले होते हैं। कभी-कभी एक तार को बाहरी आवरण से तथा दूसरे इनसुलेटेड तार को केसिंग से जोड़ दिया जाता है। इस इलेक्ट्रोड को जब कुएं में उतारा जाता है तथा यह जैसे ही जल की सतह का स्पर्श करता है तो विद्यूत परिपथ पूर्ण हो जाता है और इस कारण एमीटर में सुई हिलने लगती है। तारों की केबल में प्रत्येक मीटर तथा सेंटीमीटर के निशान लगे होते हैं। इन्हें पढ़कर जल स्तर का मापन किया जाता है। वायु लाइन विधि द्वारा सामान्य छोटे व्यास के नलकूपों, जिनमें पाइप भी लगे होते हैं - जल स्तर मापन किया जाता है। इसके अंतर्गत एक छोटे व्यास के पाइप अथवा नली को कुएं के भीतर जल स्तर के नीचे कुछ मीटर तक उतारा जाता है। पंपिंग के समय जल स्तर में हुए परिवर्तन को मापने के लिए एक दबाव मापक को एक वायु नली के ऊपर लगा दिया जाता है। प्रारंभ में कुएं में तथा वायु नली में जलस्तर समान होता है। इसके बाद वायु को वायु नली से पम्प किया जाता है। जिसके दबाव से इस नली से जल बाहर निकल आता है। दबाव मापक में प्रारंभ का माप वायु नली में कालम की ऊंचाई को दर्शाता है। पंपा चलने के समय जल स्तर में होने वाले परिवर्तन दबाव मापक में रीडिंग द्वारा ज्ञात हो सकते हैं। भूजल स्तर का मापन किसी भी विधि से करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि कुएं में पंप द्वारा पानी निकाला गया है। अथवा कुछ समय से कुआं यथास्थिति में है। यदि मापन के कुछ पूर्व पानी पंप किया हुआ हो तो कुए के मालिक को पता कर लेना चाहिए कि पूर्व में कहां तक जल स्तर था कम गहरे कुएं में जल स्तर का कुएं की दीवारों पर गीलेपन के निशान से भी अनुमान लगाया जा सकता है।

भूजल प्राप्ति की संभावना की दृष्टि से समस्त राज्य को 594 संभावित क्षेत्रों में विभक्त किया गया है जो कि समूचे प्रदेश में विस्तारित हैं। इनका विभाजन कमांड तथा नॉन कमांड क्षेत्र के आधार पर भी किया गया है। जहां सतही जल स्रोत से, जैसे बांध, झीलों, नहरों आदि से सिंचाई होती है, वह कमांड क्षेत्र में तथा जो क्षेत्र पूर्णतया भूजल द्वारा ही सिंचाई पर आधारित है, नान कमांड क्षेत्र में आते हैं। प्रत्येक संभावित क्षेत्र में वार्षिक पुनर्भरण, जल निकास तथा जलराशि का गुणन किया जाता है, तथा इन आंकड़ों को पंचायत समिति तथा जिलेवार प्रस्तुत किया जाता है। भूजल उपलब्धता में मौसम के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं तथा इसका समुचित प्रबंधन भूजल पुनर्भरण एवं भूजल निकास के समायोजन पर आधारित होता है। इसके लिए लंबे समय तक मानीटरिंग की आवश्यकता होती है। इस उद्देश्य के लिए सन् 1984 से लगभग 6700 से भी अधिक आधारभूत एवं प्रतिरूपित कुओं का विस्तृत जाल पूरे राजस्थान में फैला है। प्रदेश के एल्यूवियल क्षेत्र में 45 वर्ग किलोमीटर में, ठोस एवं कठोर शैलीय क्षेत्र में 40 वर्ग किलोमीटर तथा कठोर आग्नेय एवं परिवर्तित शैलीय क्षेत्र के 35 वर्ग किलोमीटर में एक प्रतिरूपित कुआं चयनित है। इनमें प्रत्येक वर्ष दो बार वर्षा पूर्व एवं वर्षा उपरांत जल पटल मापा जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ चयनित पीजोमीटर तथा कुओं में प्रत्येक महीने तथा त्रैमासिक मानीटरिगं भी की जाती है। चयनित कुओं में समयानुसार जल पटल मापन के आंकड़े भूजल भंडारों में होने वाले परिवर्तन की सही तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। जल पटल में बढ़ोत्तरी भूजल भंडारों में पुनर्भरण को इंगित करती है जबकि जल पटल में गिरावट भूजल भंडारों से जल निकास के कारण कमी को दर्शाती है। दल पटल के बदलाव का मापन तथा इसकी रासायनिक गुणवत्ता में परिवर्तन का विश्लेषण, भूजल स्रोतों की मानीटरिंग कहलाती है। शुष्क तथा अर्धशुष्क क्षेत्र में जैसे कि राजस्थान प्रदेश में सतही जल स्रोत बहुत सीमित होते हैं अतः भूजल पुनर्भरण मुख्य रूप से वर्षा द्वारा ही होता है, थोड़ा बहुत सिंचाई के पानी के रिसाव द्वारा भी होता है। ऐसी स्थिति में जल पटल मापन चयनित कुओं में वर्षा एवं वर्षा उपरांत के साथ ही सिंचाई उपरांत के साथ ही सिंचाई उपरांत करने से महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इस उद्देश्य के लिए कुओं का मानीटरिंग वर्षा पूर्व काल में मध्य मई से जून तक, वर्षा उपरांत से अक्तूबर से नवंबर तक तथा सिंचाई उपरांत मार्च के महीनों में किया जाता है।

भूजल मात्रा


राजस्थान प्रदेश के 3.42 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र के लगभग 62% यानि 2.12 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में भूजल स्रोत उपलब्ध है। भूजल प्राप्ति के क्षेत्रों को आगे संभावित (पोटेन्शियल) क्षेत्रों में विभक्त किया गया है। यह संभावित क्षेत्र भूजलीय एवं रासायनिक गुणवत्ता के आधार पर विभक्त किए गए हैं। वर्तमान में जल विभाजन (वाटरशेड) तथा सूक्ष्म जल विभाजन को स्रोत मूल्याकंन के लिए इकाई माना जाता है। लेकिन पश्चिमी राजस्थान में जहां कि जलोत्सारण क्षेत्र अस्पष्ट होते हैं, यह आधार उपयोगी नहीं होता है।

भूजल प्राप्ति की संभावना की दृष्टि से समस्त राज्य को 594 संभावित क्षेत्रों में विभक्त किया गया है जो कि समूचे प्रदेश में विस्तारित हैं। इनका विभाजन कमांड तथा नॉन कमांड क्षेत्र के आधार पर भी किया गया है। जहां सतही जल स्रोत से, जैसे बांध, झीलों, नहरों आदि से सिंचाई होती है, वह कमांड क्षेत्र में तथा जो क्षेत्र पूर्णतया भूजल द्वारा ही सिंचाई पर आधारित है, नान कमांड क्षेत्र में आते हैं। प्रत्येक संभावित क्षेत्र में वार्षिक पुनर्भरण, जल निकास तथा जलराशि का गुणन किया जाता है, तथा इन आंकड़ों को पंचायत समिति तथा जिलेवार प्रस्तुत किया जाता है।

प्रतिरूपित कुओं के मॉनिटरिंग के अतिरिक्त अन्य आंकड़े जो कि भूजल भंडारों के मूल्यांकन के लिए आवश्यक होते हैं वे भी विभिन्न स्रोतों से इकट्ठे किए जाते हैं। वर्षा संबंधी तथा नहरों के कमांड क्षेत्र के आंकड़े सिंचाई विभाग से, पीने के पानी से संबंधित आंकड़े जन स्वास्थ्य अभियांत्रिक विभाग, फसलों एवं कृषि विभाग से, बिजली खपत संबंधित आंकड़े बिजली बोर्ड से एकत्रित किए जाते हैं। इन आंकड़ों का विश्लेषण तथा सत्यापन तहसील, पंचायत समिति तथा राजस्व विभाग से प्राप्त आंकड़ों के साथ किया जाता है। इन सभी आंकड़ों का विश्लेषण तथा निर्वचन केंद्रीय भूजल बोर्ड के साथ मिलकर किया जाता है। इसके बाद भूजल मूल्यांकन की राज्य स्तरीय समिति के समक्ष सभी विश्लेषित आंकड़ों तथा तथ्यों को प्रस्तुत किया जाता है। इस समिति में विभिन्न संदर्भित विभागों के प्रतिनिधि होते हैं। राजस्थान राज्य में प्रावेगिक (डाइनेमिक) भूजल स्रोतों का अनुमान सर्वप्रथम सन 1984 में किया गया था। इसके बाद प्रत्येक वर्ष इसकी गणना कर नवीनतम आंकड़ों को प्रस्तुत किया जाता है। सन् 1998 के भूजल स्रोतों का अनुमान निम्न प्रकार हैः

भूजल संभावित (1998) आंकड़े मिलियन क्यूबिक मीटर से


संकुल पुनर्भरण

12,602.15

सिंचाई विकर्ष

11,035.70

घरेलू विकर्ष

983.42

भूजल विकास की अवस्था

69.10%

खंडों का वर्गीकरण

 

सुरक्षित

135

अर्द्धकाष्ठा

34

काष्ठा एवं अतिशोषित

67

खारे (लवणीय)

1

 



क्षेत्रों का वर्गीकरण


केंद्रीय शासन द्वारा एक राष्ट्रीय स्तर की समिति का गठन किया गया था। इसे भूजल अनुमान समिति कहा गया है। इस समिति ने 1997 में भूजल अनुमान विधि तैयार की। इस समिति को मुख्य रूप से उस समय की भूजल अनुमान विधियों में आवश्यक परिवर्तन एवं संशोधन करने का काम दिया गया था। इस समिति ने भूजल उपलब्धता के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों के वर्गीकरण एवं नाम पद्धति के मानदंडों को भी संशोधित किया है। इस संशोधन के अुसार भूजल निर्धारण इकाइयों का निम्न प्रकार वर्गीकरण किया गया है।

i. सुरक्षित
ii. अर्द्धकाष्ठा
iii. काष्ठा
iv. अतिशोषित

यह वर्गीकरण किसी भी क्षेत्र के भूजल विकास की अवस्था तथा मानसून पूर्व एवं मानसून उपरांत के जल स्तरों के आंकड़ों पर आधारित है। किसी भी क्षेत्र अथवा इकाई की भूजल विकास अवस्था वहां के भूजल विकर्ष का तथा पुनर्भरण का अनुमान होता है तथा यह प्रतिशत में दर्शाया जाता है।

क्षेत्रों का वर्गीकरण


क्षेत्र का प्रकार

मानदंड

जलस्तर

विकास की संभावना

सुरक्षित

भूजल विकास की अवस्था 70 से कम अथवा बराबर या 90 से कम हो सकती है

मानसून पूर्व तथा मानसून उपरांत काल में गिरावट को दर्शाता है।

भूजल विकास की विफल संभावनाएं

अर्द्धकाष्ठा

भूजल विकास की अवस्था 70 से अधिक एवं 90 से कम

जल स्तर में किसी एक काल में मानसून पूर्व अथवा मानसून उपरांत में गिरावट

भूजल विकास की विफल संभावनाओं में सावधानी की आवश्यकता

काष्ठा

भूजल विकास की अवस्था 90 से अधिक एवं 100 से कम

जलस्तर मानसून पूर्व अथवा मानसून उपरांत में गिरावट

ऐसे क्षेत्रों में भूजल विकास की विफल संभावनाएं नगण्य होती है।

अतिशोषित

भूजल विकास की अवस्था 100 से अधिक

जलस्तर में मानसून पूर्व तथा मानसून उपरांत दोनों कालों में गिरावट

ऐसे क्षेत्रों में भूजल विकास का कोई अवसर नहीं होता, वरन ऐसे प्रबंध आवश्यक हैं, जिनसे पूनर्भरण बढ़े तथा भूजल विकर्ष नियंत्रित हो।

 



भूजल की गुणवत्ता


प्रकृति में उपलब्ध जल एकदम शुद्ध नहीं होता है। वर्षा जल में वायु तथा वातावरण से धूल के कण एवं कुछ अन्य द्रव्य गैस आदि घुल जात हैं। इस वर्षा जल के सतह पर आने के बाद यह मिट्टी चट्टानों तथा जैविक द्रव्यों के सम्पर्क में आता है। जल रिसाव के दौरान यही वर्षाजल सतह पर जड़ों के क्षेत्र में, अंर्तमध्य क्षेत्र में तथा संतृप्त क्षेत्र में प्रतिक्रिया करता हुआ अंततोगत्वा भूजल में परिणत हो जाता है। इस प्रकार भूजल में लवणों की सकेंद्रियता वर्षा जल की रासायनिक गुणवत्ता से प्रभावित होती है। जमीनी सतह पर जलभर रचिताओं एवं इनके ऊपर की परतों के जैविक तथा रासायनिक प्रक्रियाओं का प्रभाव भी भूजल गुणवत्ता को प्रभावित करता है। भूजल की रासायनिक गुणवत्ता इसमें घुलनशील पदार्थों पर ही निर्भर नहीं करती वरन् इन द्रव्यों के लाक्षणिक गुणों से भी प्रभावित होती है। मिट्टी तथा चट्टानों के द्वारा भूजल की गुणवत्ता में प्रभाव के अतिरिक्त स्थान एवं जलवायु में परिवर्तन भी इसको प्रभावित करते हैं।

जल की संरचना का निर्धारण उसके भौतिक तथा रासायनिक परीक्षणों के द्वारा होता है। जल की भौतिक गुणवत्ता निर्धारण के आधारभूत आंकड़े को जल के नमूनों की प्रयोगशाला में अथवा सर्वेक्षण के दौरान उसी स्थान पर आवश्यक उपकरणों द्वारा निर्धारित किया जाता है। भूजल नमूनों की संख्या का निर्धारण क्षेत्र की एकरूपता तथा अन्वेषण के उद्देश्य पर निर्भर करता है। भूजल नमूनों को सख्त रबड़ अथवा पॉलीथीन की साफ की हुई एक या दो लीटर की बोतलों में इकट्ठा किया जाता है। जल को इस प्रकार की बोतल में ऊपर तक भर दिया जाता है तथा सुनिश्चित किया जाता है कि बोतल में हवा के बुलबुले न रह पाए।

जल में घुलनशील संघटक विभिन्न उद्देश्यों के लिए उसकी उपयोगिता का निर्धारण करते हैं। खनिजों की मात्रा सीमा से अधिक पाए जाने से जल की गुणवत्ता पीने, कृषि तथा औद्योगिक खपत के लिए अनुपयोगी हो जाती है।

पीने के जल की उपयुक्तता


पीने का पानी एक साफ पारदर्शी तथा पीने में सुरुचिपूर्ण होना चाहिए। यह किसी भी प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया से तथा अघुलनशील अशुद्धियों से रहित होना चाहिए। सबसे आवश्यक यह है कि किसी भी रासायनिक संघटक की मात्रा निर्धारित मानदंडों के अनुकूल ही होनी चाहिए वरना वह जल पीने योग्य नहीं रहता। भारतीय आयुर्विज्ञान शोध परिषद (आई.सी.एम.आर.) ने पीने के पानी के लिए कुछ मानदंड निर्धारित किए हैं।

जल में घुले हुए सभी ठोस अवयवों के अंतर्गत वे सभी संघटक आते हैं, जो कि जल में विद्यमान होते हैं इनमें से यदि एक भी अनुज्ञेय सीमा से अधिक हो तो वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। जल में पूरे घुले हुए ठोस अवयवों तथा संपूर्ण कठोरपन (टोटल डिजाल्वड सालिड्स एवं हार्डनेस) की मात्रा उच्चतम सीमा से अधिक होने पर वह पीने योग्य नहीं रह जाता है। यह जल पाइपों तथा बर्तनों में परत जमा देता है। साबुन के साथ पूरा झाग नहीं देने के कारण साबुन का खर्चा बढ़ जाता है। जल में जब मैग्नेशियम फॉस्फेट के साथ संयुक्त होता है तो ऐसा जल पीने से दस्तावार प्रभाव होता है तथा आन्त्रशोध की समस्या भी हो सकती है। क्लोराइड की अधिकता वाला जल हृदय एवं यकृत की बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए हानिकारक होता है। नाइट्रेट की अधिकता विशेषकर नवजात शिशुओं के लिए बहुत घातक है। इसके कारण ‘मेथिमोग्लोबनेनिया’ बीमारी हो जाती है, जिसको अक्सर ‘ब्ल्यू बेबी’ कहा जाता है। इसमें शिशु एसफाइकिया के कारण मर जाता है।

जल में फ्लोराइड की मात्रा 0.5 मि.ग्राम प्रति लीटर हड्डियों तथा दांतों के एनामेल के लिए बहुत लाभदायक होती है, लेकिन 1.5 मि. ग्राम प्रति लीटर से अधिक होने पर दांतों पर दुष्प्रभाव तथा हड्डियों की बीमारियाँ हो जाती हैं।

द्रव्य

उच्चतम वांछनीय सीमा

अधिकतम अनुज्ञेय सीमा

पी.एच.

7.50-8.50

6.50-9.20

जल में घुले सभी लवण (टोटल डिजाल्ड सॉलिड्स)

500

1500

सम्पूर्ण कठोर पन CaCO3 (टोटल हार्डनेस)

300

600

कैल्शियम

75

200

मैग्नेशियम

50

150

तांबा (कॉपर)

0.5

1.5

लोहा (आयरन)

0.1

1.0

मैगनीज

0.1

0.5

क्लोराइड

250

1000

सल्फेट

250

400

नाइट्रेट

20

50

प्लोराइड

1.0

1.50

अविलता (टर्बीडीटी)

5 इकाई

25 इकाई

 



सभी इकाइयां मिलिग्राम प्रति लीटर, कठोरपन कैल्शियम कार्बोनेट के रूप में पी.एच. केवल संख्या में तथा अविलता जैकसन अविलता इकाई में..

शुष्क तथा अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में, जैसे कि राजस्थान प्रदेश में पीने के पानी की गुणवत्ता एक बड़ी समस्या है। पानी का खारापन तो काफी अधिक क्षेत्रों में है ही तथा जब इसमें नाइट्रेट तथा फ्लोराइड भी अधिक मात्रा में होते हैं तो पीने के पानी की समस्या और गंभीर हो जाती है। पश्चिम राजस्थान में मीठे पानी के स्रोत कम हैं तथा खारा पानी अधिक उपलब्ध है। बाड़मेर, जैसलमेर, नागौर, बीकानेर, गंगानगर एवं चुरू जिलों में खारे पानी के क्षेत्र 50% से 90% तक हैं, जबकि जोधपुर, पाली और जालौर जिलों में 20% से 40% तक हैं। मध्य राजस्थान में स्थित भीलवाड़ जिले में 25% से अधिक क्षेत्र में खारा भूजल ही उपलब्ध है। इसी प्रकार सीकर, झुन्झूनू एवं भरतपुर जिलों में 25% से 50% क्षेत्र में भी खारा भूजल उपलब्ध है।

जल में लवणों की घुलनशीलता को सामान्यतया प्रति इकाई भार द्वारा दर्शाया जाता है, यथा प्रति लीटर मिलीग्राम। जल में घुलनशील ठोस अवयवों को बहुधा प्रति सेंटीमीटर 25 डिग्री माइक्रोसीमेंस विद्युतीय चालकता के आधार पर भी दर्शाया जाता है (1000 माइक्रोसीमेंस सेमी लगभग 640 मिलीग्राम प्रति लीटर के बराबर होता है।) जैसे-जैसे जल में लवण की सांद्रता बढ़ती है, उसकी विद्युत चालकता भी उच्च होती जाती है। जल में घुलनशील कुल ठोस अवयवों के आधार पर जल को इस प्रकार दर्शाया जाता है:

स्वच्छ

1000 मिलीग्राम/लीटर से कम

हल्का खारा

1,000 से 3,000 मिलीग्राम/लीटर

खारा

3,000 से 10,000 मिलीग्राम/लीटर

अत्यधिक खारा

10,000 से 35,000 मिलीग्राम/लीटर

अत्यधिक कड़वा

35,000 मिलीग्राम/प्रति लीटर से अधिक

 



जल के अम्लीय या क्षारीय होने की अवस्था में हाइड्रोजन की घुलनशीलता का मान पीएच में मापा जाता है। 7 पीएच हो तो क्षारीय और अगर पीएच मान 7 से कम हो तो जल अम्लीय माना जाता है।

पाली, जालौर, सिरोही, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, सीकर तथा झुन्झूनू जिलों के काफी विस्तृत क्षेत्र में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मि.ग्रा. प्रति लीटर तक पाई जाती है। फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा 90 मि.ग्रा. प्रति लीटर नागौर जिले के बांका पट्टी क्षेत्र में पाई गई है। अजमेर, भीलवाड़ा, जयपुर एवं दौसा जिलों के कई छोटे-छोटे क्षेत्रों के भूजल में फ्लोराइड की काफी अधिक मात्रा पाई जाती है।

बाड़मेर, चुरू, नागौर, झुंझुनू जिलों में भूजल में नाइट्रेट की अधिकता मिलती है। इन जिलों के 50% से 75% क्षेत्रों में नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित मानदंडों से अधिक है। नागौर जिले की जायल पंचायत समिति में नाइट्रेट की अत्यधिक मात्रा 4750 मि.ग्रा. प्रति लीटर तक मिली है। गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर, जालौर एवं सिरोही जिलों के भूजल में भी नाइट्रेट की काफी अधिक मात्रा पाई जाती है।

उपरोक्त परिस्थितियों में पीने की गुणवत्ता के निर्धारित मानदंडों की सीमा में कुछ ढील दी गई है। पश्चिमी राजस्थान में जहां खारे पानी की अधिकता है, पूरे घुले हुए ठोस लवणों की अधिकतम सीमा 3000 मि. ग्रा. प्रति लीटर है, पूर्वी राजस्थान में यह 2000 मि. ग्रा. लीटर है। परंतु ऐसे किसी भी संघटक की सीमा में कोई ढील नहीं है, जिनकी अधिकता से स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव होता है।

तत्व

अधिकतम अनुज्ञेय सीमा मिली.ग्रा./प्रति लीटर में

आरसेनिक

0.05

केडमियम

0.01

सायनाइड

0.05

सीसा

0.10

पारा

0.001

 



पशुधन के पीने के पानी के लिए पूरे घुलनशील ठोस लवणों की अधिकतम मात्रा 6000 मि.ग्रा./लीटर तक निर्धारित की गई है जबकि ऐसा देखा गया है कि भेड़े लगभग 10,000 मि.ग्रा. लीटर तक के घुलनशील ठोस लवणों वाला पानी भी पी लेते हैं। भूजल में बीमारियाँ फैलने वाले जैविक अवयव बहुत अधिक पाए जाते है क्योंकि बैक्टीरिया आदि जल भर रचिताओं में बहुत अधिक दूर तक प्रवाहित होने से नष्ट हो जाते हैं। भूजल में प्रदूषण अधिकतर स्रोत जो कि सतही जल से किन्ही दरारों, तरेड़ अथवा घुलनशील छिद्रों के द्वारा सीधे ही जुड़े हों, ऐसी स्थिति में, सतही जल का प्रदूषण भूजल को दूषित कर देता है। पीने के पानी की पाईपलाइनों में रिसाव, अथवा गंदे पानी के निकास की अनियोजित प्रणाली भी भूजल के प्रदूषण का कारण बन जाती है।

मानवीय गतिविधियाँ भी भूजल की प्राकृतिक गुणवत्ता में परिवर्तन कर उसे बिगाड़ देती है। जैसे कि जब भी कुओं से पानी बहुत अधिक मात्रा में पंप किया जाता है तो खारे पानी का बहाव मीठे पानी के स्रोतों की ओर होने लगता है। फलस्वरूप, कालांतर में खारा पानी मिलने लगता है। जमीनी सतह पर उथले खड्डों जैसे सेप्टिक टैंक अथवा खनन द्वारा छोड़े गए खड्डों आदि में गंदे पानी का जमाव अंततः भूजल को प्रदूषित कर देता है। खेतों में रासायनिक खाद का अत्यधिक उपयोग करने के बाद भी बहुत से लवण खेतों में पड़े रह जाते हैं तथा यही लवण सिंचाई के पानी अथवा वर्षा जल के रिसाव के द्वारा भूजल में मिलने लगते हैं और फिर उसकी गुणवत्ता को बिगाड़ देते हैं। भूजल प्रदूषण जल प्रबंधन की एक गंभीर समस्या है। राजस्थान के अधिकतर आबादी क्षेत्रों में जहां सीवेज के पानी का योजनाबद्ध निकास नहीं है तथा औद्योगिक इकाइयों से निकले दूषित व हानिकारक जल को बिना उपचार किए ही खुले क्षेत्रों में छोड़ दिया जाता है, वहां प्रदूषण की समस्या बहुत गंभीर है। इस समस्या के समाधान के लिए यह आवश्यक है कि प्रदूषण संबंधी नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, जिनका कि जनसाधारण में जल प्रदूषण के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण, आसानी से उल्लंघन किया जाता है।

कृषि के लिए उपयोगिता


कृषि के लिए उपयोग में आने वाले भूजल में कई प्रकार के तत्व होने आवश्यक है। हालांकि विभिन्न प्रकार के तत्व व लवण पेड़-पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक होते हैं, परंतु कुछ एक यदि जरा-सी भी मात्रा में हों तो वे पेड़-पौधों के लिए नुकसानदायक होते हैं। कृषि के लिए भूजल की उपयोगिता उसमें घुले हुए ठोस लवणों की मात्रा, मिट्टी का जलोत्सारण तथा फसलों की लवण सहिष्णुता की क्षमता पर निर्भर करती है।

औद्योगिक उपयोगिता


जल की औद्योगिक उपयोगिता अलग-अलग औद्योगिक इकाइयों में जल की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित की जाती है। साधारणतया बॉयलर्स तथा भाप बनाने के लिए उपयोग में आने वाले पानी में कठोरपन नहीं होना चाहिए ताकि परतें नहीं बन पाएं। ठंडा करने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले पानी में भी परतें नहीं जमने तथा धातुओं में क्षरण नहीं करने वाली गुणवत्ता का होना आवश्यक है। अधिक विस्तृत जानकारी के लिए जल के औद्योगिक उपयोग के मानदंड तालिका की जानकारी कर लेना आवश्यक है।

जल की गुणवत्ता के विचारधीन वर्ग


मृदा के प्रकार

बोने वाली फसलें

अनुज्ञेय लवण स्तर 10 क्यूब scm-1

गहरी काली तथा बलुई मिट्टी जिसमें चिकनी मिट्टी 50% हो तथा अच्छा जलोत्सारण हो

अर्द्ध लवण-सहिष्णु लवण लवण सहिष्णु

> 1500

भारी वयन मृदा जिसमें चिकनी मिट्टी 20.305 हो तथा जिसमें आंतरिक एवं बाह्य स्तर पर जलोत्सारण अच्छा हो

अर्द्ध लवण-सहिष्णु लवण सहिष्णु

2000/4000

मध्य वयन मृदाएं, जिसमें चिकनी मिट्टी 10-20% तथा आंतरिक एवं बाह्य स्तरीय जलोत्सारण अच्छा हो

अर्द्ध लवण-सहिष्णु लवण सहिष्णु

4000/6000

हल्की वयन मृदाएं, जिसमें चिकनी मिट्टी 10% से कम तथा आंतरिक एवं बाह्य जलोत्सारण अच्छा हो

अर्द्ध लवण-सहिष्णु लवण सहिष्णु

6000/8000

 



टिपण्णी


1. उपरोक्त वर्गीकरण इस धारणा पर आधारित है कि वर्ष में कभी भी जल पटल सतह से 1.5 मीटर तक नीचे न हो, यदि जल पटल जड़ों के क्षेत्र तक बढ़ जाता है तो लवण स्तर की सीमा आधी रह जाएगी।

2. यदि मृदा का आंतरिक जलोत्सारण, कठोर तल अत्यधिक चिकनी मिट्टी अथवा अन्य आकृतिक कारणों से बाधित हो तो उपरोक्त लवण स्तर की सीमा आधी रह जाएगी।

3. यदि जल में 70 प्रतिशत तक सोडियम लवण घुले हों तो कभी-कभी मिट्टी में जिप्सम मिलाते रहना चाहिए।

4. यदि किसी क्षेत्र में नहरों द्वारा अतिरिक्त सिंचाई का पानी उपलब्ध हो तो वहां कमजोर मानसून काल में अधिक लवणीय भूजल का उपयोग भी किया जा सकता है। 90 से अधिक सोडियम लवण युक्त भूजल मिट्टी की गुणवत्ता तथा वयन को बहुत नुकसान पहुँचाता है। इसके कारण मृदा की पारगम्यता समाप्त हो जाती है तथा गंभीर जलोत्सारण समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसके कारण पेड़ों के फलने-फूलने में कठिनाई हो जाती है। 70 से अधिक सोडियम लवण होने पर क्षारीय समस्याएं भी हो जाती है। रेसीडुअल सोडियम कार्बोनेट (आर.एस.सी.) की पानी में मात्रा भी कृषि उपयोगिता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसकी मात्रा को मिली इक्विलेंट प्रति लीटर में दर्शाया जाता है। यदि जल में आर.एस.सी की मात्रा 2.50 मिली. इक्विलेंट प्रति लीटर हो तो यह कृषि के लिए सुरक्षित होती है। बोरोन भी पेड़ पौधों के लिए एक आवश्यक तत्व है, परंतु यदि इसकी मात्रा 1.00 मि.ली. इक्विलेंट प्रति लीटर से अधिक हो तो हानिकारक हो सकता है।

प्रबंध एवं नियमन


भूजल के उचित विकास और दीर्घकालीन प्रबंध के लिए यह आवश्यक है कि जन प्रतिनिधियों द्वारा भूजल के नियंत्रण एवं उपयोगिता के संबंध में उचित नियम बनाए जाएं तथा उनका सख्ती से पालन किया जाए। राजस्थान में जल की उपयोगिता की मांग अत्यधिक बढ़ जाने के कारण भूजल का असीमित दोहन होने लगा है। इस कारण भूजल का स्तर लगातार गहरा होता जा रहा है। प्रदेश में राजस्थान भूजल नियमन कानून (1997) तैयार किया गया है।

इसके अंतर्गत निम्न बिंदु प्रस्तावित हैं:

i. जिला स्तर पर भूजल दोहन का नियंत्रण एवं नियमन करने के लिए सक्षम अधिकारी का गठन,
ii. ऐसे क्षेत्र ‘अधिसूचित (नोटिफाइड) क्षेत्र’ घोषित करना, जहां जल स्रोत पर अधिक पम्पिंग से दुष्प्रभाव पड़ता है,
iii. ऐसे क्षेत्रों में सभी कुओं की पंजीकरण करना
iv. अधिसूचित क्षेत्र में पानी निकालने एवं उपयोग करने के लिए अनुमति प्रदान करना,
v. भूजल दोहन को प्रतिबंधित एवं सीमित करना,
vi. आवश्यकता पड़ने पर केवल पीने के पानी के लिए ही कुओं के निर्माण की अनुमति देना।

भूजल उपयोग के संबंध में प्रस्तावित विधेयक का प्रारूप सरकार के समक्ष अनुमोदनार्थ है परंतु इसको लागू करने से पूर्व महत्वपूर्ण संशोधन करने की आवश्यकता है। यद्यपि इससे संबंधित कानून विधानसभा में पारित हो भी जाता है तब भी इसको लागू करने में कठिनाइयां आ सकती हैं। इसलिए इसे लागू करने से पूर्व कई प्रकार की तैयारियाँ करना आवश्यक है। इनमें से कुछ प्रमुख हैं:

i. जन मानस को भूजल की महत्ता और कमी तथा अनियंत्रित एवं अत्यधिक दोहन के दूरगामी परिणामों के संबंध में जागरूक करना,
ii. भूजल के न्यायोचित प्रबंध के बारे में लोगों को विस्तृत रूप से बताना तथा अधिकाधिक जानकारी देना,
iii.प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों द्वारा व्यापक जागरूकता तथा जन मानस को इस प्रकार जल प्रबंध कार्यक्रम में उत्साहित सम्मिलित करना जो कि उनके स्वयं के हित में हो एवं
iv. ऐसे सुधार वाले कार्यक्रम अपनाना, जिनके द्वारा संरक्षण, कृषि कार्यों में जल की बचत करने के लिए साधन अपनाना, जल की उपलब्धता के अनुसार फसलों का चयन, औद्योगिक तथा सीवेज जल का शुद्धिकरण कर पुनः उपयोग में लेना तथा भूजल पुनःपूरण को बढ़ाने के लिए जल संरक्षण की संचरनाओं का निर्माण करना आदि आवश्यक है।

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