रोशनी के लिए जतन

Submitted by admin on Sun, 02/23/2014 - 16:02
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जनसत्ता (रविवारी), 23 फरवरी 2014
आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत के सवा सात करोड़ परिवार आज भी अपने घरों का अंधेरा भगाने के लिए मिट्टी के तेल पर निर्भर है। इस अंधेरी दुनिया को रोशनी देने के लिए शाश्वत ऊर्जा और वैकल्पिक स्रोतों से मदद ली जाए तो यह काम कठिन नहीं है। इस बारे में बता रहे हैं भारत डोगरा।

भारत में अक्षय ऊर्जा के माध्यम से ऊर्जा क्षेत्र के विकेंद्रित विकास को पंचायतराज के सशक्तीकरण के साथ भली-भांति जोड़ा जा सकता है। सशक्तीकरण का अर्थ केवल यह नहीं है कि पंचायत प्रतिनिधियों के चुनाव हों, बल्कि इसकी बड़ी सार्थकता तो इसमें है कि ऊर्जा, कृषि वगैरह महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विकास की नई रचनात्मक सोच सामने आए। इससे लोग जुड़ सकें और अपनी जरूरतों के अनुकूल और आत्म-निर्भरता बढ़ाने वाले विकास की ओर बढ़ा जा सके। इस तरह परंपरागत ज्ञान और जानकारी को रचनात्मक तरीकों से जोड़ा जा सकता है ताकि आज जो संभावना उपलब्ध है उसका बेहतर से बेहतर उपयोग हो। जहां देश के महानगरों में बिजली की खपत तेजी से बढ़ी है, वहां दूर-दूर के अनेक गाँवों में बिजली या तो आज तक पहुंची ही नहीं है। या पहुंच कर भी अक्सर गायब रहती है। हालांकि, केंद्र सरकार ने कहा है कि पिछली गलतियों से सीखते हुए वह आगे ग्रामीण विद्युतीकरण को सुधारना चाहती है। लेकिन बिजली उत्पादन को देखते हुए दूरस्थ गाँवों और बस्तियों को रोशन कर पाना कठिन है। इस स्थिति में भारतीय गाँवों में वैकल्पिक और शाश्वत ऊर्जा स्रोतों के बेहतर उपयोग से दूर-दूर के गाँवों और बस्तियों को जगमग करने की संभावना का पूरा उपयोग करना चाहिए।

वैसे तो शाश्वत या अक्षय या रेन्यूबल ऊर्जा स्रोतों के बेहतर उपयोग छोटे बड़े शहरों और कस्बों में हर जगह हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हें विशेष तौर पर उपयोगी माना जा रहा है। शाश्वत ऊर्जा स्रोत कोयले और तेल की तरह निरंतर कम या समाप्त होने वाले नहीं है। यह सदा के लिए उपलब्ध है। मुख्य शाश्वत ऊर्जा स्रोतों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, सूक्ष्म स्तर और बहती नदी की पनबिजली, बायोगैस, बायोमॉस वगैरह को गिना जाता है, हालांकि कुछ अपेक्षाकृत नए अक्षय ऊर्जा स्रोतों का भविष्य में अधिक उपयोग होने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है। मंगल टरबाइन जैसे नए उपकरणों का पानी लिफ्ट करने के लिए उपयोग भी इस दिशा में ही एक कदम है।

किसी पंचायत या ब्लाक स्तर पर अगर अक्षय ऊर्जा का बेहतर से बेहतर नियोजन हो तो इसके विभिन्न स्थानों की नजर से और स्थितियों के अनुसार विभिन्न अक्षय ऊर्जा स्रोतों का बेहतर से बेहतर उपयोग हो सकता है। इसे ग्रामीण विकेंद्रित अक्षय ऊर्जा पद्धति कहा जा सकता है, जिसमें गांववासियों के प्रशिक्षण और रचनात्मक भागेदारी से आगे बढ़ने की बहुत संभावना है।

जीवाश्म ईंधन (जैसे पेट्रोल-डीजल और कोयले) से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है और इन गैसों के उत्सर्जन से जलवायु बदलाव का संकट बढ़ता है। इसलिए जैसे-जैसे जलवायु बदलाव का संकट बढ़ेगा तो अक्षय ऊर्जा स्रोतों की ओर झुकाव होगा, इनकी तकनीकों में सुधार होगा और इनका खर्च कम होगा, ऐसी उम्मीद है। इन परिस्थितियों में अक्षय ऊर्जा स्रोतों के भविष्य को उज्जवल माना जा रहा है। ऐसा नहीं है कि इनके साथ कोई समस्या नहीं जुड़ी है, पर ऋण-धन जोड़कर यही सामने आता है कि यह अक्षय ऊर्जा स्रोत ही भविष्य के महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत हैं और इनकी तकनीकी को समय रहते विकसित किया गया तो भविष्य के लिए यह बहुत लाभदायक सिद्ध होगा। विश्व स्तर पर जर्मनी जैसे कुछ देशों ने अक्षय ऊर्जा स्रोतों में तेज प्रगति का अच्छा उदाहरण सामने रखा है जिससे पर्यावरणीय खतरों वाले ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर अक्षय ऊर्जा को अधिक महत्वपूर्ण स्थान मिला है।

भारत में अक्षय ऊर्जा के माध्यम से ऊर्जा क्षेत्र के विकेंद्रित विकास को पंचायतराज के सशक्तीकरण के साथ भली-भांति जोड़ा जा सकता है। सशक्तीकरण का अर्थ केवल यह नहीं है कि पंचायत प्रतिनिधियों के चुनाव हों, बल्कि इसकी बड़ी सार्थकता तो इसमें है कि ऊर्जा, कृषि वगैरह महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विकास की नई रचनात्मक सोच सामने आए। इससे लोग जुड़ सकें और अपनी जरूरतों के अनुकूल और आत्म-निर्भरता बढ़ाने वाले विकास की ओर बढ़ा जा सके। इस तरह परंपरागत ज्ञान और जानकारी को रचनात्मक तरीकों से जोड़ा जा सकता है ताकि आज जो संभावना उपलब्ध है उसका बेहतर से बेहतर उपयोग हो।

मंगल टरबाइनउदाहरण के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक गाँवों में पनचक्कियों के विकास की अच्छी संभावना है। अनेक पर्वतीय गाँवों में पहले यहां नदी-नालों पर बनने वाली पनचक्कियों की बहुत उपयोगी भूमिका थी। आटा पीसने में विशेषकर उनका बहुत अच्छा उपयोग होता था, पर कुछ समय से यह उपेक्षित पड़ी हैं। यहां के जानकार लोगों ने बताया कि आज भी इनकी उपयोगी भूमिका हो सकती है और धीरे-धीरे इनसे छोटे स्तर का या सूक्ष्य पनबिजली उत्पादन भी जोड़ा जा सकता है। इसमें काफी रोजगार सृजन होगा और किसी दुष्परिणाम की संभावना न्यूनतम है। यह पर्वतीय क्षेत्र में बड़े बांध बनाने के अतिकेंद्रित उस मॉडल से बहुत अलग है जिसके अतिहानिकारक सामाजिक और पर्यावरणीय दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

जब ग्राम सभा में ऐसी पनचक्की और छोटी पनबिजली की योजना तैयार होगी तो जरूरी बात है कि किसी भी दुष्परिणाम से बचने का और खर्च कम करने का पूरा ध्यान रखा जाएगा। इस तरह लाखों लोगों की समझ का पूरा लाभ उठाते हुए बेहतर से बेहतर योजना बनेगी। इस तरह हजारों परियोजनाओं को जोड़कर काफी बिजली उत्पादन हो जाएगा जो सीधा गांववासियों की जरूरत पूरी करेगा।

यही विकेंद्रित मॉडल की खूबसूरती है कि यह लाखों गांववासियों को अपने क्षेत्र की बेहतर समझदारी का भरपूर उपयोग करने का अवसर देता है। इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान राजस्थान के तिलोनिया स्थित बेयरफुट कॉलेज ने दिया है। बेयरफुट कॉलेज ने सौर ऊर्जा को बहुत दू-दूर के गाँवों में फैलाया है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस कार्य की जिम्मेदारी कम औपचारिक शिक्षा प्राप्त गांववासियों ने ही संभाली है।

इस क्षेत्र में बेयरफुट कॉलेज के सफल प्रयोगों से यह संभावना उत्पन्न होती है कि विकेंद्रित अक्षय ऊर्जा के मॉडल में गांववासियों की प्रतिभा का भरपूर उपयोग करने के और बहुत सा रोज़गार सृजन करने के अवसर उपलब्ध हैं। अगर बेयरफुट कॉलेज के यह उदाहरण हमारे सामने न होते तो ऐसे बहुत से कार्यों को गांववासियों को दूर रखा जाता, जिन्हें कुछ तकनीकी प्रशिक्षण के बाद वे भली-भांति कर सकते हैं। सौर ऊर्जा के संदर्भ में सफल हुए इस तिलोनिया मॉडल को अनेक अन्य अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी अपनाया जा सकता है। तिलोनिया मॉडल के विपरीत वह मॉडल है जहां कोई बड़ी कंपनी आती है और सौर ऊर्जा (या कोई अन्य पद्धति) गांव में लगाकर चली जाती है इससे न तो गांववासियों को रख-रखाव का प्रशिक्षण मिलता है, न व्यापक स्तर पर रोजगार सृजन होता है और सदा गांववासियों की निर्भरता बनी रहती है। दूसरी और तिलोनिया मॉडल आत्म निर्भरता, रोजगार के अवसर और ज्ञान-विज्ञान का प्रसार बढ़ाता है और इस मॉडल को ही अपनाना चाहिए।

सौर उपकरण तैयार करते प्रशिक्षुहिमालय में अत्यधिक ठंड की मार झेलते अनेक गांव के वृद्धों ने केवल अंधेरी रातें ही देखी थीं, जिनमें रोशनी के नाम पर किरासिन तेल या मोमबत्ती का मद्धिम प्रकाश मात्र ही जलता था। उन्होंने कभी उम्मीद ही न की थी कि उनके घरों में रातें रोशन भी होंगी। जब बेयरफुट कॉलेज के प्रशिक्षित इंजीनियरों ने ऐसा मुमकिन कर दिखाया तो गांव के बड़े-बूढ़ों की आंखें खुशी से चमक उठीं।

सेवांग दोर्जे ने सौर ऊर्जा को लद्दाख में ले जाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने बताया कि इन गाँवों में लोगों को किरासिन तेल के लिए दुर्गम-कठिन पहाड़ी रास्तों पर मीलों चलना पड़ता था। लेकिन जब उन्होंने खुद देखा कि बिना किरासिन तेल के उनके घर प्रकाश से जगमग कर रहे हैं तो वे भाव-विह्वल हो उठे।

दोर्जे ने तपाक से यह भी बताया कि इस काम के क्रम में उन्हें दलाई लामा से मिलने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ और तो और, दलाईलामा ने उनके काम की मुक्त कंठ से प्रशंसा भी की। इतनी सफलता के बाद अब इस प्रयास का आगे भी विस्तार हुआ और बेयरफुट सोलर इंजीनियर के प्रशिक्षण कार्य को दूसरे देशों में भी पहुंचाने का काम शुरू हुआ। तिलोनिया कॉलेज का परिसर प्रशिक्षण केंद्र बना। अफ्रीका और एशिया से आई कई महिलाएं (जिनमें कई उम्रदराज थीं) प्रशिक्षण लिया।

इसमं चाद, सियरालोन, जांबिया, नांबिया, केन्या, तंजानिया से आई महिला प्रशिक्षुओं ने हिस्सा लिया था।

इन महिलाओं ने भाषा की अड़चन के बावजूद काफी कुछ सीखा। इन महिलाओं के आत्म-विश्वास में प्रशंसनीय वृद्धि हुई है और प्रशिक्षण से इन्हें बड़ा लाभ मिला है।

अब यह सौर ऊर्जा कार्यक्रम काफी दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच गया है। भारत के कई राज्यों और तीन महाद्वीपों के बीस देशों में यह फैल चुका है। पिछले चौबीस वर्षों में 16,000 से ज्यादा स्थाई सोलर इकाइयां, 9,500 सोलर लालटेन, 70 वाटर हीटर और 60 पैराबॉलिक कुकर तैयार किए जा चुके हैं और 770 गाँवों में स्थापित किए जा चुके हैं। साथ ही 480 जमीन स्तर के सोलर इंजीनियर भी प्रशिक्षित किए जा चुके हैं, जिनमें आधा से ज्यादा महिलाएं हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध रचनात्मकता का एक बड़ा उदाहरण मंगल टरबाइन के रूप में सामने आया है। हमारे देश में लाखों किसान बहते नदी-नालों से अपने खेत की सिंचाई करने के लिए डीजल पंप सेट से पानी उठाते हैं। अनेक गाँवों में पेयजल के लिए या अन्य उपयोग के लिए भी इस तरह पानी उठाया जाता है। इस डीजल पर किसानों का बहुत पैसा खर्च होता है और प्रदूषण होता है सो अलग।

सौर चूल्हा बनाती महिलाएंललितपुर जिले के एक किसान और ग्रामीण वैज्ञानिक मंगल सिंह ने किसानों की इस समस्या को समझा और मंगल टरबाइन बना कर ऐसी व्यवस्था संभव की कि बिना डीजल और बिजली के ही पानी उठाकर प्यासे खेतों तक पहुंचाया जा सके। अपने इस पेटेंट प्राप्त आविष्कार के बारे में मंगल सिंह ने बताया कि मंगल टरबाइन गांव में ही बनने वाली ऐसी मशीन है, ग्रामीण तकनीकी है जो बहती हुई जल धारा से चलती है। एक आवश्यकता के अनुरूप छोटा बड़ा पहिया बनाते हैं जिसे एक चक्कर बढ़ाने वाले गेयर बॉक्स से जोड़ते हैं जिससे इंजन मोटर की भांति तेजी से चक्कर बनते हैं। गेयर बॉक्स की शाफ्ट के दूसरे सिरे पर पुल्ली लगाकर कुट्टी मशीन, आटा चक्की, गन्ना पिराई या कोई भी अन्य कार्य कर सकते हैं या जनरेटर जोड़ कर बिजली बना सकते हैं। आम तौर पर ग्रामीण इलाकों में जहां किसान नदी नालों से डीजल या बिजली पंपों से सिंचाई करते हैं वहां मंगल टरबाइन द्वारा बिना इंजन, बिना मोटर, बिना डीजल, बिना बिजली के सिंचाई करते हैं। पाइप के जरिए पानी कहीं भी ले जा सकते हैं। पीने के लिए भी पानी पंप कर सकते हैं। मंगल टरबाइन का उपयोग अगर उन सभी स्थानों पर किया जाए, जो इसके अनुकूल हैं तो इससे करोड़ो लीटर डीजल की बचत प्रतिवर्ष हो सकती है और किसान का खर्च भी बहुत कम हो सकता है। साथ ही प्रदूषण, विशेषकर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होगा।

मंगल टरबाइन को सिंचाई और कुटीर उद्योगों के लिए वरदान बताते हुए आईआईटी, दिल्ली और विज्ञान शिक्षा केंद्र के एक अध्ययन ने बताया है कि बुंदेलखंड क्षेत्र के एक जिले में एक हजार मंगल टरबाइन लग सकती है और एक लाख हेक्टेयर के आस-पास भूमि इससे सिंचित हो सकती है।

अगर राष्ट्रीय स्तर पर अनुमान कुछ कम भी लगाया जाए और प्रति मंगल टरबाइन सौ एकड़ के आसपास की भूमि की सिंचाई की संभावना को ही माना जाए तो भी स्पष्ट है कि पूरे देश में एक करोड़ एकड़ से अधिक भूमि की सिंचाई में मंगल टरबाइन को योगदान मिल सकता है। इस तरह डीजल की खपत में बहुत कमी लाकर किसान का खर्च कम किया जा सकता है और देश की विदेशी मुद्रा भी बचाई जा सकती है। अगर एक मंगल टरबाइन दिन में 11 घंटे चले तो (25 अश्वशक्ति डीजल पंप की 4 लीटर प्रति घंटे की खपत के आधार पर) दिन में 44 लीटर डीजल की बचत हो सकती है। वर्ष में 190 दिन सिंचाई हो तो एक मंगल टरबाइन से वर्ष में 8360 लीटर (44 गुणा 190) डीजल की बचत होती है। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भी कमी आएगी। ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कमी विश्व का पर्यावरण बचाने के लिए तो जरूरी है ही, साथ ही इसमें उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने पर देश अधिक अंतरराष्ट्रीय सहायता का हकदार भी बनता है। इस तरह मंगल टरबाइन के सभी उचित और अनुकूल स्थानों पर विभिन्न सावधानियों के साथ उपयोग होने से किसानों, सरकार पर्यावरण सभी का लाभ है। इसके लिए विभिन्न स्थानों पर अक्सर मामूली से निर्माण कार्य का चेक डैम बनवाना पड़ता है, जो सरकार वैसे भी विभिन्न परियोजनाओं के अंतर्गत बनवा रही है। इसलिए इसका विशेष अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा। पूरी तकनीक ऐसी है जो गांव स्तर पर अपनाई जा सकती है और इससे गाँवों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन भी होगा।

ग्रीनपीस संगठन ने अक्षय ऊर्जा के विकेंद्रीकृत विकास का एक माडल विकसित किया है जिससे विशेषकर और गाँवों की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में विशेष सहायता मिलेगी। ‘ग्रीनपीस’ ने विशेषकर बिहार के संदर्भ में दिए गए अपने अनुसंधान-अध्ययन में बताया है कि वर्तमान केंद्रीकृति ऊर्जा व्यवस्था में गाँवों से बहुत अन्याय हो रहा है और उनकी बिजली की जरूरतें कम पूरी हो पाती हैं। इसलिए विभिन्न क्षेत्रों की संभावनाओं के आधार पर अगर वहां तरह-तरह के ऊर्जा के अक्षय स्रोतों को विकसित कर इससे गांववासियों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया जाए तो इसके बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। ‘ग्रीनपीस ने ऐसी सफलता के कई उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जिनमें कहीं सौर ऊर्जा से तो कहीं चावल की व्यर्थ जा रही भूसी से बनने वाली बिजली से अनेक जरूरतमंद गांववासियों की बिजली की जरूरतें पूरी की गईं।’

‘ग्रीनपीस’ के अध्ययन ने बताया है कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा मॉडल विशेष रूप से उपयुक्त है, जो सौर ऊर्जा, माइक्रो हाइड्रो, बायोमास वगैरह पर आधारित है। बिजली का वितरण घरेलू और व्यवसायिक स्तर पर माइक्रो ग्रिड के माध्यम से कर सकते हैं। हालांकि शुरू में यह प्रोजेक्ट ग्रिड विहीन होंगे पर बाद में स्मार्ट ग्रिड सिस्टम के माध्यम से दूसरे प्रोजेक्ट से जुड़ने की संभावना भी खुली है। ‘ग्रीनपीस’ ने वर्तमान ऊर्जा नीति का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए सरकार से अपील की है और साथ ही सरकार को ऐसी नीतियां अपनाने को कहा है, जिससे एक विकेंद्रित अक्षय ऊर्जा विकास मॉडल के कार्य को आगे बढ़ाने में सहायता मिले।

सौर चूल्हाइस तरह की विभिन्न रचनात्मक संभावनाओं को तलाशने और आगे बढ़ाने के प्रयासों को तेजी से आगे बढ़ाना जरूरी है, लेकिन साथ में सावधानी बरतनी होगी कि कहीं निहित स्वार्थों के दबाव में अक्षय ऊर्जा विकास में भी कई गलतियां न हो जाएं। सौर ऊर्जा के बड़े पैमाने के विकास के तौर तरीके ऐसे भी हो सकते हैं जिससे विस्थापन और प्रदूषण का खतरा है और दूसरी ओर विकेंद्रित विकास के अनुकूल ऐसे तौर-तरीके भी हो सकते हैं जो हमारे गाँवों की जरूरतों के अनुकूल हैं। हमें दूसरी राह अपनानी चाहिए पर खई बार कारपोरेट पहली तरह के विकास के लिए दबाव डालते हैं, इससे भ्रष्टाचार जुड़ने के कारण अनुचित तरह की प्राथमिकता अपना ली जाती है।

सौर मिशन के जानकारों का मानना है कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में प्रतिकूल सामाजिक और पर्यावरणीय परिणाम न्यूनतम करने के लिए पहले से भूमि और जल बचाने की सावधानी अपनानी होगी। इसके लिए पहले से योजनाबद्ध ढंग से कार्य करना होगा। इसी तरह पानी के उपयोग को कम करने की उचित तकनीक पर आरंभ से ध्यान देना होगा। सात करोड़ बीस लाख परिवार आज भी रोशनी के लिए मिट्टी के तेल का उपयोग करते हैं। उनको सौर मिशन से जोड़कर उन्हें सोलर लालटेन दी जानी चाहिए। अगर जरूरी सावाधायनियों को अपना कर आगे बढ़ा गया तो विभिन्न अक्षय ऊर्जा के स्रोतों के मिलन से ग्रामीण ऊर्जा की कहीं बेहतरीन विकेंद्रित व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इसे कृषि, सिंचाई, पशुपालन और वानिकी के व्यापक प्रयास के साथ जोड़कर आगे बढ़ना चाहिए। उदाहरण के लिए पशुपालन के उचित विकास से तेजी से कम हो रहे बैलों को नया जीवन मिलेगा। खेती में बैलों और यातायात में बैलगाड़ी के बेहतर उपयोग से व्यापारिक ऊर्जा पर निर्भरता कम होगी और साथ में बायोगैस की अधिक संभावना होगी। इस तरह शाश्वत ऊर्जा स्रोत का विकास कोई अलग कार्य नहीं है, बल्कि पर्यावरण रक्षा के अनुकूल और टिकाऊ ग्रामीण विकास की सोच का जरूरी हिस्सा है।

ईमेल : gargicomputers@gmail.com

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