ग्रामोद्योग बचाने को बने अलग मंत्रालय व नीति

Submitted by admin on Sun, 03/02/2014 - 13:08
आज यदि केंद्र के साथ-साथ सभी राज्य सरकारें भी अपनी शासकीय खरीद का एक सुनिश्चित प्रतिशत ग्रामोद्योगों से किए जाने को अनिवार्य बना लें। ये ही नहीं, बल्कि जिन भी संस्थानों, राजनैतिक दलों आदि के मन में देश का कौशल, पर्यावरण व बाहर जा रही पूंजी बचाने का संकल्प हो; ग्रामीणों को गाँवों में रोजगार देने का संकल्प हो....उन्हें चाहिए कि वे ऐसा करें। तब शायद गाँवों में रोजगार का बड़ा माध्यम तथा अपने-अपने इलाके की शान रहे ये ग्रामोद्योग अपनी गुणवत्ता व अस्तित्व बचा पाएं। गत् वर्षों के एक आंकड़ें के मुताबिक भारत सरकार के केंद्रीय मंत्रालय, इसके विभाग एवं सभी सार्वजनिक उपक्रम फिलहाल एक लाख, 75 हजार करोड़ रुपए की खरीददारी करते हैं। करीब दो वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में मंजूर एक फैसले के बाद इन सभी के लिए अब यह अनिवार्य है कि अपनी वार्षिक खरीद का 20 फीसदी माल अतिलघु, लघु व मझोले उद्यमियों से ही खरीदें। 20 फीसदी यानी 35 हजार करोड़। इस फैसले का महत्व और अधिक व्यापक तथा परिवर्तनकारी हो सकता था, बशर्ते प्रस्ताव में ‘उद्यमियों’ की जगह ‘ग्रामोद्यमियों’ शब्द लिखा होता। साथ ही खरीद के दायरे में आने वाली 358 वस्तुओं की सूची की समीक्षा के बाद उन्हें सार्वजनिक किया जाता।

यदि ऐसा होता, तो केंद्रीय पहल निश्चित ही एक प्रेरणादायी कदम होती। लोग सोच पाते कि सरकार को गाँवों की भी चिंता है। उदारीकरण के नाम पर आई गलाकाट प्रतियोगिता के कारण अस्तित्व का संकट झेल रहेे हमारे देशी-गंवई कारोबारियों को राहत मिलती। गाँवों को रोजगार देने की दिशा में मनरेगा के बाद यह दूसरा बड़ा कदम होता। इसके परिणाम पलायन, पर्यावरण, गांव में साझे और शहरों में सेहत के मोर्चे पर डैमेज कंट्रोल का काम करते।

कश्मीरी शाल, हिमाचली टोपी, भोटिया दुमला, जयपुरी रजाई, राजस्थानी बंधेज-जूती, मेरठ की कैंची, रामपुरी चाकू, हाथरस की हींग, अलीगढ़ी ताले, बरेली का बेंत उद्योग, कन्नौज का इत्र, लखनऊ की चिकनकारी, मऊ की तांत साड़ी, भागलपुरी चादर से लेकर असमिया सिल्क उद्योग तक। ऐसे तमाम उत्पाद, जो एक जमाने में अपनी गुणवत्ता के कारण इलाकाई ब्रांड प्रोडक्ट की तरह करोड़ों को रोजगार देते रहे हैं। इनके कारण शिक्षित-अशिक्षित हर जरूरतमंद ग्रामीण अपनी जड़ों से उजड़े बगैर पार्ट टाइम काम पाता रहा है। हमारे लकड़ी के खिलौने, हमारी आटा चक्कियां, कोल्हु, कुम्हार का चाक, कत्तिन के चरखा से लेकर वैद्यराज की वैद्यिकी तक। एक जमाने में अपनी गुणवत्ता के कारण ही इनकी शोहरत रही। ग्रामीण स्वावलंबन में ग्रामोद्योगों की अहम् भूमिका रही। महात्मा गांधी जैसे युगद्रष्टा ने इनकी वकालत की। इन्हें संरक्षण देने के उद्देश्य से ही खादी-ग्रामोद्योग आयोग की नींव रखी गई। जो अपने ही कारणों से उद्देश्य की पूर्ति में असफल रहा।

सरकार विदेश से आने वाले उर्वरक जैसी चीजों पर सब्सिडी देती है। कृषि विभाग तथा इफ्को जैसे संस्थान इनके उपयोग के लिए किसान को प्रेरित कर बिक्री सुनिश्चित करने मे सहयोगी बने हैं। किंतु देश के खादी व ग्रामोद्योगों के मामले में तो सरकार नेे पूर्व में दी सब्सिडी भी छीन ली है। बाजार में टिके रहने के लिए क्षमता निर्माण-बिक्री की भी समग्र कोशिश नहीं की। धीरे-धीरे खादी का विचार, श्रम, चरखा व व्यापार ... सब छूट रहा है।

बतौर पंचायत मंत्री श्री मणिशंकर अय्यर ने ग्राम हाट की योजना का श्रीगणेश किया था। इसमें स्थानीय ग्रामीण उत्पाद की बिक्री सुनिश्चित करने के लिए कई कायदे भी बनाए गए थे। मालूम नहीं, यह योजना परवान चढ़ती दिखाई क्यों नहीं दी? पहले डवाकरा व फिर स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिला सबलीकरण की जो कोशिश शुरू हुई, उनसे छोटे स्तर पर उत्पादक इकाइयों का एक सुंदर काम जरूर हुआ। हालांकि ये इकाइयां वहीं सफल हुईं, जहां उत्पाद की बिक्री की गांरंटी थी। असफलता का प्रतिशत भी कम नहीं है। बावजूद इसके महिला सबलता के सरल रास्ते खोलने का श्रेय तो इन कार्यक्रमों को जाता ही है। आंध्र प्रदेश समेत दक्षिण के कई राज्यों में इनके सफल उदाहरण गौरवान्वित करने वाले हैं। अमेठी व रायबरेली लोकसभा क्षेत्र भी इनकी राजनैतिक प्रयोगशला बने हुए हैं। कांग्रेस का झंडा इन्हीें इलाकों की महिलाओं के हाथ से आकार पाता रहा है। इसके अलावा ग्रामोद्योगों को संरक्षण देने की कोई व्यापक कोशिश इस देश में आज भी दिखाई नहीं देती।

दूसरी ओर ग्रामोद्योगों का भट्ठा बैठाने की संगठित कोशिश बड़े पैमाने पर चल रही है। बड़ी-बड़ी कंपनियां ऐसे छोटे-छोटे उत्पादों के कारोबार में उतर चुकी हैं। बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए शुरू-शुरू में इन्होंने हर अनैतिक हथकंडा अपनाया। लोकलुभावन चमक दिखाई। खुली चीजों को पैकबंद किया। अपनी आर्थिक हैसियत का लाभ उठाया। कीमतें सस्ती रखीं। छोटे कारोबारी कम पूंजी वाले होते हैं। बाहरी चमक व बिक्री स्टंट ने उनकी कमर तोड़ दी। उनकी कमर टूटते ही बड़ी कंपनियां आज वही उत्पाद मनमानी कीमतों पर बेच रही हैं। कंपनियों के पैकबंद सामानों की नकल से बाजार अटे पड़े हैं। रही-सही कसर घटिया चाइनीज उत्पादों ने पूरी कर दी है। अगरबत्ती, मोमबत्ती, इत्र, फर्नीचर, चादर, खिलौने, जूते..... किसी पर भी निगाह डालिए, काफी कुछ ग्रामोद्योगों के हाथों से निकल गया है। इस प्रतियोगिता का नतीजा यह हुआ कि देशी-गंवई कारोबारी गुणवत्ता से समझौता करने को मजबूर हुए। खामियाजा उपभोक्ता भुगत रहा है। सेहत भी जा रही है और पैसा भी।

आज यदि केंद्र के साथ-साथ सभी राज्य सरकारें भी अपनी शासकीय खरीद का एक सुनिश्चित प्रतिशत ग्रामोद्योगों से किए जाने को अनिवार्य बना लें। ये ही नहीं, बल्कि जिन भी संस्थानों, राजनैतिक दलों आदि के मन में देश का कौशल, पर्यावरण व बाहर जा रही पूंजी बचाने का संकल्प हो; ग्रामीणों को गाँवों में रोजगार देने का संकल्प हो....उन्हें चाहिए कि वे ऐसा करें।तब शायद गाँवों में रोजगार का बड़ा माध्यम तथा अपने -अपने इलाके की शान रहे ये ग्रामोद्योग अपनी गुणवत्ता व अस्तित्व बचा पाएं। निःसंदेह आज गाँवों की खरीद क्षमता बढ़ी है। इससे ललचाई बड़ी-बड़ी कंपनियां रूरल मार्केटिंग की रणनीति के जरिए गाँवों की जेब पर कब्जा करने को आतुर हैं; ऐसे में गाँवों के अपने उत्पादों को अधिक कीमत दिलाने की चुनौती बहुत बड़ी है। इसके लिए सिर्फ खरीद सुनिश्चित करने से काम चलने वाला नहीं। जरूरत है कि सरकार गुणवत्ता के मानदंडों का कड़ाई से पालन कराए। ग्रामोद्योग उत्पादों की संगठित व सुचारू बिक्री हेतु मजबूत सहकारी तंत्र बनाने के लिए पैसा व ईमानदारी दोनों दिखाए। क्षमता निर्माण के लिए ढाँचागत व्यवस्था करे। ग्रामोद्योग को उत्पादों की बिक्री हेतु कहीं जाना न पड़े। यदि उत्पाद उत्कृष्ट है, तो खरीददार खुद वहां आए। उन उत्पादों के प्रचार का जिम्मा सरकार को खुद उठाना चाहिए। जैसा कि सरकार बागवानी मिशन आदि के जरिए कई जगह कर रही है। गाँवों में बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के लिए जमीन अधिकरण की बजाए ग्रामोद्योग परिसरों पर काम हो। स्थानीय बिक्री केंद्र बने।

ऐेसे तमाम जरूरी कार्यों को अंजाम देने में एक अलग ग्रामोद्योग मंत्रालय व ग्रामोद्योग नीति मददगार हो सकते है। संकट से जूझती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में तो यह बड़ा काम होगा ही, साथ ही भारत की खेती व पर्यावरण का भी बड़ा लाभ होगा। तब शायद गेहूं गोदाम में सड़ने से पहले ही किसी गंवई उद्योग का कच्चा माल बनकर शुद्ध उत्पाद का निर्माण कर जाए। क्या यह अच्छा नहीं होगा?

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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