14 मार्च को जल-लोकादेश हेतु लोक संवाद

Submitted by admin on Tue, 03/11/2014 - 15:30
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पानी पर जनता क्या चाहती है? नदियों के निर्बाध व निर्मल प्रवाह व पुनरोद्धार के लिए शासन से क्या अपेक्षित है? जलाधिकार, भूजल सुरक्षा, जलोपयोग में अनुशासन, जलसंचयन, जल के व्यावसायीकरण, जलापूर्ति के निजीकरण, प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार और नदी जोड़ जैसे मसलों पर लंबे अरसे से चल रही बहस के बाद तस्वीर काफी साफ हो चुकी है। जलसुरक्षा बिल का एक प्रारूप भी इस बीच संगठनों/कार्यकर्ताओं के बीच संवाद के लिए भेजा गया था। जन-जन को जल सुरक्षा मुहैया कराने को लेकर शासन से अपेक्षित कदमों को राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्रों में शामिल कराने की स्वयंसेवी संगठनों की मुहिम इन दिनों गति पकड़ती दिखाई दे रही है। लोकसभा क्षेत्र से लेकर प्रांत स्तर पर चल रही ऐसी कई छोटी-बड़ी कोशिशों की जानकारी मैंने पूर्व में भी हिंदी वाटर पोर्टल में अपने लेखों के माध्यम से दी थी।

‘जल-जन जोड़ों अभियान’ द्वारा जल पर लोकादेश संबंधी एक मुहिम को श्रृंखलाबद्ध आयोजनों के माध्यम से लोगों व राजनीतिक दलों के बीच ले जाने की खबर है। ‘लोकादेश-2014’ नामक इस आयोजन श्रृंखला की अगली कड़ी का आयोजन आगामी 14 मार्च को नई दिल्ली के कन्संटीट्युशन क्लब में किए जाने की सूचना मुझे भी प्राप्त हुई है। पानी पर केन्द्रित होने के कारण अच्छा होता कि इस संवाद श्रृंखला का नाम जलादेश-2014 रखा जाता।

ग़ौरतलब है कि इस आयोजन में जहां एक ओर आपको जल के जनादेश पर श्री राजेन्द्र सिंह तथा श्री पी वी राजगोपाल की राय सुनने को मिलेगी, वहीं आजकल लोकसंगठन और राज संगठन के बीच ताना-बाना बुनने में व्यस्त श्री अन्ना हजारे जी का समर्थन भी मिलने की उम्मीद जताई गई है।

उल्लेखनीय है कि आयोजन में आमंत्रित दूसरे प्रमुख वक्ता श्री पी वी राजगोपाल खासकर मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भूमिहीनों के बीच भू-अधिकार के अपने संघर्ष को लेकर जाने जाते हैं। गत् विधानसभा चुनावों कें राष्ट्रवादी चिंतक श्री गोविंदाचार्य व भाजपा के पूर्व मंत्री आरिफ खान के साथ मिलकर उन्होंने छोटे राजनीतिक दलों को एकजुट करने के लिए साझा प्रयास भी किए थे। दिल्ली के लोग श्री राजगोपाल को उनकी जनादेश यात्रा के लिए जानते हैं।

श्री राजेन्द्र सिंह की शख्सियत पानी के उनके काम से ही बनी है। ‘जिस जल-जन जोड़ो अभियान’ ने इस लोकादेश का आयोजन किया है, उसका नेतृत्व श्री सिंह ही कर रहे हैं। यह अभियान उनकी संस्था - तरूण भारत संघ द्वारा संचालित है।

पानी पर जनता क्या चाहती है? नदियों के निर्बाध व निर्मल प्रवाह व पुनरोद्धार के लिए शासन से क्या अपेक्षित है? जलाधिकार, भूजल सुरक्षा, जलोपयोग में अनुशासन, जलसंचयन, जल के व्यावसायीकरण, जलापूर्ति के निजीकरण, प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार और नदी जोड़ जैसे मसलों पर लंबे अरसे से चल रही बहस के बाद तस्वीर काफी साफ हो चुकी है। जलसुरक्षा बिल का एक प्रारूप भी इस बीच संगठनों/कार्यकर्ताओं के बीच संवाद के लिए भेजा गया था। बावजूद इसके जरूरी है कि ऐसे मसलों पर व्यापक जनसंवाद कर व्यापक जनसमर्थन हासिल किया जाए।मैं यह क्यों लिख रहा हूं?
अक्सर होता यह है कि कुछ संगठन मिलकर एक दस्तावेज बना लेते हैं और उसे लोकादेश, जनादेश अथवा जनता की राय कहकर प्रचारित करने लगते हैं। किसी भी मसले पर लोकादेश यानी लोक का आदेश कहा जा रहा कोई भी आदेश महज कुछ संगठनों का आदेश होकर रह जाता है। व्यापक जनसमर्थन के अभाव में शासन उसे तवज्जो नहीं देती और वह सिर्फ एक प्रयास होकर रह जाता है। लोकादेश, लोक अभियान और लोक उम्मीदवार के नाम से चले कई प्रयासों के ऐसे हश्र हम पहले देख चुके हैं। व्यापक जनशक्ति दिखाए बगैर जनहित की बात सत्ता से मनवाना मुश्किल है। इस बात को अन्ना, पी वी और राजेन्द्र सिंह.. से ज्यादा भला कौन समझता होगा। मैं हतोत्साहित नहीं कर रहा, बल्कि पुराने अनुभव याद दिला रहा हूं।

क्या आप सोचते हैं कि इतने व्यापक राजनीतिक अनुभव वाले दल यह नहीं जानते कि जनता के लिए क्या अच्छा है और क्या नुकसान? आप हकीकत जानते हैं। कौन नहीं जानता कि जनता पर राज करने की नीयत के कारण आज की राजनीति लोकहित की नीति को लेकर लापरवाह रवैया रखते हैं? दरअसल वे सिर्फ चुनाव के वक्त वोट को महत्वपूर्ण मानते हैं; बाकी पांच साल उनके लिए नोट और नोट वाले महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह बात मैं गत् कई वर्षों में पानी पर घटी राजनीति तथा वादे और इरादों में तेजी से बढ़ते अंतर के आधार पर कह रहा हूं। यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि जिन्हें जनता अपना जनप्रतिनिधि बनाकर सदन में भेजती है, उसी से अपना आदेश मनवाने के लिए जनता को संघर्ष करना पड़ता है।

अतः यदि हम चाहते हैं कि राजनीतिक दल जनहित के मसलों को न सिर्फ अपने घोषणापत्र में शामिल करें, बल्कि सत्ता में आने पर उसे लागू भी करें; तो लोकादेश के ऐसे प्रारूपों को व्यापक जनता की आवाज बनाना होगा। जरूरी है कि लोकादेश का प्रारूप बनाकर व्यापक रायशुमारी के लिए उसे जन-जन के बीच ले जाया जाए।

मसला पानी का हो और वह भी भारत जैसे विविध जैव विविधता, विविध संस्कृति व विविध भौगोलिक स्थितियों तथा विविध जन-जरूरत वाले देश का, तो यह और भी जरूरी हो जाता है। खासकर विषय पानी की अलग-अलग समस्या से जूझ रहे विविध क्षेत्रों के विविध वर्गों के बीच छोटे-छोटे जनसंवादों के जरिए यह संभव है।

प्रश्नावलियों के जरिए व्यापक रायशुमारी सहयोगी हो सकती है। लेकिन यह किसी एक संगठन का दायित्व नहीं है। इसे कुछ संगठनों की जवाबदेही कहकर दोष उनके सिर मढ़ देना भी ठीक नहीं, जरूरी है कि पांच साल में एक बार जागने वाली जनता भी अब पूरे पांच साल खुद जागे। जरूरी है कि सामुदायिक, राष्ट्रीय व पारिस्थिकीय अस्तित्व के ऐसे मसलों पर खुलकर अपनी चिंता, अनुभव व मांग पूरी हकदारी के साथ शासन के सामने रखे। यह काम किसी संगठन का सदस्य बने बिना भी किया जा सकता है।

खैर! लोकादेश-2014 के इस आयोजन में प्रस्तुत प्रारूप से जहां अपनी सहमति-असहमति व सुझाव जताने का एक मौका होगा, वहीं यह जानना दिलचस्प होगा कि कौन-कौन सा राजनीतिक दल लोकादेश के किस-किस बिंदु को अपनी पार्टी के घोषणापत्र में शामिल करने पर कितना सहमत है। इसके लिए आयोजकों ने सभी मुख्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया है। मीडिया प्रतिनिधियों के लिए निमंत्रण खुला है ही।

कार्यक्रम विवरण


तिथि: 14 मार्च, 2014
दिन: शुक्रवार
समय: प्रातः 11 बजे से अपराह्न 5 बजे तक
मुख्य आगंतुक: श्री अन्ना हजारे, श्री पी वी राजगोपाल, श्री राजेन्द्र सिंह व कई अन्य
स्थान: कंस्टीट्युशन क्लब, रफी मार्ग,
(निकट पटेल चौक मेट्रो स्टेशन)
नई दिल्ली

अधिक विवरण के लिए संपर्क


संयोजक,जल-जन जोड़ो अभियान
श्री संजय सिंह
ईमेल : jaljanjodoabhiyan@gmail.com
फोन : 09415114151 / 09794466131

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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