धरती : पहले शोषण फिर संरक्षण

Submitted by admin on Fri, 03/14/2014 - 09:46
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पर्यावरण चेतना
वैदिक काल के मनुष्य में जितनी आस्था सूर्य के प्रति थी, उससे कम धरती के प्रति नहीं थी। मनुष्य के पोषण के लिए उसे अन्नपूर्णा कहा गया था। ऋग्वेद में यदि क्षेत्रपति की पूजा अर्चना होती थी तो हमारे ग्रामांचलों में भी न जाने कितने ग्रामदेवताओं की परिकल्पनाएं हैं। मैं जिस अंचल में हूं, वहां लगभग हर गांव में भूमिया देवता की पूजा होती है। इससे पता चलता है कि हमारा समाज किस हद तक धरती के प्रति आस्थावान है। धरती एक बार फिर नाराज है। पिछले मार्च, 2011 जिस तरह से जापान में आए भूकंप और सुनामी ने विकराल रूप धारण किया, म्यांमार और कई अन्य भागों में जलजला आया, उससे एक बार फिर धरती के रौद्र रूप की चर्चाएं होने लगी हैं। जो लोग पिछले कुछ समय से पृथ्वी के अंत की घोषणाएं कर रहे थे, उनकी दुकानों में फिर से रौनक लौट आई है।

हमने बीते महीने ‘अर्थ आवर’ मनाया, इस महीने पृथ्वी दिवस मनाएंगे और जून में विश्व पर्यावरण दिवस पर एक बार फिर धरती को बचाने की कसमें खाएंगे। यह ठीक है कि इस बहाने हमने कुछ मेगावाट बिजली बचा ली या कुछ लोगों के मन में धरती के प्रति हमदर्दी पैदा कर ली या पर्यावरण विनाश को रोकने के लिए कुछ कानून बना दिए, लेकिन 365 दिनों में से सिर्फ एक दो दिनों को धरती के लिए निर्धारित कर देने से क्या होगा।

सच पूछिए तो आज धरती को बचाने के लिए एक व्यापक मुहिम की जरूरत है। वास्तव में पश्चिम के लोग धरती के दर्द को समझ ही नहीं सकते। वे जो कुछ कर रहे हैं। वह ऊंट के मुंह में जीरा से ज्यादा नहीं है। उनके उपाय तब शुरू होते हैं, जब चिड़िया खेत चुग कर जा चुकी होती है। यह वैसा ही है, जैसे अपराध हो चुकने के बाद पुलिस लाठी भांजती रहती है।

जिस पैमाने पर इस शैली को हमने अंगीकर कर लिया है, भोग के जिस मार्ग पर हम चले पड़े हैं, उसमें पृथ्वी का विनाश ही विनाश लिखा है। पृथ्वी दिवस या अर्थ आवर महज निवारक उपाय हो सकते हैं। समस्या को समूल उखाड़ने के लिए हमें अंततः भारतीय दृष्टि की ओर लौटना होगा।

हमारे यहां हजारों वर्ष पहले धरती के दर्द को समझ लिया गया था। हमारे शास्त्रों में जो धरती की आराधना की गई है, लोक जीवन में भी कदम-कदम पर धरती की पूजा-अर्चना रखी गई है। हमारे वाङ्मय में न सिर्फ पृथ्वी की उपासना का विधान है, बल्कि ब्रह्मांड के तमाम ग्रहों-उपग्रहों की स्तुति मिलती है।

हमारे वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सब प्रकृति के रौद्र रूप से डर के कारण हुआ होगा। लेकिन उसके पीछे कहीं न कहीं धरती का मर्म भी है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ धरती का आदर सम्मान करें, उसे रौद्र नहीं समझें। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में भूमि माता की उपासना के मंत्र हैं। अथर्वन ऋषि की 63 ऋचाओं में धरती के तमाम अंगों-उपांगों, उसके बदलते रूपों का पूरी आस्था के साथ विवरण है। ऐसा नहीं है कि हमारे पूर्वज पृथ्वी के प्रति मात्र अंधश्रद्धा ही रखते थे। धरती से मिलने वाली तमाम सुविधाओं के बारे में भी उन्हें भरपूर जानकारी थी। इसलिए एक तरफ पर वे-
माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:।
नमो माता पृथिव्यै नमो माता पृथिव्यै।।


कह कर पृथ्वी को प्राणिमात्र की जननी कहते हैं तो दूसरी तरफ वे यह भी कहते हैं कि अग्नि-तेजस् का पृथ्वी के भीतर स्थाई निवास है। वे प्रार्थना करते हैं- ‘वायुमंडल, पृथ्वी और अंतरिक्ष मुझे विराट क्षेत्र तथा ऊर्जा प्रदान करें एवं समस्त दैवी आत्माओं सहित सूर्य और जल मुझे गुरुत्व तथा आत्मसात करने की शक्ति प्रदान करें।’ यानी हम जो कुछ हैं, पृथ्वी की वजह से हैं, उसके भीतर छिपी समस्त ऊर्जाएं हमें प्राप्त हों।

लेकिन यह सब तभी हो सकता है, जब धरती मैया वह सब देने को तत्पर हों या देने लायक हों और वह भी उतना ही, जिससे उसे कोई नुकसान न हो। जो मनुष्य धरती के प्रति यह भाव रखता हो, वह धरती का शोषण भला कैसे कर सकता है?
समुद्र वसने देवी पर्वतस्तनमंडले।
विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।।


अर्थात् समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली, पर्वत रूपी स्तनवाली, भगवान विष्णु की पत्नी, हे पृथ्वी देवी, मैं तुझे नमन करता हूं। मेरे पैर का तुझे स्पर्श होने वाला है, इसलिए तू मुझे क्षमा कर।

पश्चिम आधारित आज का विकास धरती को लूटने में लगा हुआ है। जब लूट-खसोट के बाद उसके दुष्परिणाम दिखने लगते हैं और संकट एकदम सामने आ खड़ा होता है, तब वे अपने उपभोग में कटौती की बात करते हैं और आज हम आंख मूंद कर उनके पीछे चलने को विवश हैं।

वैदिक काल के मनुष्य में जितनी आस्था सूर्य के प्रति थी, उससे कम धरती के प्रति नहीं थी। मनुष्य के पोषण के लिए उसे अन्नपूर्णा कहा गया था। ऋग्वेद में यदि क्षेत्रपति की पूजा अर्चना होती थी तो हमारे ग्रामांचलों में भी न जाने कितने ग्रामदेवताओं की परिकल्पनाएं हैं। मैं जिस अंचल में हूं, वहां लगभग हर गांव में भूमिया देवता की पूजा होती है। इससे पता चलता है कि हमारा समाज किस हद तक धरती के प्रति आस्थावान है। इसलिए जिस समाज में धरती को साक्षात् देवी माना गया हो, वहां एक घंटे या एक दिन के लिए धरती के प्रति रहम दिखाने का क्या अर्थ हो सकता है?

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