पार्टियां अनसुना न करें लोकादेश का जलादेश

Submitted by admin on Sat, 03/22/2014 - 12:40
Printer Friendly, PDF & Email
शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण नई चुनौतियां बनकर हमें डरा रहे हैं। इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी है कि नदी की जमीन को चिन्हित व अधिसूचित किया जाए। रिवर-सीवर अलग हों। औद्योगिक कचरे पर लगाम लगे। ठोस कचरे के पुनः उपयोग का काम प्राथमिकता पर आए। प्रवाह का मार्ग बाधा मुक्त करने तथा नदी जल व रेत का अति दोहन रोकने की बात जोर-शोर से उठाई जाए। जल सुरक्षा अधिनियम बने। नदी जलग्रहण क्षेत्र विकास सुनिश्चित हो। पार्टी, पार्टी और पार्टी! पार्टिंयों के उम्मीदवार, पार्टिंयों के घोषणापत्र, पार्टिंयों का ही राज! पार्टियां चाहें, तो कानून; न चाहें, तो जनता का हित बेमतलब! पार्टी फर्स्ट; वोटर लास्ट। 6 राष्ट्रीय, 47 राज्य स्तरीय.. कुल पंजीकृत 1616; भारत लोकतंत्र है कि पार्टीतंत्र?

यह चित्र बदलना होगा। यह चित्र असवैंधानिक है। संविधान व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार देता है, पार्टी या पक्ष को नहीं। कोई बताए कि भारत के संविधान में इस बाबत् पार्टी या पक्ष का नाम कहां लिखा है? मालूम नहीं, चुनाव आयोग किस संविधान के तहत् पार्टियों को पंजीकृत करता है और चुनाव में दलगत उम्मीदवारी की अनुमति देता है? महात्मा गांधी ने तो काग्रेस को बर्खास्त करने की बात बहुत पहले कह दी थी। कायदे से संविधान लागू होते ही सभी राजनैतिक दलों को बर्खास्त हो जाना चाहिए था। जो आज तक नहीं हुआ।

नतीजा यह है कि 150 वर्षों में अंग्रेजों ने जितना नहीं लूटा, उतना इन 66 वर्षों में पार्टिंयों ने देश को लूट लिया।

गत् 14 मार्च को लोकादेश-2014 के मंच से ये सभी सवाल उठाकर नामी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दलगत उम्मीदवारी के समक्ष एक नई बहस तो छेड़ी ही, वर्ष 2019 और आगे पक्ष, पार्टी विहीन उम्मीदवारों को समर्थन का ऐलान भी किया। कहा कि यह उनका सपना है। दलविहीन राजनीति का यह सपना कितना सही है, कितना गलत? कितना जनहितकारी होगा, कितना अराजक? यह सपना वैकल्पिक राजनीति है या आम आदमी पार्टी की तरह नया राजनैतिक विकल्प खड़ा करने की एक और कोशिश? अंग्रेजों ने भारत को ज्यादा लूटा या भारत की पार्टियों ने? धोखा संतोष भारतीय ने अन्ना को दिया या अन्ना ने तृणमूल कांग्रेस को? ये सभी प्रश्न बहस का विषय हो सकते हैं, लेकिन इस बात से भला कौन इंकार कर सकता है कि आजादी के वक्त जैसी शुद्ध हवा, जितने प्राकृतिक जंगल, जितनी स्वच्छ नदियां, जितना मीठा पानी, जितने प्रवाहमान झरने, और जितने गांव भारत में थे, आज उनकी संख्या व गुणवत्ता.. दोनो में कमी आई है।

इन 66 वर्षों में प्रदूषण बढ़ा है। पलायन बढ़ा है। आत्महत्याएं बढ़ी हैं। अमीर और गरीब के बीच में खाई बढ़ी हैं। किसानों पर दर्ज कर्ज के मामले बढ़े हैं। किंतु राजनैतिक कार्यकर्ताओं पर दर्ज मुकदमों में सजा का प्रतिशत आश्चर्यजनक रूप से घट गया है। एक तरफ राजनीतिज्ञों, मिलावटखोरों, मुनाफाखोरों और भ्रष्टाचारियों की सुरक्षा बढ़ी है, तो दूसरी तरफ हवा, पानी, नदी, खेती, जंगल, भूमि और भोजन की गुणवत्ता की सुरक्षा घटा दी गई है। सही है कि गरीब से गरीब व्यक्ति की भी आय बढ़ी है; पर क्या यह झूठ है कि उसी गरीब के लिए पानी, खेती और भोजन कई गुना ज्यादा महंगे हो गए हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार स्थानीय समुदायों के हाथ से खिसककर सरकारों और मुनाफाखोरों के हाथों में चले गए हैं। परिणामस्वरूप इन वर्षों में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बढ़ा; कब्जे बढ़े; व्यापार बढ़ा, लेकिन गरीब को बिन पैसे पर्याप्त पानी की गारंटी घटती चली गई।

दुखद है कि भूमि अधिग्रहण, उत्खनन और पानी की कमी के कारण इन 66 वर्षों में 92,009 भारत के नक्शे से मिट गए। ‘भूदान’ में दान दी गईं हजारों एकड़ जमीनें जरूरतमंदों को मिलने की बजाए किन्ही औरों के कब्जों में चली गई। नए ढांचागत निर्माण के लिए गांवों ने प्रतिवर्ष एक शिकागो शहर जितनी जमीन गंवा दी। एकता परिषद के रमेश भाई के मुताबिक जिस उत्खनन के कारण, हमने लाखों एकड़ जमीन बर्बाद की, उनसे मिले खनिज उत्पादों को न के बराबर मूल्य में खनन कंपनियों को बेचने की नीति अपनाई। कोयला चार पैसे प्रति किलो और बाॅक्साइट जैसा कीमती खनिज एक रुपए साठ पैसे की दर से बेचा। कपंनियों ने इसे कई सौ गुना अधिक दर पर बेचकर मुंहमांगा मुनाफा कमाने दिया।

गौर कीजिए कि वनक्षेत्र सिकुड़कर 20 प्रतिशत से नीचे आ गया है। भूजल के 70 प्रतिशत भंडार आज संकटग्रस्त श्रेणी में शुमार हैं। 73 प्रतिशत नदियां सूखने की चुनौती से जूझ रही हैं। 27 प्रतिशत नदियां या तो नाला बन गई हैं या बनने की ओर अग्रसर हैं। इन 66 वर्षों बाद कोई एक ऐसी प्रमुख नदी नहीं, पीने योग्य पानी के मापदंड पर जिसे खरा कहा जा सके। 66 वर्ष पहले जो पानी हमें जीवन देता था, आज वही बीमारियां बांट रहा है। सचमुच, यह ताज्जुब की बात है कि सबसे ज्यादा वोटर गांव, गरीब और किसान ही है; बावजूद इसके भारत की अर्थनीति गांव आधारित न होकर शहर आधारित हो गई है।

यह चित्र कैसे उलटेगा?


जलपुरुष राजेन्द्र सिंह की पहल पर आयोजित लोकादेश-2014 कार्यक्रमों की श्रृंखला इस चित्र को उलटने की एक छोटी-सी कोशिश थी। इस पहल के दौरान जल सुरक्षा, ग्राम सुरक्षा, खेत सुरक्षा, किसान सुरक्षा और भूमि सुरक्षा कानून की मांग जोर-शोर से उठाई गई। जल सुरक्षा बिल के पेश प्रारूप की प्रस्तावना मानती है कि प्राकृतिक संसाधनों के पोषण की बजाए, अधिक से अधिक शोषण को विकास मानने की प्रवृत्ति के कारण ही प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायीकरण को बढ़ावा मिला। लिहाजा शोषण, प्रदूषण और अतिक्रमण नई चुनौतियां बनकर हमें डरा रहे हैं।

इन नई चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी है कि नदी की जमीन को चिन्हित व अधिसूचित किया जाए। रिवर-सीवर अलग हों। औद्योगिक कचरे पर लगाम लगे। ठोस कचरे के पुनः उपयोग का काम प्राथमिकता पर आए। प्रवाह का मार्ग बाधा मुक्त करने तथा नदी जल व रेत का अति दोहन रोकने की बात जोर-शोर से उठाई जाए। जल सुरक्षा अधिनियम बने। नदी जलग्रहण क्षेत्र विकास सुनिश्चित हो। भूजल की सुरक्षा लाइसेंस अथवा जलनियामक आयोगों की बजाए जनसहमति से भूजल निकासी की गहराई सुनिश्चित करने जैसे कई महत्वपूर्ण सुझाव सुझाए गए हैं। जलसुरक्षा बिल का एक प्रारूप भी लोकादेश के दिल्ली आयोजन में बांटा गया।

कहना न होगा कि लोकादेश-2014 समाज के सपनों के दस्तावेज हैं। देखना यह है कि कौन-कौन से दल अपने घोषणापत्रों में इस सपने को साकार करने का सपना दिखाएंगे और कौन-कौन हाथ झाड़ जाएंगे।

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

कार्यवृत


श्रव्य माध्यम-

नया ताजा