हरियाली को बढ़ावा मिले

Submitted by admin on Thu, 03/27/2014 - 10:12
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पर्यावरण चेतना
जब तक कोई परिवार वनों की रक्षा ठीक से कर रहा है तब तक उसे हकदारी से वंचित नहीं किया जाएगा। माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी संतान को यह हक विरासत के रूप में मिलेगा। इस तरह की दीर्घकालीन हकदारी से लोगों का वन रक्षा से जुड़ाव हो सकेगा। दूसरी ओर इन परिवारों पर यह पूरी जिम्मेदारी होगी कि वे किसी वृक्ष को न काटें और न काटने दें। बाहरी शक्तिशाली लोग आकर जोर जबरदस्ती से कहीं अवैध कटान करें तो इसकी सूचना वन अधिकारी को पहुंचाने की जिम्मेदारी उनकी होगी। हरियाली पर आधारित कृषि को बढ़ावा देना काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इससे जहां एक तरफ वनाच्छादन बढ़ेगा वहां वनों के उजड़ने से अपनी जीविका खो रहे आदिवासियों के लिए जीविका का भी समुचित प्रबंधन किया जा सकता है। आदिवासियों-वनवासियों की आजीविका का संकट बढ़ रहा है और इस कारण उत्पन्न अभाव और असंतोष को दूर करना भी बहुत जरूरी है। इन दोनों उच्च प्राथमिकताओं को एक साथ पूरा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर वृक्ष की खेती व उजड़ते वनों को नया जीवन देने का व्यापक स्तर का कार्यक्रम शुरू करना चाहिए।

यह कार्यक्रम वन विभाग व आदिवासियों-वनवासियों के नजदीकी सहयोग पर आधारित होगा व शासन वन विभाग को जनपक्षीय बनाने के एक नए अध्याय की शुरूआत कर सकता है। वन विभाग के पास ऐसी लाखों एकड़ जमीन है जिसमें वन नाम मात्र को हैं या पहले थे पर अब बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। बहुत सी ऐसी जमीन है जो पूरी तरह खाली पड़ी है। इसमें से कुछ भूमि पर खेती के नियमितीकरण के लिए विधेयक संसद में विचाराधीन है पर इसका कार्यक्षेत्र सीमित है। विधेयक पास होने के बाद बहुत सी विवादग्रस्त भूमि रह जाएगी।

खाली वन भूमि, अधिक क्षतिग्रस्त या लुप्तप्राय वन तथा खेती कर रहे किसानों से विवाद में उलझी भूमि। तीसरे श्रेणी से यह भूमि निकाल सकते हैं। जहां अनुसूचित जनजातियों संबंधी विचाराधीन विधेयक पास होने के बाद खेती नियमित हो जाएगी। यह भूमि निकालने के बाद भी इन श्रेणियों में लाखों एकड़ भूमि उपलब्ध है। इन लाखों एकड़ भूमि पर पेड़-पौधे लगाने के लिए तथा जहां पहले से क्षतिग्रस्त पेड़-पौधे मौजूद हैं उन्हें नया जीवन देने के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर आदिवासियों (व वनों में या उनके आसपास रहने वाले अन्य गांववासियों) का नजदीकी सहयोग बड़े पैमाने पर प्राप्त करना चाहिए। विशेषकर सबसे गरीब व भूमिहीन लोगों का सहयोग प्राप्त करने को उच्चतम प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

इस सहयोग का मूल आधार यह है कि आदिवासी/वनवासी इस भूमि पर वृक्ष व औषधि पौधे लगाएंगे व उनकी रक्षा करेंगे। इसके बदले में जो लघु वन उपज औषधि व घास यहां से प्राप्त होगी उस पर आदिवासियों, वनवासियों का हक होगा। जो लोग पहले से विवादित वन विभाग की भूमि पर खेती कर रहे हैं उन्हें उसी भूमि पर बने रहने व उस पर खेती करने का अधिकार मिलेगा। जो खाली या क्षतिग्रस्त वन भूमि है उसमें हरियाली लाने के लिए आदिवासियों व वनों के अन्य गांववासियों की आवश्यकता व रुझान के आधार पर चयन होना चाहिए।

लगभग 200 से 300 एकड़ के वन क्षेत्र के लिए ऐसे परिवारों का चयन कर उनकी एक वन उत्थान व रक्षा समिति बना देनी चाहिए। इन स्थानों पर वृक्ष लगाने या उनकी रक्षा के लिए कई तरह के कार्य की जरूरत होगी जैसे चुने गए वन क्षेत्र के आसपास पत्थर की घेरवाड़ का प्रयास करना, नर्सरी तैयार करना आदि। इन विविध कार्यों के लिए रोजगार गारंटी योजना या अन्य ग्रामीण रोजगार योजनाओं व विभिन्न वानिकी योजनाओं के अंतर्गत गांववासियों विशेषकर महिलाओं को न्यायसंगत मजदूरी व रोजगार मिलते रहना चाहिए।

घास बेचने से जो आय होगी वन इन परिवारों में ही बंटेगी। इसके अतिरिक्त कई औषधि पौधों व अन्य झाड़ीनुमा पौधों से भी आय शीघ्र मिलने लगेगी। जब वृक्ष बड़े हो जाएंगे तो उनके फल फूल पत्ती बीज आदि कई तरह की लघु वन उपज आय का मुख्य स्रोत बन जाएगी। इसस्कीम की सफलता के लिए जरूरी है कि इससे जुड़े सभी परिवारों को लघु वन उपज, औषधि उपज व घास का अधिकार निश्चित तौर पर दीर्घकाल के लिए मिलना चाहिए।

जब तक कोई परिवार वनों की रक्षा ठीक से कर रहा है तब तक उसे हकदारी से वंचित नहीं किया जाएगा। माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी संतान को यह हक विरासत के रूप में मिलेगा। इस तरह की दीर्घकालीन हकदारी से लोगों का वन रक्षा से जुड़ाव हो सकेगा। दूसरी ओर इन परिवारों पर यह पूरी जिम्मेदारी होगी कि वे किसी वृक्ष को न काटें और न काटने दें। बाहरी शक्तिशाली लोग आकर जोर जबरदस्ती से कहीं अवैध कटान करें तो इसकी सूचना वन अधिकारी को पहुंचाने की जिम्मेदारी उनकी होगी। इसके लिए उन्हें संचार के आवश्यक साधन भी उपलब्ध करवाए जाएंगे। इसी तरह यह जिम्मेदारी इन परिवारों की होगी कि उनमें से कोई शिकार न करे व उनके क्षेत्र में कोई बाहरी शिकारी आए तो इसकी सूचना तुरंत वन अधिकारियों तक पहुचाएं। अपने द्वारा संरक्षित क्षेत्र में ये वन की रक्षा हर तरह से करेंगे। जहां इसके लिए कई कार्यों से उन्हें नियमित मजदूरी मिलेगी। पर कई कार्य वे श्रमदान व सेवाभाव से भी करेंगे।

सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि पेड़ बड़े होने तक न्यूनतम जरूरतों को पूरी करने लायक मजदूरी हर परिवार को अवश्य मिले। इन परिवारों को विशेषकर महिलाओं को व उनके स्वयं समूहों को इसके लिए सहायता दी जाएगी कि वे लघु वन उपज के श्रेणीकरण, प्रसंस्करण व व्यापार से अपने लिए अच्छी फसल प्राप्त कर सकें।

वृक्ष व पौधे की किस्मों के चयन में उच्च प्राथमिकता इस बात की दी जाएगी कि वे स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष हों। लघु उपज की दृष्टि से विशेष सहयोगी हों व उनमें जल व मिट्टी संरक्षण की अच्छी क्षमता हों। इन प्राथमिकताओं का उल्लंघन तभी संभव होगा। (वह भी बहुत सीमित हद तक) यदि इसके बहुत महत्तवपूर्ण कारण है। किसी भी नए पेड़ पौधे या उसकी नई किस्म को पहले बहुत सीमित स्थान पर परीक्षण के लिए लगाया जाएगा व इसकी उपयोगिता सिद्ध होने के बाद ही इसके प्रसार की अनुमति पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद मिलेगी।

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