फ्लोराइड उन्मूलन पर समुदाय संवाद व विमर्श का आयोजन

Submitted by admin on Thu, 03/27/2014 - 16:31
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गांव के लोगों ने बताई फ्लोराइड की परेशानी


इन दिनों मालवा में भी गर्मी का दौर शुरू हो चुका है। क्षेत्र के कार्यकर्ता सरदार डावर ने गांव के लोगों को बताया कि गर्मी में भूजल स्तर कम होते ही किस तरह से पानी का संकट खड़ा हो जाता है। इसलिए इस पानी को पीने की बजाए नहाने से लेकर अन्य निस्तारी काम के लिए उपयोग में लिया जा सकता है। इसके अलावा श्री डावर ने यह भी बताया कि कुएं व बावड़ी का पानी पीने के लिए सुरक्षित रखा जाए। धार। म.प्र. के आदिवासी बहुल धार जिले के तिरला विकासखंड के ठेठ आदिवासी ग्राम मोहनपुरा और उसके 12 फलियों में फ्लोराइड की समस्या से लोग परेशान हैं। विश्व जल दिवस के उपलक्ष्य में 20 मार्च को ग्राम मोहनपुरा में समुदाय संवाद व विमर्श कार्यक्रम में ग्रामीणों ने फ्लोराइड उन्मूलन की बाधाओं की जानकारी दी। सबसे अहम बात थी कि इस आयोजन के माध्यम से वे इस बात के लिए एकजुट हुए हैं कि भविष्य में सरकारी योजना का लाभ उन्हें मिले, उसके लिए वे प्रयास शुरू करेंगे। आदिवासी अंचल के ग्राम में इस तरह की चेतना आना एक विशेष बात है। दूसरी ओर खुद ग्रामीणों ने बताया कि स्कूलों में बच्चों के लिए लगाए फ्लोराइड मुक्ति फिल्टर खराब पड़े हैं। साथ ही जिन हैंडपंपों का पानी पीने योग्य नहीं है, उनका मजबूरन पीने के पानी के लिए उपयोग करना पड़ रहा है।

यह सारी हकीकत ग्रामीणों ने बयां की है। 20 मार्च को ग्राम मोहनपुरा में इंडिया वाटर पोर्टल व अर्घ्यम संस्था द्वारा आयोजित संवाद व विमर्श के दौरान फ्लोराइड उन्मूलन पर चर्चा हुई। सबसे पहले ग्रामीणों को फ्लोराइडयुक्त पानी से लेकर स्वच्छ पानी की महत्ता और उनसे जुडे विषयों पर जानकारी दी गई।

अभिनव तरीके से बताया स्वच्छता का महत्व


ग्राम मोहनपुरा के तीन अलग-अलग स्थानों पर जाकर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समुदाय से चर्चा की। इसमें मोहनपुरा के दो फलिए यानी मोहल्ले और माली कुंडी ग्राम शामिल है। ग्रामीणों को बताया गया कि किस तरह से स्वच्छ पानी में मिट्टी डाल दी जाए तो वह पीने योग्य नहीं होता है। जबकि पानी में यदि नमक घोल दिया जाए तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता है। जबकि सही अनुपात में यदि नमक व शकर पानी में मिलाया जाए तो वह ओआरएस के जीवनरक्षक घोल का काम करता है। वहीं केवल शकर की अधिक मात्रा यदि पानी में मिला दी जाए तो वह शरबत जैसा काम करने लगता है। इस तरह की व्यावहारिक बातें बताकर फ्लोराइड की समस्या पर ध्यान आकर्षित किया। जब ग्रामीणों को बताया गया कि गांव के हैंडपंप से जो पानी मिल रहा है उसमें कोई मिलावट नहीं कर रहा है बल्कि धरती से जो कुदरती पानी आ रहा है उसी में यह फ्लोराइड मिल रहा है। भले ही पानी दिखने में गंदा नहीं है। उसमें कोई मिलावट भी नहीं दिखती। किंतु वह स्वच्छ पानी भी पीने योग्य नहीं है।

नहीं दिखता है फ्लोराइड


समुदाय से चर्चा में गट्टू मेडा, रमेश डावर, सीतारामभाई ने एक रोचक प्रश्न खड़ा किया। जिसमें उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता पूर्णांक शर्मा से प्रश्न किया कि जब शक्कर का स्वाद आ जाता है, नमक का खारापन महसूस होता है, गंदे पानी का रंग बदल जाता है तो फ्लोराइड क्यों नहीं दिखता या उसका स्वाद क्यों नहीं आता। फील्ड में काम करने वाले श्री शर्मा ने बताया कि फ्लोराइड एक ऐसा रसायन है जो कि सूक्ष्म आंखों से नहीं दिखाई देता। इसलिए इस बात की जानकारी रखना सरकार के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की जिम्मेदारी है। वही बताता है कि पानी में क्या गुणवत्ता संबंधी कमजोरी है। इस तरह ग्रामीणों की जिज्ञासा शांत हुई। वहीं इस मौके पर ग्रामीणों को बताया गया कि किस तरह से गांव के बच्चों के दांत खराब हो रहे हैं और हाथ-पैर तेड़े-मेड़े हो रहे हैं। यहां तक कि विमर्श में यह बात भी सामने आई कि दूध व सब्जियों का उपयोग किया जाए तो बच्चे से लेकर बड़े इस परेशानी से बच सकते हैं।

नहाने से लेकर अन्य उपयोग


इन दिनों मालवा में भी गर्मी का दौर शुरू हो चुका है। क्षेत्र के कार्यकर्ता सरदार डावर ने गांव के लोगों को बताया कि गर्मी में भूजल स्तर कम होते ही किस तरह से पानी का संकट खड़ा हो जाता है। इसलिए इस पानी को पीने की बजाए नहाने से लेकर अन्य निस्तारी काम के लिए उपयोग में लिया जा सकता है। इसके अलावा श्री डावर ने यह भी बताया कि कुएं व बावड़ी का पानी पीने के लिए सुरक्षित रखा जाए।

जब दो युवक ले आए फिल्टर


माली कुंडी ग्राम में संवाद का कार्यक्रम चल ही रहा था और समुदाय के दो युवा बीच कार्यक्रम में से उठे और स्कूल में लगा हुआ फिल्टर ले आए और उसकी समस्या बताने लगे। यह एक बड़ी उपलब्धि थी। इसकी वजह यह थी कि गांव के लोग फ्लोराइड की समस्या को समझ तो रहे थे किंतु उस पर आगे कोई बात नहीं आ पाती थी। प्राथमिक विद्यालय मालीकुंडी से लेकर जिले के अन्य विकासखंड के करीब 200 स्कूलों में इस तरह के फिल्टर उपलब्ध कराए गए थे किंतु ये फिल्टर अब केवल स्कूलों में अनावश्यक जगह घेर रहे हैं। इनकी अटाले जैसी स्थिति कर दी गई है।

महिलाओं ने बताई हैंडपंप की समस्या


मोहनपुरा गांव में एक हैंडपंप इस तरह का स्थापित किया है जिस पर मौका पड़ने पर मोटर से पानी खींचा जा सकता है। साथ ही बिजली नहीं होने पर उसे हैंडपंप के तौर पर ही उपयोग करने की सुविधा है। महिलाओं ने बताया कि मोटर चलती नहीं है और पानी स्वच्छ करने की कोई सुविधा ही नहीं है। महिलाओं ने विमर्श कार्यक्रम में बताया कि उन्हें कुएं से जो पानी मिल रहा है उसमें भी गंदगी रहती है।

जनसुनवाई की राह


इस मौके पर मुख्य रूप से विमर्श में यह बात सामने आई है कि तिरला विकासखंड के मोहनपुरा सहित दर्जनों गांव है जहां पर डेढ़ साल पहले पाइप लाइन बिछाई थी और वे अब जहां-तहां बिखरे पड़े हैं। विमर्श में वेलसिंहभाई व सीताराम ने कहा कि हम क्या करें यह समझ में नहीं आता है। पंचायतस्तर पर कोई सुनवाई नहीं होती है। इस पर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि प्रति मंगलवार को जिला मुख्यालय धार पर जनसुनवाई होती है और उसमें यदि कलेक्टर तक आवेदन पहुंचता है तो कार्रवाई होती है। ग्रामीणों ने एकजुट होकर यह संकल्प लिया है कि आगामी दिनों में वे जनसुनवाई की राह से अपने गांव की समस्या को हल करने का प्रयास करेंगे। इस मौके पर क्षेत्रीय कार्यकर्ता दीपेंद्रभाई, चेतन खडीकर आदि मौजूद रहे। अंत में आभार स्थानीय आयोजक रियल फिडबैक मीडिया द्वारा माना गया।

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