जल प्रदूषण : समस्या और समाधान

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Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान की पत्रिका 'जल चेतना', जुलाई 2013

प्रदूषित जल का मानव-जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रदूषित जल रोग जनित होता है। प्रदूषित जल जंतुओं पर बुरा प्रभाव डालता है। ऑक्सीजन की कमी से अक्सर मछलियां मर जाती हैं। अन्य जंतुओं पर ऑक्सीजन की कमी का बुरा असर पड़ता है। जिस कारण समुद्री जीवों में चालीस प्रतिशत की कमी पिछले बीस वर्षों में हुई है। समुद्र में तैलीय जल-प्रदूषण से जलचरों व पेड़-पौधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जल सभी जीवधारियों के लिए नितांत जरूरी है। पेड़-पौधे भी अपना भोजन जल के माध्यम से ग्रहण करते हैं। इसलिए ‘जल ही जीवन है’ कहना अतिश्योक्ति न होगा। प्रत्येक जीवधारियों की कोशिकाओं में नब्बे प्रतिशत से भी ज्यादा जल की मात्रा होती है। शरीर की समस्त क्रियाएं जल के माध्यम से ही होती हैं।

धरती की 75 प्रतिशत सतह जलमग्न है। जल हमारी फसल के लिए ही नहीं अपितु उद्योगों-रसायनों आदि के लिए भी बहुत आवश्यक है। पृथ्वी को जलीय-ग्रह की संज्ञा से विभूषित किया गया है। धरती के तापमान को सामान्य बनाए रखने में जल का बहुत बड़ा योगदान है, अन्यथा पृथ्वी पर तपिस इतनी बढ़ जाएगी कि जीवधारियों का रहना कठिन हो जाए। जल हमको कई रूपों में प्राप्त होता है। जल का सामान्य रूप द्रव है।

यह वायुमंडल में भाप के रूप में होता है, ध्रुवों में बर्फ के रूप में होता है तथा कभी-कभी यह ओस-ओला, कोहरा तथा पाले के रूप में भी दिखाई पड़ता है। दक्षिण गोलार्द्ध में 81 प्रतिशत जल तथा 19 प्रतिशत स्थल है। उत्तरी गोलार्द्ध में 54 प्रतिशत जल तथा 46 प्रतिशत स्थल है। जल को हम पांच तरीकों से जान सकते हैं- महासागरीय जल, अंतर्द्वीपीय जल, वायु मंडलीय जल, जैवमंडलीय जल तथा भूमिगत जल।

महासागरीय जल स्वाद में नमकीन होता है। प्रतिकिलोग्राम पर इसमें लवणता पैंतीस ग्राम औसतन होती है। क्योंकि सूरज की गर्मी महासागरों के जल पर निरंतर पड़ती रहती है, इसलिए वाष्पीकरण की क्रिया भी लगातार होती रहती है। जिसमें जल सदैव उड़ता रहता है तथा सागर के जल में लवणों की अधिकता हो जाती है। यह जल अनेक प्रकार के जीव-जंतुओं औव वनस्पतियों के लिए लाभदायक होता है, किंतु कुछ रासायनिक एवं जैविक उद्देश्य के लिए यह खारा पानी ठीक नहीं माना जाता है।

वर्षा के माध्यम से जल नदी, नालों, पोखरों, गड्ढों में एकत्र हो जाता है। पृथ्वी पर जल बर्फ की चादरों के रूप में भी एकत्रित रहता है। पर्वतीय क्षेत्रों में इसे देखा जा सकता है। बर्फ के रूप में धरती का दो तिहाई हिस्सा ढका रहता है, जो आहिस्ता-आहिस्ता पिघलकर नदियों, झीलों एवं जलाशयों में बहता रहता है। यह पानी ताजा और मीठा होता है। जिससे मनुष्य की जल-आपूर्ति होती है। इस जल को हम अंर्तद्वीपीय जल के नाम से संबोधित करते हैं।

इस जल की मात्रा वार्षिक होने वाली वर्षा पर निर्भर होती है। समुद्र और जलाशयों आदि का जल विकिरण क्रिया द्वारा सदैव वाष्प बनकर उड़ता रहता है। यह वाष्प वायुमंडल में मिल जाती है। लेकिन यह वाष्प वायुमंडल में एक निश्चित मात्रा में ही मौजूद रह सकती है। वायुमंडल में जल वाष्प की मात्रा उसकी आर्द्रता पर निर्भर होती है। जिसे अपेक्षित आर्द्रता कहा जाता है। इस जल को हम वायुमंडलीय जल कहते हैं।

वास्तव में जीवधारियों के लिए जल ही जीवन है। पेड़-पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से मिट्टी मे छिपे जल से अपना भोजन ग्रहण करते हैं। इस जल में पेड़-पौधों के लिए आवश्यक खनिज-लवण मौजूद रहते हैं। जल अधिक होने पर पेड़-पौधे अपनी पत्तियों के छिद्रों द्वारा अधिक पानी को भाप बनाकर उड़ा देते हैं। पेड़-पौधों की इस क्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। यह क्रिया मरूस्थलीय क्षेत्रों में कम तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक होती है। जीव-जंतु जल की जरूरत पेयजल द्वारा पूरी करते हैं। जीव-जंतुओं में जैव-रासायनिक क्रिया में जल का महत्वपूर्ण स्थान है।

धरती की सतह के नीचे जल की जानकारी मनुष्य को पुराने समय से रही है। इस जल को हम भूमिगत जल कहते हैं। इस भूमिगत जल को हम नलों, कुओं, हैंडपंपों आदि के माध्यम से प्राप्त करते हैं। यह पानी वर्षा द्वारा धीरे-धीरे रिस कर जमीन की सतह में पहुंच जाता है। बर्फ की परतों का पानी एवं नदी, झील, तालाब और बांधों का पानी भी धीरे-धीरे रिस कर जमीन में जाता रहता है।

जल के इस जल-चक्र को हम इस तरह से समझ सकते हैं। पहले सागरों तथा जलाशयों का पानी तपस के कारण वाष्प में परिवर्तित होता है फिर यहीं जल वाष्प वायुमंडल में मौजूद धूलकणों के ऊपर संघनित होकर बादलों को बनाती हैं जिससे बरसात होती है। वर्षा से यह वायुमंडलीय जल पुनः बूंदों, हिमपात, और ओस कणों के रूप में धरती पर आ जाता है और सागरों, जलाशयों आदि में जाकर मिल जाता है। इस तरीके से जल मंडल, वायु मंडल, स्थल मंडल और जैव मंडल के बीच परिसंचरण को जल चक्र के रूप में जानते हैं।

जल में अनेक प्रकार के खनिज तत्व, कार्बनिक, अकार्बनिक पदार्थ और गैसें घुली रहती हैं। यदि जल में यह पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में इकट्ठे हो जाते हैं तो पानी प्रदूषित होकर हानिकारक हो जाता है। जल की इस गुणवत्ता की कमी को ही हम जल प्रदूषण कहते हैं। जल मे भौतिक प्रदूषण रंग, स्वाद, गंध और ऊष्मीय गुणों में बदलाव की वजह से होता है।

रासायनिक-प्रदूषण पानी में रासायनिक-पदार्थों की वजह से उत्पन्न होता है तथा जैव-प्रदूषण पानी में हानिकारक सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी से उत्पन्न होता है। घरों का कचरा जैसे-नहाने, धोने, पोछा लगाने, सड़े फल, तरकारियों, साबुन और डिटर्जेंट आदि से जो कूड़ा-करकट और गंदा पदार्थ निकलता है वह साफ पानी से मिलकर पानी को प्रदूषित बनाते हैं।

पानी में रोग-जनक सूक्ष्म जीवों के मिल जाने से भी पानी प्रदूषित होता है जो मनुष्य के पीने लायक नहीं रह जाता है। इस प्रकार के पानी से पेट की तमाम बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं। जिन्हें हम जलोढ़ रोग कहकर संबोधित करते हैं। इसके अलावा औद्योगिक संयंत्रों से निकलने वाला बहिःस्रव, अपशिष्ट पदार्थ नदियों में छोड़ने में धात्विक तत्व के साथ अम्ल, क्षार, लवण, वसा, तेल और कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ भी पानी में मिल कर परेशानी पैदा करते हैं।

आज कृषि की वैज्ञानिक पद्धति के साथ-साथ रासायनिकों का प्रयोग खेती-किसानी में हो रहा है। आज रासायनिक उर्वरक, खरपतवारनाशी, कीट-नाशक और कवक-नाशक रासायनों का प्रयोग अधिक बढ़ा है। जिनके प्रयोग से ज्यादा डाला गया रसायन बहकर जलाशयों में पहुंच जाता है, जो जल मे गंभीर –प्रदूषण की विकट समस्या उत्पन्न करता है। जो तेलवाही जलयानों के तेल-विसर्जन से इनके दुर्घटनाग्रस्त होने से या इनमें आग लगने से तेल वाहक जहाजों से तेल उतारने या भरने से इसके अलाव समुद्र तटीय तेल कुओं से लीकेज होने पर उत्पन्न होती है। जल में रेडियो धर्मिता के कारण भी जल में प्रदूषण उत्पन्न होती है।

जब परमाणु बम विस्फोट किया जाता है तो उसके असंख्य रेडियोधर्मी कण वायुमंडल में फैल जाते हैं। आहिस्ता-आहिस्ता ये कण पृथ्वी के जल स्रोतों में रेडियोधर्मी पदार्थों का रिसाव करते रहते हैं। जिसके कारण वह जल मनुष्य के प्रयोग लायक नहीं रह जाता।

प्रदूषित जल का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रदूषित जल रोग जनित होता है। प्रदूषित जल जंतुओं पर बुरा प्रभाव डालता है। ऑक्सीजन की कमी से अक्सर मछलियां मर जाती हैं। अन्य जतुओं पर ऑक्सीजन की कमी का बुरा असर पड़ता है। जिस कारण समुद्री जीवों में चालीस प्रतिशत की कमी पिछले बीस वर्षों में हुई है। समुद्र में तैलीय जल-प्रदूषण से जलचरों व पेड़-पौधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

रसायनों से प्रदूषित जल पीकर मछलियां बीमार हो जाती हैं तथा जब इन्हें मानव खाता है तो वह भी बीमार पड़ जाता है। इसके अलावा विषैले रसायनों से प्रदूषित जल मनुष्य के उपयोग लायक नहीं रह जाता, ऐसे में पानी को पीकर जानवर भी बीमार पड़ जाते हैं। जल को आज हम विभिन्न आकार की छेद वाली लोहे की जालियों से गुजारते हैं, ताकि पानी से धातुओं के टुकड़े, कंकड़-पत्थर, बालु, लकड़ी तथा अन्य कूड़ा-करकट अलग हो जाए।

जल को गुरुत्वाकर्षण के आधार पर फिर ठोस कणों से पृथक किया जाता है। बड़े-बड़े टैंकों मे गंदे पानी में घुले ठोस कण नीचे बैठ जाते हैं। जिन्हें हम वैकुलम पंप की सहायता से निकाल देते हैं। कुछ पदार्थों का घनत्व जल से कम या बराबर होता है, ऐसी स्थिति में प्रदूषित पानी के अंदर हवा पास करके निराकरण किया जाता है। इसके अतिरिक्त क्रियाशील स्लज विधि और फुहार निस्यंदक विधि द्वारा भी हम जल के प्रदूषण को दूर कर सकते हैं।

‘केंद्रीय जल स्वास्थ्य इंजीनियरिंग संस्थान’ के अनुसार भारत में प्रति एक लाख व्यक्तियों में से तीन सौ साठ व्यक्तियों की मृत्यु आंत्रशोध थायराइड, पेचिश आदि से होती है। जिसका मूल कारण जल-प्रदूषण है। नगरों में शत-प्रतिशत निवासियों के लिए स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था नहीं हो पाती है।

भारत के अनेक शहरों में पेयजल प्रबंध नजदीकी नदी से किया जाता है। प्रायः इसी नदी में शहर का कूड़ा-करकट, मल-मूत्र, कारखानों आदि से निकलने वाला अपशिष्ट पदार्थों को बहाया जाता है। जिसकी वजह से हमारे देश की तमाम नदियों का पानी प्रदूषित होता जा रहा है।

जल-प्रदूषण के निवारण एवं नियंत्रण के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1974 से ‘जल-प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम’ लागू किया है। जल-प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। जल-प्रदूषण का निवारण, हम और हमारी जागरूकता है। समय के रहते हमें इसका निदान ढूंढना होगा।

संपर्क
डॉ. सुरेश उजाला, सम्पादक-उत्तर प्रदेश (मासिक), सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, लखनऊ- (उ.प्र.), मो. 09451144480