सामाजिक-आर्थिक पर्यावरण संवर्धन विकास का आधार

Submitted by admin on Fri, 04/11/2014 - 10:18
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पर्यावरण विमर्श

पर्यावरण को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क्षति पहुंचाने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है-आवास। वर्तमान में जब गांव की जनसंख्या शहर की ओर पलायन कर रही है, तब नई तकनीक द्वारा कम खर्च में मकान बनाने की जद्दोजहद में आवास निर्माण के दौरान पर्यावरण को गहरी क्षति पहुंचाई जा रही है। किसी भी वास्तुकार ने तथाकथित आधुनिक निर्माण की तकनीकों और मकानों की रचनाओं का पर्यावरण के प्रभाव के संदर्भ में विचार किया ही नहीं है।

मानव का अस्तित्व वनस्पति और जीव-जंतु के अस्तित्व पर निर्भर है। हमारे आसपास के वृक्ष, जल और वायु एवं विभिन्न प्राकृतिक कारकों को हम पर्यावरण के रूप में जानते हैं। मनुष्य इन प्राकृतिक कारकों का उपयोग अपने विकास हेतु करता आया है। लेकिन आज मनुष्य विकास की राह में आंख मूंदकर इस तरह आगे बढ़ रहा है कि पर्यावरण की क्षाति को नजरअंदाज कर रहा है। देश में पर्यावरण की साज-संभाल की कोशिशें इतनी कम हैं कि हमारे देश का नहीं, बल्कि विश्व का पर्यावरण प्रदूषण भी उस कगार पर जा पहुंचा है कि वह निकट भविष्य में अपनी क्षति का बदला विनाशरूपी ऐसे ताडंव के रूप में लेगा, जिसका नियंत्रण मानवीय शक्ति द्वारा किए गए किसी भी तकनीकी विकास से असंभव होगा।

पिछले तीस साल का अनुभव तो साफतौर पर यही बताता है कि पर्यावरण संवर्धन के बिना संतुलित आर्थिक विकास नहीं हो सकता। पर्यावरण का अर्थ केवल जमीन, हवा या पानी भर नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण में वे समस्त प्राकृतिक संसाधन हैं, जिन पर हमारा जीवन टिका हुआ है और आगे बढ़ रहा है। बिगड़ता पर्यावरण सीधे-सीधे आर्थिक असमानता की खाई को और अधिक बढ़ाता है और इसकी सीधी चोट सबसे ज्यादा गरीब पर पड़ती है। बिगड़ता पर्यावरण और सामाजिक अन्याय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वास्तव में हम आर्थिक और सामाजिक विकास का कैसा रूप चुनते हैं, यह इसी पर निर्भर करेगा कि हमने विकास हेतु पर्यावरण का दोहन किस रूप में किया हैं? लोगों के लिए पर्यावरण का मतलब कुछ सुहावनी प्राकृतिक चीजों का शौकिया संरक्षण है, जबकि वह एक ऐसा विस्तृत संसाधन है, जिस पर उनकी रोजमर्रा की आर्थिक जिंदगी, सामाजिक उन्नति और आध्यात्मिक प्रेरणा टिकी हुई है।

भारत के संदर्भ में कहा जाता है कि वह प्राकृतिक संसाधनों से धनी, लेकिन गरीबों का देश है। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में पर्यावरण के हर अंग पर न जाने कितनी तरह से लोगों और समूहों का अस्तित्व टिका है। जब भी पर्यावरण का कोई एक अंग बर्बाद होता है तो समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को अपूरणीय क्षति होती है और दूसरा धनाढ्य वर्ग उस पर अपना आधिपत्य जमा लेता है। उदाहरण के लिए तेजी से नष्ट होते जा रहे हैं- वन, चरागाह, नदियां और समुद्र के तटवर्ती हिस्सों के प्रदूषण से न सिर्फ लाखों आदिवासियों, घुमंतु लोगों बंजारों और मछुआरों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी है, बल्कि उनकी सामाजिक-संस्कृति मृत्यु के कगार पर खड़ी हो गई है।

भारत के दक्षिण प्रदेश तमिलनाडु और कर्नाटक में एक बहुत बड़ी जनसंख्या बांस की टोकरी बनाकर गुजारा करती थी, लेकिन आधुनिक तकनीकी विकास और बांसों के व्यावसायिक प्रयोग ने न केवल बसोड़ परिवार पर कहर ढाया, अपितु उनकी संस्कृति को ही नष्ट कर दिया। देश की वन नीति का आदिवासियों के जीवन और संस्कृति पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ा है। चरागाह के समापन ने डेरा की घुमंतु जातियों को समापन के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। मछली पकड़ने के आधुनिक यंत्रों और जालों के कारण परंपरागत मछुआरे पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।

राष्ट्रीय वन-नीति के अनुसार देश का एक-तिहाई भौगोलिक क्षेत्र वनाच्छादित होना चाहिए। वन विनाश के कारण पर्यावरण में गिरावट, बाढ़, भूस्खलन, सूखा, भूक्षरण, बेरोजगारी एवं वनवासियों की गरीबी की समस्या का हमें एक साथ सामना करना पड़ रहा है। परंपरागत मछुआरों को पर्यावरण रचना का इतना समग्र और वैज्ञानिक ज्ञान था कि वे पर्यावरण से सामंजस्य स्थापित कर अपना कार्य करते थे, लेकिन यांत्रिकी जाल ने उन मछुआरों को बेकार और पलायनवादी बना दिया, जहां और यंत्रों के प्रदूषण के लपेट में समुद्री जीव-जंतु वनस्पतियों को खतरा उत्पन्न हो गया है, वहीं लाखों लोगों की जीविका भी छिन गई है।

घुमंतु चरवाहों में गूजरों द्वारा पाले जाने वाले पशुओं में इतनी विविधता है कि सारे संसार में इस मामले में भारत का स्थान विशिष्ट था। घुमंतु लोगों में कुछ लोग राजस्थान और गुजरात में ऊंट, लद्दाख में याक, आंध्र प्रदेश में सूअर पालते हैं, शेष घुमंतु सूखे और अधसूखे इलाकों तथा हिमालय क्षेत्र में भेड़ बकरी, भैंस और गाय पालते हैं। परंतु घुमंतु की लगभग 200 जातियां भारत में पाई जाती हैं, जो कुल जनसंख्या का 6 प्रतिशत हैं, लेकिन विकास योजनाओं में कभी इनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया। लगातार समाप्त होते जा रहे चरागाह ने इन्हें लाचार और पलायनवादी बना दिया है। परिणामस्वरूप पर्यावरण की दृष्टि से सीमांत इलाकों में घुमंतु प्रजाति द्वारा उत्पादन की एक सटीक पद्धति के साथ उनसे होने वाली आय का स्रोत भी समाप्त हो जाएगा।

भारत में लगभग पांच करोड़ से अधिक आदिवासी हैं, जो एक समय समूचे भारत में फैले हुए थे और आज एकांत कोनों में अपनी जिंदगी जी रहे हैं। पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक विकास योजनाएं भारतीयों के जीवन की मुख्य धारा में थोड़ी अस्त-व्यस्तता पैदा करके रह जाती होंगी, परंतु आदिवासियों की संस्कृति और समाज-व्यवस्था के लिए तो वे मृत्यु-समान हैं। तेज औद्योगिक विकास, नागरीयकरण, सड़क निर्माण आदि के कारण भारत ने तीव्र औद्योगिक विकास तो किया, लेकिन इससे प्रदूषण बढ़ा है, वनों का नाश हुआ है और देश का पर्यावरण सतुलन बिगड़ा है। भारत के आदिवासी जो पर्यावरण के इस परिवर्तन को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाए। इस प्रगति के लिए भारी मूल्य चुका रहे हैं।

वर्तमान विकास की प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का यह ढांचा न केवल पर्यावरण पर हमला कर वन्य जीवों, वनों, मछलियों आदि को तो बर्बाद कर ही रहा है, साथ में इसकी चपेट में समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग (गरीब एवं कमजोर) भी आता है। विकास की इस अंधी दौड़ में जब आदमी आदमी की चिंता नहीं करता तो उससे पर्यावरण की चिंता की उम्मीद रखना बेकार है। दुनिया की सांस्कृतिक विविधता का मूल आधार पर्यावरण ही है। आज इन दोनों पर खतरा मंडरा रहा है और कारण एक है, उपभोगवादी प्रवृत्ति।

पर्यावरण को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क्षति पहुंचाने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है-आवास। वर्तमान में जब गांव की जनसंख्या शहर की ओर पलायन कर रही है, तब नई तकनीक द्वारा कम खर्च में मकान बनाने की जद्दोजहद में आवास निर्माण के दौरान पर्यावरण को गहरी क्षति पहुंचाई जा रही है। किसी भी वास्तुकार ने तथाकथित आधुनिक निर्माण की तकनीकों और मकानों की रचनाओं का पर्यावरण के प्रभाव के संदर्भ में विचार किया ही नहीं है। उदाहरण के लिए भारत में खुले आंगन वाले मकान, विशेषत: शहरों में और अब धीरे-धीरे गांवों से भी गायब होते जा रहे हैं। खुले आंगन के कारण घर की हवा शुद्ध रहती थी और गर्मियों में घर ठंडे रहते थे। नई तरह के मकान गर्मियों में खूब गर्म और जाड़ों में खूब ठंडे हो जाते हैं और उष्णकटिबंध के भूभाग में ऐसे मकानों में रहना मुश्किल हो जाता है। इस कारण बिजली के पंखे, वातानुकूलन और हीटर आदि कृत्रिम और गैर जरूरी चीजों का उपयोग अनिवार्य हो रहा है।

एक प्रमुख हिंदी दैनिक नई दुनिया ने बड़े दुःख के साथ लिखा है कि आधुनिक लिबास की तरह आधुनिक मकान भी एक फैशन बन गया है। केवल आहार एक ऐसा मामला रह गया है, जिसमें हमने अभी तक भारतीयता कायम रखी है। हमारे सिविल इंजीनियरों के सारे अध्ययन का एक विषय यही है कि इस्पात से सीमेंट को कैसे मजबूत बनाया जाए, लेकिन बांस के उपयोग से मिट्टी की दीवारें भी मजबूत बन सकती हैं। इस बारे में कभी नहीं सोचा। यह ऐसा विषय है, जिसे केवल ग्रामीण लोग ही जानते हैं। यदि स्कीमों लोग आर्कटिक टुंड्रा में बर्फ के ऐसे मकान बना सकते हैं, जो उनको गर्म रख सकते हैं तो हम ऐसे मकान क्यों नहीं बना सकते जो हमारे मौसम के अनुकूल हों।

आज की विकासशैली में उपभोग का ढांचा कुछ ऐसा है कि वह लोगों को उसके आस-पास के पर्यावरण से तोड़ता जा रहा है। यह टूटन ऐसा भयानक रूप ले चुकी है, जिसमें मां द्वारा बच्चों को स्तनपान कराने जैसी निहायत सहज और प्राकृतिक आदत एवं मौलिक जरूरत बहुराष्ट्रीय कंपनी के डिब्बे बंद दूध पाउडर के कुचक्र में फंसकर समाप्त होते जा रही है। विज्ञान और तकनीकी के विकास में आज हम बाकी दुनिया के साथ बराबरी की हैसियत में बैठे हैं, लेकिन यह कहीं हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को ही नष्ट करने का आधार न बन जाए।

विकास वह प्रक्रिया है, जो हर व्यक्ति को स्वावलंबी बनाता है, जिसमें समाज और राष्ट्र स्वावलंबी बनता है। यह स्वावलंबन तब तक पूर्ण नहीं होता, जब तक व्यक्ति और व्यक्ति एवं पर्यावरण के बीच संबंधी मधुर एवं मजबूत नहीं होंगे।

आज भारत के योग और आयुर्वेद का लोहा संपूर्ण विश्व मान रहा है। भारत की मेधाओं ने राष्ट्र की सीमा लांघकर दूसरे देशों में अपनी प्रतिभा का झंडा गाड़ा है। इसलिए स्व-विकास के लिए हमें पूर्वी, पश्चिमी, उत्तरी या दक्षिणी देशों पर निर्भर न होकर स्वयं इस ओर कदम बढ़ाना होगा और भारत के विकास के लिए एक ऐसा रास्ता निकालना होगा, जिसमें पर्यावरण के साथ सामंजस्य कर, प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का उचित प्रयोग विभिन्न संस्कृतियों और जीवनशैली के प्रति आदर-भाव के साथ किया जाए, जो चिर-स्थाई एवं न्यायपूर्ण हो। यदि हम महात्मा गांधी के इस कथन को ध्यान में रखें, “यह धरती हरेक की जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी एक के लालच को नहीं।”

संदर्भ


1. वन आदिवासी एवं पर्यावरण, डॉ. डी. एन. तिवारी, संस्करण 2002
2. पर्यावरणीय मनोविज्ञान, प्रेमसागर नाथ तिवारी, संस्करण 1997
3. पर्यावरण : प्रदूषण, वेद प्रकाश, संस्करण 2002
4. पर्यावरण व जैव प्रौद्योगिकी, डॉ प्रवीण चंद्र त्रिवेदी/डॉ. मंजु शर्मा, संस्करण 2007

प्राचार्य,
स्वामी स्वरूपानंद इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन
हुडको, भिलाई

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