कितना जहरीला ‘ड्रैगन’ का विकास

Submitted by admin on Wed, 04/16/2014 - 09:12
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जिस चीनी विकास की दुहाई देते हम नहीं थक रहे, उसी चीन के बीजिंग, शंघाई और ग्वांगझो जैसे नामी शहरों के बाशिंदे प्रदूषण की वजह से गंभीर बीमारियों के बड़े पैमाने पर शिकार बन रहे हैं। चीन के गांसू प्रांत के लांझू शहर पर औद्योगीकरण इस कदर हावी है कि लांझू चीन के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है। लांझू शहर को आपूर्ति किए जा रहे पेयजल में बेंजीन की मात्रा सामान्य से 20 गुना अधिक पाई गई यानी एक लीटर पानी में 200 मिलीग्राम! बेंजीन की इतनी अधिक मात्रा सीधे-सीधे कैंसर को न्योता है।

जनप्रतिनिधित्व को राजयोग या राजभोग समझने का राजरोग जहर है। ऐसा राजरोगी बनने के लिए वोट को मजहब में बांटना जहर है। ईर्ष्या करना जहर है। अन्याय व हिंसा जहर है। दूसरे से कर्ज लेकर पी जाना जहर है। जरूरत से ज्यादा किया गया भोजन जहर है। ठीक इसी तरह किसी भी संज्ञा या सर्वनाम का जरूरत से ज्यादा किया गया दोहन भी एक दिन जहर ही साबित होता है। ये सभी बातें हमारी आने वाली सरकार को अभी से अच्छी तरह रट लेनी चाहिए; वरना राजनीति जहरीली हो चाहे न हो, यह धरती जहरीली जरूर हो जाएगी। यह बात खासतौर पर नरेन्द्र मोदी जी को तो अच्छी तरह समझ ही लेनी चाहिए। खासतौर पर नरेन्द्र मोदी जी को इसलिए कहा जा रहा है कि अगले प्रधानमंत्री वही होंगे।

राहुल गांधी जी भले ही यह कह रहे हों कि यदि हम हिंदू-मुसलमां होकर लड़ने की बजाए पूरी शक्ति से काम में लग जाएं, तो अगले कुछ सालों में चीन को पीछे छोड़ देंगे; लेकिन आने वाली सरकार को यह जिद्द नहीं करनी चाहिए। सरकार को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि भारतीय विकास का भावी माॅडल चाहे जो हो, वह चीन सरीखा तो कतई नहीं हो सकता। चीनी अर्थव्यवस्था का माॅडल घटिया चीनी की तरह है; जिसका उत्पादन, उत्पादनकर्ता, उपलब्धता और बिक्री बहुत है, किंतु टिकाऊपन की गारंटी न के बराबर। चीन आर्थिक विकास की आंधी में बहता एक ऐसा राष्ट्र बन गया है, जिसे दूसरे के पैसे और सीमा पर कब्जे की चिंता है; अपनी तथा दूसरे की जिंदगी व सेहत की चिंता कतई नहीं। यह मैं नहीं कह रहा; खुद चीन के कारनामें कह रहे हैं।

यह सच है कि चीन ने अपनी आबादी को बोझ समझने की बजाए एक संसाधन मानकर बाजार के लिए उसका उपयोग करना सीख लिया है। यह बुरा नहीं है। ऐसा कर भारत भी आर्थिक विकास सूचकांक पर और आगे दिख सकता है। किंतु विकास के तमाम अन्य मानकों की अनदेखी करके यह करना खतरनाक होगा। त्रासदियों के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक दौड़ में आगे दिखता चीन प्राकृतिक समृद्धि, सेहत और सामाजिक मुसकान के सूचकांक में काफी पिछड़ गया है। उपलब्ध रिपोर्ट बताती हैं कि चीनी सामाजिक परिवेश में तनाव गहराता जा रहा है। जनवरी, 2013 से अगस्त, 2013 के आठ महीनों में करीब 50 दिन ऐसे आए, जब चीन के किसी न किसी हिस्से में कुदरत का कहर बरपा। औसतन एक महीने में छह दिन! बाढ़, बर्फबारी, भयानक लू, जंगल की आग, भूकंप, खदान धंसान और टायफून आदि के रूप में आई कुदरती प्रतिक्रिया के ये संदेश कतई ऐसे नहीं हैं कि इन्हें नजरअंदाज किया जा सके।

सिर्फ छह जनवरी, 2013 की ही तारीख को लें तो व्यापक बर्फबारी से सात लाख, 70 हजार लोगों के प्रभावित होने का आंकड़ा है। प्रदूषण की वजह से चीन की 33 लाख हेक्टेयर भूमि खेती लायक ही नहीं बची। ऐसी भूमि मे उत्पादित फसल को जहरीला करार दिया गया है। तिब्बत को वह ’क्रिटिकल जोन’ बनाने में लगा ही हुआ है। खबर है कि अपने परमाणु कचरे के लिए वह तिब्बत को ‘डंप एरिया’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। तिब्बत में मूल स्रोत वाली नदियों में बहकर आने परमाणु कचरा उत्तर पूर्व भारत को बीमार ही करेगा। ऐसे नजारे संयुक्त राष्ट्र देशों के भी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष-2013 में प्राकृतिक आपदा की वजह से 192 बिलियन डाॅलर खो दिए। अब वे अपना देश बचाने के लिए ज्यादा कचरा फेंकने वाले उद्योगों को दूसरे ऐसे देशों में ले जा रहे हैं, जहां प्रति व्यक्ति आय कम है। क्या ये किसी अर्थव्यवस्था के ऐसा होने का संकेत हैं कि उससे प्रेरित हुआ जा सके? ऐसी मलीन अर्थव्यवस्था में तब्दील हो जाने की बेसब्री भारत की सरकारों में भी दिखाई दे रही है। क्या भारत को इससे बचना नहीं चाहिए?

गौरतलब है कि जिस चीनी विकास की दुहाई देते हम नहीं थक रहे, उसी चीन के बीजिंग, शंघाई और ग्वांगझो जैसे नामी शहरों के बाशिंदे प्रदूषण की वजह से गंभीर बीमारियों के बड़े पैमाने पर शिकार बन रहे हैं। चीन के गांसू प्रांत के लांझू शहर पर औद्योगीकरण इस कदर हावी है कि लांझू चीन के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है। अभी बीते 11 अप्रैल को ही घटना है। लांझू शहर को आपूर्ति किया जा रहा पेयजल इतना जहरीला पाया गया कि आपूर्ति ही रोक देनी पड़ी। आपूर्ति जल में बेंजीन की मात्रा सामान्य से 20 गुना अधिक पाई गई यानी एक लीटर पानी में 200 मिलीग्राम! बेंजीन की इतनी अधिक मात्रा सीधे-सीधे कैंसर को अपनी गर्दन पकड़ लेने के लिए दिया गया न्योता है। प्रशासन ने आपूर्ति रोक जरूर दी, लेकिन इससे आपूर्ति के लिए जिम्मेदार ‘विओलिया वाटर’ नामक ब्रितानी कंपनी की जिम्मेदारी पर सवालिया निशान छोटा नहीं हो जाता। भारत के लिए इस निशान पर गौर करना बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि यह वही विओलिया वाटर है, जिसकी भारतीय संस्करण बनी ‘विओलिया इंडिया’ नागपुर नगर निगम और दिल्ली जल बोर्ड के साथ हुए करार के साथ ही विवादों के घेरे में है।

सरकारी के स्थान पर निजी कंपनी को लाने के पीछे तर्क यही दिया जाता है कि गुणवत्ता सुधरेगी और सेवा का स्तर ऊंचा होगा। प्रश्न यह है कि यदि ‘पीपीपी’ के बावजूद गुणवत्ता की गारंटी नहीं है; यदि निजी कंपनी को सौंपे जाने के बावजूद दिल्ली का सोनिया विहार संयंत्र अक्सर दिन में एक बार गंदला पानी ही नलों तक पहुंचाता है, तो फिर ‘पीपीपी’ किस काम की? अनुभव बताते हैं कि ‘पीपीपी’ का मतलब परियोजना लागत का जरूरत से ज्यादा बढ़ जाना है। परियोजना लागत के बढ़ जाने का मतलब ठीकरा बिलों और करों के जरिए जनता के सिर फूटना है। यदि चीन जैसे सख्त कानून वाले देश में ‘विओलिया वाटर’ जानलेवा पानी की आपूर्ति करके भी कायम है; इससे ‘पीपीपी’ माॅडल में भ्रष्टाचार की पूरी संभावना की मौजूदगी का सत्य स्थापित होता ही है। बावजूद इसके यदि भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में उक्त तीन पी के साथ लोगों को जोड़कर चार पी यानी ‘पीपीपीपी’ की बात कही गई है तो अच्छी तरह समझ लीजिए ‘मनरेगा’ की तरह ‘पीपीपीपी’ भी आखिरी लाइन में खड़े व्यक्ति को बेईमान बनाने वाला साबित होगा। अतः कम से कम बुनियादी ढांचागत क्षेत्र के विकास व बुनियादी जरूरतों की पूर्ति वाले सेवाक्षेत्र में यह माॅडल नहीं अपनाना चाहिए।

निजी कंपनी का काम मुनाफा कमाना होता है। वह कमाएगी ही।’कारपोरेट सोशल रिसपोंसबिलिटी’ का कानूनी प्रावधान भले ही हो, बावजूद इसके ‘शुभ लाभ’ की जगह ‘अधिकतम लाभ’ के इस मुनाफाखोर युग में किसी कंपनी से कल्याणकारी निकाय की भूमिका निभाने की अपेक्षा करना गलत है। एक कल्याणकारी राज्य में नागरिकों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सरकार की जिम्मेदारी होती है। इसे सरकार को ही निभाना चाहिए। जरूरत प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायीकरण से होने वाले मुनाफे में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी के प्रावधान करने से ज्यादा, प्राकृतिक संसाधनों का शोषण रोकने की है। किंतु क्या सरकार बनाने का दावा कर रही भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में हवा में आॅक्सीजन, प्राकृतिक टापुओं में प्राकृतिक वन, शहरों में हरियाली, मिट्टी में नमी और भूगर्भ में शुद्धतम जलभंडार बढ़ाने की कोई ठोस योजना शामिल है? नहीं! धरती का शोषण और हवा-पानी-मिट्टी में बढ़ता प्रदूषण रोकने की कोई संजीदा योजना भी भाजपा घोषणापत्र में दिखाई नहीं देती। अलबत्ता 100 नये शहरों और तोड़क ‘नदी जोड़’ के जरिए प्राकृतिक शोषण को बढ़ाने की घोषणा इस घोषणापत्र में जरूर की गई है।

ताज्जुब है कि समंदर के बढ़ते तापमान की चेतावनी की अनदेखी कर कोई जिम्मेदार पार्टी या सरकार कैसे कर सकती है? समंदर में बढ़ते ताप की ताजा चेतावनी साफ है। आगे प्रकृति और सेहत पर खतरा गहराएगा। जैव विविधता पर संकट उन्नत चाल में चलेगा। मार्च-अप्रैल के महीने में बार-बार झुक आए बदरा बता ही रहे हैं कि खेती को राम भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इन तीनों का रोजगार, आर्थिक विकास दर और हमारे होठों पर स्थाई मुसकान से गहरा रिश्ता है। इस रिश्ते की गुहार यह है कि अब भारत प्राकृतिक संसाधन समृद्धि विकास दर को घटाए बगैर आर्थिक विकास दर बढ़ाने वाला माॅडल चुने। इस समय की समझदारी और सीख यही है कि सरकारें धन का घमंड छोड़ पूरी धुन के साथ विकास की एक ऐसी रूपरेखा को अंजाम देने में जुट जाएं कि जिसमें कुदरत के घरौंदें भी बचें और हमारी आर्थिक, सामाजिक व निजी खुशियां भी। वरना याद रखें कि प्रकृति, सेहत, खेती और रोजगार पर संकट अकेले नहीं आते, अनैतिकता और अपराध को ये साथ लाते हैं।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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