कार, ट्रक व विवाह : भारत की नई महामारियां

Submitted by admin on Sun, 04/20/2014 - 09:55
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सर्वोदय प्रेस सर्विस, अप्रैल 2014
भारत में ध्वनि प्रदूषण को लेकर जिस तरह की लापरवाही बरती जा रही है वह धीरे-धीरे महामारी का रूप लेती जा रही है। दिन में कारों और मोटरसाइकलों का शोर और रात में ट्रकों व शादियों में बजने वाले लाउडस्पीकर आम नागरिक को न केवल बीमार कर रहे हैं बल्कि उसकी कार्यक्षमता पर भी विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं। भारत भर के अस्त-व्यस्त शहरों एवं नागरिकों पर दम घोटू धुआं और बदबूदार कचरे के ढेरों के साथ ध्वनि विस्तारक और कारों, ट्रकों और चिंघाड़ती बसों से बमबारी करते हार्न लगातार आक्रमण करते रहते हैं। लाउडस्पीकरों का उपयोग राजनीतिक विचार फैलाने, खर्चीली, तयशुदा और लंबी शादियों को मनाने व उन्हें प्रचारित करने के लिए और मंदिरों और मस्जिदों के ठीक बाहर लगाकर शोर के साथ मुक्ति का सही मार्ग बताने के लिए किया जाता है।

शहरों और नगरों में ध्वनि प्रदूषण असहनीय होता जा रहा है और यह लोगों के स्वास्थ्य को जबर्दस्त प्रभावित कर रहा है। इस वजह से सुनने की समस्या, नींद में गड़बड़ी, हृदय रोग, कार्यस्थल एवं विद्यालयों में कार्यक्षमता में दिक्कतें आदि उस सामाजिक महामारी के कुछ लक्षण हैं, जिससे राष्ट्रभर में न केवल तनाव में वृद्धि हो रही है, बल्कि पर्यावरण का हृास भी हो रहा है।

किसी समय उत्सवधर्मिता को इस असाधारण राष्ट्र के आकर्षण का एक हिस्सा माना जाता था। लेकिन निम्नस्तरीय सेनीटेशन, बदबूदार झुग्गी बस्तियां और खुले सीवर के बाद शोर, वायु एवं जल प्रदूषण को अब एक प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दा माना जाने लगा है और इस पर तुरंत सरकारी व सामुदायिक कार्रवाई की मांग की जा रही है।

हार्न की आवाज


विश्व के सबसे शोर भरे शहरों को लेकर हुए सर्वेक्षण में भारत को तीनों, स्वर्ण, रजत व ताम्र पदक प्राप्त हुए हैं। इसमें यहां की राजधानी दिल्ली प्रथम आई है, जिसमें 70 लाख से अधिक वाहन (भारत के तीन अन्य महत्वपूर्ण शहरों के वाहनों के योग के बराबर) प्रतिदिन सड़कों पर होते हैं। इसके तुरंत बाद भारत का सबसे अधिक जनसंख्या वाला (2.1 करोड़) एवं सर्वाधिक समृद्ध शहर मुंबई और उसके बाद कोलकाता आता है। गौरतलब है कि कर्कशता में सर्वाधिक योगदान कार एवं मोटर साइकलें करती हैं। यहां वाहन चालन को शोरभरा बना दिया गया है और बजाए पीछे (बैकव्यू) देखने वाले कांच के प्रयोग के, आगे निकलने या ओवर टेक करने का प्रयास किया जाता है।

“बीसीसी”, के अनुसार मुड़ने के दौरान या किसी चौराहे, दोराहे पर पहुंचकर रफ्तार धीमी करने के बजाए ड्राइवर तेज हार्न बजाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वे साइकल चालक, पदयात्री, बच्चों, कुत्तों, गायों और उन सभी को, जो दुर्भाग्यवश उनसे धीमे चलते हैं के कान में जोर से भोंपू बजाते हैं। हर ट्रक के रंगीन पिछवाड़े पर अनिवार्य रूप से यह नारा लिखा होता है कि “जोर से हार्न बजाएं”। ऐसा जंक्शन जहां से ड्राइवर को सीधे हाथ की ओर मुड़ना हो वहां की सभी लेन भले ही सीधे जाने वाली क्यों न हो, पर वह बाधा खड़ी कर देता है और गुस्से और तेजी से हार्न बजाने में लीन हो जाता है।

विद्यालयों एवं अस्पतालों के आसपास हार्न बजाने की अनुमति नहीं है, लेकिन यह भी एक ऐसा कानून है जिसे व्यापक रूप से लागू नहीं किया गया है और खतरनाक तरीके से इसकी अनदेखी की गई है। छोटे कुत्तों की ही तरह छोटे वाहन सबसे ज्यादा शोर करते हैं। ये बहुत खतरनाक तरीके से शहरों में दौड़ते हैं और अनपेक्षित रूप से एकाएक आपके सामने सड़कों पर प्रकट हो जाते हैं।

दिनभर व्यस्त रही सड़कें रात में सूनी तो होती हैं, लेकिन इस दौरान ट्रक उन पर जबरिया काबिज हो जाते हैं। यह “सड़कों के राजा” 118 डेसीबल के अपने हार्न जो कि आकाशी बिजली की गड़गड़ाहट के बराबर होता है, से इन सड़कों पर राज करते (शहरी क्षेत्रों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश 50 डेसीबल के करीब के हैं और 85 डेसीबल से ऊपर का कैसा भी शोर कानों को नुकसान पहुंचा सकता है) हुए सभी छोटे एवं शांत वाहनों एवं नींद लेने वाले लोगों के ऊपर अपने प्रभुत्व का नगाड़ा पीटते गुजरते हैं।

शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में वाहन चलाना भयानक जोखिमभरा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत में सन् 2010 में सड़क दुर्घटनाओं के 2,31,027 व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी। परिवार या तीन, चार या पांच लोग विद्यालय के बस्ते या रोजमर्रा की खरीदी के साथ आपको एक ही मोपेड या मोटरसाइकल पर दिखाई पड़ जाएंगे। इतना ही नहीं उनके सिर पर आपको हेलमेट (यह भी एक लागू न होने वाला कानून है) भी दिखाई नहीं देगा। बहुत खराब रख-रखाव वाली व क्षमता से बहुत अधिक भरी बसें अपनी कमाई बढ़ाने के लिए हार्न के सहारे तेज रफ्तार से एक स्टाप से दूसरे बस स्टाप के बीच में अंधाधुंध दौड़ती नजर आती हैं। यदि नियमन की बात करें त¨ सड़क पर किसी भी तरह की विनम्रता कमोवेश यहां नदारद है।

भारत में कानूनों को विदेशी मेहमानों के समक्ष उदार गहनों की तरह प्रस्तुत किया जाता है और बाद में उनसे लोकतांत्रिक धूल इकट्ठा करने को कह दिया जाता है। दिल्ली से लेकर नीचे तक के सभी राजनीतिज्ञों ने भ्रष्टाचार एवं बेईमानी का स्वर फैलाकर समाज के सभी वर्गों यानि ट्रक ड्राइवर से लेकर कारपोरेट के लोगों तक को यह संदेश दे दिया है कि कानून का कोई अर्थ नहीं है। न तो उन्हें लागू करने के लिए और न ही उनका पालन करने के लिए किसी को बाध्य किया जाएगा।

अंधेरा होने के बाद आपको तब बहुत ही रंगीन शोर दिखाई पड़ता है जब अंधेरी सड़कों पर मोटर साइकल, कार, ट्रक और ट्रेक्टर भी बिना अपनी हेडलाइट के और अक्सर गलत दिशा में चलते दिखाई पड़ते हैं। यह शोरभरी लापरवाही व नियमों की अवहेलना से भरा वाहन चालन न केवल खतरनाक है बल्कि यह कईयों के लिए मौत का सामान भी बन जाता है। वैसे यह सभी के लिए जोखिम भरा तो है ही।

ध्वनि प्रदूषण, फिर वह नाराज ट्रकों व कारों का कोरस हो या चार दिन लंबी शादी का या चुनावी राजनीति का, कुल मिलाकर अस्वास्थ्यकर, अरुचिकर और नागरिकों की निजता का जबर्दस्त अतिक्रमण है।

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