पारिस्थितिक तंत्र एवं पर्यावरण प्रदूषण

Submitted by admin on Sun, 04/20/2014 - 10:37
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पर्यावरण विमर्श
विकासशील देशों की पर्यावरणीय समस्याएं, समृद्ध और औद्योगिक रूप से विकासशील देशों की समस्याओं से बिल्कुल अलग-थलग है, जहां प्रदूषण की समस्या मुख्य है। विकासशील देशों की स्थिति राजा टांटालस की स्थिति जैसी ही है, जिसे देवताओं के आदेश की अवमानना के जुर्म में भूख और प्यास की त्रासदी झेलनी पड़ी थी। उसे समस्त जल और खाद्य सामग्री के होते हुए भी भूख और प्यास त्रसित था। अंतरिक्ष से सुदूर ग्रह में करोड़ों वर्षों से मानव जीवन का संधारण और संवर्धन हुआ है। परंतु आज की परिवर्तनशील परिस्थिति में पर्यावरण पर हुए घटनाओं ने मानव जीवन को ही अस्तित्वहीन बनाने की स्थिति में ला खड़ी कर ली है।

आज ‘विकास’ और ‘बिगड़ता पर्यावरण’ दोनों ही समस्याएं गंभीर से गंभीरतम होती जा रही है। ये दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं।

सच ही में पर्यावरण में वायु, जल, पौधे और जंतु तो आते ही हैं, साथ ही इन सभी गुण-धर्मों के साथ-साथ और भी अनेक तत्वों का समावेश है। इसके अंतर्गत प्राकृतिक और मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा परिवर्धित घटनाओं का संपूर्ण आधार बन जाता है। अतः यह स्पष्ट रूप से पर्यावरण में जैविक, अजैविक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक तत्व आ जाते हैं। जैविक तत्व में पेड़-पौधों और जंतु शामिल हैं। वायु, जल,मृदा, और ऐसे ही अन्य अजीवित पदार्थ अनैतिक घटक के अंतर्गत आते हैं।

पर्यावरण के अध्ययन के तहत जीवों और उनके पर्यावरण का अध्ययन किया जाता है। संपूर्ण को आधार मानकर देखा जाए तो पर्यावरण का अध्ययन करने से ही संपूर्ण जैव मंडल का अध्ययन हो जाता है। जैव मंडल में, जहां किसी-न-किसी तरह का जीवन विद्यमान है। यद्यपि समुद्र की अनंत गहराइयों से आरंभ होकर, पर्वतों के शिखरों तक संपूर्ण जगह पर विस्तारित है, तथापि अधिकांश जीवन पृथ्वी की सतह के नीचे और कुछ मीटर ऊपर तक व्याप्त है। जैव मंडल का विस्तार पृथ्वी का सतह से अनुमानित 10,000 मीटर ऊंचाई तक, समुद्र में लगभग 8,000 मीटर की गहराई तक और पृथ्वी की सतह के नीचे 250 मीटर तक इसका विस्तार है।

जीवन के अधिकांश रूप, सामान्य जीवन परिस्थितियों और भोजन स्रोतों में सीमित रहते हैं, साथ-ही-साथ किसी जाति विशेष के जीवों का पोषण समस्त जैव मंडल के परिप्रेक्ष्य में संतुलित होता है। इस प्रकार जैव मंडल वास्तविक में एक प्रकार का विश्व जैव तंत्र है, जो ऊर्जा पोषक तत्वों के चक्रीय प्रवाह पर आश्रित है। जैव मंडल को सामान्यतः तीन बड़े तंत्रों में विभाजित किया जा सकता है-

1. लिथास्फीअर – इसके अंतर्गत पृथ्वी का ठोस भाग उदाहरण के रूप में चट्टानें, मृदा और अवसादी तत्वों को लिया जा सकता है।
2. हाइड्रोस्फीअर – इसके अंतर्गत समुद्र और अलवणीय जल आता है।
3. एटमांस्पीअर – इसके अंतर्गत गैसीय भाग आता है जिसमें वायुमंडल सम्मिलित है।

उपरोक्त तीनों तंत्र आपस में और इनमें से प्रत्येक जीवन के विभिन्न रूपों से सभी प्रकार से जुड़े हुए हैं।

पारिस्थितिक तंत्र


जैव-मंडल में वनस्पतियों और जंतुओं की असंख्य जातियां सम्मिलित हैं। जीवन-तंत्र सभी प्रकार से आत्मनिर्भर है। फिर भी कोई पौधा या जंतु अकेला ही जीवन बिता नहीं सकता, वह अपने पर्यावरण पर निर्भर रहता है। सभी प्राणियों को विशेषतः भोजन, जल और खनिज ग्रहण करना और अनुपयोगी पदार्थों को त्याग देना पड़ता है अपने शरीर का एक अनुकूल तापमान बनाए रखना होता है। जीवों और उनके पर्यावरण की परस्पर क्रियाओं का अध्ययन पारिस्थितिकी जिसे इकोलॉजी कहते हैं, कहलाता है। जीव अपने पर्यावरण के अजीवित तत्वों से क्रिया के परिणामस्वरूप सम्मिलित रूप से एक तंत्र का निर्माण करता है, इसे ही पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है।

इकोतंत्र जीवित (कार्बनिक या जैविक) और अजीवित (अकार्बनिक या अजैविक) तत्वों की पारस्परिक अंतःक्रियाओं और उनकी परस्पर निर्भरता का समुच्च्य है। अतः स्पष्ट रूप से इस ग्रह पर उपस्थिति समस्त इकोतंत्र को संयुक्त रूप से जैव मंडल की संज्ञा से अबिहित किया जा सकता है।

‘इकोतंत्र’ शब्द विभिन्न आवृत्ति के सभी स्थानों के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे-इसे पानी के छोटे से गड्ढे के लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है और बड़े वन के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। विभिन्न इकोतंत्रों का संगठन पृथक-पृथक होता है। ये भिन्नताएं जातियों की संख्या, अजैविक तत्वों के प्रकार और उनके सापेक्ष परिमाण और देश-काल की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की होती है। ईंधनों की महंगाई से उत्पन्न ऊर्जा संकट औद्योगिक सभ्यता के लिए एक चुनौती है। इस चुनौती से खतरा उत्पन्न हो गया है।

विकासशील देशों की पर्यावरणीय समस्याएं, समृद्ध और औद्योगिक रूप से विकासशील देशों की समस्याओं से बिल्कुल अलग-थलग है, जहां प्रदूषण की समस्या मुख्य है। विकासशील देशों की स्थिति राजा टांटालस की स्थिति जैसी ही है, जिसे देवताओं के आदेश की अवमानना के जुर्म में भूख और प्यास की त्रासदी झेलनी पड़ी थी। उसे समस्त जल और खाद्य सामग्री के होते हुए भी भूख और प्यास त्रसित था। ठीक इसी तरह इन विकासशील देशों के पास पर्याप्त प्राकृतिक संपदा तो है, परंतु इन संपदाओं का सामान्य उपयोग इन देशों की पहुंच से बस थोड़ा-सा ही दूरी है।

भारत की कई पर्यावरणीय समस्याएं दूसरे देशों के समान ही है, किंतु उसकी समस्याएं भी हैं, तीव्र गति से जनसंख्या में वृद्धि अनियोजित शहरी और औद्योगिक विकास, सीमांत भूमि पर कृषि का विस्तार और उस पर अतिक्रमण, वनों तथा प्राकृतिक संपदा का अंधाधुंध दोहन करना आता है। भूमि के कटाव में वृद्धि, जल स्रोतों में गाद या तलछट का जमाव, भूस्खलन, नदियों के क्षेत्रों अनियमितताएं, जलस्तर, में गिरावट, प्रदूषण और गिरावट और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट भी परिलक्षित स्पष्ट है।

प्रदूषण के विभिन्न स्रोत


प्रदूषण के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं-
1. मानव बस्तियां- जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है। समूहों में लोग रह रहे हैं, उनके आकार तथा संख्या में तेजी से वृद्धि होती जा रही है। बस्ती की निवासियों की कुछ आधारभूत मांग होती है, जैसे – आवास, भोजन, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, संरक्षण, परिवहन आदि-आदि, जिससे मांग तथा पूर्ति का संतुलन बिगड़ा है। जनसंख्या के अनुपात में नागरिक सेवाओं में पर्याप्त पूर्ति कर पाना संभव नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप गांवों में गंदगी, कस्बों में भीड़-भाड़ नगरों में शोर-गुल तथा अव्यवस्था का प्रसार हुआ है, औद्योगीकरण भी बढ़ा है। उद्योग प्रायः शहरों में और उसके आस-पास ही स्थापित किए जाते हैं। रोजगार के लिए लोगों का जत्था गांवों से शहरों की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जिससे शहरों की आबादी तब्दील हो रही है। इन सभी उद्योगों के आस-पास झोपड़-पट्टियों के विस्तार के साथ-साथ गंदगी और अव्यवस्था होने लगी है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि उद्योगों की स्थापना सुनियोजित ढंग से हो।

2. उद्योग – बड़े प्रदूषण के प्रमुख कारण उद्योग-धंधे ही हैं, विभिन्न औद्योगिक प्रक्रमों के अंतर्गत कई प्रदूषक तत्व उप-उत्पाद के रूप में निकलते हैं। अधिकांश औद्योगिक उप-उत्पाद बिना उपचार किए ही नदी-तालाबों में विसर्जित कर दिए जाते हैं या फिर उन्हें खाली भूमि पर वैसे ही बहा दिया जाता है। इससे पर्यावरण का गंभीर प्रदूषण होना संभव है। कई औद्योगिक अवशेष अति विषैले होते हैं, जिनका पर्यावरण में आकर मिल जाना खूब घातक सिद्ध होता है। प्रदूषण की समस्या से बचने के लिए अति आवश्यक होगा कि नए उद्योग नियोजित रूप से शहर तथा आवासीय बस्तियों से दूर निर्मित किए जाएं।

कृषि – कृषि के आधुनिकीकरण के साथ-ही-साथ कीटनाशी, पेस्टनाशी उर्वरकों के समुचित जानकारी के अभाव, कृषक फसलों पर इन पदार्थों का पर्याप्त से अधिक छिड़काव करते हैं। खेतों में पड़े अतिरिक्त उर्वरक या अन्य पदार्थ वर्षा के समय जल में बहकर नदियों तथा तालाब में मिल जाता है तथा कीटनाशी दवाओं तथा खरपतवार नाशी दवाओं के फलों तथा सब्जियों के साथ हमारे शरीर में पहुंचने की भी संभावना बनी रहती है।

ऊर्जा उत्पादन प्रक्रियाएं- मानव के दैनिक जीवन में समस्त कार्यों के लिए ऊर्जा एक आवश्यक घटक है। यह ऊर्जा लकड़ी, कोयला, मिट्टी का तेल, पेट्रोल इत्यादि ईंधनों के दहन से मिलती है। विविध दहन प्रक्रमों के दौरान धुआं, गैसें तथा कोयला कण निकलते हैं, जो वायुमंडल में मिलकर उसके प्रदूषण होने का कारक बने हैं।

ताप विद्युत घरों में कोयला, ईंधन के रूप में दहन किया जाता है। इससे बड़ी मात्रा में कार्बन-डाइऑक्साइड कोयला कण तथा अन्य प्रदूषण तत्व उत्पन्न होते हैं। बड़ी तादात में कोयले की राख निकलती है, जिसे विसर्जित करना एक समस्या होती है। विसर्जन व्यवस्था का अभाव होने से इन पदार्थों से पर्यावरण प्रदूषित होना संभव है।

परमाण्विक विद्युत घरों में निकले अवशिष्टों में रेडियो-धर्मी तत्व विद्यमान होते हैं, जो गंभीर प्रदूषण को निमंत्रण देते हैं।

जल-प्रदूषण


जल, जीवन के लिए प्रथम सोपान है। बिना जल के जीवन नहीं जिया जा सकता। मानव शरीर में दो-तिहाई भाग जल ही है। जल शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के संवहन का कार्य भी करता है, इसीलिए मानव स्वास्थ्य के लिए शुद्ध जल आवश्यक है।

जल-प्रदूषण के कारण


सामान्यतः जल प्रदूषण निम्न कारणों से होता हैं-

घरेलू अपजल (Domestic Effluents)
वाहित मल (Sweage)
औद्योगिक उपजल (Industrial Effluents)
कृषि बर्हिस्राव (Agricultural Effluents)
उष्मीय या तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution)
रेडियोएक्टिव अपशिष्ट तथ अवपात (Radio Active Waste and Fallouts)
तेल प्रदूषण (Oil Pollution)

नियंत्रण के उपाय


जहां तक संभव हो किसी भी प्रकार के अपशिष्ट या अपशिष्टयुक्त जल को जलाशयों में मिलने नहीं दिया जाना चाहिए।
पेयजल के स्रोतों के आस-पास कूड़ा-कचरा अथवा अन्य अनावश्यक पदार्थ एकत्र नहीं किए जाने चाहिए।
नदी तथा तालाबों में पशुओं को नहलाने पर भी पाबंदी होनी चाहिए।
जलाशयों में नहाने, कपड़ा धोने इत्यादि को रोका जाना चाहिए।
उद्योगों के निकलने वाले अपशिष्ट जल को शुद्ध करने के बाद ही जल स्रोतों में मिलाना चाहिए।

वायु प्रदूषण


वर्तमान में औद्योगिक चिमनियों से उत्सर्जित धुआं एवं धूल कण, मोटर गाड़ियों से निकला धुआं तथा विविध मानवीय क्रिया-कलापों से उड़ने वाली धूल इत्यादि हमारे आस-पास की वायु को निरंतर प्रदूषित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दहन प्रक्रिया के परिणामस्वरूप वायुमंडल की मात्रा में कमी आ रही है।

औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो रही है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के हाइड्रोजन, क्लोरिन, नाइट्रोजन के ऑक्साइड अमोनिया, बेरीलियम, सीसा, आर्सेनिक, केडमियम, एस्बेस्टास, बेंजोपाइरिन एवं मुख्य रूप से रेडियोएक्टिव पदार्थ हैं, जिनके कारण दमा, श्वसनी-शोथ गले का दर्द आदि रोग होते हैं। अति प्रदूषित वायु में अधिक समय तक रहने से फेफड़े का कैंसर जैसे घातक रोग होने की संभावना रहती है।

यह निश्चित है कि विकासशील देशों में बढ़ती आबादी जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकास करना जरूरी है। प्रत्येक प्रकार को विकास प्रक्रिया का एक आधार होना आवश्यक है और वह एक दिए गए सामाजिक आर्थिक पर्यावरण की पृष्ठभूमि में संभाव्य है।

विकसित और विकासशील देशों के बीच एक घना असंतुलन बना हुआ है। इसके सुधार के लिए यह जरूरी है कि अहितकारी और हानिकारक, आंतरिक और बाह्य तत्वों द्वारा विकासशील देशों के स्रोतों के उपयोग पर रोक लगे। आज भारत के साथ अनेक देश आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए नए विकल्प ढूंढने की प्रक्रिया में हैं। विकास का प्रथम लक्ष्य तो आखिर मानव का हित संरक्षण ही है और यही पर्यावरणीय गुणवत्ता के लिए आवश्यक है और जरूरी भी है।

171/1, मैत्रीकुंज, रिसाली, भिलाई (छ.ग)

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