सिंचाई अनुशासित, खेती वैज्ञानिक तो मुनाफा गारंटीड

Submitted by admin on Sat, 04/26/2014 - 09:34

अनुशासित सिंचाई के लिए सरकार से अपेक्षा है कि आपादाकाल न हो तो वह मुफ्त बिजली और मुफ्त नहरी सिंचाई की सौगात देने से बचे। किस इलाके में भूजल आधारित खेती को बढ़ावा देना है? किस इलाके में नहरी सिंचाई कारगर होगी? किस इलाके में वर्षा आधारित खेती को बढ़ावा देना अनुकूल होगा? यह सब तय करने के लिए जरूरी है कि सिंचाई योजना राष्ट्रीय स्तर पर तय करने की बजाए जिलावार तय की जाए। साथ ही सरकार अनुशासित सिंचाई की तकनीक व कम सिंचाई की मांग करने वाले बीज व तौर-तरीकों के शोध व प्रयोग को बढ़ावा दे।

वैज्ञानिक खेती और सिंचाई से मेरा मतलब देसी बीज, देसी खाद-पांस, रहट-चड़स छोड़कर बाजारू खेती या आधुनिक संयंत्रों को अपना लेना कतई नहीं है। वैज्ञानिक हो जाने का मतलब है खेती को ऐसे तौर-तरीके अपनाना, जिससे खेत की नमी और उर्वरता सुरक्षित रहे, उत्पादन अच्छा व स्वस्थ हो तथा मौजूद पानी की मात्रा, गुणवत्ता और मिट्टी के अनुसार फसल व बीज का चयन किया जाए। अनुशासित सिंचाई का मतलब है कि जितना पानी स्रोत से चले, उतना खेत तक पहुंचे। अनुशासित सिंचाई का मतलब यह भी है कि जितनी जरूरत हो, उससे अधिक सिंचाई न की जाए। यदि हम चाहते हैं कि ऐसा हो, तो निम्नलिखित कदमों को उठाकर देखना चाहिए:

लीकप्रूफ नाली, पक्की मेड़


जलस्रोत से खेत तक जाने वाली नाली हो सके तो पक्की, नहीं तो एकदम पुख्ता, लीकपूफ्र व साफ होनी चाहिए। सिंचाई से पहले नाली को घास व खरपतवार से मुक्त कर लें।

समतल खेत


बोआई के लिए खेत को तैयार करते वक्त पाटा लगाकर एकदम समतल कर लें। इसके लिए किसान आजकल कंप्यूटरीकृत लेवलर का प्रयोग कर रहे हैं। ऐसा करने से पानी पूरे खेत में एक समान पहुंचता है। कम पानी में भी उचित सिंचाई होती है। एक जगह खेत में एक फुट पानी भर गया और दूसरी जगह पानी चढ़ ही नहीं रहा - ऐसी स्थिति से बचने का भी यही उपाय है। इससे उपज प्रतिशत में काफी बढ़ोतरी होती है।

बूंद-बूंद सिंचाई


सिंचाई में पानी के अनुशासित उपयोग के लिए ‘बूंद-बूंद सिंचाई’ तथा ‘सिंचाई की फव्वारा पद्धति’ कारगर तकनीक हैं। ‘बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति’ में हर पौधे को जोड़ते हुए पूरे खेत में पतली पाइप बिछा दी जाती है। इस पाइप को पर्याप्त ऊंचाई पर रखी पानी की टंकी से जोड़ दिया जाता है तथा प्रत्येक पौधे के तने के पास एक छेद होता है।

टंकी से चला पानी जितने पौधे उतने छेदों के जरिए एक-एक बूंद करके पौधों को सींचता रहता है। लाभ यह है कि लगातार नलकूप चलाने की बजाए टंकी को आवश्यकतानुसार भर देना होता है। इससे न मिट्टी कटती है, न पानी अधिक लगता है। खेत और नलकूप के रास्ते में होने वाली बर्बादी भी नहीं होती। नमी भी गहरे तक पहुंचती है। लेकिन यह पद्धति सिर्फ बागवानी तथा निश्चित दूरी पर लगने वाली पौध में कारगर होती है।

फव्वारा पद्धति


‘फव्वारा पद्धति’ में नलकूप से खेत तक प्लास्टिक का पाइप बिछा दिया जाता है। इस पाइप में लगे चार मुंह वाले जोड़ों के जरिए पूरे खेतों में वर्गाकार पाइप बिछ जाते हैं। इन्हीं जोड़ों पर लगे फव्वारे घूम-घूमकर चारों तरफ बराबर पानी पहुंचाते रहते हैं। पानी बिल्कुल बर्बाद नहीं होता। इस पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पौध के तने व पत्तियों को भिगोकर निर्मल करता रहता है। इससे पौध में कीट लगने की संभावना काफी कम हो जाती है।

मल्चिंग


गर्मी के मौसम में सब्जी, फूल, औषधीय पौधे तथा नर्सरी आदि में नमी बचाकर रखने तथा पौध को तेज धूप से बचाने के लिए आजकल पाॅलीहाउस और ग्रीन हाउस का उपयोग हो रहा है। सब्जी की पौध के अगल-बगल काले प्लास्टिक की पट्टियों को बिछाने से भी नमी का वाष्पन रुकता है। इस प्रक्रिया को ‘मल्चिंग’ कहते हैं। जाहिर है कि नमी टिकेगी तो, जल्दी-जल्दी सिंचाई की मजबूरी घटेगी।

नमी बचाती जैविक खाद


उपजाऊपन बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता यथासंभव कम करें। जानवरों के गोबर, कचरा कंपोस्ट व केंचुआ खाद का प्रयोग को प्राथमिकता दें। इससे मिट्टी में सिंचाई की नमी ज्यादा समय तक टिकती है। किसान आपको बता सकते हैं कि जब तक वे रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नहीं करते थे, सरसों-चना-मटर जैसी फसलें बिना सिंचाई के हो जाती थी।

अब ये फसलें भी कम से कम एक सिंचाई की मांग करती हैं। सच बात यह है कि उर्वरकों की गर्मी, बंधी मिट्टी को तोड़कर धीरे-धीरे रेत में तब्दील कर देती है। मिट्टी की ऊपरी परत को सख्त करने में भी उर्वरकों का योगदान रहता है। जैविक खाद मिट्टी और नमी को बचाकर रखती है।

मिश्रित खेती


मिश्रित खेती भी पानी बचाने और मुनाफा बढ़ाने का कारगर नुस्खा है। मिश्रित खेती यानी एक खेत में दो फसलें एक साथ; जैसे ज्वार और अरहर, चना और सरसों तथा प्याज और गन्ना।

मिश्रित खेती का दूसरा मतलब है - बागवानी और खेती एक साथ। बागवानी और खेती एक साथ करने सें नमी का वाष्पन कम होता है; बागीचे के पत्ते खेत को जैविक खाद प्रदान करते हैं, सो अलग। किंतु यह हर फसल के साथ नहीं हो सकता। इसके लिए ध्यान रखना जरूरी है किस फल की बागवानी में किस सब्जी, दलहन, तिलहन या अनाज की खेती की जा सकती है। आम, अमरूद, काजू, पपीता, केला, अनार, आंवला, नींबू, संतरा आदि फलों की बागवानी के साथ कई फसलों की खेती संभव है।

स्थानीय व्यंजन व स्वाद को बढ़ावा


यह सही है कि आजकल सब कुछ ग्लोबल यानी वैश्विक होता जा रहा है; आर्थिकी, तकनीकी, पहनावा, रूप-रंग, संवाद, संचार से लेकर सोच तक। किंतु खानपान के मामले में स्थानीय स्तर पर यदि हम स्थानीय स्वाद और स्थानीय परंपरागत व्यजंनों को प्राथमिकता दें तो इससे भी पानी का सदुपयोग सुनिश्चित हो सकता है।

इसके पीछे तर्क यह है कि परंपरागत रूप से प्रत्येक इलाके में स्थानीय मिट्टी, पानी, आबोहवा तथा पोषक तत्वों की जरूरत के मुताबिक ही फसल उत्पादन होता था। व्यंजन तथा स्थानीय रुचि के चयन का आधार भी। जहां पानी कम होगा, वहां वैसी ही फसल व उन्हीं उत्पादों से बने व्यंजनों का चलन स्वाभाविक है। उन्हें बढ़ावा देना भी पानी के अनुशासित उपयोग का ही काम है।

शासन-प्रशासन से अपेक्षा


अनुशासित सिंचाई के लिए सरकार से अपेक्षा है कि आपादाकाल न हो तो वह मुफ्त बिजली और मुफ्त नहरी सिंचाई की सौगात देने से बचे। किस इलाके में भूजल आधारित खेती को बढ़ावा देना है? किस इलाके में नहरी सिंचाई कारगर होगी? किस इलाके में वर्षा आधारित खेती को बढ़ावा देना अनुकूल होगा?

यह सब तय करने के लिए जरूरी है कि सिंचाई योजना राष्ट्रीय स्तर पर तय करने की बजाए जिलावार तय की जाए। साथ ही सरकार अनुशासित सिंचाई की तकनीक व कम सिंचाई की मांग करने वाले बीज व तौर-तरीकों के शोध व प्रयोग को बढ़ावा दे। फव्वारा पाइपों को सस्ता करे, ताकि गरीब किसान भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित हों। खेतों और मेड़ों की मजबूती को मिशन बनाए। नहरी सिंचाई में नदी/झील से चले पानी का 40 से 60 फीसदी इधर-उधर हो जाता है। जरूरत है कि इसे नहरों से होने वाले सीपेज व बेलगाम कटान पर रोक का नुस्खे को अमल में लाया जाए।

कृषि मंत्रालय तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय की कई योजनाएं निःसंदेह, काफी अच्छी हैं। किंतु क्रियान्वयन के स्तर पर बागवानी मिशन, सगंधीय एवम् औषधीय पौधे, सिंचाई तकनीक तथा कृषि स्कूल जैसी अनेक अच्छी योजनाएं कुछ प्रभावशाली किसानों को लाभ देने वाली बनकर रह गई हैं।

भारत के ज्यादातर राज्यों में ये योजना-परियोजनाएं अभी भी असल जरूरतमंद किसानों की पहुंच से बाहर हैं। अतः जरूरी है कि शासन-प्रशासन ऐसी अच्छी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने का अपना संकल्प बनाए। ज्यादा जोर दे। हर जिले में कृषि अधिकारी से काम नहीं चलने वाला, जिला स्तरीय खेती और बागवानी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय तंत्र को और विकसित तथा विकेन्द्रित करने की जरूरत है।

कम पानी की फसलों का अधिक बाजार मूल्य देकर भी सरकार कम पानी वाली फसलों के अनुकूल फसल चक्र को अपनाने हेतु कम पानी वाले इलाके के किसानों को प्रोत्साहित कर सकती है। पानी के कुप्रबंधन के चलते गहराए जल संकट से निजात पानी का यही रास्ता है और खेतिहरों पर पानी की बर्बादी की तोहमत से बचने का भी।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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