नदी तंत्र और मानवीय हस्तक्षेप

Submitted by admin on Fri, 05/02/2014 - 10:45
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विकास गतिविधियों के बढ़ने के कारण नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद जंगल कम हो रहे हैं। अतिवृष्टि तथा जंगल घटने के कारण भूमि कटाव बढ़ रहा है। भूमि कटाव बढ़ने के कारण नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद मिट्टी की परत की मोटाई घट रही है। मोटाई घटने के कारण उनमें बहुत कम मात्रा में भूजल संचय हो रहा है। भूजल संचय के घटने के कारण नदियों में गैर-मानसूनी जल प्रवाह घट रहा है। जल प्रवाह के घटने के कारण नदी तंत्र की प्राकृतिक भूमिका घट रही है। गैर-मानसूनी दायित्व पूरे नहींं हो रहे हैं।

आदिकाल से नदियां स्वच्छ जल का अमूल्य स्रोत रही हैं। समाज द्वारा उनके पानी का उपयोग निस्तार, आजीविका तथा खेती के लिए किया जाता रहा है। पिछले कुछ सालों से देश की अधिकांश नदियों के गैर-मानसूनी प्रवाह में कमी हो रही है, छोटी नदियां सूख रही हैं और उनमें प्रदूषण बढ़ रहा है। यह स्थिति हिमालयीन नदियों में कम तथा भारतीय प्रायद्वीप की नदियों में अधिक गंभीर है। यह स्थिति प्राकृतिक नहीं है।

नदी, प्राकृतिक जलचक्र का अभिन्न अंग है। उसके अंतर्गत, नदी अपने जलग्रहण क्षेत्र पर बरसे पानी को समुद्र में जमा करती है। वह कछार में मिट्टी का कटाव कर भूआकृतियों का निर्माण करती है। वह जैविक विविधता से परिपूर्ण होती है। वह वर्षा जल, सतही जल तथा भूमिगत जल के घटकों के बीच संतुलन रख, अनेक सामाजिक तथा आर्थिक कर्तव्यों का पालन करती है।

मौसमी घटकों के सक्रिय रहने के कारण, नदी घाटी में चट्टानें सड़ती तथा गलती हैं। यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार नदी में प्राकृतिक भूमिका के निर्वाह तथा निर्भर प्राणियों, जलचरों एवं वनस्पतियों के इष्टतम विकास हेतु जल होना चाहिए। अर्थात नदी-तंत्र की प्राकृतिक भूमिका तभी तक संभव है जब तक उसमें हमें पर्यावर्णीय प्रवाह मौजूद है।

नदी तंत्र अपना पहला प्राकृतिक दायित्व, वर्षा ऋतु में सम्पन्न करता है। अपने कछार में मिट्टियों, उप-मिट्टियों, कार्बनिक पदार्थों तथा घुलनशील रसायनों इत्यादि को हटा कर परिवहित करता है। मुक्त हुए घटक, समुद्र की ओर अग्रसर होते हुए, हर साल, विभिन्न मात्रा तथा दूरी तक विस्थापित होते हैं। वर्षा ऋतु में सम्पन्न इस दायित्व के निर्वाह के परिणामस्वरूप नदी घाटी में भूआकृतिक परिमार्जन होता है।

नदीतंत्र अपना दूसरा प्राकृतिक दायित्व वर्षा उपरांत, निम्नानुसार सम्पन्न करता है -

 

 

1. सतही जल प्रवाह -


यह नदी में प्रवाहित मुक्त जल प्रवाह है। इसकी गति नदी तल के ढाल द्वारा नियंत्रित होती है। बरसात के बाद नदी में प्रवाहित जल का मुख्य स्रोत, कछार के भूजल भंडार हैं। इनसे, जलापूर्ति, वाटर टेबिल के नदी तल के ऊपर रहते तक ही संभव होती है। कुछ मात्रा में पानी की पूर्ति नदी तल के नीचे धरती तथा शीतकालीन वर्षा से भी होती है। सतही जल प्रवाह का अस्तित्व नदी के समुद्र में मिलने तक ही रहता है। इसकी मात्रा प्रारंभ में कम तथा बाद में क्रमशः बढ़ती जाती है।

 

 

 

 

2. नदी तल के नीचे बहने वाला जल प्रवाह -


नदी तल के नीचे प्रवाहित जल प्रवाह की गति का निर्धारण स्थानीय ढाल एवं नदी-तल के नीचे मौजूद परत की पारगम्यता तय करती है। परत की पारगम्यता और ढाल के कारण विकसित दाब के संयुक्त प्रभाव से नदी तल के नीचे बहने वाला पानी प्राप्त होता है। अधिक ढाल वाले प्रारंभिक क्षेत्रों में नदी तल के नीचे बहने वाले जल का दाब अधिक होता है तथा पारगम्य संस्तर पाया जाता है, नदी को तल के नीचे बहने वाले जल की अधिकांश मात्रा प्राप्त होती है। जैसे-जैसे नदी डेल्टा की ओर बढ़ती है, नदी का ढाल घटता है तथा नदी तल के नीचे मिलने वाले कणों की साइज कम होती जाती है। छोटे होते हुए कणों की परत की पारगम्यता और दाब समानुपातिक रूप से घटता है। इनके संयुक्त प्रभाव और समुद्र के अधिक घनत्व वाले पानी के कारण डेल्टा क्षेत्र में नदी तल के नीचे बहने वाला पानी समुद्र के स्थान पर, नदी को मिलता है।

नदी तंत्र अपना दूसरा प्राकृतिक दायित्व, सूखे मौसम में सम्पन्न करता है। वह, नदी तल में बरसात के मौसम के बाद बचे मिट्टी के अत्यंत छोटे कणों तथा घुलित रसायनों को समुद्र की ओर ले जाता है। इसके कारण विशाल मात्रा में सिल्ट तथा घुलित रसायनों का परिवहन होता है। इसी कारण नदी तंत्र के अधिक ढाल वाले हिस्से में बहुत कम मात्रा में सिल्ट पाई जाती है।

नदी द्वारा उपरोक्त प्राकृतिक दायित्वों का निर्वाह बरसात में सर्वाधिक तथा बरसात बाद जलप्रवाहों की घटती मात्रा के अनुपात में किया जाता है। अर्थात प्राकृतिक दायित्वों को पूरा करने के लिए प्रत्येक नदी का बारहमासी होना आवश्यक है।

 

 

 

 

मानवीय हस्तक्षेप


1. नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में भूमि उपयोग में परिवर्तन का परिणाम
विकास गतिविधियों के बढ़ने के कारण नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद जंगल कम हो रहे हैं। अतिवृष्टि तथा जंगल घटने के कारण भूमि कटाव बढ़ रहा है। भूमि कटाव बढ़ने के कारण नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद मिट्टी की परत की मोटाई घट रही है। मोटाई घटने के कारण उनमें बहुत कम मात्रा में भूजल संचय हो रहा है। भूजल संचय के घटने के कारण नदियों में गैर-मानसूनी जल प्रवाह घट रहा है। जल प्रवाह के घटने के कारण नदी तंत्र की प्राकृतिक भूमिका घट रही है। गैर-मानसूनी दायित्व पूरे नहींं हो रहे हैं। जलवायु बदलाव और जलग्रहण क्षेत्र में बदलते भूमि उपयोग के कारण नदी तंत्र का संपूर्ण जाग्रत इको-सिस्टम प्रतिकूल ढंग से प्रभावित हो रहा है। यह मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है।

2. नदी मार्ग में बाँधों के निर्माण का परिणाम
बाँधों के निर्माण के कारण जलग्रहण क्षेत्र से परिवहित मलवा तथा पानी में घुले रसायन बाँध में जमा होने लगते हैं। परिणामस्वरूप बाँध के पानी के प्रदूषित होने तथा जलीय जीव-जंतुओं और वनस्पतियों पर पर्यावणीय खतरों की संभावना बढ़ जाती है। प्राकृतिक जलचक्र तथा नदी के कछार में प्राकृतिक भूआकृतियों के विकास में व्यवधान आता है। यह मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है।

बाढ़ के गाद युक्त पानी के साथ बह कर आने वाले कार्बनिक पदार्थों और बाँध के पानी में पनपने वाली वनस्पतियों के आक्सीजनविहीन वातावरण में सड़ने के कारण मीथेन गैस बनती है। यह गैस जलाशय की सतह, स्पिल-वे, हाइड्रल बाँधों के टरबाईन और डाउन-स्ट्रीम पर उत्सर्जित होती है। यह गैस जलवायु बदलाव के लिए जिम्मेदार है। यह मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है।

3. नदी मार्ग में रेत का खनन का परिणाम
निर्माण कार्यों में रेत का उपयोग अपरिहार्य है। नदी से रेत निकालने के कारण नदी मार्ग में जगह-जगह गड्ढे बन जाते हैं। हर साल, बाढ़ का पानी गड्ढों को भर देता है। गड्ढों में मूल रूप से जमा कणों की साइज और खनित रेत के कणों की साइज और उनकी जमावट में अंतर होता है। इस कारण, नदी तल के नीचे बहने वाले पानी के प्रवाह का नियमन करने वाली परत की भूमिका भंग हो जाती है। परिणामस्वरूप पानी बाहर आ जाता है और नदी के अगले हिस्से को पानी नहीं मिलता। यह स्थिति बरसात में बाढ़ तथा सूखे मौसम में नदी के सूखने की स्थिति पैदा करती है।

4. नदी घाटी में बढ़ता भूजल दोहन का परिणाम
पिछले कुछ दशकों में भूजल का दोहन तेजी से बढ़ा है। भूजल दोहन के बढ़ने के कारण भूजल स्तर की प्राकृतिक गिरावट में, दोहन के कारण होने वाली गिरावट जुड़ गई है। इस दोनों के असर से जैसे ही भूजल स्तर नदी तल के नीचे उतरता है, नदी का प्रवाह समाप्त हो जाता है। वह असमय सूख जाती है।

 

 

 

 

 

 

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About the author

.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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