पर्यावरण विनाश : आजादी की असफलता

Submitted by admin on Sun, 05/04/2014 - 08:59
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पर्यावरण विमर्श

जीवन का सच्चा सुख उसके ही साथ है, जो आज भी इस आजादी को आजादी बनाए रखने के लिए अपने-अपने ढंग से सत्य का साथ देते हुए संघर्षरत हैं। पर्यावरण विनाश आजादी की असफलता का सबसे बुरा लक्षण है। या यूं कहें कि यह बीमारी का आखिरी लक्षण है। सभ्यता एवं संस्कार की मौत के अंतिम लक्षणों के रूप में पर्यावरण महाविनाश के अतिरिक्त कुछ और देखने और दिखाने की जरूरत ही नहीं है।

पिछले 1-2 दशकों के अंतर्गत व्यक्तियों के व्यवहार में तथा व्यक्तियों के प्रति समाज की भूमिका में गंभीर अंतर आया है। किसी भी एक पहलू को विश्लेषण करने के बहुत सारे दृष्टिकोण हो सकते हैं और हरेक पहलू के अनेक आयाम होते हैं, किंतु मैं एक पर्यावरणविद् होने के नाते सदैव इस उलझन से अपने आपको मुक्त करने की कोशिश करता रहता हूं कि यह पृथ्वी जो करोड़ों वर्षों से मानव एक जीवों के लिए सुरक्षित घर थी, अब एकाएक क्यों पिछले 50 सालों में असुरक्षित हो गई एवं उस पर करोड़ों वर्ष से सुरक्षित जी रहे जीव-जंतु बहुत ज्यादा असुरक्षित हो गए।

वैज्ञानिकों में यह बात बहुधा कही जाते हैं कि ‘सर्वाइकल ऑफ फिटेस्ट’ अर्थात् जो सक्षम होगा या समर्थ होगा, वहीं जीवित रहेगा। लेमार्क ने जैविक विकास के मार्ग के लिए इसी सिद्धांत को प्रतिपादित किया।

बचपन में प्रारंभिक जीव विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में जे.वी. लेमार्क की यह अवधारणा मुझे भी बिलकुल ठीक लगती थी और ऐसा लगता था कि प्रकृति के अनुकूल जो अपने आपको ढाल सकता है, वही बचा होगा। बाकी जो लोग अनुकूल नहीं थे, वे डायनासोर की तरह लुप्त हो गए होंगे, पर जीवन के अंतिम हो रहे पड़ाव तक यह बात आज के परिप्रेक्ष्य में सही नहीं लगती।

चूंकि इस अर्थव्यवस्था के युग में बाजार ने प्रकृति पर इतना अधिक अतिक्रमण किया है कि जो जीव प्राकृतिक रूप से इतने अधिक शक्तिशाली एवं सक्षम थे कि वे किसी भी विभिषिका को पार कर लाखों-करोड़ों वर्ष तक पृथ्वी पर अपना अस्तित्व संभव बनाए रखें, पर पर्यावरण पर इस आर्थिक अतिक्रमण ने उन जीवों के लिए अनुकूल पर्यावरण को प्रतिकूल कर दिया और वे परास्त होकर लुप्त होने लगे। फलस्वरूप, वे पूरी तरह से सक्षम एवं समर्थ होने के बावजूद भी इस पृथ्वी से सदा-सदा के लिए लुप्त हो गए।

कितने ही जीव, कितने ही जंतु, कितने ही वृक्ष, कितनी ही वनस्पतियां, कुछेक पर्वत श्रृंखलाएं लुप्त हो गई तो लगभग सारी-की-सारी नदियां इस बाजार के आक्रमण से गंभीर रूप से पीड़ित और दूषित हैं। परिणाम यह है कि भारत शासन के पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश को पर्यावरण को बचाने के लिए नित्य नए कानून बनाने पड़ रहे हैं या फिर ऐसे औद्योगिक प्रस्तावों की पर्यावरणीय स्वीकृति को निरस्त करना पड़ रहा है, चूंकि ये उद्योग पर्यावरण के लिए आत्मघाती ही हैं।

परिणामस्वरूप उनको अपने ही दल से बेदखल करने की भी बात करते पाए जाते हैं, पर सौभाग्य है कि ऐसे किसी एक निर्भीक एवं साहसिक व्यक्ति पर माननीय प्रधानमंत्री ने इस विभाग को जन्म दिया।

इस लेख मे मेरी लेखनी बारंबार बाजार को यूं ही दोषी नहीं ठहरा रही है और न ही सोच में कोई भूल है, न किसी प्रकार की अज्ञानता। किंतु हो सकता है कि मैं बाजार के उन दूषित भागों को सही शब्दों में प्रकट न कर पाऊं, जिसके परिणामस्वरूप धन-पिपासु लोगों ने पृथ्वी के सुरम्य पर्यावरण को चांदी एवं सोने के कुछ सिक्कों के लालच में कानूनी अमलीजामा पहनाकर नीलाम कर दिया और पृथ्वी से ऐसे बहुत सारे मनोहारी दृश्यों को सदा-सदा के लिए समाप्त कर दिया, जिसे शायद हुसैन जैसे विश्व विख्यात चित्रकार भी अपनी कल्पनाओं की, रंग भरी तूलिकाओं से शायद ही चित्रों में भी या कल्पनाओं में भी साकार कर पाए?

बचपन के दिनों की यादों में बसे, वसंत ऋतु के आगमन पर साल के फूलों से सोलह श्रृंगार से ज्यादा, अधिक जेवरों से लदी हुई दुल्हन से ज्यादा, श्रृंगारमयी फूलों से लदे साल के वृक्ष, रक्ताभ पुष्पों से आभूषित पलास के वृक्ष और ज्यादा सेमल के वृक्ष इनके जादुई सुगंध और टेशू के फूलों से फैली आग की लपटों-सी लालिमा, साल और आम के बौरों से बौराए हुए जंगल, अब कल्पनाओं में भी अतीत की बातें हो गई हैं।

प्रकृति के उस सौदर्य की सुरक्षा की बात को पुनः स्थापित करने की चर्चा करना तो जैसे पूर्णतया मूर्खता ही होगी। चूंकि वर्तमान में जब कभी पर्यावरण के संदर्भ में बात होती है तो स्थानीय प्रदूषण से लेकर भौगोलिक मौसम परिवर्तन तक ही चर्चा सीमित हो जाती है और स्वाभाविक रूप से जिस विज्ञान एवं तकनीकी के विकास से यह संकट उत्पन्न हुआ, समाधान भी उसी विज्ञान एवं तकनीकी के मार्ग से ढूंढने की कोशिश की जा रही है। पर दुर्भाग्य यह है कि जिस बाजार के षड्यंत्र के कारण यह विनाश हुआ, उसी बाजार को उपाय में लाया जा रहा है, पर्यावरण को बचाने।

यद्यपि विज्ञान एवं तकनीकी का भी मार्ग निश्चित रूप से उचित है, पर सबसे बड़ा दो, जो उस मार्ग में शामिल है, वह यह है कि प्रारंभिक औद्योगिक क्रांति के दौर से लेकर आज तक पश्चिमी राष्ट्रों ने इस विज्ञान एवं तकनीकी को बाजार में आर्थिक शासन का अस्त्र बनाकर, विकासशील देशों को विकास के सपने दिखाकर इतना लूट लिया (पर्यावरणीय दृष्टि से और आर्थिक दृष्टि से) कि अब इन (विकासशील) देशों में वह ताकत ही नहीं बची है कि पश्चिमी देशों द्वारा विज्ञान एवं तकनीकी के समृद्धि से उत्पन्न लूट को खर्च कर जितना पर्यावरण बर्बाद किया है, उस पर्यावरण को बचाने के लिए आवश्यक विज्ञान एवं तकनीकी को पश्चिमी देशों के बाजार से ये विकासशील देश या अविकसित देश कभी खरीद पाएं।

इसीलिए तो लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय समझौतों पर इस बात पर बारंबार बल दिया जाता है कि विकसित देश पर्यावरणीय संरक्षण तथा ऊर्जा संरक्षण का ज्ञान एवं तकनीकी विकासशील देशों को मुफ्त में उपलब्ध कराएं। पर क्योटो के कानकुन तक के लगभग 15 वर्ष के सफर में हासिल पाई लगभग शून्य ही है।

दुर्भाग्य यह है कि न केवल भारत, बल्कि लगभग सभी विकासशील देश एवं अविकसित देशों के सत्ता प्रमुख विज्ञान एवं तकनीकी के मार्ग से संपन्नता के सपने दिखाकर लट मचा रहे पश्चिमी देशों के न तो षड्यंत्र को समझ पाए और न कभी इस बात का एहसास कर पाए कि उनके देश का पर्यावरण किसी भी हालत मे विकास के उस स्तर को पाकर सुरक्षित एवं निरापद रह ही नहीं सकता, जिनके सपने दिखाए जा रहे हैं।

अपितु, विकास का वह स्तर हमारे देश के लिए वह त्रासदी ला सकता है, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की है। विकास के कुछेक पायदान अवश्य हमारे समक्ष उदाहरण हैं। लोगों को मेरी सोच बहुधा अटपटी लगती है, पर उस दिन से पहले जब पहली बार यह स्वीकारा गया कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर नहीं घूमता, बल्कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, तब तक ऐसी बातों को कहने वाले लोगों को मूर्ख या सिरफिरा ही कहा जाता था।

खैर, उस बात की परवाह किए बिना मैं भी इस लेख के पाठकों से आग्रह करना चाहता हूं कि वे इस बात का आंकलन करने की कृपा करें कि भारत में कार्यशील हजारों देशी एवं विदेशी कंपनियों द्वारा प्रतिवर्ष अर्जित कुल लाभ कितना है और प्रति भारतीय व्यक्ति के सिर पर इस लाभ का कितना बोझ आता है।

उदाहरण के स्वरूप यदि मोटे तौर पर छत्तीसगढ़ राज्य में ही मान लें कि नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लगभग 6000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष लाभ अर्जन करता है, भिलाई स्टील प्लांट शायद 15 हजार करोड़ रुपए प्रतिवर्ष अर्जन करता है, दक्षिणी-पूर्वी रेलवे भी कुछ हजार करोड़ रुपए लाभ अर्जित करना होगा और दक्षिण-पूर्वी कोयला खदानें भी कुछ हजार करोड़ का लाभ अर्जन करती होंगी।

भारतीय एल्यूमीनियम कंपनी एवं एनटीपीस तथा ऐसे निजी क्षेत्र के अनेक बड़े-बड़े स्टील प्लांट एवं पॉवर प्लांट छत्तीसगढ़ राज्य में ढेर सारा लाभ कमाते हुए कार्यरत हैं। इस राज्य में 2 करोड़ लोगों की जनसंख्या में लगभग 1 करोड़, 32 लाख लोगों को (34 लाख परिवारों को ) गरीबी रेखा के नीचे पाया गया है, अर्थात् उनकी प्रति व्यक्ति आय 12000 रुपए प्रति वर्ष से कम है।

यदि हम गणना की सहजता के लिए यह मान लें कि छत्तीसगढ़ राज्य में काम करने वाले सभी शासकीय एवं अशासकीय निगम एवं उपक्रम से कुल लाभ प्रतिवर्ष एक लाख करोड़ रुपए है तो इसके सीधे-सीधे मायने यह हुआ कि निगमीय लाभ का भार प्रति छत्तीसगढ़ी व्यक्ति पर 50 हजार रुपए प्रतिवर्ष है, जबकि उस व्यक्ति की आय ही केवल 12000 रुपए प्रतिवर्ष है। इसी प्रकार यदि हम इन औद्योगिक एवं अन्य गतिविधियों द्वारा पर्यावरण को हो रहे क्षति के मूल्य के आधार पर राज्य पर पड़ने वाले पर्यावरणीय क्षय लागत का अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार आंकलन करें तो शायद इसका मूल्य लगभग 4.5 लाख से 5 लाख करोड़ रुपए होगा।

अर्थात् प्रति व्यक्ति पर्यावरण क्षय या पर्यावरण ह्रास का बोझ प्रतिवर्ष 2 लाख रुपए होगा, जबकि उसकी आमदनी मात्रा 12000 रुपए हैं। यानी की विकास के मार्ग पर देश को चलाने वाले लोग यदि प्रति भारतीय से 5000 रुपए लाभ प्रतिवर्ष वसूल रहे हैं और 2 लाख रुपए प्रति वर्ष का पर्यावरणीय क्षय मूल्य भार डाल रहे हैं तो भी आमदनी प्रतिवर्ष यदि 12000 रुपए ही प्रति व्यक्ति है तो फिर, यह कैसा विकास? किसका विकास? किसका विनाश? और यदि निगमीय जगत् के लोग कहीं एक छोटा-सा अस्पताल खोल दिए या एक ‘आई कैंप’ लगा दिए, जो उसके लिए प्रशंसा के अथाह शब्द बांधे जाने की क्या जरूरत? सब्बल लूटकर सुई दान देने वालों को दानदाता कहाने का क्या अधिकार है?

प्रश्न यह है कि पूंजीवादी विकास के इस मॉडल पर जब से हमने आश्रय लिया है, तब से सब कुछ बाजारू हो गया है। अर्थात् सब कुछ बिकाऊ हो गया है।

कितने ही लोग ऐसे विजिटिंग कार्ड लेकर घूमते हैं, जो कहते हैं कि ज्योतिष की भांति वे लोग प्रत्येक व्यक्ति की मस्तक रेखा पढ़कर उसके मस्तिष्क पर लिखे हुए उसके विक्रय मूल्य का अनुमान लगा लेते हैं, चाहे वह मंत्री हो या सांसद, विधायक हो या अधिकारी या कर्मचारी और इसी का परिणाम है कि ‘राडिया’ जैसी महिला इस देश में पौने तीन लाख करोड़ रुपए के भयंकर लूट के बावजूद भी सुरक्षित है (चूंकि उसे सबके माथे पर लिखे कलंक के मूल्यों को पढ़ने की भाषा जो आती है।) और कानूनी दंगल में अपने किसी-न-किसी दांव के द्वारा अपने को बचाए हुए हैं, पर सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि पर्यावरण जैसे बिंदु पर पर्यावरण के पक्ष में उसकी लूट को रोकने के लिए खड़े होने वाले गरीब, आदिवासियों, ग्रामवासियों, भारतवासियों लोगों के पास न तो भाषा है न जबान है, न कानून है, न संसाधन हैं। है तो केवल कुछ जज्बे, जिसके द्वारा वे लोग ‘विश्नोइयों’ की तरह पेड़ों से लिपटकर अपना बलिदान देना जानते हैं, सिर कटाना आता है, भूखे मर सकते हैं, पर संविधान के किस कानून के अंतर्गत किस व्यक्ति को क्या सजा दी जा सकती है, इसकी बहस न तो गांव के न्यायालय में वे कर सकते हैं और न ही उच्चतम न्यायालय में। इसलिए ग्रामसभा से लेकर राष्ट्र के सदन तक के बीच कहीं भी पर्यावरण के प्रति इतना न्याय नहीं मिल पाता कि वह बाजार में बिकने वाली वस्तु न बन पाए।

सांख्यिकीय को पढ़ने और पढ़ाने वाले अर्थव्यवस्था को निरुपित करने वाले तमाम विद्वान उन पश्चिमी राष्ट्रों से हैं, जिनके पूर्वज समुद्री लुटेरे हुआ करते थे और धरती के भिन्न-भिन्न देशों को लूटने के मकसद से ही आक्रमण करने, नौकाओं से सवार होकर निकलते थे। उनकी आनुवांशिक भावना और संस्कार ही हमेशा लूट की ही रही।

सारे कानून उन्होंने लूट को विधि सम्मत करने एवं विकासशील एवं विकसित देशों के पर्यावरण को तबाह कर बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के लिए ही निरुपित किए थे। भारतवर्ष यूं तो आज एक अत्यंत शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरता हुआ दिखाया जा रहा है, किंतु इस भ्रम में लोगों को बहुत नहीं जीना चाहिए।

चूंकि इस देश के अंदर तेजी से तबाह हो रहा पर्यावरण एवं विस्फोटक हो रही जनसंख्या और उन सबसे भी अधिक खतरनाक भयावह रूप से पनप रहा भ्रष्टाचार तीनों मिलकर ऐसी विस्फोटक परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं, जिससे कि हमारे हजारों, लाखों साल की संस्कृति भी तबाह हो जाए और हमारी सामाजिक समरसता खत्म हो जाए, देश का पर्यावरण पूरी तरह तबाह हो जाए और देश फिर से गुलामी के दलदल में फंस जाए।

इसलिए एक स्वस्थ एवं सुरक्षित भारत के लिए यह बहुत जरूरी है कि हम देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करें, बाजार से मुक्त करें, पूंजीवाद से मुक्त करें। बेतहाशा बढ़ रही जनसंख्या पर नियंत्रण करें और देश को बाजार के चंगुल से मुक्त कर अपने संस्कारों की ओर लौटें, जहां ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की परिकल्पना है, जहां ‘रूखा-सूखा खाय कर ठंडा पानी पीव, देख पराई चूपड़ी क्यों ललचावे जीव’ अवधारणाएं प्रचलित रही हैं एवं संचालित रखी जा सकती हैं।

हमें हमारे संविधान के प्रावधानों के अनुरूप अपने सामाजिक एवं सार्वजनिक चिंतन को विकसित करना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 15 में जहां समानता के अधिकार दिए हैं, वहीं अनुच्छेद 13 पार्ट-III में उन सभी कानूनों एवं नियमों को अवैध बताया है, जो कि किसी भी नागरिक के मूलभूत अधिकार की अवहेलना करते हों। जहां अनुच्छेद 38(2) के अनुसार आय में असमानता को दूर करना अनिवार्य किया है तो अनुच्छेत 38(1) में आर्थिक एवं सामाजिक कल्याणकारी कार्यों को प्रोत्साहित करना शासन के लिए अनिवार्य किया है। जहां 39(a) में आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध कराना अनिवार्य किया है तो अनुच्छेद 39(b) में सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों (यथा-खनिज, कोयला, पानी आदि) पर नियंत्रण एवं वितरण इस प्रकार से हो कि जनसामान्य के हितों के लिए सर्वाधिक हितकारी हो। अनुच्छेद 39(c) के अनुसार शासन द्वारा अर्थव्यवस्था का संचालन इस तरह किया जाना आवश्यक है, ताकि परिणामतः धन कुछ हाथों में सकेंद्रित न हो जाए और जन-सामान्य के लिए घातक न सिद्ध हो।

इतने स्पष्ट संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भी कोई कानून उपरोक्त बातों की रक्षा नहीं कर पा रहा है, न पर्यावरण की, न पर्वतों की, न पानी की, न पशुओं की, न पक्षियों की, न गरीबों की, न लघु उद्योगों की, न लघु व्यापारियों की, न किसानों की और न मजदूरों की तो फिर क्या हम केवल एक किताब को जिम्मेदार ठहराकर अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों से मुक्त हो सकते हैं।

जीवन का सच्चा सुख उसके ही साथ है, जो आज भी इस आजादी को आजादी बनाए रखने के लिए अपने-अपने ढंग से सत्य का साथ देते हुए संघर्षरत हैं। पर्यावरण विनाश आजादी की असफलता का सबसे बुरा लक्षण है। या यूं कहें कि यह बीमारी का आखिरी लक्षण है। सभ्यता एवं संस्कार की मौत के अंतिम लक्षणों के रूप में पर्यावरण महाविनाश के अतिरिक्त कुछ और देखने और दिखाने की जरूरत ही नहीं है। तो आइए, हम अपनी-अपनी कोशिश तो ज़रूर करें, इस त्रासदीग्रस्त पर्यावरण को संभालने, बचाने, संवारने, बाकी तो राम ही राखे।

संपादक, पर्यावरण ऊर्जा टाइम्स,
205, मेनरोड, समता कॉलोनी, रायपुर (छ.ग.)

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