जल संसाधन : समृद्धि हेतु उपयोग करें भविष्य के लिए बचाएं

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राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान की पत्रिका 'जल चेतना', जुलाई 2013

भारतीय नदियों में जल का स्रोत मुख्यतः वर्षा जल तथा कुछ भाग बर्फ के पिघलने से आता है। मानसून, जो जून से सिंतबर माह तक रहता है, नदियों में जल उपलब्ध कराता है। वार्षिक वर्षा के संदर्भ में भारत भाग्यशाली है। भारत को औसतन 400 मिलियन हेक्टेयर मीटर वर्षा जल के रूप में प्राप्त होता है जिसमें से 187 मिलियन हेक्टेयर मीटर सतही जल के रूप में प्राप्त होता है। इसमें से 69 मिलियन हेक्टेयर मीटर, कुल उपलब्ध सतही जल का 37% भाग ही हम उपयोग कर पा रहे हैं क्योंकि हमारे पास पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं है। जल एक अनमोल प्राकृतिक संपदा है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। किसी भी समाज का विकास वहां उपस्थित जल संसाधनों पर निर्भर करता है। पृथ्वी के 75% भाग पर जलीय आवरण है जो कि नदियों, तालाबों, समन्दर-सागरों के रूप में देखा जा सकता है। पृथ्वी पर कुल जल का 97.6% महासागरों में तथा 2.4% सागर, नदी, झील, तालाब, जलवाष्प, भूजल, हिमखंड तथा ग्लेशियरों में पाया जाता है। नदियां, तालाबों तथा जलाशयों में उपस्थित जल, कुल जल का 1% से भी कम भाग है (सारिणी 1)। फिर भी यह जल पृथ्वी पर उपस्थित जीवधारियों के लिए अत्यंत आवश्यक है और इसी से जीवन संभव है।

सौरमंडल में पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जिस पर जल का अथाह भंडार है। जल-जीवधारियों में जल उपस्थित जीवद्रव्य का प्रमुख घटक है। जीवधारियों में विभिन्न जैविक क्रियाओं को संपन्न करने में जल एक प्रमुख घटक है। इनके कुल भार का 70% भाग जल होता है। जल एक प्रमुख पारिस्थितिकीय भौतिक संघटक है जो कि पारिस्थितिक तंत्र के आकार तथा इस की प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है। यही कारण है कि प्राचीन काल में मानव सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई। मानव ने जमीन और जल के संबंध को समझ लिया और जल दोहन की अत्याधुनिक तकनीकों का प्रयोग करना शुरू कर दिया।

वाष्पीकरण विधि द्वारा जल निरंतर सागरों से वायुमंडल में तथा वायुमंडल से वर्षा तथा बर्फ के रूप में पुनः सागरों में तथा जमीन पर आ जाता है। जमीन से बहकर तालाबों, जलाशयों, नदियों के रास्ते सागरों में पहुंच जाता है। सौर ऊर्जा का एक तिहाई भाग को कुल जल का 0.004% भाग को जल चक्र में बनाए रखने में खर्च होता है।

अलवणीय जल एक प्रमुख पदार्थ है। जिस पर मानव जीवन आश्रित है। हिंदू मान्यता के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पांच तत्व-भूमि, वायु, अग्नि, आकाश तथा जल से हुआ है। इनमें से जल प्रमुख है। कुल जल का मात्र 1% भाग ही उपयोग के लिए उपलब्ध है। जिसका 73% भाग कृषि, उद्योग तथा घरेलू व अन्य उपयोग हेतु उपलब्ध है। (सारणी-2)

भारतीय नदियों में जल का स्रोत मुख्यतः वर्षा जल तथा कुछ भाग बर्फ के पिघलने से आता है। मानसून, जो जून से सिंतबर माह तक रहता है, नदियों में जल उपलब्ध कराता है। वार्षिक वर्षा के संदर्भ में भारत भाग्यशाली है। भारत को औसतन 400 (मिलियन हेक्टेयर मीटर) वर्षा जल के रूप में प्राप्त होता है जिसमें से 187 मिलियन हेक्टेयर मीटर (वार्षिक जल का 47 प्रतिशत) सतही जल के रूप में प्राप्त होता है। इसमें से 69 मिलियन हेक्टेयर मीटर, कुल उपलब्ध सतही जल का 37% भाग ही हम उपयोग कर पा रहे हैं क्योंकि हमारे पास पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं है। भारत के विभिन्न जलाशयों में कुल जल उपलब्धता को सारणी 3 में दर्शाया गया है।

भारत को औसतन 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर वार्षिक वर्षा जल उपलब्ध होता है जिसमें से 1100 बिलियन क्यूबिक मीटर जल अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी में बह जाता है। इसमें से 250 बिलियन क्यूबिक मीटर जल को नदियों को जोड़ कर रोकना प्रस्तावित है।

भारत की जनगणना 1 मार्च, 2011 के अनुसार भारत की आबादी 12,100 लाख है। जनसंख्या की वृद्धि पिछले 100 वर्षों में जिस दर से हुई है। सारणी-4 में दर्शाया गया है जो एक चिंता का विषय है।

इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हमें सभी संसाधनों द्वारा उपलब्ध जल को पूर्ण रूप से उपयोगी जल के बराबर करना होगा। यह तभी संभव है जब देश की सभी प्रमुख नदियां एक दूसरे से जुड़ी हों। जल संसाधन जल के मुख्य स्रोत है। मानव इन संसाधनों का उपभोग कृषि, उद्योग, घरेलू तथा अन्य उपयोगों में करता है। इन सभी पूर्तियों हेतु मानव को अलवणीय जल की आवश्यकता होती है। अलवणीय जल एक नवीकरण स्रोत है। फिर भी विश्व की स्वच्छ जल आपूर्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। विश्व की बढ़ती आबादी के कारण विश्व के कई भागों में जल की मांग इस की उपलब्धता से आगे निकल गई है। वहीं खाद्य मांगों में भी वृद्धि हो रही है। इस मांग को हमें सीमित जल संसाधनों से पूरा करना है जिसके लिए हमने सिंचाई की नई विकसित तकनीकों का उपयोग किया है। विश्व में कुल उपलब्ध उपयोगी जल का 69% कृषि में उपयोग होता है, 22% उद्योगों में, जिसमें शामिल है ऊर्जा संयंत्र, तेल रिफाइनरियां तथा अन्य उद्योग। वर्षा 2000 में विश्व की जनसंख्या 6.2 बिलियन पार कर गई। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार 2050 तक 3.5 बिलियन की और वृद्धि निश्चित है। यह वृद्धि विकासशील देशों में अधिक होगी जो आज भी जल संकट की अवस्था से गुजर रहे हैं, भविष्य में क्या होगा?

विश्व व्यापार संगठन के अनुसार यदि कृषि, उद्योग तथा घरेलू आदि उपयोगों के लिए जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो तो इस अवस्था को वाटर स्ट्रेस कहते हैं।

2001 की जनगणना के अनुसार भारत के शहरों की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। 1901 में 238.9 मिलियन आबादी, जो कुल जनसंख्या का 10.84 प्रतिशत था। शहरी आबादी बीते 100 वर्षों में (2001 तक) बढ़कर 1027 मिलियन हो गई जो कुल जनसंख्या का 30.5 प्रतिशत है। बढ़ती आबादी के कारण संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। जनसंख्या बढ़ती जा रही है लेकिन संसाधन सीमित है। मुंबई में 1995 में 3026 मिलियन ली. जल प्रति दिन की मांग थी जब कि कुल 60 प्रतिशत मांग को ही पूरा करना संभव था। दिल्ली की कुल मांग 3600 मिलियन ली. जल प्रतिदिन की तुलना में कुल 2947.5 मिलियन लीटर जल प्रतिदिन की पूर्ति हो रही थी। भारत में एक ग्रामीण को लगभग 12 ली. जल प्रतिदिन की आवश्यकता होती है, वहीं प्रत्येक शहरी प्रतिदिन 50-200 ली. जल का उपभोग करता है। तात्पर्य यह है कि जीवन स्तर में सुधार के साथ-साथ जल की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है।

विकासशील देशों की काफी जनसंख्या पर्याप्त जल के अभाव को झेल रही है। भारत के करीब 8000 गांवों में पानी नहीं है, महिलाएं तथा बच्चों को लंबी दूरी तय कर घरेलू उपयोग के लिए जल स्रोतों तक जाना पड़ता है। यह अनुमानित है कि 16 मिलियन हेक्टेयर मीटर भूगर्भ जल हमारे लिए उपलब्ध है जिसमें से 10.5 मिलियन हेक्टेयर मीटर सिंचाई में प्रयोग हो रहा है।

पूरे विश्व में जलवायु परिवर्तन के कारण जल संसाधनों पर अधिक असर पड़ रहा है क्योंकि जलवायु तथा जल चक्र एक दूसरे के पर्याय है। पृथ्वी के बढ़ते ताप के कारण वाष्पीकरण अधिक हो रहा है तथा वर्षा के पैटर्न में बदलाव आ रहा है। भारत का चेरापूंजी, जहां सर्वाधिक वर्षा होती थी, पिछले वर्षों में वर्षा दर में कमी आई है। अत्यधिक वर्षा होने के कारण बाढ़ तथा सूखे की समस्या मैदानी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक हिमपात की समस्या उत्पन्न हुई है। तापमान अधिक होने के कारण जल की गुणवत्ता भी प्रभावितहोती है तथा सिंचाई की अधिक आवश्यकता के कारण जल का दोहन अधिक हो रहा है।

विश्व की बढ़ती आबादी के कारण जलाशय खत्म होते जा रहे है तथा लाखों पंप अंधाधुंध भूगर्भ जल का दोहन कर रहे हैं। घनी आबादी वाले क्षेत्र, जहां हर 10-20 मीटर की दूरी पर पंप की पाइप पड़ी हुई है। जल के अत्यधिक दोहन के कारण मैक्सिको सिटी, बैंकॉक, मनीला, बीजिंग, शंघाई, चेन्नई आदि शहरों का जल स्तर 10-15 मीटर नीचे खिसक गया है।

भारत, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के बड़े क्षेत्रों में ट्यूबवेल से अत्यधिक जल दोहन के कारण अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं। जल स्तर निरंतर गिरता जा रहा है।

पृथ्वी पर पीने योग्य जल की सीमित मात्रा ही उपलब्ध है। औद्योगिक क्षेत्र का जिस गति से विस्तार हुआ है, उससे भूजल की मांग में अप्रत्याशित वृद्धि के चलते धरती की कोख में समाए पानी का अनियोजित, असीमित एवं अंधाधुंध दोहन हो रहा है। इसके चलते देश के कई क्षेत्रों में भूजल दोहन की स्थिति वहां पर वर्षा की वार्षिक प्रतिपूर्ति से अधिक है। जल स्तर में आ रही निरंतर गिरावट के कारण दलदली तथा तराई भूमि का क्षेत्र दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है जिसके फलस्वरूप विभिन्न वनस्पतियां तथा जंतुओं की अनेक प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं और अनेक लुप्त होने के कगार पर हैं। पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहे हैं।

अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो रही है। बीसवीं शताब्दी तक हम विश्व के आधे से ज्यादा तराई क्षेत्रों को खो चुके हैं। अलवणीय जल पारिस्थितिकी तंत्र में जैवविविधता की हानि, लवणीय जल तथा मृदा पारिस्थितिकी तंत्र में उपलब्ध जैवविविधता की तुलना में अधिक हुई है।

यूरोप में तराई क्षेत्र के नष्ट होने के कारण वहां की जैव विविधता खत्म हो गई है। यूनाइटेड नेशन क्लाइमेट रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर्वत श्रृंखला के बर्फीले ग्लेशियर एशिया में बहने वाली प्रमुख नदियों का जल स्रोत है। इन नदियों पर लगभग 2.4 बिलियन आबादी आश्रित है। पृथ्वी के बढ़ते ताप के कारण यह अनुमान लगाया गया है कि 2035 तक हम इन ग्लेशियरों को खो देंगे जिस कारण भारत, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा नेपाल में पहले बाढ़ और फिर सूखे की स्थिति उत्पन्न होगी। वर्ष 2025 तक विश्व की 2/3 जनसंख्या को पेयजल संकट का सामना करना पड़ेगा।

धरती का सीना चीरकर लगातार पानी निकालने से मैक्सिको सिटी, बैंकॉक व वेनिस में जमीन धंसने की समस्या उत्पन्न हो गई है। यदि यही स्थिति रही तो धरती की कोख सूख जाएगी। हम तो नवीन प्रौद्योगिकी के बल पर जल प्राप्त कर लेंगे। लेकिन पृथ्वी को प्राणवान वायु देने वाले इन पौधों का क्या होगा? क्या इनके बिना हमारा जीवन संभव है।

जेनिफर व्हाइट और डेविड वार्गस वर्षा जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। इनके अनुसार मैक्सिको शहर के 36% घरों को पर्याप्त जल नहीं मिल रहा है। इस शहर में हफ्ते में केवल कुछ घंटे ही पानी की आपूर्ति दी जाती है। इनके प्रयासों से वर्षा जल के संचय के लिए शहर में 110 तंत्र विकसित किए हैं जिनसे 416500 लीटर पानी संचित हो रहा है जिससे 740 घरों में जलापूर्ति हो रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार विश्व के विकासशील देशों के 200 मिलियन लोगों के पास स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। शहरीकरण तथा औद्योगीकरण के कारण स्वच्छ जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं।

भारत में पीने के लिए 90% जल नदियों से आता है जो मानवीय क्रियाकलापों के कारण प्रदूषित हो गई है। गंगा में 873 मिलियन लीटर प्रतिदिन दूषित जल डाला जा रहा है। साबरमती नदी में 998 मिलियन लीटर प्रतिदिन दूषित जल अहमदाबाद शहर से आता है।

विश्व के जल स्रोत सिकुड़ते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तित हो रही है जिससे जीवधारी प्रभावित हो रहे हैं। इस समय की सबसे बड़ी मांग है पर्यावरण संरक्षण। यद्यपि कई विकसित तथा विकासशील देश इस दिशा में प्रयत्नशील है और विभिन्न विधियां अपना रहे हैं। जिसमें शामिल है रेनवाटर हार्वेस्टिंग, बम्बू ड्रिप सिंचाई, तालाब, कुंडों का विकास आदि। जल की बढ़ती आवश्यकता तथा घटती उपलब्धता के कारण देशों की सीमाओं के बीच जल संसाधनों को लेकर तनाव तथा विवाद की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

अर्थ-सम्मिट-2002 के अनुसार वर्ष 2015 के मध्य तक आधे पृथ्वी वासियों के पास पर्याप्त जल की उपलब्धता नहीं होगी। कुछ विकसित देश जैसे उत्तरी अमेरिका, यूरोप, रूस आदि में 2025 तक जल की समस्या नहीं होगी क्योंकि इन देशों की जनसंख्या वृद्धि जल संसाधनों के अनुरूप है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार विश्व में भारत ऐसा देश है जहां बड़े क्षेत्र की सिंचाई की जाती है जो कि 59 मिलियन हेक्टेयर है। 1997 में इस क्षेत्र की सिंचाई के लिए 501 बिलियन क्यूबिक मीटर जल का उपभोग होता था जो आने वाले वर्षों में और बढ़ा है।

लुधियाना को भारत का मैनचेस्टर कहा जाता है। यह भारत के प्रदेश पंजाब का तेजी से विकसित हो रहा शहर है। यह दिल्ली से 250 किमी. की दूरी पर स्थित है जो पंजाब का सबसे अधिक आबादी वाला शहर है। 1991 की जनगणना के अनुसार शहर की आबादी एक मिलियन को पार कर गई थी। बढ़ती आबादी, औद्योगिक विकास के कारण शहर जल प्रदूषण व भूगर्भ जल के अभाव से ग्रसित है।

विकासशील देशों में देशवासियों को स्वच्छ जल की आवश्यकता के स्तर में 1970 से 2004 तक लगातार वृद्धि हो रही है। विश्व बैंक के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति पेयजल उपलब्धता में 15-20% की कमी आई है।

हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जल की मांग उपलब्ध स्रोत में कुल उपलब्ध जल को पार कर जाएगी। (सारणी 5) भारत की तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के कारण आने वाले दो दशकों में भारत में घोर जल संकट उत्पन्न होने वाला है। भारत में 21% संक्रामक बीमारियां प्रदूषित जल से फैलती हैं।

भारत का मुंबई शहर इस समय 650 मिलियन लीटर प्रतिदिन जल की कमी झेल रहा है।

विश्व बैंक ने भारत की राजधानी दिल्ली को जल उपलब्धता के पैमाने में एशिया का सबसे संकटग्रस्त शहर माना है जबकि मुंबई दूसरे स्थान पर है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। 15 साल से अधिक समय तक चली चर्चा के बाद ‘The right to safe and clean water and sanitation resolution’ पारित किया कि मानव अधिकारों की पूर्ति तथा जीवन के पूर्ण आनंद के लिए यह आवश्यक है।

भारत सरकार ने सूखा तथा बाढ़ से निपटने के लिए अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और सक्षमता का उपयोग करके सभी प्राणधारियों का समन्वय करके भारत के जल संसाधनों के एकीकृत और दीर्घकालिक विकास और प्रबंधन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्रीय जल आयोग का गठन किया गया।

जुलाई 1982 में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी का गठन किया जिसके उद्देश्यों में जल संतुलन तथा जल संसाधनों का अत्यधिक उपयोग किया जा सके, शामिल है। 1990 में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी के कार्यक्षेत्र में वृद्धि करते हुए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर हिमालय तथा पेनिन्सुलर नदियों को जोड़ने की संभावनाओं पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का दायित्व दिया गया।

भारतीय कंपनियां जल संकट के समाधान के लिए परमाणु अलवणीकरण रिएक्टर से उम्मीदें बांधे हुई हैं। विश्व नाभिकीय संगठन के अनुसार भारत 1970 से अलवणीकरण अनुसंधान में लगा हुआ है। लवणीय जल को पीने योग्य बनाने के प्रयास किए तो जा रहे हैं, लेकिन इस पर लागत इतनी अधिक है कि कुछ देश ही थोड़ी मात्रा में इस विधि से जल उपलब्ध करा रहे हैं। इजराइल लवणीय जल से अलवणीय जल का उत्पादन 53 सेंट प्रति क्यूबिक मीटर की दर से कर रहा है जबकि सिंगापुर 49 सेंट प्रति क्यूबिक मीटर। भारत तथा चीन, जो विश्व के सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश है, इस विधि को विकसित करने में तत्पर हैं। 2007 में पाकिस्तान ने संयंत्र के प्लान की घोषणा की तथा बरमूडा में संयंत्र के खरीद के लिए हस्ताक्षर किए।

ट्यूब स्टार ऑयल तथा गैस कंपनी भारत में परमाणु अलवणीकरण संयंत्र की स्थापना की संभावनाओं को खोज रहा है। यह संयंत्र ऊर्जा के साथ-साथ स्वच्छ जल भी उपलब्ध कराएगा।

भारत का 3.29 मिलियन कि.मी. क्षेत्रफल, जो विश्व के क्षेत्रफल का 2.4% है, अनुपात में 1/50वां विश्व भूमि तथा 1/25वां विश्व स्रोत, जिन पर 1/6वां विश्व की जनसंख्या आश्रित है। इसलिए जल संसाधनों के संरक्षण तथा इनके नियोजित उपयोग की जिम्मेदारी में हमारी भूमिका मुख्य है। अन्यथा परिणाम बहुत गंभीर होंगे। यह किसी विकसित तथा अविकसित देश की समस्या नहीं बल्कि पूरे विश्व की समस्या है जिसमें प्रत्येक राष्ट्र व व्यक्ति की सक्रियता व सहयोग की आवश्यकता है क्योंकि बूंद-बूंद से सागर भरता है। इस पहल तथा पवित्र प्रयास के लिए पहले खुद से जल बचाने का संकल्प करना होगा।

सारणी-1 पृथ्वी पर जल का वितरण


1.

महासागर

97.6%

2.

हिमखंड

1.8%

3.

भूजल

0.5%

4.

नदी, तालाब आदि

0.02%

5.

मृदा वाष्प

0.01%

6.

वायुमंडलीय नमी

0.0001%

 



सारणी-2 अलवणीय जल का वितरण


 

जल प्रकार

कुल जल प्रतिशत

उपलब्ध जल प्रतिशत

1.

बर्फ

80%

-

2.

पानी/तरल

20%

-

 

क. तालाब

0.2%

1%

 

ख. मृदा

0.04%

0.2%

 

ग. नदियां

0.02%

0.1%

 

घ. वायुमंडल

0.02%

0.1%

 

ङ. भूजल

19.7%

98.4%

 



सारणी-3 भारत के जलाशयों में कुल वार्षिक जल उपलब्धता


क्र.नं.

नदियों के नाम

कुल वार्षिक जल क्षमता

1.

सिंधु

73.31

अ.

गंगा

525.02

ब.

ब्रह्मपुत्र बेसिन व अन्य

585.60

2.

गोदावरी

110.5

3.

कृष्णा

78.12

4.

कावेरी

21.36

5.

पेन्नार

6.32

6.

पेन्नार और कन्याकुमारी के मध्य पूर्व दिशा में बहने वाली नदियां

16.46

7.

महानदी और पेन्नार के मध्य पूर्व दिशा में बहने वाली नदियां

22.52

8.

महानदी

66.88

9.

ब्राह्मणी और बैतरणी

28.48

10.

सुवर्णरेखा

12.37

11.

साबरमती

3.81

12.

माही

11.02

13.

कच्छ, साबरमती, लूनी सहित पश्चिम में बहने वाली नदियां

15.10

14.

नर्मदा

45.64

15.

तापी

14.88

16.

तापी से ताद्री तक पश्चिम में बहने वाली नदियां

87.41

17.

ताद्री से कन्याकुमारी तक पश्चिम में बहने वाली नदियां

113.53

18.

राजस्थान के मरुस्थल के प्रवाह क्षेत्र

न्यूनतम

19.

बांग्लादेश और बर्मा की ओर की छोटी नदियों के बेसिन

31.00

 

योग

186.33

 



सारणी-4 भारत की जनसंख्या 1901 से 2001 तक


जनगणना का वर्ष

जनसंख्या

दशक में वृद्धि

1901

23,83,96,327

-

1911

25,20,93,390

1,36,97,063

1921

25,13,21,213

-7,72,177

1931

27,89,77,238

2,76,56,025

1941

31,86,60,580

3,96,83,342

1951

36,10,88,090

4,24,27,510

1961

43,92,34,771

7,81,46,681

1971

54,81,59,652

10,89,24,881

1981

68,33,29,097

13,51,69,445

1991

84,64,21,039

16,30,91,942

2001

1,02,87,37,436

18,23,16,397

2011

1,21,01,93,422

18,14,55,986

 



सारणी-5 विभिन्न क्षेत्रों में जल की बढ़ती


स्रोत-भारत 2005

क्र.सं.

क्षेत्र

2010

2025

2050

1.

सिंचाई

688

910

1072

2.

घरेलू उपयोग

56

73

102

3.

उद्योग

12

23

63

4.

ऊर्जा

5

15

130

5.

अन्य

52

72

80

 

कुल

813

1093

1447

 



सम्पर्क
डॉ. विजय कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजकीय महाविद्यालय विलासपुर, रामपुर यू.पी., मो. 09411414580, ईमेल- entomology3@yahoo.com

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