लाख की खेती नहीं होने से रोजी का संकट

Submitted by admin on Tue, 05/13/2014 - 11:05
पहले जंगल से वनोपज मिल जाती थी। महुआ, गुल्ली, तेंदू, अचार, गोंद, आंवला और आम मिल जाते थे। कंदमूल, फूल और भाजियां मिल जाती थीं। अगर एक दो दिन भोजन न मिले तो इससे गुजारा हो जाता था। भंजनी घास जिससे रस्सियां बनती हैं, वह जंगल से ले आते थे और बेचते थे, उस पर भी रोक है। जीने का कोई सहारा नहीं होने के कारण जंगल से सिरगट्ठा लाकर बेचते थे। इसमें दो दिन लगते थे। एक दिन 8-10 किलोमीटर जाना और फिर इतना ही वापिस आना। सिरगट्ठा लेकर पिपरिया कस्बे में जाना। उससे जो कुछ पैसे मिलते उससे राशन खरीदना। लेकिन पिछले दो-तीन साल से उस पर पाबंदी है। पहले हम कोसम के पेड़ों पर लाख की खेती करते थे, अब कोसम के पेड़ नहीं हैं, जंगल से सिरगट्ठा (जलाऊ लकड़ी) लाते थे, उस पर रोक है, महुआ, गुल्ली और तेंदू बीनते थे, वह भी नहीं ला सकते और दिहाड़ी मजदूरी भी महीने पर नहीं मिलती, यह कहते-कहते बसंती बाई की आंखें भर आती हैं।

बसंती बाई होशंगाबाद जिले के पिपरिया तहसील के सिमारा गांव की रहने वाली हैं। वह रज्झर समुदाय से हैं। उनके परिवार में 9 सदस्य हैं जिनमें 3 लड़कियों की शादी हो चुकी है। तीनों पढ़ी-लिखी नहीं हैं, स्कूल नहीं गई। बड़ा लड़का कुछ पढ़ा लेकिन जल्द छोड़ दिया। एक लड़का पढ़ रहा है, लेकिन कितना आगे तक पढ़ पाएगा, कहना मुश्किल है।

बसंती और उसके पति बैजा बताते हैं कि 25-30 साल पहले तक यहां कोसम की अच्छी डांग हुआ करती थी। किसानों के खेतों में और कुछ निजी खेतों में कोसम के पेड़ होते थे। कोसम के पेड़ों पर लाख की खेती करते थे। दो बार कोसम की डारों टहनियों में पर बीज बांधते थे। 10-15 दिन में वह बीज जम जाता था। धीरे-धीरे वह कीड़ा टहनियों में फैल जाता था। चार महीनों में वह बीज पककर तैयार हो जाता था। और फिर सरोता और हंसिया से टहनियों को काट लेते थे।

एक बार जेठ-आषाढ़ में और दूसरी बार कार्तिक-अगहन में। जब फसल पककर तैयार हो जाती थी तब टहनियों से लाख निकाल लेते थे और स्थानीय व्यापारियों को बेच देते थे। इस में घर के सभी सदस्यों को काम मिलता था। महिलाएं और बच्चे भी इसमें मदद करते थे। अब सब पेड़ सफाचट हो गए हैं। सब के सब खेत बन गए हैं।

पहले जंगल से वनोपज मिल जाती थी। महुआ, गुल्ली, तेंदू, अचार, गोंद, आंवला और आम मिल जाते थे। कंदमूल, फूल और भाजियां मिल जाती थीं। अगर एक दो दिन भोजन न मिले तो इससे गुजारा हो जाता था। भंजनी (भाभर) घास जिससे रस्सियां बनती हैं, वह जंगल से ले आते थे और बेचते थे, उस पर भी रोक है।

.जीने का कोई सहारा नहीं होने के कारण जंगल से सिरगट्ठा (जलाउ लकड़ी) लाकर बेचते थे। इसमें दो दिन लगते थे। एक दिन 8-10 किलोमीटर जाना और फिर इतना ही वापिस आना। सिरगट्ठा लेकर पिपरिया कस्बे में जाना। उससे जो कुछ पैसे मिलते उससे राशन खरीदना। लेकिन पिछले दो-तीन साल से उस पर पाबंदी है।

बैजा और बसंती ने बताया कि उसकी माली हालत अच्छी नहीं है। लेकिन उसका गरीबी रेखा वाला कार्ड नहीं है। उसके परिवार को गरीबी रेखा से ऊपर का कार्ड मिला है, जिसमें सिर्फ मिट्टी तेल लेने की पात्रता है। उन्होंने कहा कि सिर्फ मिट्टी तेल से हमारा गुजारा कैसे होगा? उन्होंने पूछा क्या अमीर हूं वे? राशन दुकान से राशन भी नहीं मिलता।

बैजा ने बताया कि उसके पास 1 एकड़ से कम जमीन है। लेकिन यहां जंगली जानवरों से फसल नुकसान की बड़ी समस्या है। सतपुड़ा टाईगर रिजर्व से जंगली जानवर आते हैं और फसलों का नुकसान करते हैं। खेतों की रखवाली करना बहुत मुश्किल है। जिस दिन से फसल खेत में बोओ उसी दिन से खेत में डेरा डालकर उसकी रखवाली करो। लेकिन यह बहुत मुश्किल है। जंगली सुअर, हिरण और सांभर बड़ी संख्या में खेतों में आते हैं और फसल को चट कर जाते हैं।

बसंती और उसके पति बैजा दोनों मजदूरी कर अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं। खेतों की निंदाई-गुड़ाई और फसल कटाई करते हैं। लेकिन आजकल आसपास फसल कटाई के लिए कंबाईन हारवेस्टर आ गए हैं। अब खेती की कटाई का काम भी नहीं मिलता। किसान और मजदूर का रिश्ता टूट रहा है।

कुल मिलाकर, रज्झर समुदाय जिसकी जीविका परंपरागत रूप से लाख की खेती और जंगल पर आधारित थी, वह खतरे में है। रोजी-रोटी की समस्या है। जंगलों के खत्म होने और उनमें लोगों की आवाजाही में तरह-तरह की रोक के कारण जंगल के आसपास रहने वाले समुदायों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इस दिशा में काम करने की जरूरत है।

लाख की खेती न होने से संकट में आदिवासी किसानयह रिपोर्ट विकास संवाद के अध्ययन का हिस्सा हैै।

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