गांधी कायम हैं

Submitted by admin on Fri, 05/16/2014 - 14:41
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गांधी मार्ग, मई-जून 2014
हिंसा का जवाब हिंसा नहीं है- इस सचाई को अभी कुछ ही पहले पहचान चुका कोकराझार और बक्सा क्षेत्र का समाज फिर उसी हिंसा का शिकार हुआ है। यहां आज सब समुदाय अल्पसंख्यक से बन गए हैं। चुनाव की राजनीति ने अविश्वास की जड़ों को और सींचा है। ऐसे में शांति, सद्भाव व अहिंसा का पौधा कैसे पनपेगा- इसी की तलाश में लगे कामों का लेखा-जोखा।

गांवों में मुखिया को ‘गांव-बूढ़ा’ कहा जाता है। कुछ गांव बूढ़ा ने हिम्मत की। विभिन्न समुदायों के गांव बूढ़ा, विविधतापूर्ण असमी समाज के हर समुदाय के लोग, यानी बोडो, मुस्लिम, राजवंशी, संथाल, राभा, आदिवासी और नेपाली सब साथ बैठे और इस बैठक ने, इस काम ने उन्हें निर्भय किया। वे बोले, हम पीढ़ियों से एक साथ रहे हैं, हम आज भी विश्वासपूर्वक साथ रहेंगे, किन्हीं दुष्ट तत्वों के बरगलाने से अपने पड़ोसी पर हमला नहीं करेंगे। बस धीरे-धीरे हवा बदलने लगी। गांधी की मानव देह की हत्या को छयासठ बरस बीत चुके हैं। आजाद भारत द्वारा की गई उनके वैचारिक अस्तित्व की हत्या, अवहेलना को भी अब सड़सठ बरस पूरे हो रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि गांधी भारत के मुखपृष्ठ से लगभग मिट से गए हैं, बाकी है उनकी खोखली मूर्तियां, जो चैराहों पर लाखों-लाख मोटर-बसों का धुआं और धूल फांकती रहती हैं। गांधी की नित्य निमित्त की वस्तुओं से संग्रहालय शोभा पा रहे हैं। नित नूतन तकनीक से उनके बीत चुके जीवन को चलचित्रों में सजीव किया जा रहा है। तरह-तरह की बौद्धिक-शोधों ने पुस्तकों के पृष्ठ-दर-पृष्ठ रंगकर अनेक ग्रंथालयों की आलमारियां सजा दी हैं। पर असली गांधी को तो हमने जमीन में न जाने कितने गहरे में गाड़ दिया है। वे ऐसी कोशिशों से भला कहां करवट ले पाएंगे?

गांधी का करिश्मा उनके जीवनकाल में भी अनेक लोगों को अप्रत्याशित व अविश्वसनीय लगता था। आज भी यही लगता है। तब कांग्रेस के कई नेताओं ने उनकी दांडी-यात्रा और नमक-सत्याग्रह को प्रारंभ में आजादी के आंदोलन के लिए प्रासंगिक ही नहीं माना था। मुट्ठी भर नमक उठा लेने से क्या हो जाएगा? पर उसी नमक सत्याग्रह ने ब्रिटिश राज की नींव हिला दी थी। बिना शस्त्र उठाए एक महाबली साम्राज्य के पंजों से देश को मुक्त करा देना एक करिश्मा ही था, जिसका कोई उदाहरण उसके पूर्व के इतिहास में देखने को नहीं मिला।

गांधी ऐसे ही एक अभिनव आरोहरण से इस देश को और विश्व को ‘हिंसामुक्त मानव समाज’ बनाना चाहते थे। यह फिर से एक करिश्मा ही होता। किंतु उस नई राह पर चढ़ने का साहस हमारे कर्णधार नहीं जुटा पाए। वास्तव में, वह आजादी का एक नया अवतार होता। संविधान में अंकित ‘हम भारत के लोग’ के हर व्यक्ति के जीवन में सही इजहार होता। लोग निर्भय होते, अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की लगभग एक-सी गुणवत्ता इस देश में रहने वाले हर व्यक्ति को प्राप्त हो पाई होती और तब हिंसा का यह तांडव भी न होता।

आज तो अनेक प्रकार की हिंसा से वही ‘हम भारत के लोग’ खुद को डरा हुआ पाते हैं। धर्म, जाति, संप्रदाय, वर्ग, दल, पंथ, विचारधारा और कुविचार धारा की बंदूकें उसकी ओर तनी हुई हैं। गरीब डरा हुआ है, तो अमीर भी भयभीत है। इस डर से देश को कौन बाहर निकाल सकता है?

मेरे पास इस प्रश्न का एक ही उत्तर है: ‘गांधी’। मैं यहां कोकराझार के आम लोगों के बीच बैठकर गांधी का करिश्मा प्रत्यक्ष देख रही हूं। सन् 2012 के जुलाई माह में असम प्रदेश के भीतर बने इस ‘बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट्सि’ में दो समुदायों के बीच हुए खूनी संघर्ष ने देश को हिला दिया था। ठीक दो सप्ताह बाद यानी अगस्त के प्रारंभ में ही गांधी का भरोसा लेकर हम दसेक लोगों की टोली यहां पहुंची थी। मंजर खतरनाक था, सड़कों पर लाशें तब भी बिछ रही थीं। सबसे खतरनाक थी दहशत। यह डर हर व्यक्ति, हर परिवार, हर गांव, हर गली, हर संस्थान, हर दुकान और हर समुदाय में खम जमाए बैठा था।

हमारे ड्राइवर ने तो गाड़ी चलाने से इनकार कर दिया, क्योंकि दूसरे समुदाय के राहत-शिविर की दिशा में जाने से उसके प्राणों को खतरा था। सरकारी कर्मचारी शासकीय काम के लिए भी अमुक बस्ती की ओर जाती सड़क पर जाने से कतराते थे। क्रोध और नफरत ऐसी कि एक सुशिक्षित महिला नेता ने दूसरे समुदाय के अपने विश्वस्त नौकर को यह कहकर निकाल दिया था कि अपना चेहरा यहां नहीं दिखाना, वरना मैं तुम्हारी गरदन काट दूंगी।

दूसरों का डर भगाने के लिए स्वयं निडर होना पड़ता है। उसी निडरता का दीपक लिए हम घूमते रहे, घर-घर, व्यक्ति-व्यक्ति, गांव-गांव और नगर-नगर। साथ बैठो, सभी समुदाय एक साथ आओ, अपना भय भगाओ, आप पीढ़ियों से साथ-साथ रहे हो और एक दिन फिर साथ ही रहोगे- हमारे इन शब्दों से अधिक हमारी निर्भयता ने उन पर असर किया।

यहां गांवों में मुखिया को ‘गांव-बूढ़ा’ कहा जाता है। कुछ गांव बूढ़ा ने हिम्मत की। विभिन्न समुदायों के गांव बूढ़ा, विविधतापूर्ण असमी समाज के हर समुदाय के लोग, यानी बोडो, मुस्लिम, राजवंशी, संथाल, राभा, आदिवासी और नेपाली सब साथ बैठे और इस बैठक ने, इस काम ने उन्हें निर्भय किया। वे बोले, हम पीढ़ियों से एक साथ रहे हैं, हम आज भी विश्वासपूर्वक साथ रहेंगे, किन्हीं दुष्ट तत्वों के बरगलाने से अपने पड़ोसी पर हमला नहीं करेंगे। बस धीरे-धीरे हवा बदलने लगी।

फिर शिक्षकों और आचार्यों में भी यह निर्भयता आने लगी। वे महीनों से अपने विद्यालयों में अपनी ड्यूटी पर भी नहीं जा पाए थे। अपने सह-शिक्षकों से आंखें मिलाने में उन्हें डर लगता था, पर वे आगे आए। अपने स्कूल-काॅलेज तथा शिक्षण संस्थान में गांधी की बात सुनने के लिए आयोजन किए, उस निर्भय आत्मा ने शिक्षकों और गुरुजनों में ही नहीं, बल्कि छात्र-छात्रओं में भी उत्साह भर दिया। युवा शिविर में धुबड़ी जिले के एक युवक ने भावपूर्ण शब्दों में कहा: “शांति और अहिंसा के इस शिविर में हम आए हैं, कल तक जो एक-दूसरे के सामने नहीं आते थे, डरकर दूर से ही भाग रहे थे, वे आज साथ बैठे हैं, साथ खा रहे हैं, साथ खेल रहे हैं, गा रहे हैं, बातें कर रहे हैं। हमें खुद विश्वास नहीं होता। क्या हम वही हैं? नहीं, हम बदल गए हैं।”

ये युवा सचमुच बदल गए हैं। इनके पीछे गुरुजनों का प्रोत्साहन भरा हाथ है, माता-पिता की सहमति है। विभिन्न समुदायों के ये युवा अब बांहों में बांहे डाले गांधी की कुटी देखने सेवाग्राम जाते हैं और गांधी की अंतिम जेल- आगा खां पैलेस पूना जाते हैं और ऐसी यात्राओं से इतना अभिप्रेरित होते हैं कि वापस आकर अपने काॅलेज के प्रिंसिपल से आग्रह करते हैं कि अब हम 2 अक्तूबर को गांधीजी का जन्मदिन मनाएंगे, अपने काॅलेज में अहिंसा दिवस मनाएंगे। कई काॅलेजों में ही नहीं, कुछ गांवों में भी अहिंसा दिवस का आयोजन अहिंसा पक्ष के रूप में आयोजित करके इन युवाओं ने हिंसा के अपयश को ढो रही इस भूमि में अहिंसा का उत्साह भर दिया है।

दूसरे शांति सद्भावना शिविर में युवाओं ने अपने समाज की सबसे बड़ी समस्या के रूप में हिंसा को चिन्हित किया है। इसका निराकरण क्या हो, इसकी उन्हें खोज है। यह समझ तो उन्होंने टटोल ली है कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं है। इसको अपने आसपास के समाज में फैलाने का निश्चय भी वे कर चुके हैं। कोकराझार का यह क्षेत्र देश भर में अपनी क्रूर हिंसा के लिए बदनाम हो गया है। इन युवाओं को यह लज्जा का सबब लगता है। यह क्षेत्र अपना यह कलंक धोकर प्रेम का क्षेत्र बने, इस विचार का आकर्षण युवा मन में स्थान बना रहा है। क्या यह गांधी का ही करिश्मा नहीं है?

क्या यह गांधी का पुनर्जन्म नहीं है? गांधी ने कहा था, मैं अपनी कब्र से भी आवाज दूंगा। लगता है, उनकी आत्मा की आवाज इन युवाओं के दिलों में उतर रही है।

राधा बहन गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष हैं।

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