फिर भी क्यूं बेपानी हम

Submitted by admin on Sat, 05/17/2014 - 14:22

देश के एक बड़े समुदाय को अभी भी यह समझने की जरूरत है कि हमारी परंपरागत छोटी-छोटी स्वावलंबी जल संरचनाएं ही हमें वह सब कुछ लौटा सकती हैं, जो पिछले तीन दशक में हमने खोया है। इस दावे को यहां कागज पर समझना जरा मुश्किल है। लेकिन लेह, लद्दाख, कारगिल और लाहुल-स्पीति के शुष्क रेगिस्तानों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि यदि पानी संजोने का स्थानीय कौशल न होता, तो यहां मानव बसावट ही न होती।

अभी जेठ भले ही न आया हो, लेकिन उमड़ते-घुमड़ते बदरा के बावजूद उसकी आहट अभी से सुनाई देने लगी है। पेयजल के संकट से जूझते दक्षिणी दिल्ली के खानपुर, संगम विहार जैसी काॅलोनी वासियों ने बीच दुपहरी सड़कों पर दौड़ती रफ्तार रोक दी। यह घटना नई भले हो, लेकिन हर साल मई-जून का नजारा यही है: पानी-पानी चिल्लाते लोग, टी.वी., अखबार, रैली, गोष्ठियां ! पानी के लिए झगड़ा-मारपीट-बाजार!!

सूखते चेहरे, सूखती नदियां, कुएं, तालाब, झीलें! चटकती-दरकती धरती और पानी के टूटती परंपराएं व कानून!! सब कुछ जैसे बेपानी होने को लालायित दिखाई देता है। यह आधुनिक भारत है। महाशक्ति बनने का दंभ भरता भारत! पर ताज्जुब है कि अपनी इस नाकामी के लिए हममें से कोई भी आज पानी-पानी होता नजर नहीं आता; न समाज, न सरकार, न नेता और न अफसर। यह प्रश्न नई सरकार के लिए भी है कि क्यों होते जा रहे हैं बेपानी हम? क्यों मरता जा रहा है हमारी आंखों का पानी?

1951 के भारत में जल की उपलब्धता 5177 घन मी प्रति व्यक्ति थी। अब यह घटकर 1650 हो गई है। सरकारी अध्ययन वर्ष-2050 तक इसके 1447 होने की बात कहता है, जबकि अन्य के मुताबिक वर्ष-2025 में ही प्रति व्यक्ति 1341 घन मी.से अधिक पानी उपलब्ध नहीं होगा। संकट साफ है; फिर भी हम वर्षा, बर्फबारी और हिमनद के रूप में प्रतिवर्ष प्राप्त होने वाले 4000 अरब घन मी. पानी में से 2131 अरब घन मी.यूं ही बह जाने देते हैं। शेष बचे 1869 से भी मात्र 1123 अरब घन मी. भू अथवा सतही जल के रूप में उपयोगी बचा पाते हैं। क्यों?

हम क्यों भूल जाते हैं कि मेसोपोटामिया से लेकर पाकिस्तान के लायलपुर, सरगोधा, भाण्टगुमरी और भारत की राजधानी दिल्ली के उजड़ने-बसने का कारण पानी ही रहा? हमने जब-जब प्रकृति से लिया ज्यादा और दिया कम, तब-तब हमें उजड़ना पड़ा। हमें क्यों याद नहीं रहता कि हमारे शरीर की 70 फीसदी बीमारियां पानी की कमी या अशुद्धि के कारण ही होती हैं? हम यह समझने में क्यों असमर्थ हैं कि पानी की कमी होने पर बड़ी से बड़ी आर्थिक तरक्की टिक नहीं सकती? ...या सब कुछ जानते हुए भी हम अकर्मण्य हो गए हैं?

हमारे पास सब कुछ है : कम पानी की फसलें, जीवनशैली, ज्ञान, वनक्षेत्र, हिमनद, लाखों तालाब-झीलें, हजारों नदियों का नाड़ीतंत्र, स्पंजनुमा शानदार गहरे एक्युफर। अकेले 861404 वर्ग किमी. फैला गंगा बेसिन ही 47 फीसदी खेत और 37 फीसदी आबादी को पानीदार बनाने में सक्षम है। सरकारों के पास भी पानी के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है।

भले ही इसमें बड़ा हिस्सा कर्ज का हो। बंजर भूमि-मरुभूमि विकास, एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन, कैचमेंट एरिया डेवलपमेंट, रिवर रिवाइल से लेकर मनरेगा तक जाने कितने नाम व बजट पानी बचाने और संजोने में लगे हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग की बहु प्रचारित शब्दावली सीख ली है। फिर भी हम बेपानी होते देश हैं।

शायद इसलिए कि इन सब में पानीदार लोगों की समझ व साझेदारी नहीं है। इसलिए भी कि हमें पानी का नहीं, पानी से कमाई का लालच है। हमने पानी साफ करने के लिए खरबों एस टी पी में बहाए, लेकिन पानी गंदा करने वालों को रोकने की जुर्रत नहीं की। हमने संकटग्रस्त इलाकों में अतिदोहन रोकने के लिए लाइसेंस- अनुमति का चक्रव्यूह रचा, लेकिन उद्योगों को धकाधक पानी खींचने दिया।

हमने मनरेगा के तहत तालाब के नाम पर ऐसे बंद डिब्बे बनाए, जिनमें न पानी आने का रास्ता है और न जाने का। खेत डूबे, तो सारे तालाबों में निकासी के नाले बना दिए। फिर चाहे सारे तालाबों में साल भर पानी रहे या सूखे। आदेश आया, तो लेखपाल ने सारे लालाबों को कब्जामुक्त व दुरुस्त बताकर झूठी रिपोर्ट ही पेश की।

मुझे ये सारी बेसमझी देश के जाने-माने लोकसभा क्षेत्र अमेठी की एक छोटी-सी उज्जयिनी नदी की पदयात्रा में एक साथ ही देखने का मौका मिला। सरकार ने नदी का नाम बदलकर गुलालपुर ड्रेन रख दिया और जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली। यह प्रमाण है कि नेता से लेकर अफसर तक सभी को पानी के मामले में साक्षर करने की जरूरत है।

देश के एक बड़े समुदाय को अभी भी यह समझने की जरूरत है कि हमारी परंपरागत छोटी-छोटी स्वावलंबी जल संरचनाएं ही हमें वह सब कुछ लौटा सकती हैं, जो पिछले तीन दशक में हमने खोया है। इस दावे को यहां कागज पर समझना जरा मुश्किल है। लेकिन लेह, लद्दाख, कारगिल और लाहुल-स्पीति के शुष्क रेगिस्तानों को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि यदि पानी संजोने का स्थानीय कौशल न होता, तो यहां मानव बसावट ही न होती। आइए! पानी का रोना छोड़कर फावड़ा - कुदाल उठाएं और इस बारिश से पहले आसमान से बरसी हर बूंद को सहेजने में जुट जाएं, ताकि इन्हें सूरज की नजर न लगे और हम जिंदा रहें।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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