कुछ बुनियादी बातें

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पानी, समाज और सरकार (किताब)

संविधान के बाद, पानी पर दूसरा बंधनकारी दस्तावेज 1987 में देश की जलनीति के रूप में सामने आया। पानी पर सरकार का वह पहला नीतिगत दस्तावेज था। इस दस्तावेज के लागू होने के बाद, सन 2002 में, केन्द्र सरकार ने जलनीति पर दूसरा दस्तावेज जारी किया। कुछ जानकारों के अनुसार जलनीति के दोनों दस्तावेजों में सोच का नज़रिया लगभग समान है पर इस बात से सभी सहमत हैं कि सरकार के दृष्टिबोध का प्रतीक, जलनीति का दस्तावेज और परियोजनाएं, जलनीति आधारित मील के पत्थर होते हैं।

आंकड़ों की समझ बनाने के बाद, सामान्य पाठक के लिए पानी से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें जानना, समझना और उन पर विचार करना उचित होगा।

धरती पर पानी अनेक रूपों में मिलता है। कहीं तरल रूप में, कहीं ठोस रूप में तो कहीं भाप के रूप में। उसका कोई भी रूप, हमेशा एक जैसा नहीं रहता। वह रूप बदलता रहता है। प्रकृति उसे लगातार चलाते रहती है - समुद्र से भाप के रूप में उठाकर आसमान में। आसमान में वह बादल बनता है और फिर वह (बादल) पानी की बूंदों, बर्फ, ओस, पाले की शक्ल में अपने को ढाल कर धरती पर उतरता (गिरता) है।

धरती पर उतरा पानी या बर्फ, फिर अपनी अगली यात्रा शुरू करता है - धरती के ऊपर नदी-नालों, झरनों के रूप में, धरती की गहराइयों में भूजल के रूप में तो कुछ मात्रा पहाड़ों पर बर्फ की चादर और हिम नदियों के रूप में। हर पल, साल दर साल जल यात्रा चलती रहती है। यही पानी, कालांतर में समुद्र में लौट जाता है।

यही प्रकृति का जलचक्र है। जलविज्ञानी इसे हाईड्रोलाॅजिकल साइकिल कहते हैं। यह जलचक्र युगों-युगों से चल रहा है। पृथ्वी की उत्पति से लेकर आज तक, इसने अनेक बार अपना ठिकाना और रूप बदला है तो कभी बरसने का अपना अंदाज। इसी की माया है, कल तक जहां खूब पानी बरसता था, वह इलाका आज पानी की चंद बूंदों के लिए मोहताज है।

पानी, आत्मा की तरह अजर अमर है। अनादि काल से, धरती के भीतर, बाहर और धरती के वातावरण में उसकी सकल मात्रा एक जैसी है। आने वाले दिनों में भी उसकी सकल मात्रा ज्यों की त्यों रहेगी। वह कभी नहीं मरता, वह कभी खत्म नहीं होता, वह केवल रूप और स्थान बदलता है। रूप और स्थान बदलने के काम में सूर्य और वायुमंडल की हवा की गति एवं दशा तथा तापमान ही उसके भाग्य का फैसला करते हैं। प्रकृति का यही फैसला उसके मिलने की जगह, उसके रूप और उसकी आबादी तय करता है। भू-वैज्ञानिक बताते हैं कि पानी के साथ-साथ पिछले भू-वैज्ञानिक युगों में धरती पर समुद्रों और महाद्वीपों ने भी अपने ठिकाने बदले हैं।

पानी, सभी जीवित प्राणियों, वनस्पतियों, जल-चरों, नभचरों इत्यादि के जीवन का आधार है। उसके बिना जीवन संभव नहीं है। धरती के बाहर भी, अन्य ग्रहों पर जब जीवन की संभावना को तलाशने की बात होती है तो बात लौटकर फिर हवा और पानी पर ही आकर टिकती है। धरती पर हुए जीवन के विकास की अनवरत यात्रा और उससे संबद्ध अलग-अलग कालखंड में, अनेक जीव-जन्तु और वनस्पतियां अस्तित्व में आई और विलुप्त हुई पर हवा और पानी, हर काल खंड में मौजूद रहे और जीवन के आधार बने रहे। हवा और पानी, प्रकृति की जीवन के अस्तित्व को धरती पर बनाए रखने और बचाए रखने वाली विकल्पहीन नियामत है। समाज की धरोहर है।

धरती पर पानी की भूमिका एक जैसी नहीं है। वह समय और स्थान के अनुसार बदलती है। पानी की इस विलक्षण भूमिका और उसके प्रभावों को देखते हुए उसे ब्रह्मा (जन्मदाता), विष्णु (पालक) और महेश (संहारक) की संज्ञा दी जा सकती है। एक ओर वह शरीर में प्राण फूंकता है, पालन पोषण करता है तो बाढ़ और सूखे के रूप में संहारक बन प्राण हरता भी है।

भारत जैसे उष्णकटिबन्धीय देश में जहां वर्षा का मौसम तीन से चार माह का होता है और जहां सारा पानी लगभग 100 घंटो में बरस जाता हो, उस देश में बरसात के बाद के सूखे महीनों में, जीवन को आधार देने के लिए पानी, धरती की कोख, मिट्टी के कणों के आसपास और न जाने कितनी जगह तथा कितने स्वरूपों में मौजूद रहता है। वायुमंडल में बदलों के रूप में उसकी मौजूदगी और आर्द्रता की मात्रा, बरसात की विभिन्न परिस्थितियां पैदा करती है। ओस और ओलों के रूप में उसकी भूमिका को तो किसान ही सबसे बेहतर समझता है।

पानी, संहारक या पीड़ा का कारक भी है। अल्पसमय में बहुत अधिक मात्रा में गिरा पानी, बाढ़ की विभीषिका के रूप में सामने आता है और बड़े पैमाने पर जन-धन, फसलों, निर्माण कार्यों और वनस्पतियों का विनाश करता है, पनिया अकाल पैदा करता है। दूसरी ओर, जरूरत से कम गिरा पानी फसलों को नुकसान पहुंचाता है और पेयजल का संकट पैदा करता है।

पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पर्यावरणीय हानि और प्राकृतिक संसाधनों की क्षति के कारण पूरे इलाके में गरीबी का कुचक्र पैर पसारने लगता है। लगातार आती बाढ़ और साल दर साल पड़ने वाला सूखा, पलायन की परिस्थितियां पैदा करता है। उसकी संहारक ताकत का अहसास पाले के रूप में भी देखने के लिए मिलता है।

समुद्री तूफान, सुनामी, बर्फ के तूफान और ढाल के सहारे तेजी से नीचे फिसलती बर्फ, बादलों का फटना भी कम विनाशकारी नहीं होता। बहता पानी जब गति पकड़ता है तो वह मिट्टी के कणों को विस्थापित कर कटाव को जन्म देता है। वह एक ओर बीहड़ बनाता है तो दूसरी ओर मिट्टी की उपजाऊ परत को भी बहाकर ले जाता है। वह नदी घाटी को स्वरूप देता है तो दूसरी ओर डेल्टा बनाता है। बर्फ के रूप में भी वह कटाव करता है और मिट्टी और पत्थरों को विस्थापन का काम करता है।

पानी का दूसरा काम मिट्टी को बनाना, उसे अपने मूल स्थान से विस्थापित करना और फिर अन्य उपयुक्त स्थानों पर जमा करना भी है। संसार की सभी नदियों के कछार इसी प्रक्रिया से बने हैं। जलाशयों में गाद का जमा होना इसी प्रक्रिया का नतीजा है। भू-आकृतियों का निर्माण और विनाश (धरती की ऊपरी सतह का लगातार बदलाव) पानी की इसी ताकत का नतीजा है। पानी की यही ताकत चट्टानों पर रासायनिक प्रतिक्रिया करती है, कुछ पदार्थों को घोल बनाकर बहा देती है और बची चट्टान को धीरे-धीरे मिट्टी में बदल देती है।

पानी द्वारा यह काम बहुत धीरे-धीरे किया जाता है इसलिए आंखों या सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से मिट्टी बनने या घोल बनने की क्रिया दिखाई नहीं देती। वैज्ञानिक बताते हैं कि पानी की यही ताकत जलवायु की मदद से सामान्य परिस्थितियों में एक साल में एक हेक्टेयर जमीन में आधा टन मिट्टी बना डालती हैं वे यह भी बताते हैं कि पानी अपना काम बहुत ही गुपचुप तरीके से करता है पर खेत से बह कर बाहर जाने वाली मिट्टी की कारगुजारी किसान की अनुभवी आंखाों से नहीं छुपती। मिट्टी का बनना और खेत से बहकर निकल जाना समाज के भले बुरे के लिए जिम्मेदार है।

पानी में घुले रासायनिक पदार्थ जब अपनी लक्ष्मण रेखा लांघ जाते हैं तो वे कई तरह की समस्याएं पैदा करते हैं। समुद्र के पानी का खारापन, अनेक मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में बाधक है। वाष्पीकरण के कारण अनेक बार, पानी में घुले अवांछित रासायनिक पदार्थ मिट्टी की ऊपरी परत में इकट्ठे हो जाते हैं। कई बार, सतही जल या भूमिगत जल में जब अवांछित रासायनिक पदार्थों की मात्रा सहनशीलता की सीमा से अधिक हो जाती है तो वह पेयजल, कल-कारखानों या सिंचाई में उसके उपयोग को बाधित करता है।

फ्लोराइड और आर्सेनिक की अधिकता से अनेक गंभीर बीमारियां होने लगती हैं। जल स्रोतों में अपशिष्ट और जहरीला कचरा फेंके जाने के कारण पूरी दुनिया में प्रदूषित जल की मात्रा बढ़ रही है और हर साल, लगभग 25 लाख लोग प्रदूषित जल से पैदा होने वाली बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।

पिछले कुछ सालों से ग्लोबल वार्मिंग अर्थात धरती के गरम होने की बात होने लगी है। जाहिर है, ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम में बदलाव आएगा पर उपयुक्त यही है कि हम अपनी बात केवल पानी तक सीमित रखें। इस अनुक्रम में उल्लेखनीय है कि वर्तमान में पानी की गंभीर कमी झेलने वाले दक्षिण एशिया, चीन, सहारा मरुस्थल, पश्चिमी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के एंडीज इलाके में ग्लोबल वार्मिंग के कारण पानी की कमी एवं पर्यावरण का ह्रास और अधिक गंभीर होगा। जलवायु परिवर्तन की वर्तमान दर के चलते अनुमान है कि सन 2025 तक पानी की कमी वाले देशों में लगभग तीन अरब लोग जल संकट की चपेट में आएंगे और पैदावार के 25 प्रतिशत तक कम होने की संभावना है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय पर्वत की मौजूदा हिम चादर की मोटाई कम होगी। हिमखंडों के तेजी से पिघलने से उस इलाके की पूरी की पूरी जलवायु ही बदल जाएगी। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों के पूरे नदी-तंत्र को मानसून के बाद कम पानी मिलेगा। निचले इलाकों में पानी के बंटवारों और उपयोगों पर गाज गिरेगी। सबसे अधिक नुकसान हिमालय क्षेत्र की पनबिजली योजनाओं के उत्पादन एवं सिंचाई पर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के कारण यदि भारत की धरती का तापमान एक डिग्री भी बढ़ता है तो अनुमान है कि जमीन में नमी घटेगी और वाष्पीकरण बढ़ जाएगा। इसका असर खेती पर पड़ेगा।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण एक ओर समुद्र की सीमाओं का विस्तार होगा और मौजूदा निचले इलाके पानी में डूबेंगे। दूसरी ओर बर्फ की चादर कम होने से आबादी बसाने के लिए नए इलाके प्राप्त होंगे। ग्लोबल वार्मिंग के कारण अधिकांश वर्षा वनों के उजड़ने की संभावना है। वनों के कम होने या उनके घनत्व में कमी से जलवायु और बरसात पर बुरा असर पड़ेगा। नई-नई बीमारियों और मलेरिया का प्रकोप बढ़ेगा।

पानी के उपयोग की फेहरिस्त बहुत लंबी है। हवा के बाद, पानी ही जीवन के लिए सबसे अधिक जरूरी है। मनुष्य उसका उपयोग पीने, भोजन पकाने, निस्तार जरूरतें पूरी करने और व्यक्तिगत स्वच्छता के लिए करता है। हर मनुष्य की यह प्राथमिक जरूरत है। गांव, कस्बे या शहर, जहां-जहां आबादी बढ़ती है वहां-वहां पेयजल, जल-मल निकास इत्यादि की व्यवस्था, किचन, गार्डन, पार्क, अस्पताल, स्कूल, कालेज, कार्यालय, फैक्टरियां, फायर ब्रिगेड, होटल, वाटर पार्क, स्वीमिंग पूल इत्यादि क्षेत्रों में पानी की मांग बढ़ती है।

जीवन शैली में आते बदलावों के कारण, साल दर साल, पानी की मांग में बढ़ोतरी और जरूरी होती जाती है। पानी की इस मांग को पूरा करना स्थानीय प्रशासन और सरकार का दायित्व बन जाता है। कुछ लोग इन जरूरतों का वर्गीकरण भी करते हैं। वे इन्हें मूलभूत आवश्यकता, सामाजिक आवश्यकता, व्यापारिक आवश्यकता इत्यादि रूपों में परिभाषित करते हैं और उसके प्रबंध को भी नए सिरे से वर्गीकृत करने की वकालत करते हैं पर नए या पुराने वर्गीकरण के बावजूद पानी की सकल मांग में बढ़ोतरी के अलावा अन्य कोई बदलाव नहीं होता।

पानी, समाज और सरकार की कहानी के इस मुकाम पर, पाठकों की समझ बढ़ाने एवं पानी संबंधी दिशाबोध समझने के लिए सबसे पहले देश के संविधान में पानी के उल्लेख और उसके बाद अद्यतन जल नीति की प्राथमिकताओं और उनमें समाज की भागीदारी या उपस्थिति को देखना किसी हद तक उचित होगा।

भारत के संविधान के प्रवेश-56, सूची-I एवं II में पानी के संबंध में केन्द्र और राज्यों के दायित्वों का निर्धारण किया गया है, जो इस प्रकार है-

सूची-I केन्द्र सूची


56, अंतरराज्यीय नदियों तथा घाटियों का संचालन और विकास, उस सीमा तक, जहां तक कि ऐसा संचालन और विकास, जनहित में संसद द्वारा विधि के अंतर्गत केन्द्र के नियंत्रण में घोषित किया गया है।

सूची-II राज्य सूची


17, जल, अर्थात जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, निकास और बांध, जलाशय और जल विद्युत, सूची-I के प्रवेश 56 के अधीन।

संविधान में जल के अर्थ और दृष्टिबोध की सीमा जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, निकास (ड्रेनेज) और बांध, जलाशय और जल विद्युत ही है। पानी के मामले में संविधान ने केन्द्र सरकार के अधिकारों की लक्ष्मण रेखा या सीमा अंतरराज्यीय नदियों तथा घाटियों के संचालन और विकास, उस सीमा तक, जहां तक कि ऐसा संचालन और विकास, जनहित में संसद द्वारा विधि के अंतर्गत घोषित किया गया हो; माना है। संविधान में भूजल और उससे जुड़ी बातों का जिक्र नहीं है। देश के संविधान ने पानी को राज्य का विषय माना है।

परियोजनाओं के क्रियान्वयन का अधिकार राज्यों को है। इस पूरे उल्लेख में समाज अनुपस्थित है फिर चाहे वह मामला अधिकारों का हो या भागीदारी का, उसका जिक्र कहीं नहीं है। प्रजा (समाज) की सर्वाधिक जरूरी आवश्यकता की पूर्ति एवं उसके विकास की जवाबदारी सरकार के हाथों में है।

संविधान के बाद, पानी पर दूसरा बंधनकारी दस्तावेज 1987 में देश की जलनीति के रूप में सामने आया। पानी पर सरकार का वह पहला नीतिगत दस्तावेज था। इस दस्तावेज के लागू होने के बाद, सन 2002 में, केन्द्र सरकार ने जलनीति पर दूसरा दस्तावेज जारी किया। कुछ जानकारों के अनुसार जलनीति के दोनों दस्तावेजों में सोच का नज़रिया लगभग समान है पर इस बात से सभी सहमत हैं कि सरकार के दृष्टिबोध का प्रतीक, जलनीति का दस्तावेज और परियोजनाएं, जलनीति आधारित मील के पत्थर होते हैं।

सरकार के दृष्टिबोध और जल नीति आधारित परियोजनाओं में समाज की अपेक्षाओं की पूर्ति और समस्याओं का हल छिपा होता है। इसलिए यही असली पैमाना है, यही असली समझ है और किसी हद तक यही अच्छे भविष्य की गारंटी है अतः कहा जा सकता है कि समाज की अपेक्षाओं का अक्स ही सही नीति है और ऐसा होना ही चाहिए। सरकार से अपेक्षित आकांक्षाओं का क्षितिज तो पानी का स्वराज एवं स्वावलंबन ही हो सकता है।

भारत की जलनीति (2002) के दस्तावेज में पानी के उपयोग की आयोजना और क्रियान्वयन की प्राथमिकताओं का जिक्र है जिसके अनुसार, देश में पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं का क्रम निम्नानुसार तय किया गया है-

1. पेय जल
2. सिंचाई
3. जल विद्युत या पनबिजली
4. इकोलॉजी
5. कृषि उद्योग एवं गैर कृषि उद्योग

भारत की जलनीति के दस्तावेज में प्राथमिकताओं, के क्रम को बदलने या उनमें कुछ नया जोड़ने का उल्लेख है। इसके अलावा, राज्यों को अपनी-अपनी नीति बनाने की सुविधा भी दी गई है।

भारत की जल नीति 2002 के दस्तावेज में पानी के उपयोग की आयोजना और क्रियान्वयन की प्राथमिकताओं की फेहरिस्त में पेयजल पहली पायदान पर है। सिंचाई दूसरे पायदान पर है। नीति में कम पानी और अधिक पानी चाहने वाली फसलों को पानी देने के मामले में अंतर नहीं किया गया है तथा उनके बीच प्राथमिकता का जिक्र अनुपस्थित है। तीसरे क्रम पर पनबिजली उत्पादन के लिए पानी की प्राथमिकता का उल्लेख है।

सब जानते हैं कि पनबिजली पैदा करने में पानी खर्च नहीं होता इसलिए पनबिजली के पैदा होने के बाद पानी की मात्रा ज्यों की त्यों रहेगी। चौथे क्रम पर इकोलॉजी और पांचवे क्रम पर कृषि उद्योग, गैर कृषि उद्योग और औद्योगिक उत्पादन के लिए पानी के उपयोग का जिक्र है। अंत में नौकायन, आमोद प्रमोद के लिए पानी का उपयोग दर्शाया है। सब जानते हैं कि नौकायन गतिविधियों में बहुत कम पानी खर्च होता है।

मध्यम और उच्च वर्ग की जीवनशैली बदलने के कारण आमोद प्रमोद की अनेक नई गतिविधियां अस्तित्व में आ रही हैं। अधिकाधिक लोगों द्वारा आधुनिक जीवनशैली अपनाने और आमोद प्रमोद के कारण पानी की मांग और उसका व्यय बढ़ रहा है पर निम्न वर्ग की बहुसंख्य आबादी की आजीविका के लिए आवंटन की प्राथमिकता अनुपस्थित है। उपर्युक्त विवरण से लगता है कि आने वाले दिनों में पानी को भी शायद अमीरी और गरीबी को नापने के पैरामीटर के रूप में काम में लेना संभव होगा।

गौरतलब है कि जलनीति में पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं का तो उल्लेख है पर विभिन्न कामों में लाए जाने वाले पानी के उपयोग की सीमाओं का उल्लेख नहीं है। कुछ लोगों को जल नीति के दस्तावेज में पानी के उपयोग की सीमाओं के उल्लेख की कमी खलती है तो कुछ लोग इसे एकदम गैर जरूरी मानते हैं। इसी तरह, कुछ लोग पानी के पुनःउपयोग या री-साइकिल को आवश्यक मानते हैं तो कुछ लोगों को री-साइकिल किए पानी को काम में लेते समय झिझक अनुभव होती है।

लेखक को लगता है कि आने वाले दिनों में पानी की बढ़ती मांग के कारण विभिन्न सेक्टरों में पानी के उपयोग की सीमाओं, बहुसंख्य समाज की जरूरतों, पानी से जुड़े कार्यक्रमों की फिलॉसफी और पानी के मानवीय चेहरे पर और अधिक ध्यान दिया जाएगा।

आंकड़ों और आज जल के बारे में हमारी समझ तथा देश के कायदे कानूनों पर आधारित बुनियादी बातों की समझ बनाने के बाद अगले पायदान पर पुरानी विरासत का जायजा ले लें। गुजरे जमाने के आईने में पानी की पानीदार तस्वीर देख लें और थोड़ी उसकी बात भी कर लें। जायका बदल जाएगा और पाठकों को लीक से हटकर पानी के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी मिलेगी।

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.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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